डहकि डहकि परिचेहु सब काहू

चौपाई २, दोहा १३७ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

डहकि डहकि परिचेहु सब काहू। अति असंक मन सदा उछाहू॥ करम सुभासुभ तुम्हहि न बाधा। अब लगि तुम्हहि न काहूँ साधा॥ २ ॥

अर्थ

सबको ठग-ठगकर परखे हो और अत्यन्त निडर हो गये हो; इसीसे [ठगने के काम में ] मन में सदा उत्साह रहता है। शुभ-अशुभ कर्म तुम्हें बाधा नहीं देते। अब तक तुमको किसी ने ठीक नहीं किया था।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “नारद का शाप और मोहभंग” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १३७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में नारद का स्वयंवर में मोह, शाप और अंततः माया-भंग का वर्णन है।

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नारद का शाप और मोहभंग