शिवजी का विवाह
विधिपूर्वक शिव और पार्वती का दिव्य विवाह सम्पन्न होता है। देवता, ऋषि और समस्त लोक इस मंगल मिलन का उत्सव मनाते हैं।
बालकाण्ड · प्रकरण २७ / ५९
प्रकरण पाठ
जसि बिबाह कै बिधि श्रुति गाई। महामुनिन्ह सो सब करवाई॥ गहि गिरीस कुस कन्या पानी। भवहि समरपीं जानि भवानी॥ १ ॥
अर्थ:
वेदों में विवाह की जैसी रीति कही गयी है, महामुनियों ने वह सभी रीति करवायी। पर्वतराज हिमाचल ने हाथ में कुश लेकर तथा कन्या का हाथ पकड़कर उन्हें भवानी (शिवपत्नी) जानकर शिवजी को समर्पण किया।
पानिग्रहन जब कीन्ह महेसा। हियँ हरषे तब सकल सुरेसा॥ बेदमंत्र मुनिबर उच्चरहीं। जय जय जय संकर सुर करहीं॥ २ ॥
अर्थ:
जब महेश्वर (शिवजी) ने पार्वती का पाणिग्रहण किया, तब [इन्द्रादि] सब देवता हृदय में बड़े ही हर्षित हुए। श्रेष्ठ मुनिगण वेदमन्त्रों का उच्चारण करने लगे और देवगण शिवजी का जय-जयकार करने लगे।
दाइज दियो बहु भाँति पुनि कर जोरि हिमभूधर कह्यो। का देउँ पूरनकाम संकर चरन पंकज गहि रह्यो॥ सिवँ कृपासागर ससुर कर संतोषु सब भाँतिहिं कियो। पुनि गहे पद पाथोज मयनाँ प्रेम परिपूरन हियो॥
अर्थ:
बहुत प्रकार का दहेज देकर, फिर हाथ जोड़कर हिमाचल ने कहा-हे शंकर ! आप पूर्णकाम हैं, मैं आपको क्या दे सकता हूँ? [इतना कहकर] वे शिवजी के चरणकमल पकड़कर रह गये। तब कृपा के सागर शिवजी ने अपने ससुर का सभी प्रकार से समाधान किया। फिर प्रेम से परिपूर्ण हृदय मैना जी ने शिवजी के चरणकमल पकड़े [और कहा--]॥
करेहु सदा संकर पद पूजा। नारिधरमु पति देउ न दूजा॥ बचन कहत भरे लोचन बारी। बहुरि लाइ उर लीन्हि कुमारी॥ २ ॥
अर्थ:
हे पार्वती! तू सदा शिवजी के चरणों की पूजा करना, नारियों का यही धर्म है। उनके लिये पति ही देवता है और कोई देवता नहीं है। इस प्रकार की बातें कहते-कहते उनकी आँखों में आँसू भर आये और उन्होंने कन्या को छाती से चिपटा लिया।
पुनि पुनि मिलति परति गहि चरना। परम प्रेमु कछु जाइ न बरना॥ सब नारिन्ह मिलि भेटि भवानी। जाइ जननि उर पुनि लपटानी॥ ४ ॥
अर्थ:
मैना बार-बार मिलती हैं और पार्वती के चरणों को पकड़कर गिर पड़ती हैं। बड़ा ही प्रेम है, कुछ वर्णन नहीं किया जाता। भवानी सब स्त्रियों से मिल-भेंटकर फिर अपनी माता के हृदय से जा लिपटीं।
जननिहि बहुरि मिलि चली उचित असीस सब काहूँ दईं। फिरि फिरि बिलोकति मातु तन तब सखीं लै सिव पहिं गईं॥ जाचक सकल संतोषि संकरु उमा सहित भवन चले। सब अमर हरषे सुमन बरषि निसान नभ बाजे भले॥
अर्थ:
पार्वतीजी माता से फिर मिलकर चलीं, सब किसी ने उन्हें उचित आशीर्वाद दिये। पार्वतीजी फिर-फिर कर माता की ओर देखती जाती थीं। तब सखियाँ उन्हें शिवजी के पास ले गयीं। महादेवजी सब याचकों को सन्तुष्ट कर पार्वती के साथ घर (कैलास) को चले। सब देवता प्रसन्न होकर फूलों की वर्षा करने लगे और आकाश में सुन्दर नगाड़े बजने लगे॥
जबहिं संभु कैलासहिं आए। सुर सब निज निज लोक सिधाए॥ जगत मातु पितु संभु भवानी। तेहिं सिंगारु न कहउँ बखानी॥ २ ॥
अर्थ:
जब शिवजी कैलास पर्वत पर पहुँचे, तब सब देवता अपने-अपने लोकों को चले गये। [तुलसीदासजी कहते हैं कि] पार्वतीजी और शिवजी जगत् के माता-पिता हैं, इसीलिए मैं उनके सिंगार का वर्णन नहीं करता।
तब जनमेउ षटबदन कुमारा। तारकु असुरु समर जेहिं मारा॥ आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। षन्मुख जन्मु सकल जग जाना॥ ४ ॥
अर्थ:
तब छः मुख वाले कुमार (स्वामिकार्तिक) का जन्म हुआ, जिन्होंने युद्ध में तारकासुर को मारा। वेद, शास्त्र और पुराणों में स्वामिकार्तिक के जन्म की कथा प्रसिद्ध है और सारा जगत् उसे जानता है।
जगु जान षन्मुख जन्मु कर्मु प्रतापु पुरुषारथु महा। तेहि हेतु मैं बृषकेतु सुत कर चरित संछेपहिं कहा॥ यह उमा संभु बिबाहु जे नर नारि कहहिं जे गावहीं। कल्यान काज बिबाह मंगल सर्बदा सुखु पावहीं॥
अर्थ:
षडानन (स्वामिकार्तिक) के जन्म, कर्म, प्रताप और महान पुरुषार्थ को सारा जगत् जानता है। इसलिये मैंने वृषकेतु (शिवजी) के पुत्र का चरित्र संक्षेप से ही कहा है। शिव-पार्वती के विवाह की इस कथा को जो स्त्री-पुरुष कहेंगे और गायेंगे, वे कल्याण के काज, विवाह-मंगलों में सदा सुख पावेंगे॥
प्रेम बिबस मुख आव न बानी। दसा देखि हरषे मुनि ग्यानी॥ अहो धन्य तव जन्मु मुनीसा। तुम्हहि प्रान सम प्रिय गौरीसा॥ २ ॥
अर्थ:
वे प्रेम में मुग्ध हो गये, मुख से वाणी नहीं निकलती। उनकी यह दशा देखकर ज्ञानी मुनि याज्ञवल्क्य बहुत प्रसन्न हुए [और बोले--] हे मुनीश! अहा हा! तुम्हारा जन्म धन्य है; तुमको गौरीपति शिवजी प्राणों के समान प्रिय हैं।
सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं। रामहि ते सपनेहुँ न सोहाहीं॥ बिनु छल बिस्वनाथ पद नेहू। राम भगत कर लच्छन एहू॥ ३ ॥
अर्थ:
शिवजी के चरणकमलों में जिनकी प्रीति नहीं है, वे श्रीरामचन्द्रजी को स्वप्न में भी अच्छे नहीं लगते। विश्वनाथ श्रीशिवजी के चरणों में निष्कपट (विशुद्ध) प्रेम होना यही रामभक्त का लक्षण है।
सिव सम को रघुपति ब्रतधारी। बिनु अघ तजी सती असि नारी॥ पनु करि रघुपति भगति देखाई। को सिव सम रामहि प्रिय भाई॥ ४ ॥
अर्थ:
शिवजी के समान रघुनाथजी की भक्ति का व्रत धारण करने वाला कौन है? जिन्होंने बिना ही पाप के सती-जैसी स्त्री को त्याग दिया और प्रतिज्ञा करके श्रीरघुनाथजी की भक्ति को दिखा दिया। हे भाई! श्रीरामचन्द्रजी को शिवजी के समान और कौन प्यारा है?
राम चरित अति अमित मुनीसा। कहि न सकहिं सत कोटि अहीसा॥ तदपि जथाश्रुत कहउँ बखानी। सुमिरि गिरापति प्रभु धनुपानी॥ २ ॥
अर्थ:
हे मुनीश! रामचरित्र अत्यन्त अपार है। सौ करोड़ शेषजी भी उसे नहीं कह सकते। तथापि जैसा मैंने सुना है, वैसा वाणी के स्वामी (प्रेरक) और हाथ में धनुष लिये हुए प्रभु श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण करके कहता हूँ।
सारद दारुनारि सम स्वामी। रामु सूत्रधर अंतरजामी॥ जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी। कबि उर अजिर नचावहिं बानी॥ ३ ॥
अर्थ:
सरस्वतीजी कठपुतली के समान हैं और अन्तर्यामी स्वामी श्रीरामचन्द्रजी [सूत पकड़कर कठपुतली को नचानेवाले] सूत्रधार हैं। अपना भक्त जानकर जिस कवि पर वे कृपा करते हैं, उसके हृदयरूपी आँगन में सरस्वती को वे नचाया करते हैं।
हरि हर बिमुख धर्म रति नाहीं। ते नर तहँ सपनेहुँ नहिं जाहीं॥ तेहि गिरि पर बट बिटप बिसाला। नित नूतन सुंदर सब काला॥ १ ॥
अर्थ:
जो भगवान् विष्णु और महादेवजी से विमुख हैं और जिनकी धर्म में प्रीति नहीं है, वे लोग स्वप्न में भी वहाँ नहीं जा सकते। उस पर्वत पर एक विशाल बरगद का पेड़ है, जो नित्य नवीन और सब काल (छहों ऋतुओं) में सुन्दर रहता है।
त्रिबिध समीर सुसीतलि छाया। सिव बिश्राम बिटप श्रुति गाया॥ एक बार तेहि तर प्रभु गयऊ। तरु बिलोकि उर अति सुखु भयऊ॥ २ ॥
अर्थ:
वहाँ तीनों प्रकार की (शीतल, मंद और सुगन्ध) वायु बहती रहती है और उसकी छाया बड़ी ठंडी रहती है। वह शिवजी के विश्राम करने का वृक्ष है, जिसे वेदों ने गाया है। एक बार प्रभु श्रीशिवजी उस वृक्ष के नीचे गये और उसे देखकर उनके हृदय में बहुत आनन्द हुआ।
निज कर डासि नागरिपु छाला। बैठे सहजहिं संभु कृपाला॥ कुंद इंदु दर गौर सरीरा। भुज प्रलंब परिधन मुनिचीरा॥ ३ ॥
अर्थ:
अपने हाथ से बाघम्बर बिछाकर कृपालु शिवजी स्वभाव से ही (बिना किसी खास प्रयोजन के) वहाँ बैठ गये। कुन्द के पुष्प, चन्द्रमा और शंख के समान उनका गौर शरीर था। बड़ी लंबी भुजाएँ थीं और वे मुनियों के-से (बल्कल) वस्त्र धारण किये हुए थे।
तरुन अरुन अंबुज सम चरना। नख दुति भगत हृदय तम हरना॥ भुजग भूति भूषन त्रिपुरारी। आननु सरद चंद छबि हारी॥ ४ ॥
अर्थ:
उनके चरण नये (पूर्णरूप से खिले हुए) लाल कमल के समान थे, नखों की ज्योति भक्तों के हृदय का अन्धकार हरनेवाली थी। साँप और भस्म ही उनके भूषण थे और उन त्रिपुरासुरके शत्रु शिवजी का मुख शरद् चन्द्रमा की शोभा को भी हरनेवाला (फीकी करनेवाला) था।
पति हियँ हेतु अधिक अनुमानी। बिहसि उमा बोलीं प्रिय बानी॥ कथा जो सकल लोक हितकारी। सोइ पूछन चह सैलकुमारी॥ ३ ॥
अर्थ:
स्वामी के हृदय में [अपने ऊपर पहले की अपेक्षा] अधिक प्रेम समझकर पार्वतीजी हँसकर प्रिय वचन बोलीं। [याज्ञवल्क्यजी कहते हैं कि] जो कथा सब लोगों का हित करने वाली है, उसे ही पार्वतीजी पूछना चाहती हैं।
बिस्वनाथ मम नाथ पुरारी। त्रिभुवन महिमा बिदित तुम्हारी॥ चर अरु अचर नाग नर देवा। सकल करहिं पद पंकज सेवा॥ ४ ॥
अर्थ:
[पार्वतीजी ने कहा-- ] हे संसार के स्वामी! हे मेरे नाथ! हे त्रिपुरासुर का वध करने वाले! आपकी महिमा तीनों लोकों में विख्यात है। चर, अचर, नाग, मनुष्य और देवता सभी आपके चरणकमलों की सेवा करते हैं।