पुनि जल दीख रूप निज पावा
पुनि जल दीख रूप निज पावा
चौपाई १, दोहा १३६ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
पुनि जल दीख रूप निज पावा। तदपि हृदयँ संतोष न आवा॥ फरकत अधर कोप मन माहीं। सपदि चले कमलापति पाहीं॥ १ ॥
अर्थ
मुनि ने फिर जल में देखा, तो उन्हें अपना (असली) रूप प्राप्त हो गया; तब भी उन्हें सन्तोष नहीं हुआ। उनके ओंठ फड़क रहे थे और मन में क्रोध था। तुरंत ही वे भगवान् कमलापति के पास चले।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “नारद का शाप और मोहभंग” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १३६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में नारद का स्वयंवर में मोह, शाप और अंततः माया-भंग का वर्णन है।
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नारद का शाप और मोहभंग