काहुँ न लखा सो चरित बिसेषा
काहुँ न लखा सो चरित बिसेषा
चौपाई ४, दोहा १३४ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
काहुँ न लखा सो चरित बिसेषा। सो सरूप नृपकन्याँ देखा॥ मर्कट बदन भयंकर देही। देखत हृदयँ क्रोध भा तेही॥ ४ ॥
अर्थ
इस विशेष चरित को और किसी ने नहीं जाना, केवल राजकन्या ने [नारदजी का] वह रूप देखा। उनका बंदर-सा मुँह और भयंकर शरीर देखते ही कन्या के हृदय में क्रोध उत्पन्न हो गया।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “नारद का शाप और मोहभंग” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १३४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में नारद का स्वयंवर में मोह, शाप और अंततः माया-भंग का वर्णन है।
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नारद का शाप और मोहभंग