कामदेव का देवकार्य के लिये जाना और भस्म होना

देवताओं के कार्य के लिए कामदेव शिवजी की तपस्या भंग करने जाता है। शिवजी के क्रोध से वह भस्म हो जाता है, और इस घटना से देवसमूह तथा रति दोनों व्याकुल हो उठते हैं।

बालकाण्ड · प्रकरण २३ / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

तदपि करब मैं काजु तुम्हारा। श्रुति कह परम धरम उपकारा॥ पर हित लागि तजइ जो देही। संतत संत प्रसंसहिं तेही॥ १ ॥

अर्थ:

तथापि मैं तुम्हारा काम तो करूँगा, क्योंकि श्रुति दूसरे के उपकार को परम धर्म कहती है। जो दूसरे के हित के लिए अपना शरीर त्याग देता है, संत सदा उसकी प्रशंसा करते हैं।

चौपाई

अस कहि चलेउ सबहि सिरु नाई। सुमन धनुष कर सहित सहाई॥ चलत मार अस हृदयँ बिचारा। सिव बिरोध ध्रुव मरनु हमारा॥ २ ॥

अर्थ:

यों कहकर और सबको सिर नवाकर कामदेव अपने पुष्प के धनुष को हाथ में लेकर [वसंतादि] सहायकों के साथ चला। चलते समय कामदेव ने हृदय में ऐसा विचार किया कि शिवजी के साथ विरोध करने से मेरा मरण निश्चित है।

चौपाई

तब आपन प्रभाउ बिस्तारा। निज बस कीन्ह सकल संसारा॥ कोपेउ जबहिं बारिचरकेतू। छन महुँ मिटे सकल श्रुति सेतू॥ ३ ॥

अर्थ:

तब उसने अपना प्रभाव फैलाया और समस्त संसार को अपने वश में कर लिया। जिस समय उस मछलीके चिह्न वाले ध्वजवाले कामदेव ने कोप किया, उस समय क्षणभर में ही वेदों की सारी मर्यादा मिट गयी।

चौपाई

ब्रह्मचर्ज ब्रत संजम नाना। धीरज धरम ग्यान बिग्याना॥ सदाचार जप जोग बिरागा। सभय बिबेक कटकु सबु भागा॥ ४ ॥

अर्थ:

ब्रह्मचर्य, व्रत, संयम, नाना प्रकार के धीरज, धर्म, ज्ञान, विज्ञान, सदाचार, जप, योग, वैराग्य, सभी विवेक की सेना डरकर भाग गयी।

दोहा

जे सजीव जग अचर चर नारि पुरुष अस नाम। ते निज निज मरजाद तजि भए सकल बस काम॥ ८४ ॥

अर्थ:

जगत में स्त्री-पुरुष संज्ञावाले जितने चर-अचर प्राणी थे, वे सब अपनी-अपनी मर्यादा छोड़कर काम के वश हो गये।

दोहा 85 के अंतर्गत
चौपाई

सब के हृदयँ मदन अभिलाषा। लता निहारि नवहिं तरु साखा॥ नदीं उमगि अंबुधि कहुँ धाईं। संगम करहिं तलाव तलाईं॥ १ ॥

अर्थ:

सबके हृदय में काम की अभिलाषा हो गयी। लताओं को देखकर वृक्षों की शाखाएँ झुकने लगीं। नदियाँ उमड़कर समुद्र की ओर दौड़ीं और संगम करने लगीं ताल-तलाईँ।

चौपाई

जहँ असि दसा जड़न्ह कै बरनी। को कहि सकइ सचेतन करनी॥ पसु पच्छी नभ जल थल चारी। भए कामबस समय बिसारी॥ २ ॥

अर्थ:

जहाँ ऐसी दशा जड़ों की कही गयी, वहाँ चेतन प्राणियों की करनी कौन कह सकता है? पशु-पक्षी, नभ, जल, थल-चारी, समय भूलकर काम के वश हो गये।

चौपाई

मदन अंध ब्याकुल सब लोका। निसि दिनु नहिं अवलोकहिं कोका॥ देव दनुज नर किंनर ब्याला। प्रेत पिसाच भूत बेताला॥ ३ ॥

अर्थ:

सब लोग कामान्ध होकर व्याकुल हो गये। चकवा-चकवी रात-दिन नहीं देखते। देव, दैत्य, नर, किन्नर, सर्प, प्रेत, पिशाच, भूत, बेताल—

चौपाई

इन्ह कै दसा न कहेउँ बखानी। सदा काम के चेरे जानी॥ सिद्ध बिरक्त महामुनि जोगी। तेपि कामबस भए बियोगी॥ ४ ॥

अर्थ:

इन्हें उनकी दशा नहीं कहूँगा, क्योंकि वे सदा काम के चेले माने जाते हैं। सिद्ध, विरक्त, महामुनि और योगी भी काम के वश होकर वियोगी हो गये।

छन्द

भए कामबस जोगीस तापस पावँरन्हि की को कहै। देखहिं चराचर नारिमय जे ब्रह्ममय देखत रहे॥ अबला बिलोकहिं पुरुषमय जगु पुरुष सब अबलामयं। दुइ दंड भरि ब्रह्मांड भीतर कामकृत कौतुक अयं॥

अर्थ:

जब योगीश्वर और तपस्वी भी काम के वश हो गये, तब पामर मनुष्यों की कौन कहे? जो समस्त चराचर जगत को ब्रह्ममय देखते थे, वे अब उसे स्त्रीमय देखने लगे। अबला सारे जग को पुरुषमय देखने लगीं और पुरुष उसे अबलामय देखने लगे। दो दंड भर ब्रह्माण्ड के भीतर कामकृत यह कौतुक रहा॥

सोरठा

धरी न काहूँ धीर सब के मन मनसिज हरे। जे राखे रघुबीर ते उबरे तेहि काल महुँ॥ ८५ ॥

अर्थ:

किसी ने भी हृदय में धैर्य नहीं धारण किया, कामदेव ने सबके मन हर लिये। श्रीरघुबीर ने जिनकी रक्षा की, केवल वे ही उस समय बचे रहे।

दोहा 86 के अंतर्गत
चौपाई

उभय घरी अस कौतुक भयऊ। जौ लगि कामु संभु पहिं गयऊ॥ सिवहि बिलोकि ससंकेउ मारू। भयउ जथाथिति सबु संसारू॥ १ ॥

अर्थ:

दो घड़ीतक ऐसा तमाशा हुआ, जब तक कामदेव शिवजी के पास पहुँच गया। शिवजी को देखकर कामदेव डर गया, तब सारा संसार फिर जैसा-का-तैसा हो गया।

चौपाई

भए तुरत सब जीव सुखारे। जिमि मद उतरि गएँ मतवारे॥ रुद्रहि देखि मदन भय माना। दुराधरष दुर्गम भगवाना॥ २ ॥

अर्थ:

तुरंत ही सब जीव वैसे ही सुखी हो गये जैसे मतवाले (नशा पिये हुए) लोग मद (नशा) उतर जाने पर सुखी होते हैं। दुराधर्ष, दुर्गम भगवान् रुद्र को देखकर कामदेव भयभीत हो गया।

चौपाई

फिरत लाज कछु करि नहिं जाई। मरनु ठानि मन रचेसि उपाई॥ प्रगटेसि तुरत रुचिर रितुराजा। कुसुमित नव तरु राजि बिराजा॥ ३ ॥

अर्थ:

लौटने में लज्जा लगती है और कुछ किया भी नहीं जा सकता। आखिर मन में मरने का निश्चय करके उसने उपाय रचा। तुरंत ही सुन्दर ऋतुराज प्रकट हुआ। फूले हुए नये-नये वृक्षों की कतारें सुशोभित हो गयीं।

चौपाई

बन उपबन बापिका तड़ागा। परम सुभग सब दिसा बिभागा॥ जहँ तहँ जनु उमगत अनुरागा। देखि मुएहुँ मन मनसिज जागा॥ ४ ॥

अर्थ:

वन-उपवन, बावली-तालाब और सब दिशाओं के विभाग परम सुन्दर हो गये। जहाँ-तहाँ मानो अनुराग उमड़ रहा है, जिसे देखकर मरे हुओं के मन में भी कामदेव जाग उठा।

छन्द

जागइ मनोभव मुएहुँ मन बन सुभगता न परै कही। सीतल सुगंध सुमंद मारुत मदन अनल सखा सही॥ बिकसे सरन्हि बहु कंज गुंजत पुंज मंजुल मधुकरा। कलहंस पिक सुक सरस रव करि गान नाचहिं अपछरा॥

अर्थ:

मरे हुए मन में भी कामदेव जागने लगा, वन की सुन्दरता कही नहीं जा सकती। कामरूपी अग्नि का सच्चा मित्र शीतल, मन्द, सुगन्धित पवन चलने लगा। सरोवरों में अनेकों कमल खिल गये, जिन पर सुन्दर भौंरों के समूह गुंजार करने लगे। कलहंस, कोयल और तोते रसीली बोली बोलने लगे और अप्सराएँ गा-गाकर नाचने लगीं॥

दोहा

सकल कला करि कोटि बिधि हारेउ सेन समेत। चली न अचल समाधि सिव कोपेउ हृदयनिकेत॥ ८६ ॥

अर्थ:

कामदेव अपनी सेनासमेत करोड़ों प्रकार की सब कलाएँ (उपाय) करके हार गया, पर शिवजी की अचल समाधि न डिगी। तब कामदेव क्रोधित हो उठा।

दोहा 87 के अंतर्गत
चौपाई

देखि रसाल बिटप बर साखा। तेहि पर चढ़ेउ मदनु मन माखा॥ सुमन चाप निज सर संधाने। अति रिस ताकि श्रवन लगि ताने॥ १ ॥

अर्थ:

आम के वृक्ष की एक सुन्दर डाली देखकर मन में क्रोध से भरा हुआ कामदेव उस पर चढ़ गया। उसने पुष्प-धनुष पर अपने [पाँचों] बाण चढ़ाये और अत्यन्त क्रोध से [लक्ष्य की ओर] ताककर उन्हें कान तक तान लिया।

चौपाई

छाड़े बिषम बिसिख उर लागे। छूटि समाधि संभु तब जागे॥ भयउ ईस मन छोभु बिसेषी। नयन उघारि सकल दिसि देखी॥ २ ॥

अर्थ:

कामदेव ने तीक्ष्ण पाँच बाण छोड़े, जो शिवजी के हृदय में लगे। तब उनकी समाधि टूट गयी और वे जाग गये। ईश्वर (शिवजी) के मन में बहुत क्षोभ हुआ। उन्होंने आँखें खोलकर सब ओर देखा।

चौपाई

सौरभ पल्लव मदनु बिलोका। भयउ कोपु कंपेउ त्रैलोका॥ तब सिवँ तीसर नयन उघारा। चितवत कामु भयउ जरि छारा॥ ३ ॥

अर्थ:

जब आम के पत्तों में [छिपे हुए] कामदेव को देखा, तो उन्हें बड़ा क्रोध हुआ, जिससे तीनों लोक काँप उठे। तब शिवजी ने तीसरा नेत्र खोला, उनके देखते ही कामदेव जलकर भस्म हो गया।