राजा दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ, रानियों का गर्भवती होना
संतान की कामना से राजा दशरथ पुत्रेष्टि यज्ञ कराते हैं। यज्ञफल स्वरूप प्राप्त पायस ग्रहण करने के बाद उनकी रानियाँ गर्भवती होती हैं।
बालकाण्ड · प्रकरण ३७ / ५९
प्रकरण पाठ
अवधपुरीं रघुकुलमनि राऊ। बेद बिदित तेहि दसरथ नाऊँ॥ धरम धुरंधर गुननिधि ग्यानी। हृदयँ भगति मति सारँगपानी॥ ४ ॥
अर्थ:
अवधपुरी में रघुकुलमणि राजा दशरथ नाम के राजा हुए, जिनका नाम वेद में विख्यात है। वे धर्म-धुरन्धर, गुणों के भण्डार और ज्ञानी थे। उनके हृदय में भगवान् की भक्ति थी, और उनकी बुद्धि भी श्रीराम में लगी रहती थी।
निज दुख सुख सब गुरहि सुनायउ। कहि बसिष्ठ बहु बिधि समुझायउ॥ धरहु धीर होइहहिं सुत चारी। त्रिभुवन बिदित भगत भय हारी॥ २ ॥
अर्थ:
राजा ने अपना सारा दुःख-सुख गुरु को सुनाया। गुरु वसिष्ठजी ने उन्हें बहुत प्रकार से समझाया [और कहा--] धीरज धरो, तुम्हारे चार पुत्र होंगे, जो तीनों लोकों में प्रसिद्ध और भक्तों का भय हरने वाले होंगे।
कैकेई कहँ नृप सो दयऊ। रह्यो सो उभय भाग पुनि भयऊ॥ कौसल्या कैकेई हाथ धरि। दीन्ह सुमित्रहि मन प्रसन्न करि॥ २ ॥
अर्थ:
वह (उनमें से एक भाग) राजा ने कैकेयी को दिया। शेष जो बच रहा उसके फिर दो भाग हुए और राजाने उनको कौसल्या और कैकेयी के हाथ पर रखकर (अर्थात् उनकी अनुमति लेकर) और इस प्रकार उनका मन प्रसन्न करके सुमित्रा को दिया।
नौमी तिथि मधु मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता॥ मध्य दिवस अति सीत न घामा। पावन काल लोक बिश्रामा॥ १ ॥
अर्थ:
पवित्र चैत्रका महीना था, नवमी तिथि थी। शुक्लपक्ष और भगवान्का प्रिय अभिजित् मुहूर्त्त था। दोपहरका समय था। न बहुत सरदी थी, न धूप (गरमी) थी। वह पवित्र समय सब लोकोंको शान्ति देनेवाला था।