पुष्पवाटिका निरीक्षण, सीताजी का प्रथम दर्शन, श्रीसीतारामजी का परस्पर दर्शन
श्रीराम पुष्पवाटिका देखने जाते हैं, जहाँ सीताजी का प्रथम दर्शन होता है। उस पावन क्षण में श्रीसीतारामजी एक-दूसरे को देखकर अंतःकरण से आकृष्ट होते हैं।
बालकाण्ड · प्रकरण ४५ / ५९
प्रकरण पाठ
मध्य बाग सरु सोह सुहावा। मनि सोपान बिचित्र बनावा॥ बिमल सलिलु सरसिज बहुरंगा। जलखग कूजत गुंजत भृंगा॥ ४ ॥
अर्थ:
बाग के बीचोबीच सुहावना सरोवर सुशोभित है, जिसमें मणियों की सीढ़ियाँ विचित्र ढंग से बनी हैं। उसका जल निर्मल है, जिसमें अनेक रंगों के कमल खिले हुए हैं, जल के पक्षी कलरव कर रहे हैं और भ्रमर गुंजार कर रहे हैं।
देखन बागु कुअँर दुइ आए। बय किसोर सब भाँति सुहाए॥ स्याम गौर किमि कहौं बखानी। गिरा अनयन नयन बिनु बानी॥ १ ॥
अर्थ:
दो राजकुमार बाग देखने आए हैं। वे किशोर अवस्था के हैं और सब प्रकार से सुन्दर हैं। वे साँवले और गोरे [रंग के] हैं; उनके सौन्दर्य को मैं कैसे बखान करूँ। वाणी नेत्रों के बिना है और नेत्र वाणी के बिना हैं।
जिन्ह निज रूप मोहनी डारी। कीन्हे स्वबस नगर नर नारी॥ बरनत छबि जहँ तहँ सब लोगू। अवसि देखिअहिं देखन जोगू॥ ३ ॥
अर्थ:
और जिन्होंने अपने रूप की मोहिनी डालकर नगर के स्त्री-पुरुषों को अपने वश में कर लिया है। जहाँ-तहाँ सब लोग उन्हीं की छबि का वर्णन कर रहे हैं। अवश्य [चलकर] उन्हें देखना चाहिये, वे देखने ही योग्य हैं।
कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि। कहत लखन सन रामु हृदयँ गुनि॥ मानहुँ मदन दुंदुभी दीन्ही। मनसा बिस्व बिजय कहँ कीन्ही॥ १ ॥
अर्थ:
कंकण, किंकिनि और नूपुर के शब्द सुनकर श्रीरामचन्द्रजी हृदय में विचारकर लक्ष्मण से कहते हैं--[यह ध्वनि ऐसी आ रही है] मानो कामदेव ने विश्व को जीतने का संकल्प करके डंके पर चोट मारी है।
अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा। सिय मुख ससि भए नयन चकोरा॥ भए बिलोचन चारु अचंचल। मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल॥ २ ॥
अर्थ:
ऐसा कहकर श्रीरामजी ने फिरकर उस ओर देखा। श्रीसीताजी के मुखरूपी चन्द्रमा [को निहारने] के लिये उनके नेत्र चकोर बन गये। सुन्दर नेत्र स्थिर हो गये (टकटकी लग गयी)। मानो सकुचाकर निमि ने [जिनका सबकी पलकों में निवास माना गया है, लड़कौ-दामाद के मिलन-प्रसंग को देखना उचित नहीं, इस भाव से] पलकें छोड़ दीं, (पलकों में रहना छोड़ दिया, जिससे पलकों का गिरना रुक गया)।
देखि सीय सोभा सुखु पावा। हृदयँ सराहत बचनु न आवा॥ जनु बिरंचि सब निज निपुनाई। बिरचि बिस्व कहँ प्रगटि देखाई॥ ३ ॥
अर्थ:
सीताजी की शोभा देखकर श्रीरामजी ने बड़ा सुख पाया। हृदय में वे उसकी सराहना करते हैं, किन्तु मुख से वचन नहीं निकलते। [वह शोभा ऐसी अनुपम है] मानो ब्रह्मा ने अपनी सारी निपुणता को मूर्तिमान करके संसार को प्रकट करके दिखा दिया हो।
सुंदरता कहुँ सुंदर करई। छबिगृहँ दीपसिखा जनु बरई॥ सब उपमा कबि रहे जुठारी। केहिं पटतरौं बिदेहकुमारी॥ ४ ॥
अर्थ:
वह (सीताजी की शोभा) सुन्दरता को भी सुन्दर करनेवाली है [वह ऐसी मालूम होती है] मानो सुन्दरतारूपी घर में दीपक की लौ जल रही हो। सारी उपमाओं को तो कवियों ने जूँठा कर रखा है। मैं जनकनन्दिनी श्रीसीताजी की किससे उपमा दूँ।
रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ। मनु कुपंथ पगु धरइ न काऊ॥ मोहि अतिसय प्रतीति मन केरी। जेहिं सपनेहुँ परनारि न हेरी॥ ३ ॥
अर्थ:
रघुवंशियों का यह सहज (जन्मगत) स्वभाव है कि उनका मन कभी कुमार्ग पर पैर नहीं रखता। मुझे तो अपने मन का अत्यन्त ही विश्वास है कि जिसने [जाग्रत् की कौन कहे] स्वप्न में भी परायी स्त्री पर दृष्टि नहीं डाली है।
जिन्ह कै लहहिं न रिपु रन पीठी। नहिं पावहिं परतिय मनु डीठी॥ मंगन लहहिं न जिन्ह कै नाहीं। ते नरबर थोरे जग माहीं॥ ४ ॥
अर्थ:
रण में शत्रु जिनकी पीठ नहीं देख पाते (अर्थात् जो लड़ाई के मैदान से भागते नहीं), परायी स्त्रियाँ जिनके मन और दृष्टि को नहीं खींच पातीं, और माँगने वाले जिनके यहाँ 'नहीं' नहीं पाते (खाली हाथ नहीं लौटते), ऐसे श्रेष्ठ पुरुष संसार में थोड़े हैं।
चितवति चकित चहूँ दिसि सीता। कहँ गए नृपकिसोर मनु चिंता॥ जहँ बिलोक मृग सावक नैनी। जनु तहँ बरिस कमल सित श्रेनी॥ १ ॥
अर्थ:
सीताजी चकित होकर चारों ओर देख रही हैं। मन इस बात की चिंता कर रहा है कि राजकुमार कहाँ चले गये। बालमृग-नयनी सीताजी जहाँ दृष्टि डालती हैं, वहाँ मानो श्वेत कमलों की कतार बरस जाती है।
लोचन मग रामहि उर आनी। दीन्हे पलक कपाट सयानी॥ जब सिय सखिन्ह प्रेमबस जानी। कहि न सकहिं कछु मन सकुचानी॥ ४ ॥
अर्थ:
नेत्रों के रास्ते श्रीरामजी को हृदय में लाकर चतुरशिरोमणि जानकीजी ने पलकों के किवाड़ लगा दिये (अर्थात् नेत्र मूँदकर उनका ध्यान करने लगीं)। जब सखियों ने सीताजी को प्रेम के वश जाना, तब वे मन में सकुचा गयीं; कुछ कह नहीं सकती थीं।
उर मनि माल कंबु कल गीवा। काम कलभ कर भुज बलसींवा॥ सुमन समेत बाम कर दोना। सावँर कुअँर सखी सुठि लोना॥ ४ ॥
अर्थ:
वक्षःस्थल पर मणियों की माला है। शंख के समान सुन्दर गला है। कामदेव के हाथी के बच्चे की सूँड़ के समान (उतार-चढ़ाववाली एवं कोमल) भुजाएँ हैं, जो बल की सीमा हैं। जिसके बायें हाथ में फूलों सहित दोना है, हे सखि! वह साँवला कुँअर तो बहुत ही सलोना है।
सकुचि सीयँ तब नयन उघारे। सनमुख दोउ रघुसिंघ निहारे॥ नख सिख देखि राम कै सोभा। सुमिरि पिता पनु मनु अति छोभा॥ २ ॥
अर्थ:
तब सीताजी ने सकुचाकर नेत्र खोले और रघुकुल के दोनों सिंहों को अपने सामने खड़े देखा। नख से शिखा तक श्रीरामजी की शोभा देखकर और फिर पिता के प्रण को याद करके उनका मन बहुत क्षुब्ध हो गया।