असुर सुरा बिष संकरहि आपु रमा
असुर सुरा बिष संकरहि आपु रमा
दोहा १३६ · बालकाण्ड
दोहा पाठ
असुर सुरा बिष संकरहि आपु रमा मनि चारु। स्वारथ साधक कुटिल तुम्ह सदा कपट ब्यवहारु॥ १३६ ॥
अर्थ
असुरों को मदिरा और शिवजी को विष देकर तुमने स्वयं लक्ष्मी और सुन्दर [कौस्तुभ] मणि ले ली। तुम बड़े धोखेबाज और मतलबी हो। सदा कपट का व्यवहार करते हो।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “नारद का शाप और मोहभंग” प्रकरण का दोहा १३६ है। इस प्रकरण में नारद का स्वयंवर में मोह, शाप और अंततः माया-भंग का वर्णन है।
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नारद का शाप और मोहभंग