श्रीभगवान का प्राकट्य और बाललीला का आनंद

अयोध्या में भगवान श्रीराम का मंगलमय प्राकट्य होता है और नगर आनंद से भर उठता है। बाललीलाओं से माता-पिता, परिजन और भक्तजन निरंतर हर्षित होते हैं।

बालकाण्ड · प्रकरण ३८ / ५९

प्रकरण पाठ

छन्द

भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी। हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥ लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी। भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी॥ १ ॥

अर्थ:

दीनों पर दया करनेवाले, कौसल्याजी के हितकारी कृपालु प्रभु प्रकट हुए। मुनियों के मन को हरनेवाले उनके अद्भुत रूप को देखकर माता हर्ष से भर गयी। नेत्रों को आनन्द देनेवाला मेघ के समान श्यामशरीर था; चारों भुजाओं में अपने (खास) आयुध [धारण किये हुए] थे; [दिव्य] आभूषण और वनमाला पहने थे; बड़े-बड़े नेत्र थे। इस प्रकार शोभाके समुद्र तथा खर राक्षस को मारनेवाले भगवान्‌ प्रकट हुए।

छन्द

कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता। माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता॥ करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता। सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता॥ २ ॥

अर्थ:

दोनों हाथ जोड़कर माता कहने लगी-हे अनन्त! मैं किस प्रकार तुम्हारी स्तुति करूँ। वेद और पुराण तुमको माया, गुण और ज्ञानसे परे और परिमाणरहित बतलाते हैं। श्रुतियाँ और संतजन दया और सुखका समुद्र, सब गुणोंका धाम कहकर जिनका गान करते हैं, वही भक्तोंपर प्रेम करनेवाले लक्ष्मीपति भगवान्‌ मेरे कल्याणके लिये प्रकट हुए हैं।

छन्द

ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै। मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहै॥ उपजा जब ग्याना प्रभु मुसुकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै। कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै॥ ३ ॥

अर्थ:

वेद कहते हैं कि तुम्हारे प्रत्येक रोम में माया के रचे हुए अनेकों ब्रह्माण्डों के समूह [भरे] हैं। वे तुम मेरे गर्भ में रहे--इस हँसीकी बात के सुनने पर धीर (विवेकी) पुरुषों की बुद्धि भी स्थिर नहीं रहती (विचलित हो जाती है)। जब माताको ज्ञान उत्पन्न हुआ, तब प्रभु मुसकराये। वे बहुत प्रकारके चरित्र करना चाहते हैं। अतः उन्होंने [पूर्वजन्मकी] सुन्दर कथा कहकर माताको समझाया, जिससे उन्हें पुत्रका (वात्सल्य) प्रेम प्राप्त हो (भगवानके प्रति पुत्रभाव हो जाय)।

छन्द

माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा। कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा॥ सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा। यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा॥ ४ ॥

अर्थ:

माताकी वह बुद्धि बदल गयी, तब वह फिर बोली-हे तात! यह रूप छोड़कर अत्यन्त प्रिय बाललीला करो, [मेरे लिये] यह सुख परम अनुपम होगा। [माताका] यह वचन सुनकर देवताओंके स्वामी सुजान भगवान्‌ने बालक [रूप] होकर रोना शुरू कर दिया। [तुलसीदासजी कहते हैं--] जो इस चरित्रका गान करते हैं, वे श्रीहरिका पद पाते हैं और [फिर] संसाररूपी कृपमें नहीं गिरते।

दोहा

बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार। निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार॥ १९२ ॥

अर्थ:

ब्राह्मण, गौ, देवता और संतोंके लिये भगवान्‌ने मनुष्यका अवतार लिया। वे [अज्ञानमयी, मलिना] माया और उसके गुण (सत्‌, रज, तम) और [बाहरी तथा भीतरी] इन्द्रियोंसे परे हैं। उनका [दिव्य] शरीर अपनी इच्छासे ही बना है [किसी कर्मबन्धनसे परवश होकर त्रिगुणात्मक भौतिक पदार्थोके द्वारा नहीं]।

दोहा 193 के अंतर्गत
चौपाई

सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी। संभ्रम चलि आईं सब रानी॥ हरषित जहँ तहँ धाईं दासी। आनँद मगन सकल पुरबासी॥ १ ॥

अर्थ:

बच्चेके रोनेकी बहुत ही प्यारी ध्वनि सुनकर सब रानियाँ उतावली होकर दौड़ी चली आयीं। दासियाँ हर्षित होकर जहाँ-तहाँ दौड़ीं। सारे पुरवासी आनन्दमें मग्र हो गये।

चौपाई

दसरथ पुत्रजन्म सुनि काना। मानहुँ ब्रह्मानंद समाना॥ परम प्रेम मन पुलक सरीरा। चाहत उठन करत मति धीरा॥ २ ॥

अर्थ:

राजा दशरथजी पुत्र के जन्म की बात कानों से सुनकर मानो ब्रह्मानन्दमें समा गये। मनमें अतिशय प्रेम है, शरीर पुलकित हो गया। [आनन्दमें अधीर हुई] बुद्धिको धीरज देकर [और प्रेममें शिथिल हुए शरीरको सँभालकर] वे उठना चाहते हैं।

चौपाई

जाकर नाम सुनत सुभ होई। मोरें गृह आवा प्रभु सोई॥ परमानंद पूरि मन राजा। कहा बोलाइ बजावहु बाजा॥ ३ ॥

अर्थ:

जिनका नाम सुननेसे ही कल्याण होता है, वही प्रभु मेरे घर आये हैं। [यह सोचकर] राजाका मन परम आनन्दसे पूर्ण हो गया। उन्होंने बाजेवालोंको बुलाकर कहा कि बाजा बजाओ।

चौपाई

गुर बसिष्ठ कहँ गयउ हँकारा। आए द्विजन सहित नृपद्वारा॥ अनुपम बालक देखेन्हि जाई। रूप रासि गुन कहि न सिराई॥ ४ ॥

अर्थ:

गुरु वसिष्ठजी के पास बुलावा गया। वे ब्राह्मणों के साथ राजद्वार पर आये। उन्होंने जाकर अनुपम बालक को देखा, जो रूप की राशि है और जिसके गुण कहने से समाप्त नहीं होते।

दोहा

नंदीमुख सराध करि जातकरम सब कीन्ह। हाटक धेनु बसन मनि नृप बिप्रन्ह कहँ दीन्ह॥ १९३ ॥

अर्थ:

फिर राजा ने नान्दीमुख श्राद्ध करके सब जातकर्म-संस्कार आदि किये और ब्राह्मणों को सोना, गौ, वस्त्र और मणियों का दान दिया।

दोहा 194 के अंतर्गत
चौपाई

ध्वज पताक तोरन पुर छावा। कहि न जाइ जेहि भाँति बनावा॥ सुमनबृष्टि अकास तें होई। ब्रह्मानंद मगन सब लोई॥ १ ॥

अर्थ:

ध्वजा, पताका और तोरणों से नगर छा गया। जिस प्रकार से वह सजाया गया, उसका तो वर्णन ही नहीं हो सकता। आकाश से फूलों की वर्षा हो रही है, सब लोग ब्रह्मानन्द में मग्न हैं।

चौपाई

बृंद बृंद मिलि चलीं लोगाईं। सहज सिंगार किएँ उठि धाईं॥ कनक कलस मंगल भरि थारा। गावत पैठहिं भूप दुआरा॥ २ ॥

अर्थ:

स्त्रियाँ झुंड-की-झुंड मिलकर चलीं। स्वाभाविक श्रृंगार किए ही वे उठ दौड़ीं। सोने का कलश लेकर और थालों में मंगल भरकर गाती हुई राजद्वार में प्रवेश करती हैं।

चौपाई

करि आरति नेवछावरि करहीं। बार बार सिसु चरनन्हि परहीं॥ मागध सूत बंदिगन गायक। पावन गुन गावहिं रघुनायक॥ ३ ॥

अर्थ:

वे आरती करके नेवछावर करती हैं और बार-बार बच्चे के चरणों पर गिरती हैं। मागध, सूत, बंदिगन और गायक रघुनायक के पावन गुण गाते हैं।

चौपाई

सर्बस दान दीन्ह सब काहू। जेहिं पावा राखा नहिं ताहू॥ मृगमद चंदन कुंकुम कीचा। मची सकल बीथिन्ह बिच बीचा॥ ४ ॥

अर्थ:

राजा ने सभी को भरपूर दान दिया। जिसने पाया उसने भी नहीं रखा (लुटा दिया)। [नगर की] सभी गलियों के बीच-बीच में मृगमद, चंदन और कुंकुम की कीच मच गई।

दोहा

गृह गृह बाज बधाव सुभ प्रगटे सुषमा कंद। हरषवंत सब जहँ तहँ नगर नारि नर बृंद॥ १९४ ॥

अर्थ:

घर-घर बाज-बधाई शुभ प्रगट हुई शोभा के कंद। हरषवंत सब जहाँ-तहाँ नगर नारि नर बृंद॥

दोहा 195 के अंतर्गत
चौपाई

कैकयसुता सुमित्रा दोऊ। सुंदर सुत जनमत भैं ओऊ॥ वह सुख संपति समय समाजा। कहि न सकइ सारद अहिराजा॥ १ ॥

अर्थ:

कैकेयी और सुमित्रा--इन दोनों ने भी सुन्दर पुत्रों को जन्म दिया। उस सुख, सम्पत्ति, समय और समाज का वर्णन सरस्वती और सर्पों के राजा शेषजी भी नहीं कर सकते।

चौपाई

अवधपुरी सोहइ एहि भाँती। प्रभुहि मिलन आई जनु राती॥ देखि भानु जनु मन सकुचानी। तदपि बनी संध्या अनुमानी॥ २ ॥

अर्थ:

अवधपुरी इस प्रकार सुशोभित हो रही है, मानो रात्रि प्रभु से मिलने आयी हो और सूर्य को देखकर मन में सकुचा गयी हो, परन्तु फिर भी मन में विचार कर वह मानो सन्ध्या बन गयी हो।

चौपाई

अगर धूप बहु जनु अँधिआरी। उड़इ अबीर मनहुँ अरुनारी॥ मंदिर मनि समूह जनु तारा। नृप गृह कलस सो इंदु उदारा॥ ३ ॥

अर्थ:

अगर की धूप का बहुत-सा धुआँ मानो [सन्ध्या का] अन्धकार है और जो अबीर उड़ रहा है, वह उसकी ललाई है। महलों में जो मणियों के समूह हैं, वे मानो तारागण हैं। राजमहल का जो कलश है, वही मानो श्रेष्ठ चन्द्रमा है।

चौपाई

भवन बेदधुनि अति मृदु बानी। जनु खग मुखर समयँ जनु सानी॥ कौतुक देखि पतंग भुलाना। एक मास तेइँ जात न जाना॥ ४ ॥

अर्थ:

राजभवन में जो अति कोमल वाणी से वेदध्वनि हो रही है, वही मानो खगों की मुखरता समय में सनी हुई हो। यह कौतुक देखकर पतंग भी [अपनी चाल] भूल गया। एक महीना उसने बीतता हुआ न जाना (अर्थात्‌ उसे एक महीना वहीं बीत गया)।

दोहा

मास दिवस कर दिवस भा मरम न जानइ कोइ। रथ समेत रबि थाकेउ निसा कवन बिधि होइ॥ १९५ ॥

अर्थ:

महीने भर का दिन हो गया। इस रहस्य को कोई नहीं जानता। सूर्य अपने रथ समेत थक गये, फिर रात किस प्रकार होती?

दोहा 196 के अंतर्गत
चौपाई

यह रहस्य काहूँ नहिं जाना। दिनमनि चले करत गुनगाना॥ देखि महोत्सव सुर मुनि नागा। चले भवन बरनत निज भागा॥ १ ॥

अर्थ:

यह रहस्य किसी ने नहीं जाना। सूर्यदेव गुणगान करते हुए चले। यह महोत्सव देखकर देवता, मुनि और नाग अपने भाग्य की सराहना करते हुए अपने-अपने घर चले।

चौपाई

औरउ एक कहउँ निज चोरी। सुनु गिरिजा अति दृढ़ मति तोरी॥ काकभुसुंडि संग हम दोऊ। मनुजरूप जानइ नहिं कोऊ॥ २ ॥

अर्थ:

हे पार्वती! तुम्हारी बुद्धि बहुत दृढ़ है, इसलिए मैं और भी अपनी एक चोरी (छिपाव) की बात कहता हूँ, सुनो। काकभुशुण्डि और मैं दोनों वहाँ साथ-साथ थे, परन्तु मनुष्य रूप में होने के कारण हमें कोई जान न सका।

चौपाई

परमानंद प्रेम सुख फूले। बीथिन्ह फिरहिं मगन मन भूले॥ यह सुभ चरित जान पै सोई। कृपा राम कै जापर होई॥ ३ ॥

अर्थ:

परमानन्द और प्रेम-सुख में फूले हुए हम दोनों मगन मन से (मस्त हुए) गलियों में [तन-मन की सुधि] भूले हुए फिरते थे। परन्तु यह शुभ चरित्र वही जान सकता है, जिस पर श्रीराम की कृपा हो।

चौपाई

तेहि अवसर जो जेहि बिधि आवा। दीन्ह भूप जो जेहि मन भावा॥ गज रथ तुरग हेम गो हीरा। दीन्हे नृप नानाबिधि चीरा॥ ४ ॥

अर्थ:

उस अवसर पर जो जिस प्रकार आया और जिसके मन को जो अच्छा लगा, राजा ने उसे वही दिया। हाथी, रथ, घोड़े, सोना, गौएँ, हीरे और भाँति-भाँति के वस्त्र राजा ने दिये।

दोहा

मन संतोषे सबन्हि के जहँ तहँ देहिं असीस। सकल तनय चिर जीवहुँ तुलसिदास के ईस॥ १९६ ॥

अर्थ:

राजा ने सबके मन को सन्तुष्ट किया। [इसीसे] सब लोग जहाँ-तहाँ आशीर्वाद दे रहे थे कि तुलसीदास के ईस (स्वामी) सब पुत्र (चारों राजकुमार) चिरजीवी हों।

दोहा 197 के अंतर्गत
चौपाई

कछुक दिवस बीते एहि भाँती। जात न जानिअ दिन अरु राती॥ नामकरन कर अवसरु जानी। भूप बोलि पठए मुनि ग्यानी॥ १ ॥

अर्थ:

इस प्रकार कुछ दिन बीत गये। दिन और रात जाते हुए जान नहीं पड़ते। तब नामकरण संस्कार का समय जानकर राजाने ज्ञानी मुनि श्रीवसिष्ठजी को बुला भेजा।

चौपाई

करि पूजा भूपति अस भाषा। धरिअ नाम जो मुनि गुनि राखा॥ इन्ह के नाम अनेक अनूपा। मैं नृप कहब स्वमति अनुरूपा॥ २ ॥

अर्थ:

मुनि की पूजा करके राजाने कहा--हे मुनि! आपने मन में जो विचार रखे हों, वे नाम रखिये। [मुनि ने कहा--] हे राजन्‌! इनके अनेक अनुपम नाम हैं, फिर भी मैं अपनी बुद्धि के अनुसार कहूँगा।

चौपाई

जो आनंद सिंधु सुखरासी। सीकर तें त्रैलोक सुपासी॥ सो सुखधाम राम अस नामा। अखिल लोक दायक बिश्रामा॥ ३ ॥

अर्थ:

ये जो आनन्द के समुद्र और सुख की राशि हैं, जिस (आनन्द-सिन्धु) के एक कण से तीनों लोक सुखी होते हैं, उन (आपके सबसे बड़े पुत्र) का नाम 'राम' है, जो सुख का भवन और सम्पूर्ण लोकों को शान्ति देने वाला है।

चौपाई

बिस्व भरन पोषन कर जोई। ताकर नाम भरत अस होई॥ जाके सुमिरन तें रिपु नासा। नाम सत्रुहन बेद प्रकासा॥ ४ ॥

अर्थ:

जो संसार का भरण-पोषण करते हैं, उन (आपके दूसरे पुत्र) का नाम 'भरत' होगा। जिनके स्मरण मात्र से शत्रु का नाश होता है, उनका वेदों में प्रसिद्ध 'शत्रुघ्न' नाम है।

दोहा

लच्छन धाम राम प्रिय सकल जगत आधार। गुरु बसिष्ट तेहि राखा लछिमन नाम उदार॥ १९७ ॥

अर्थ:

जो शुभ लक्षणों के धाम, श्रीरामजी के प्यारे और सारे जगत् के आधार हैं, गुरु वसिष्ठजी ने उनका “लक्ष्मण” ऐसा श्रेष्ठ नाम रखा।

दोहा 198 के अंतर्गत
चौपाई

धरे नाम गुर हृदयँ बिचारी। बेद तत्व नृप तव सुत चारी॥ मुनि धन जन सरबस सिव प्राना। बाल केलि रस तेहिं सुख माना॥ १ ॥

अर्थ:

गुरुजी ने हृदय में विचार कर ये नाम रखे [और कहा--] हे राजन्‌! तुम्हारे चारों पुत्र वेद के तत्त्व हैं। जो मुनियों के धन, भक्तों के सर्वस्व और शिवजी के प्राण हैं, उन्होंने [इस समय तुम लोगों के प्रेमवश] बाललीला के रस में सुख माना है।

चौपाई

बारेहि ते निज हित पति जानी। लछिमन राम चरन रति मानी॥ भरत सत्रुहन दूनउ भाई। प्रभु सेवक जसि प्रीति बड़ाई॥ २ ॥

अर्थ:

बचपन से ही श्रीरामचन्द्रजी को अपना परम हितैषी स्वामी जानकर लक्ष्मणजी ने उनके चरणों में प्रीति जोड़ ली। भरत और शत्रुघ्न दोनों भाइयों में स्वामी और सेवक की जिस प्रीति की प्रशंसा है वैसी प्रीति हो गयी।

चौपाई

स्याम गौर सुंदर दोउ जोरी। निरखहिं छबि जननीं तृन तोरी॥ चारिउ सील रूप गुन धामा। तदपि अधिक सुखसागर रामा॥ ३ ॥

अर्थ:

श्याम और गौर शरीरवाली दोनों सुन्दर जोड़ियों की शोभा को देखकर माताएँ तृण तोड़ती हैं [जिसमें दीठ न लग जाय]। यों तो चारों ही पुत्र शील, रूप और गुण के धाम हैं, तो भी सुख के समुद्र श्रीरामचन्द्रजी सबसे अधिक हैं।

चौपाई

हृदयँ अनुग्रह इंदु प्रकासा। सूचत किरन मनोहर हासा॥ कबहुँ उछंग कबहुँ बर पलना। मातु दुलारइ कहि प्रिय ललना॥ ४ ॥

अर्थ:

उनके हृदय में कृपारूपी चन्द्रमा प्रकाशित है। उनकी मन को हरने वाली हँसी उस (कृपारूपी चन्द्रमा) की किरणों को सूचित करती है। कभी गोद में [लेकर] और कभी उत्तम पालने में [लिटाकर] माता “प्यारे ललना!” कहकर दुलारती है।

दोहा

ब्यापक ब्रह्म निरंजन निर्गुन बिगत बिनोद। सो अज प्रेम भगति बस कौसल्या कें गोद॥ १९८ ॥

अर्थ:

जो सर्वव्यापक, निरंजन, निर्गुण, विनोदरहित और अजन्मा ब्रह्म हैं, वही प्रेम और भक्ति के वश कौसल्याजी की गोद में [खेल रहे] हैं।

दोहा 199 के अंतर्गत
चौपाई

काम कोटि छबि स्याम सरीरा। नील कंज बारिद गंभीरा॥ अरुन चरन पंकज नख जोती। कमल दलन्हि बैठे जनु मोती॥ १ ॥

अर्थ:

उनके नील कमल और गम्भीर (जल से भरे हुए) मेघ के समान श्याम शरीर में करोड़ों कामदेवों की शोभा है। लाल-लाल चरणकमलों के नखों की [शुभ्र] ज्योति ऐसी मालूम होती है जैसे [लाल] कमल के पत्तों पर मोती स्थिर हो गए हों।

चौपाई

रेख कुलिस ध्वज अंकुस सोहे। नूपुर धुनि सुनि मुनि मन मोहे॥ कटि किंकिनी उदर त्रय रेखा। नाभि गभीर जान जेहिं देखा॥ २ ॥

अर्थ:

[चरणतलों में] वज्र, ध्वजा और अंकुश के चिह्न शोभित हैं। नूपुर (पैंजनी) की ध्वनि सुनकर मुनियों का मन भी मोहित हो जाता है। कमर में करधनी और पेट पर तीन रेखाएँ (त्रिवली) हैं। नाभि की गम्भीरता को तो वही जानते हैं जिन्होंने उसे देखा है।

चौपाई

भुज बिसाल भूषन जुत भूरी। हियँ हरि नख अति सोभा रूरी॥ उर मनिहार पदिक की सोभा। बिप्र चरन देखत मन लोभा॥ ३ ॥

अर्थ:

बहुत-से आभूषणों से सुशोभित विशाल भुजाएँ हैं। हृदय पर हरि-नख की बहुत ही निराली छटा है। छाती पर मनिहार-पदिक की शोभा है; ब्राह्मण-चरण देखते ही मन लुभा जाता है।

चौपाई

कंबु कंठ अति चिबुक सुहाई। आनन अमित मदन छबि छाई॥ दुइ दुइ दसन अधर अरुनारे। नासा तिलक को बरनै पारे॥ ४ ॥

अर्थ:

कण्ठ शंख के समान है और ठोड़ी बहुत ही सुहावनी है। मुख पर अनन्त कामदेवों की छटा छाई हुई है। दो-दो दाँत हैं, लाल-लाल ओठ हैं। नासिका और तिलक के सौन्दर्य का तो वर्णन ही कौन कर सकता है।

चौपाई

सुंदर श्रवन सुचारु कपोला। अति प्रिय मधुर तोतरे बोला॥ चिक्कन कच कुंचित गभुआरे। बहु प्रकार रचि मातु सँवारे॥ ५ ॥

अर्थ:

सुन्दर कान और सुचारु गाल हैं, मधुर तोतली बोली बहुत ही प्यारी लगती है। चिकने, घुँघराले बाल हैं, जिन्हें माता ने बहुत प्रकार से रचकर सँवारा है।

चौपाई

पीत झगुलिआ तनु पहिराई। जानु पानि बिचरनि मोहि भाई॥ रूप सकहिं नहिं कहि श्रुति सेषा। सो जानइ सपनेहुँ जेहिं देखा॥ ६ ॥

अर्थ:

शरीर पर पीली झगुली पहनाई हुई है। उनका घुटनों और हाथों के बल चलना मुझे बहुत भाई। उनके रूप का वर्णन वेद और शेषजी भी नहीं कर सकते। उसे वही जानता है जिसने सपने में भी देखा हो।

दोहा

सुख संदोह मोहपर ग्यान गिरा गोतीत। दंपति परम प्रेम बस कर सिसुचरित पुनीत॥ १९९ ॥

अर्थ:

जो सुख के पुंज, मोह से परे तथा ज्ञान और वाणी से अतीत हैं, वे दंपति के परम प्रेम बस होकर पवित्र बालचरित करते हैं।

दोहा 200 के अंतर्गत
चौपाई

एहि बिधि राम जगत पितु माता। कोसलपुर बासिन्ह सुखदाता॥ जिन्ह रघुनाथ चरन रति मानी। तिन्ह की यह गति प्रगट भवानी॥ १ ॥

अर्थ:

इस प्रकार [सम्पूर्ण] जगत् के माता-पिता श्रीरामजी कोसलपुर वासियों को सुख देते हैं। जिन्होंने श्रीरघुनाथजी के चरणों में प्रीति मानी है, हे भवानी! उनकी यह प्रत्यक्ष गति है।

चौपाई

रघुपति बिमुख जतन कर कोरी। कवन सकइ भव बंधन छोरी॥ जीव चराचर बस कै राखे। सो माया प्रभु सों भय भाखे॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी से विमुख रहकर मनुष्य चाहे करोड़ों उपाय करे, परन्तु उसका संसार-बन्धन कौन छुड़ा सकता है। जिसने सब चराचर जीवों को वश में करके रखा है, वही माया प्रभु से भय खाती है।

चौपाई

भृकुटि बिलास नचावइ ताही। अस प्रभु छाड़ि भजिअ कहु काही॥ मन क्रम बचन छाड़ि चतुराई। भजत कृपा करिहहिं रघुराई॥ ३ ॥

अर्थ:

भगवान् उस मायाको भौंह के इशारे पर नचाते हैं। ऐसे प्रभुको छोड़कर कहो, किसका भजन किया जाय। मन, वचन और कर्म से चतुराई छोड़कर भजते ही श्रीरघुनाथजी कृपा करेंगे।

चौपाई

एहि बिधि सिसुबिनोद प्रभु कीन्हा। सकल नगरबासिन्ह सुख दीन्हा॥ लै उछंग कबहुँक हलरावै। कबहुँ पालने घालि झुलावै॥ ४ ॥

अर्थ:

इस प्रकार प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने बालक्रीड़ा की और समस्त नगरवासियों को सुख दिया। कौसल्याजी कभी उन्हें गोद में लेकर हिलाती-डुलातीं और कभी पालने में लिटाकर झुलातीं थीं।

दोहा

प्रेम मगन कौसल्या निसि दिन जात न जान। सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान॥ २०० ॥

अर्थ:

प्रेम में मग्न कौसल्याजी रात और दिन का बीतना नहीं जानती थीं। पुत्र-स्नेह के वश माता बालचरितों का गान किया करती थीं।

दोहा 201 के अंतर्गत
चौपाई

एक बार जननीं अन्हवाए। करि सिंगार पलनाँ पौढ़ाए॥ निज कुल इष्टदेव भगवाना। पूजा हेतु कीन्ह अस्नाना॥ १ ॥

अर्थ:

एक बार माता ने श्रीरामचन्द्रजी को स्नान कराया और श्रृंगार करके पालने पर पौढ़ा दिया। फिर अपने कुल के इष्टदेव भगवान् की पूजा के लिए स्नान किया।

चौपाई

करि पूजा नैबेद्य चढ़ावा। आपु गई जहँ पाक बनावा॥ बहुरि मातु तहवाँ चलि आई। भोजन करत देख सुत जाई॥ २ ॥

अर्थ:

पूजा करके नैवेद्य चढ़ाया और स्वयं वहाँ गयी, जहाँ पाक बनाया गया था। फिर माता वहाँ लौटकर आईं और वहाँ आकर पुत्र को भोजन करते देखा।

चौपाई

गै जननी सिसु पहिं भयभीता। देखा बाल तहाँ पुनि सूता॥ बहुरि आइ देखा सुत सोई। हृदयँ कंप मन धीर न होई॥ ३ ॥

अर्थ:

माता भयभीत होकर (यह सोचकर कि वह तो पालने में सोया था, यहाँ किसने लाकर बैठा दिया?) पुत्र के पास गयीं, तो वहाँ बालक को सोया हुआ देखा। फिर [पूजास्थान में लौटकर] देखा कि वही पुत्र वहाँ [भोजन कर रहा] था। उनके हृदय में कम्प होने लगा और मन को धीरज नहीं होता।

चौपाई

इहाँ उहाँ दुइ बालक देखा। मतिभ्रम मोर कि आन बिसेषा॥ देखि राम जननी अकुलानी। प्रभु हँसि दीन्ह मधुर मुसुकानी॥ ४ ॥

अर्थ:

यहाँ और वहाँ मैंने दो बालक देखे। यह मेरी बुद्धि का भ्रम है या कोई और विशेष बात? प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने माता को घबरायी हुई देखकर मधुर मुसकान से हँस दिया।

दोहा

देखरावा मातहि निज अद्भुत रूप अखंड। रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड॥ २०१ ॥

अर्थ:

फिर उन्होंने माता को अपना अखण्ड अद्भुत रूप दिखलाया, जिसके एक-एक रोम में करोड़ों ब्रह्माण्ड लगे हुए हैं।

दोहा 202 के अंतर्गत
चौपाई

अगनित रबि ससि सिव चतुरानन। बहु गिरि सरित सिंधु महि कानन॥ काल कर्म गुन ग्यान सुभाऊ। सोउ देखा जो सुना न काऊ॥ १ ॥

अर्थ:

अगणित सूर्य, चन्द्रमा, शिव, चतुर्मुख ब्रह्मा, बहुत-से पर्वत, नदियाँ, समुद्र, पृथ्वी, वन, काल, कर्म, गुण, ज्ञान और स्वभाव देखे। और वे पदार्थ भी देखे जो किसी ने सुने भी न थे।

चौपाई

देखी माया सब बिधि गाढ़ी। अति सभीत जोरें कर ठाढ़ी॥ देखा जीव नचावइ जाही। देखी भगति जो छोरइ ताही॥ २ ॥

अर्थ:

सब प्रकार से गाढ़ी मायाको देखा कि वह अत्यन्त भयभीत होकर हाथ जोड़े खड़ी है। जीव को देखा, जिसे वह नचाती है, और भक्ति को देखा, जो उसे छुड़ा देती है।

चौपाई

तन पुलकित मुख बचन न आवा। नयन मूदि चरननि सिरु नावा॥ बिसमयवंत देखि महतारी। भए बहुरि सिसुरूप खरारी॥ ३ ॥

अर्थ:

शरीर पुलकित हो गया, मुख से वचन नहीं निकला। तब आँखें मूँदकर उसने श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में सिर नवाया। माता को आश्चर्यचकित देखकर खरके शत्रु श्रीरामजी फिर बालरूप हो गये।

चौपाई

अस्तुति करि न जाइ भय माना। जगत पिता मैं सुत करि जाना॥ हरि जननी बहुबिधि समुझाई। यह जनि कतहुँ कहसि सुनु माई॥ ४ ॥

अर्थ:

स्तुति की भी नहीं जा सकी; वह डर गई कि मैंने जगत्-पिता को पुत्र करके जाना। हरि ने माता को बहुत प्रकार से समझाया [और कहा—] हे माई! सुनो, यह बात कहीं मत कहना।

दोहा

बार बार कौसल्या बिनय करइ कर जोरि। अब जनि कबहूँ ब्यापै प्रभु मोहि माया तोरि॥ २०२ ॥

अर्थ:

कौसल्याजी बार-बार हाथ जोड़कर विनय करती हैं कि अब प्रभु की आपकी माया मुझे कभी न व्यापे।

दोहा 203 के अंतर्गत
चौपाई

बालचरित हरि बहुबिधि कीन्हा। अति अनंद दासन्ह कहँ दीन्हा॥ कछुक काल बीतें सब भाई। बड़े भए परिजन सुखदाई॥ १ ॥

अर्थ:

भगवान् ने बहुत प्रकार से बाललीलाएँ कीं और अपने सेवकों को अत्यन्त आनन्द दिया। कुछ समय बीतने पर सब भाई बड़े भए परिजन सुखदाई।

चौपाई

चूड़ाकरन कीन्ह गुरु जाई। बिप्रन्ह पुनि दछिना बहु पाई॥ परम मनोहर चरित अपारा। करत फिरत चारिउ सुकुमारा॥ २ ॥

अर्थ:

तब गुरुजी ने जाकर चूड़ाकर्म-संस्कार किया। ब्राह्मणों ने फिर बहुत-सी दक्षिणा पायी। चारों सुन्दर राजकुमार बड़े ही मनोहर अपार चरित्र करते फिरते हैं।

चौपाई

मन क्रम बचन अगोचर जोई। दसरथ अजिर बिचर प्रभु सोई॥ भोजन करत बोल जब राजा। नहिं आवत तजि बाल समाजा॥ ३ ॥

अर्थ:

जो मन, वचन और कर्म से अगोचर हैं, वही प्रभु दशरथजी के आँगन में विचर रहे हैं। भोजन करते समय जब राजा बुलाते हैं, तब वे अपने बालसखाओं के समाज को छोड़कर नहीं आते।

चौपाई

कौसल्या जब बोलन जाई। ठुमुकु ठुमुकु प्रभु चलहिं पराई॥ निगम नेति सिव अंत न पावा। ताहि धरै जननी हठि धावा॥ ४ ॥

अर्थ:

कौसल्याजी जब बुलाने जाती हैं, तब प्रभु ठुमुक-ठुमुक भाग चलते हैं। जिनका वेद 'नेति' (इतना ही नहीं) कहकर निरूपण करते हैं और शिवजी ने जिनका अंत नहीं पाया, माता उन्हें हठपूर्वक पकड़ने के लिए दौड़ती हैं।

चौपाई

धूसर धूरि भरें तनु आए। भूपति बिहसि गोद बैठाए॥ ५ ॥

अर्थ:

वे शरीर में धूल लपेटे हुए आए और राजा ने हँसकर उन्हें गोद में बैठा लिया।

दोहा

भोजन करत चपल चित इत उत अवसरु पाइ। भाजि चले किलकत मुख दधि ओदन लपटाइ॥ २०३ ॥

अर्थ:

भोजन करते हैं पर चित्त चञ्चल है। अवसर पाकर मुँह में दही-भात लपेटे किलकारी मारते हुए इधर-उधर भाग चले।

दोहा 204 के अंतर्गत
चौपाई

बालचरित अति सरल सुहाए। सारद सेष संभु श्रुति गाए॥ जिन्ह कर मन इन्ह सन नहिं राता। ते जन बंचित किए बिधाता॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी की बहुत ही सरल (भोली) और सुन्दर (मनभावनी) बाललीलाओं का सरस्वती, शेषजी, शिवजी और वेदों ने गान किया है। जिनका मन इन लीलाओं में अनुरक्त नहीं हुआ, विधाता ने उन मनुष्यों को वंचित कर दिया (नितान्त भाग्यहीन बनाया)।

चौपाई

भए कुमार जबहिं सब भ्राता। दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता॥ गुरगृहँ गए पढ़न रघुराई। अलप काल बिद्या सब आई॥ २ ॥

अर्थ:

ज्यों ही सब भाई कुमारावस्था के हुए, त्यों ही गुरु, पिता और माता ने उनका यज्ञोपवीत संस्कार कर दिया। श्रीरघुनाथजी [भाइयोंसहित] गुरु के घर में विद्या पढ़ने गये और थोड़े ही समय में उनको सब विद्याएँ आ गयीं।

चौपाई

जाकी सहज स्वास श्रुति चारी। सो हरि पढ़ यह कौतुक भारी॥ बिद्या बिनय निपुन गुन सीला। खेलहिं खेल सकल नृप लीला॥ ३ ॥

अर्थ:

चारों वेद जिनके स्वाभाविक स्वास हैं, वे भगवान् पढ़ें, यह बड़ा कौतुक (अचरज) है। चारों भाई विद्या, विनय, गुण और शील में [बड़े] निपुण हैं और सब राजाओं की लीलाओं के ही खेल खेलते हैं।

चौपाई

करतल बान धनुष अति सोहा। देखत रूप चराचर मोहा॥ जिन्ह बीथिन्ह बिहरहिं सब भाई। थकित होहिं सब लोग लुगाई॥ ४ ॥

अर्थ:

हाथों में बाण और धनुष बहुत ही शोभा देते हैं। रूप देखते ही चराचर (जड-चेतन) मोहित हो जाते हैं। वे सब भाई जिन गलियों में खेलते [हुए निकलते] हैं, उन गलियों के सब लोग-लुगाई उनको देखकर स्नेह से शिथिल हो जाते हैं अथवा ठिठककर रह जाते हैं।

दोहा

कोसलपुर बासी नर नारि बृद्ध अरु बाल। प्रानहु ते प्रिय लागत सब कहुँ राम कृपाल॥ २०४ ॥

अर्थ:

कोसलपुर के रहनेवाले स्त्री, पुरुष, वृद्ध और बालक सभी को कृपालु श्रीरामचन्द्रजी प्राणों से भी बढ़कर प्रिय लगते हैं।

दोहा 205 के अंतर्गत
चौपाई

बंधु सखा सँग लेहिं बोलाई। बन मृगया नित खेलहिं जाई॥ पावन मृग मारहिं जियँ जानी। दिन प्रति नृपहि देखावहिं आनी॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी भाइयों और इष्ट-मित्रों को बुलाकर साथ ले लेते हैं और नित्य वन में जाकर शिकार खेलते हैं। मन में पवित्र समझकर मृगों को मारते हैं और प्रतिदिन लाकर राजा (दशरथजी) को दिखलाते हैं।

चौपाई

जे मृग राम बान के मारे। ते तनु तजि सुरलोक सिधारे॥ अनुज सखा सँग भोजन करहीं। मातु पिता अग्या अनुसरहीं॥ २ ॥

अर्थ:

जो मृग श्रीरामजी के बाण से मारे जाते थे, वे शरीर छोड़कर देवलोक को चले जाते थे। श्रीरामचन्द्रजी अपने छोटे भाइयों और सखाओं के साथ भोजन करते हैं और माता-पिता की आज्ञा का पालन करते हैं।

चौपाई

जेहि बिधि सुखी होहिं पुर लोगा। करहिं कृपानिधि सोइ संजोगा॥ बेद पुरान सुनहिं मन लाई। आपु कहहिं अनुजन्ह समुझाई॥ ३ ॥

अर्थ:

जिस प्रकार नगर के लोग सुखी हों, कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजी वही संयोग (लीला) करते हैं। वे मन लगाकर वेद-पुराण सुनते हैं और फिर स्वयं छोटे भाइयों को समझाकर कहते हैं।

चौपाई

प्रातकाल उठि कै रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिं माथा॥ आयसु मागि करहिं पुर काजा। देखि चरित हरषइ मन राजा॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी प्रातःकाल उठकर माता-पिता और गुरु को मस्तक नवाते हैं और आज्ञा लेकर नगर का काम करते हैं। उनके चरित्र देख-देखकर राजा मन में बड़े हर्षित होते हैं।

दोहा

ब्यापक अकल अनीह अज निर्गुन नाम न रूप। भगत हेतु नाना बिधि करत चरित्र अनूप॥ २०५ ॥

अर्थ:

जो व्यापक, अकल (निरवयव), इच्छारहित, अजन्मा और निर्गुण हैं; तथा जिनका न नाम है न रूप, वही भगवान् भक्तों के लिये नाना प्रकार के अनुपम (अलौकिक) चरित्र करते हैं।

दोहा 206 के अंतर्गत
चौपाई

यह सब चरित कहा मैं गाई। आगिलि कथा सुनहु मन लाई॥ बिस्वामित्र महामुनि ग्यानी। बसहिं बिपिन सुभ आश्रम जानी॥ १ ॥

अर्थ:

यह सब चरित्र मैंने गाकर (बखानकर) कहा। अब आगे की कथा मन लगाकर सुनो। ज्ञानी महामुनि विश्वामित्रजी वन में शुभ आश्रम (पवित्र स्थान) जानकर बसते थे।

चौपाई

जहँ जप जग्य जोग मुनि करहीं। अति मारीच सुबाहुहि डरहीं॥ देखत जग्य निसाचर धावहिं। करहिं उपद्रव मुनि दुख पावहिं॥ २ ॥

अर्थ:

जहाँ वे मुनि जप, यज्ञ और योग करते थे, वहाँ मारीच और सुबाहु से बहुत डरते थे। यज्ञ देखते ही राक्षस दौड़ पड़ते थे और उपद्रव मचाते थे, जिससे मुनि दुःख पाते थे।

चौपाई

गाधितनय मन चिंता ब्यापी। हरि बिनु मरहिं न निसिचर पापी॥ तब मुनिबर मन कीन्ह बिचारा। प्रभु अवतरेउ हरन महि भारा॥ ३ ॥

अर्थ:

गाधितनय के मन में चिन्ता छा गयी कि ये पापी राक्षस भगवान् के बिना मारे नहीं मरेंगे। तब श्रेष्ठ मुनि ने मन में विचार किया कि प्रभु ने पृथ्वी का भार हरने के लिए अवतार लिया है।

चौपाई

एहूँ मिस देखौं पद जाई। करि बिनती आनौं दोउ भाई॥ ग्यान बिराग सकल गुन अयना। सो प्रभु मैं देखब भरि नयना॥ ४ ॥

अर्थ:

इसी बहाने जाकर मैं उनके पदों का दर्शन करूँ और विनती करके दोनों भाइयों को ले आऊँ। [अहा!] जो ज्ञान, वैराग्य और सब गुणों के धाम हैं, उन प्रभु को मैं नेत्र भरकर देखूँगा।

दोहा

बहुबिधि करत मनोरथ जात लागि नहिं बार। करि मज्जन सरऊ जल गए भूप दरबार॥ २०६ ॥

अर्थ:

बहुत प्रकार से मनोरथ करते हुए जाने में देर नहीं लगी। सरयूजी के जल में स्नान करके वे राजा के दरबार पर पहुँचे।