श्राप सीस धरि हरषि हियँ प्रभु

दोहा १३७ · बालकाण्ड

दोहा पाठ

श्राप सीस धरि हरषि हियँ प्रभु बहु बिनती कीन्हि। निज माया कै प्रबलता करषि कृपानिधि लीन्हि॥ १३७ ॥

अर्थ

शाप को सिर पर चढ़ाकर, हृदय में हर्षित होते हुए प्रभु ने बहुत विनती की और कृपानिधान भगवान् ने अपनी माया की प्रबलता खींच ली।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “नारद का शाप और मोहभंग” प्रकरण का दोहा १३७ है। इस प्रकरण में नारद का स्वयंवर में मोह, शाप और अंततः माया-भंग का वर्णन है।

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नारद का शाप और मोहभंग