करहिं कूटि नारदहि सुनाई

चौपाई २, दोहा १३४ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

करहिं कूटि नारदहि सुनाई। नीकि दीन्हि हरि सुंदरताई॥ रीझिहि राजकुअँरि छबि देखी। इन्हहि बरिहि हरि जानि बिसेषी॥ २ ॥

अर्थ

वे नारदजी को सुना-सुनाकर व्यंग्य वचन कहते थे--भगवान् ने इनको अच्छी 'सुन्दरता' दी है। इनकी शोभा देखकर राजकुमारी रीझ ही जाएगी और 'हरि!' (वानर) जानकर इन्हीं को खास तौर से वरेगी।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “नारद का शाप और मोहभंग” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १३४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में नारद का स्वयंवर में मोह, शाप और अंततः माया-भंग का वर्णन है।

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नारद का शाप और मोहभंग