जब हरि माया दूरि निवारी

चौपाई १, दोहा १३८ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

जब हरि माया दूरि निवारी। नहिं तहँ रमा न राजकुमारी॥ तब मुनि अति सभीत हरि चरना। गहे पाहि प्रनतारति हरना॥ १ ॥

अर्थ

जब भगवान्‌ने अपनी माया को हटा लिया, तब वहाँ न लक्ष्मी ही रह गयीं, न राजकुमारी ही। तब मुनि ने अत्यन्त भयभीत होकर श्रीहरि के चरण पकड़ लिये और कहा--हे शरणागत के दुःखों को हरनेवाले! मेरी रक्षा कीजिये।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “नारद का शाप और मोहभंग” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १३८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में नारद का स्वयंवर में मोह, शाप और अंततः माया-भंग का वर्णन है।

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नारद का शाप और मोहभंग