कुपथ माग रुज ब्याकुल रोगी

चौपाई १, दोहा १३३ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

कुपथ माग रुज ब्याकुल रोगी। बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी॥ एहि बिधि हित तुम्हार मैं ठयऊ। कहि अस अंतरहित प्रभु भयऊ॥ १ ॥

अर्थ

हे योगी मुनि! सुनिए, रोग से व्याकुल रोगी कुपथ्य माँगे तो वैद्य उसे नहीं देता। इसी प्रकार मैंने भी तुम्हारा हित करने की ठान ली है। ऐसा कहकर भगवान्‌ अन्तर्धान हो गए।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “नारद का शाप और मोहभंग” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १३३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में नारद का स्वयंवर में मोह, शाप और अंततः माया-भंग का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
नारद का शाप और मोहभंग