नारद का अभिमान और माया का प्रभाव
देवर्षि नारद तप से कामदेव को जीतकर अभिमान से भर उठते हैं। भगवान की माया उन्हें सूक्ष्म रूप से स्पर्श करती है और उनकी परीक्षा का मार्ग तैयार होता है।
बालकाण्ड · प्रकरण ३० / ५९
प्रकरण पाठ
तब नारद गवने सिव पाहीं। जिता काम अहमिति मन माहीं॥ मार चरित संकरहि सुनाए। अतिप्रिय जानि महेस सिखाए॥ ३ ॥
अर्थ:
तब नारदजी शिवजी के पास गये। उनके मन में इस बात का अहंकार हो गया कि हमने कामदेव को जीत लिया। उन्होंने कामदेव के चरित्र शिवजी को सुनाये और महादेवजी ने उन (नारदजी) को अत्यन्त प्रिय जानकर [इस प्रकार] शिक्षा दी--।
एक बार करतल बर बीना। गावत हरि गुन गान प्रबीना॥ छीरसिंधु गवने मुनिनाथा। जहँ बस श्रीनिवास श्रुतिमाथा॥ २ ॥
अर्थ:
एक बार गानविद्या में निपुण मुनिनाथ नारदजी हाथ में सुन्दर वीणा लिये, हरिगुण गाते हुए क्षीरसागर को गये, जहाँ वेदों के मस्तकस्वरूप (मूर्तिमान् वेदान्ततत्त्व) लक्ष्मीनिवास भगवान् नारायण रहते हैं।
काम चरित नारद सब भाषे। जद्यपि प्रथम बरजि सिवँ राखे॥ अति प्रचंड रघुपति कै माया। जेहि न मोह अस को जग जाया॥ ४ ॥
अर्थ:
यद्यपि श्रीशिवजी ने उन्हें पहले से ही बरज रखा था, तो भी नारदजी ने कामदेव का सारा चरित्र भगवान् को कह सुनाया। श्रीरघुनाथजी की माया बड़ी ही प्रबल है। जगत् में ऐसा कौन जन्मा है जिसे वह मोहित न कर दे।
सुनु मुनि मोह होइ मन ताकें। ग्यान बिराग हृदय नहिं जाकें॥ ब्रह्मचरज ब्रत रत मतिधीरा। तुम्हहि कि करइ मनोभव पीरा॥ १ ॥
अर्थ:
हे मुनि! सुनिये, मोह तो उसके मन में होता है जिसके हृदय में ज्ञान-वैराग्य नहीं है। आप तो ब्रह्मचर्य-व्रत में तत्पर और बड़े धीरबुद्धि हैं। भला, कहीं आपको भी कामदेव सता सकता है ?