जो एहि बरइ अमर सोइ होई

चौपाई २, दोहा १३१ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

जो एहि बरइ अमर सोइ होई। समरभूमि तेहि जीत न कोई॥ सेवहिं सकल चराचर ताही। बरइ सीलनिधि कन्या जाही॥ २ ॥

अर्थ

[लक्षणों को सोचकर वे मन में कहने लगे कि] जो इसे ब्याहेगा, वह अमर हो जायगा और रणभूमि में कोई उसे जीत न सकेगा। यह शीलनिधि की कन्या जिसको वरेगी, सब चर-अचर जीव उसकी सेवा करेंगे।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “नारद का शाप और मोहभंग” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १३१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में नारद का स्वयंवर में मोह, शाप और अंततः माया-भंग का वर्णन है।

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नारद का शाप और मोहभंग