सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि

सोरठा १४० · बालकाण्ड

सोरठा पाठ

सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल। अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि॥ १४० ॥

अर्थ

देवता, मनुष्य और मुनियों में ऐसा कोई नहीं है जिसे भगवान् की महान् बलवती माया मोहित न कर दे। मन में ऐसा विचार कर उस महामाया के स्वामी (प्रेरक) श्रीभगवान् का भजन करना चाहिये।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “नारद का शाप और मोहभंग” प्रकरण का सोरठा १४० है। इस प्रकरण में नारद का स्वयंवर में मोह, शाप और अंततः माया-भंग का वर्णन है।

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नारद का शाप और मोहभंग