श्रीराम-लक्ष्मण का जनकपुर निरीक्षण

गुरु की आज्ञा से श्रीराम और लक्ष्मण जनकपुर का भ्रमण करते हैं। नगरवासी उनके रूप, विनय और तेज को देखकर मुग्ध हो उठते हैं।

बालकाण्ड · प्रकरण ४४ / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

मुनि पद कमल बंदि दोउ भ्राता। चले लोक लोचन सुख दाता॥ बालक बृंद देखि अति सोभा। लगे संग लोचन मनु लोभा॥ १ ॥

अर्थ:

सब लोकों के नेत्रों को सुख देने वाले दोनों भाई मुनि के चरणकमलों की वन्दना करके चले। बालकों के झुंड ने इनकी अत्यन्त शोभा देखकर साथ लग गये। उनके नेत्र और मन इनकी माधुरी पर लुभा गये।

चौपाई

पीत बसन परिकर कटि भाथा। चारु चाप सर सोहत हाथा॥ तन अनुहरत सुचंदन खोरी। स्यामल गौर मनोहर जोरी॥ २ ॥

अर्थ:

दोनों भाइयों के पीले वस्त्र हैं, कमर में तरकस बँधे हैं। हाथों में सुन्दर धनुष-बाण सुशोभित हैं। श्याम और गौर वर्ण के शरीरों पर सुन्दर चन्दन की खोरी लगी है। साँवरे और गोरे रंग की मनोहर जोड़ी है।

चौपाई

केहरि कंधर बाहु बिसाला। उर अति रुचिर नागमनि माला॥ सुभग सोन सरसीरुह लोचन। बदन मयंक तापत्रय मोचन॥ ३ ॥

अर्थ:

सिंह के समान गर्दन है; विशाल भुजाएँ हैं। छाती पर अत्यन्त सुन्दर नागमणि की माला है। सुन्दर लाल कमल के समान नेत्र हैं। तीनों तापों से छुड़ाने वाला चन्द्रमा के समान मुख है।

चौपाई

कानन्हि कनक फूल छबि देहीं। चितवत चितहि चोरि जनु लेहीं॥ चितवनि चारु भृकुटि बर बाँकी। तिलक रेख सोभा जनु चाँकी॥ ४ ॥

अर्थ:

कानों में सोने के कर्णफूल अत्यन्त शोभा दे रहे हैं और देखते ही देखने वाले के चित्त को मानो चुरा लेते हैं। उनकी चितवन बड़ी मनोहर है और भौंहें तिरछी एवं सुन्दर हैं। माथे पर तिलक की रेखाएँ ऐसी सुन्दर हैं मानो शोभा पर मुहर लगा दी गयी हो।

दोहा

रुचिर चौतनीं सुभग सिर मेचक कुंचित केस। नख सिख सुंदर बंधु दोउ सोभा सकल सुदेस॥ २१९ ॥

अर्थ:

सिर पर सुन्दर चौतनीं [टोपियाँ] हैं, काले और घुँघराले बाल हैं। दोनों भाई नख से लेकर शिखा तक सुन्दर हैं और सारी शोभा जहाँ जैसी चाहिये वैसी ही है।

दोहा 220 के अंतर्गत
चौपाई

देखन नगर भूपसुत आए। समाचार पुरबासिन्ह पाए॥ धाए धाम काम सब त्यागी। मनहुँ रंक निधि लूटन लागी॥ १ ॥

अर्थ:

जब पुरवासियों ने यह समाचार पाया कि दोनों राजकुमार नगर देखने के लिये आये हैं, तब वे सब घर-बार और सब काम-काज छोड़कर ऐसे दौड़े मानो दरिद्र [धन का] खजाना लूटने दौड़े हों।

चौपाई

निरखि सहज सुंदर दोउ भाई। होहिं सुखी लोचन फल पाई॥ जुबतीं भवन झरोखन्हि लागीं। निरखहिं राम रूप अनुरागीं॥ २ ॥

अर्थ:

स्वभाव ही से सुन्दर दोनों भाइयों को देखकर वे लोग नेत्रों का फल पाकर सुखी हो रहे हैं। युवती स्त्रियाँ घर के झरोखों से लगी हुई प्रेम सहित श्रीरामचन्द्रजी के रूप को देख रही हैं।

चौपाई

कहहिं परसपर बचन सप्रीती। सखि इन्ह कोटि काम छबि जीती॥ सुर नर असुर नाग मुनि माहीं। सोभा असि कहुँ सुनिअति नाहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

वे आपस में बड़े प्रेम से बातें कर रही हैं—हे सखी! इन्होंने करोड़ों कामदेवों की छबि को जीत लिया है। देवता, मनुष्य, असुर, नाग और मुनियों में ऐसी शोभा तो कहीं सुनने में भी नहीं आती।

चौपाई

बिष्नु चारि भुज बिधि मुख चारी। बिकट बेष मुख पंच पुरारी॥ अपर देउ अस कोउ न आही। यह छबि सखी पटतरिअ जाही॥ ४ ॥

अर्थ:

भगवान् विष्णु के चार भुजाएँ हैं, ब्रह्माजी के चार मुख हैं, शिवजी का विकट वेष है और उनके पाँच मुख हैं। हे सखी! दूसरा देवता भी कोई ऐसा नहीं है जिसके साथ इस छबि की उपमा दी जाय।

दोहा

बय किसोर सुषमा सदन स्याम गौर सुख धाम। अंग अंग पर वारिअहिं कोटि कोटि सत काम॥ २२० ॥

अर्थ:

इनकी किशोर अवस्था है, ये सुन्दरता के घर, साँवले और गोरे रंग के तथा सुख के धाम हैं। इनके अंग-अंग पर करोड़ों-करोड़ों कामदेवों को निछावर कर देना चाहिये।

दोहा 221 के अंतर्गत
चौपाई

कहहु सखी अस को तनुधारी। जो न मोह यह रूप निहारी॥ कोउ सप्रेम बोली मृदु बानी। जो मैं सुना सो सुनहु सयानी॥ १ ॥

अर्थ:

हे सखी! [भला] कहो तो ऐसा कौन शरीरधारी होगा जो इस रूप को देखकर मोहित न हो जाय (अर्थात् यह रूप जड़-चेतन सबको मोहित करनेवाला है)। [तब] कोई दूसरी सखी प्रेम सहित कोमल वाणी से बोली—हे सयानी! मैंने जो सुना है उसे सुनो—।

चौपाई

ए दोऊ दसरथ के ढोटा। बाल मरालन्हि के कल जोटा॥ मुनि कौसिक मख के रखवारे। जिन्ह रन अजिर निसाचर मारे॥ २ ॥

अर्थ:

ये दोनों [राजकुमार] महाराज दशरथजी के पुत्र हैं। बाल राजहंसों का-सा सुन्दर जोड़ा है। ये मुनि विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा करनेवाले हैं, इन्होंने युद्ध के मैदान में राक्षसों को मारा है।

चौपाई

स्याम गात कल कंज बिलोचन। जो मारीच सुभुज मदु मोचन॥ कौसल्या सुत सो सुख खानी। नामु रामु धनु सायक पानी॥ ३ ॥

अर्थ:

जिनका श्याम शरीर और सुन्दर कमल-जैसे नेत्र हैं, जो मारीच और सुबाहु के मद को चूर करनेवाले और सुख की खान हैं और जो हाथ में धनुष-बाण लिये हुए हैं, वे कौसल्याजी के पुत्र हैं; इनका नाम राम है।

चौपाई

गौर किसोर बेषु बर काछें। कर सर चाप राम के पाछें॥ लछिमनु नामु राम लघु भ्राता। सुनु सखि तासु सुमित्रा माता॥ ४ ॥

अर्थ:

जिनका रंग गोरा और किशोर अवस्था है और जो सुन्दर वेष बनाये और हाथ में धनुष-बाण लिये श्रीरामजी के पीछे-पीछे चल रहे हैं, वे इनके छोटे भाई हैं; उनका नाम लक्ष्मण है। हे सखी! सुनो, उनकी माता सुमित्रा हैं।

दोहा

बिप्रकाजु करि बंधु दोउ मग मुनिबधू उधारि। आए देखन चापमख सुनि हरषीं सब नारि॥ २२१ ॥

अर्थ:

दोनों भाई ब्राह्मण विश्वामित्र का काम करके और रास्ते में मुनि गौतम की स्त्री अहल्या का उद्धार करके यहाँ धनुषयज्ञ देखने आये हैं। यह सुनकर सब स्त्रियाँ प्रसन्न हुईं।

दोहा 222 के अंतर्गत
चौपाई

देखि राम छबि कोउ एक कहई। जोगु जानकिहि यह बरु अहई॥ जौं सखि इन्हहि देख नरनाहू। पन परिहरि हठि करइ बिबाहू॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी की छबि देखकर कोई एक (दूसरी सखी) कहने लगी—यह वर जानकी के योग्य है। हे सखी! यदि कहीं राजा इन्हें देख ले, तो प्रतिज्ञा छोड़कर हठपूर्वक इन्हीं से विवाह कर देगा।

चौपाई

कोउ कह ए भूपति पहिचाने। मुनि समेत सादर सनमाने॥ सखि परंतु पनु राउ न तजई। बिधि बस हठि अबिबेकहि भजई॥ २ ॥

अर्थ:

किसी ने कहा—राजा ने इन्हें पहचान लिया है और मुनि के सहित इनका आदरपूर्वक सम्मान किया है। परन्तु हे सखी! राजा अपना प्रण नहीं छोड़ता। वह होनहार के वशीभूत होकर हठपूर्वक अविवेक का ही आश्रय लिये हुए है।

चौपाई

कोउ कह जौं भल अहइ बिधाता। सब कहँ सुनिअ उचित फलदाता॥ तौ जानकिहि मिलिहि बरु एहू। नाहिन आलि इहाँ संदेहू॥ ३ ॥

अर्थ:

कोई कहती है—यदि विधाता भले हैं और सुना जाता है कि वे सब को उचित फल देते हैं, तो जानकीजी को यही वर मिलेगा। हे सखी! इसमें सन्देह नहीं है।

चौपाई

जौं बिधि बस अस बनै सँजोगू। तौ कृतकृत्य होइ सब लोगू॥ सखि हमरें आरति अति तातें। कबहुँक ए आवहिं एहि नातें॥ ४ ॥

अर्थ:

जो दैवयोग से ऐसा संयोग बन जाय, तो हम सब लोग कृतार्थ हो जायँ। हे सखी! हमारे तो इससे इतनी अधिक आतुरता हो रही है कि इसी नाते कभी ये यहाँ आएँगे।

दोहा

नाहिं त हम कहुँ सुनहु सखि इन्ह कर दरसनु दूरि। यह संघटु तब होइ जब पुन्य पुराकृत भूरि॥ २२२ ॥

अर्थ:

नहीं तो, हे सखी! सुनो, हमको इनके दर्शन दुर्लभ हैं। यह संयोग तभी हो सकता है जब हमारे पूर्वजन्मों के बहुत पुण्य हों।

दोहा 223 के अंतर्गत
चौपाई

बोली अपर कहेहु सखि नीका। एहिं बिआह अति हित सबही का॥ कोउ कह संकर चाप कठोरा। ए स्यामल मृदु गात किसोरा॥ १ ॥

अर्थ:

दूसरी ने कहा—हे सखी! तुमने बहुत अच्छा कहा। इस विवाह से सभी का परम हित है। किसी ने कहा—शंकरजी का धनुष कठोर है और ये साँवले राजकुमार कोमल शरीर के बालक हैं।

चौपाई

सबु असमंजस अहइ सयानी। यह सुनि अपर कहइ मृदु बानी॥ सखि इन्ह कहँ कोउ कोउ अस कहहीं। बड़ प्रभाउ देखत लघु अहहीं॥ २ ॥

अर्थ:

हे सयानी! सब असमंजस ही है। यह सुनकर दूसरी सखी कोमल वाणी से कहने लगी—हे सखी! इनके सम्बन्ध में कोई-कोई ऐसा कहते हैं कि ये देखने में तो छोटे हैं, पर इनका प्रभाव बहुत बड़ा है।

चौपाई

परसि जासु पद पंकज धूरी। तरी अहल्या कृत अघ भूरी॥ सो कि रहिहि बिनु सिव धनु तोरें। यह प्रतीति परिहरिअ न भोरें॥ ३ ॥

अर्थ:

जिनके चरणकमलों की धूलि का स्पर्श पाकर अहल्या तर गई, जिसने बड़ा भारी पाप किया था, वे क्या शिवजी का धनुष बिना तोड़े रहेंगे। इस विश्वास को भूलकर भी नहीं छोड़ना चाहिये।

चौपाई

जेहिं बिरंचि रचि सीय सँवारी। तेहिं स्यामल बरु रचेउ बिचारी॥ तासु बचन सुनि सब हरषानीं। ऐसेइ होउ कहहिं मृदु बानीं॥ ४ ॥

अर्थ:

जिस ब्रह्मा ने सीता को सँवारकर (बड़ी चतुराई से) रचा है, उसी ने विचारकर साँवला वर भी रच रखा है। उसके ये वचन सुनकर सब हर्षित हुईं और कोमल वाणी से कहने लगीं—ऐसा ही हो।

दोहा

हियँ हरषहिं बरषहिं सुमन सुमुखि सुलोचनि बृंद। जाहिं जहाँ जहँ बंधु दोउ तहँ तहँ परमानंद॥ २२३ ॥

अर्थ:

सुन्दर मुख और सुन्दर नेत्रोंवाली स्त्रियाँ समूह-समूह हृदय में हर्षित होकर फूल बरसा रही हैं। जहाँ-जहाँ दोनों भाई जाते हैं, वहाँ-वहाँ परम आनन्द छा जाता है।

दोहा 224 के अंतर्गत
चौपाई

पुर पूरब दिसि गे दोउ भाई। जहँ धनुमख हित भूमि बनाई॥ अति बिस्तार चारु गच ढारी। बिमल बेदिका रुचिर सँवारी॥ १ ॥

अर्थ:

दोनों भाई नगर के पूरब ओर गये; जहाँ धनुषयज्ञ के लिये [रंग] भूमि बनायी गयी थी। बहुत लंबा-चौड़ा सुन्दर ढला हुआ पक्का आँगन था, जिस पर सुन्दर और निर्मल वेदी सजायी गयी थी।

चौपाई

चहुँ दिसि कंचन मंच बिसाला। रचे जहाँ बैठहिं महिपाला॥ तेहि पाछें समीप चहुँ पासा। अपर मंच मंडली बिलासा॥ २ ॥

अर्थ:

चारों ओर सोने के बड़े-बड़े मंच बने थे, जिन पर राजा लोग बैठेंगे। उनके पीछे समीप ही चारों ओर दूसरे मचानों का मण्डलाकार घेरा सुशोभित था।

चौपाई

कछुक ऊँचि सब भाँति सुहाई। बैठहिं नगर लोग जहँ जाई॥ तिन्ह के निकट बिसाल सुहाए। धवल धाम बहुबरन बनाए॥ ३ ॥

अर्थ:

वह कुछ ऊँचा था और सब प्रकार से सुन्दर था, जहाँ जाकर नगर के लोग बैठेंगे। उन्हीं के निकट विशाल एवं सुन्दर सफेद मकान अनेक रंगों के बनाये गये हैं।

चौपाई

जहँ बैठें देखहिं सब नारी। जथाजोगु निज कुल अनुहारी॥ पुर बालक कहि कहि मृदु बचना। सादर प्रभुहि देखावहिं रचना॥ ४ ॥

अर्थ:

जहाँ अपने-अपने कुल के अनुसार सब स्त्रियाँ यथायोग्य (जिसको जहाँ बैठना उचित है) बैठकर देखेंगी। नगर के बालक कोमल वचन कह-कहकर आदरपूर्वक प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को [यज्ञशाला की] रचना दिखला रहे हैं।

दोहा

सब सिसु एहि मिस प्रेमबस परसि मनोहर गात। तन पुलकहिं अति हरषु हियँ देखि देखि दोउ भ्रात॥ २२४ ॥

अर्थ:

सब बालक इसी बहाने प्रेम के वश होकर श्रीरामजी के मनोहर अंगों को छूकर शरीर से पुलकित हो रहे हैं और दोनों भाइयों को देख-देखकर उनके हृदय में अत्यन्त हर्ष हो रहा है।

दोहा 225 के अंतर्गत
चौपाई

सिसु सब राम प्रेमबस जाने। प्रीति समेत निकेत बखाने॥ निज निज रुचि सब लेहिं बोलाई। सहित सनेह जाहिं दोउ भाई॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी ने सब बालकों को प्रेम के वश जानकर [यज्ञभूमि के] स्थानों की प्रेमपूर्वक प्रशंसा की। [इससे बालकों का उत्साह, आनन्द और प्रेम और भी बढ़ गया, जिससे] वे सब अपनी-अपनी रुचि के अनुसार उन्हें बुला लेते हैं और [प्रत्येक के बुलाने पर] दोनों भाई प्रेम सहित उनके पास चले जाते हैं।

चौपाई

राम देखावहिं अनुजहि रचना। कहि मृदु मधुर मनोहर बचना॥ लव निमेष महुँ भुवन निकाया। रचइ जासु अनुसासन माया॥ २ ॥

अर्थ:

कोमल, मधुर और मनोहर वचन कहकर श्रीरामजी अपने छोटे भाई लक्ष्मण को [यज्ञभूमि की] रचना दिखलाते हैं। जिनकी आज्ञा पाकर माया लव निमेष (पलक गिरने के चौथाई समय) में ब्रह्माण्डों के समूह रच डालती है।

चौपाई

भगति हेतु सोइ दीनदयाला। चितवत चकित धनुष मखसाला॥ कौतुक देखि चले गुरु पाहीं। जानि बिलंबु त्रास मन माहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

वही दीनों पर दया करनेवाले श्रीरामजी भक्ति के कारण धनुषयज्ञशाला को चकित होकर (आश्चर्य के साथ) देख रहे हैं। इस प्रकार सब कौतुक (विचित्र रचना) देखकर वे गुरु के पास चले। देर हुई जानकर उनके मन में डर है।

चौपाई

जासु त्रास डर कहुँ डर होई। भजन प्रभाउ देखावत सोई॥ कहि बातें मृदु मधुर सुहाईं। किए बिदा बालक बरिआईं॥ ४ ॥

अर्थ:

जिनके भय से डर को भी डर लगता है, वही प्रभु भजन का प्रभाव [जिसके कारण ऐसे महान् प्रभु भी भय का नाट्य करते हैं] दिखला रहे हैं। उन्होंने कोमल, मधुर और सुन्दर बातें कहकर बालकों को जबरदस्ती विदा किया।

दोहा

सभय सप्रेम बिनीत अति सकुच सहित दोउ भाइ। गुर पद पंकज नाइ सिर बैठे आयसु पाइ॥ २२५ ॥

अर्थ:

फिर भय, प्रेम, विनय और बड़े संकोच के साथ दोनों भाई गुरु के चरणकमलों में सिर नवाकर आज्ञा पाकर बैठे।

दोहा 226 के अंतर्गत
चौपाई

निसि प्रबेस मुनि आयसु दीन्हा। सबहीं संध्याबंदनु कीन्हा॥ कहत कथा इतिहास पुरानी। रुचिर रजनि जुग जाम सिरानी॥ १ ॥

अर्थ:

रात्रि का प्रवेश होते ही (संध्या के समय) मुनि ने आज्ञा दी, तब सभी ने संध्यावंदन किया। फिर प्राचीन कथाएँ तथा इतिहास कहते-कहते सुन्दर रात्रि दो पहर बीत गयी।

चौपाई

मुनिबर सयन कीन्हि तब जाई। लगे चरन चापन दोउ भाई॥ जिन्ह के चरन सरोरुह लागी। करत बिबिध जप जोग बिरागी॥ २ ॥

अर्थ:

तब श्रेष्ठ मुनि जाकर शयन किए। दोनों भाई उनके चरण दबाने लगे जिनके चरणकमलों के [दर्शन एवं स्पर्श के] लिए वैराग्यवान् पुरुष भी भाँति-भाँति के जप और योग करते हैं।

चौपाई

तेइ दोउ बंधु प्रेम जनु जीते। गुर पद कमल पलोटत प्रीते॥ बार बार मुनि अग्या दीन्ही। रघुबर जाइ सयन तब कीन्ही॥ ३ ॥

अर्थ:

वे ही दोनों भाई मानो प्रेम से जीते हुए प्रेमपूर्वक गुरु के चरणकमलों को दबा रहे हैं। मुनि ने बार-बार आज्ञा दी, तब श्रीरघुनाथजी ने जाकर शयन किया।

चौपाई

चापत चरन लखनु उर लाएँ। सभय सप्रेम परम सचु पाएँ॥ पुनि पुनि प्रभु कह सोवहु ताता। पौढ़े धरि उर पद जलजाता॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी के चरणों को हृदय से लगाकर भय और प्रेम सहित परम सुख पाकर लक्ष्मणजी उन्हें दबा रहे हैं। प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने बार-बार कहा--हे तात! [अब] सो जाओ। तब वे उन चरणकमलों को हृदय में धरकर लेट रहे।

दोहा

उठे लखनु निसि बिगत सुनि अरुनसिखा धुनि कान। गुर तें पहिलेहिं जगतपति जागे रामु सुजान॥ २२६ ॥

अर्थ:

रात बीतने पर, मुर्गे का शब्द कानों से सुनकर लक्ष्मणजी उठे। जगत् के स्वामी सुजान श्रीरामचन्द्रजी भी गुरु से पहले ही जाग गये।