ब्राह्मण संत वन्दना
ब्राह्मणों और संतों को धरती पर चलने वाले देवस्वरूप मानकर कवि उनकी महिमा गाते हैं। उनकी कृपा, शील और लोकहितकारी वृत्ति को श्रद्धापूर्वक नमन किया गया है।
बालकाण्ड · प्रकरण ३ / ५९
प्रकरण पाठ
मति कीरति गति भूति भलाई। जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई॥ सो जानब सतसंग प्रभाऊ। लोकहुँ बेद न आन उपाऊ॥ ३ ॥
अर्थ:
उनमें से जिसने जिस समय जहाँ कहीं भी किसी भी यत्न से बुद्धि, कीर्ति, सद्गति, विभूति (ऐश्वर्य) और भलाई पाई है, उसे सत्संग का ही प्रभाव समझना चाहिए। वेदों में और लोक में इनकी प्राप्ति का दूसरा कोई उपाय नहीं है।
सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई॥ बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं। फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं॥ ५ ॥
अर्थ:
दुष्ट भी सत्संगति पाकर सुधर जाते हैं, जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सुहावना हो जाता है (सुन्दर सोना बन जाता है)। किन्तु दैवयोग से यदि कभी सज्जन कुसंगति में पड़ जाते हैं, तो वे वहाँ भी साँप की मणि के समान अपने गुणों का ही अनुसरण करते हैं (अर्थात् जिस प्रकार साँप का संसर्ग पाकर भी मणि उसके विष को ग्रहण नहीं करती तथा अपने सहज गुण-प्रकाश को नहीं छोड़ती, उसी प्रकार साधु पुरुष दुष्टों के संग में रहकर भी दूसरों को प्रकाश ही देते हैं, दुष्टों का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता)।
बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी। कहत साधु महिमा सकुचानी॥ सो मो सन कहि जात न कैसें। साक बनिक मनि गुन गन जैसें॥ ६ ॥
अर्थ:
ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कवि और पण्डितों की वाणी भी संत-महिमा का वर्णन करने में सकुचाती है; वह मुझसे किस प्रकार नहीं कही जाती, जैसे साग बेचने वाले से मणियों के गुण-समूह नहीं कहे जा सकते।
बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ। अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोइ॥ ३ (क) ॥
अर्थ:
मैं संतों को प्रणाम करता हूँ, जिनके चित्त में समता है, जिनका न कोई मित्र है और न शत्रु। जैसे अंजलि में रखे हुए सुन्दर फूल (जिस हाथ ने फूलों को तोड़ा और जिस हाथ ने उनको रखा, उन) दोनों ही हाथों को समान रूप से सुगन्धित करते हैं, वैसे ही संत शत्रु और मित्र दोनों का ही समान रूप से कल्याण करते हैं।