बंदीजनों द्वारा जनकप्रतिज्ञा की घोषणा

बंदीजन सभा में जनक की प्रतिज्ञा का उद्घोष करते हैं कि जो वीर शिवधनुष उठाकर चढ़ाएगा, वही सीता का वरण करेगा। यह सुनकर राजाओं का उत्साह और प्रतिस्पर्धा बढ़ जाती है।

बालकाण्ड · प्रकरण ४९ / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

तब बंदीजन जनक बोलाए। बिरिदावली कहत चलि आए॥ कह नृपु जाइ कहहु पन मोरा। चले भाट हियँ हरषु न थोरा॥ ४ ॥

अर्थ:

तब राजा जनक ने बंदीजनों (भाटों) को बुलाया। वे विरुदावली (वंश की कीर्ति) गाते हुए चले आये। राजा ने कहा--जाकर मेरा प्रण सबसे कहो। भाट चले, उनके हृदय में कम आनन्द न था।

दोहा

बोले बंदी बचन बर सुनहु सकल महिपाल। पन बिदेह कर कहहिं हम भुजा उठाइ बिसाल॥ २४९ ॥

अर्थ:

भाटों ने श्रेष्ठ वचन कहा- हे पृथ्वी की पालना करनेवाले सब राजागण! सुनिये। हम अपनी भुजा उठाकर जनकजी का विशाल प्रण कहते हैं।

दोहा 250 के अंतर्गत
चौपाई

नृप भुजबल बिधु सिवधनु राहू। गरुअ कठोर बिदित सब काहू॥ रावनु बानु महाभट भारे। देखि सरासन गवँहिं सिधारे॥ १ ॥

अर्थ:

राजाओं के भुजाओं का बल चन्द्रमा है, शिवजी का धनुष राहु है। वह भारी है, कठोर है, यह सबको विदित है। बड़े भारी योद्धा रावण और बाणासुर भी इस धनुष को देखकर भाग खड़े हुए (उसे उठाना तो दूर रहा, छूने तक की हिम्मत न हुई)।

चौपाई

सोइ पुरारि कोदंडु कठोरा। राज समाज आजु जोइ तोरा॥ त्रिभुवन जय समेत बैदेही। बिनहिं बिचार बरइ हठि तेही॥ २ ॥

अर्थ:

उसी पुरारि (शिवजी) के कठोर धनुष को आज राजसमाज में जो भी तोड़ेगा, तीनों लोकों की विजय के साथ बैदेही बिना किसी विचार के हठपूर्वक उसी को वरेगी।