संत असंत वन्दना
संत और असंत के स्वभाव का सूक्ष्म विवेचन किया गया है। संतों की शीतल, हितकारी वृत्ति और दुष्टों की पीड़ादायक प्रवृत्ति के माध्यम से सद्गुणों का महत्व स्पष्ट होता है।
बालकाण्ड · प्रकरण ५ / ५९
प्रकरण पाठ
खल अघ अगुन साधु गुन गाहा। उभय अपार उदधि अवगाहा॥ तेहि तें कछु गुन दोष बखाने। संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने॥ १ ॥
अर्थ:
दुष्टों के पापों और अवगुणों की तथा साधुओं के गुणों की कथाएँ—दोनों ही अपार और अथाह समुद्र हैं। इसी से कुछ गुण और दोषों का वर्णन किया गया है, क्योंकि बिना पहचाने उनका ग्रहण या त्याग नहीं हो सकता।
भलेउ पोच सब बिधि उपजाए। गनि गुन दोष बेद बिलगाए॥ कहहिं बेद इतिहास पुराना। बिधि प्रपंचु गुन अवगुन साना॥ २ ॥
अर्थ:
भले, बुरे सभी ब्रह्मा के पैदा किये हुए हैं, पर गुण और दोषों को विचारकर वेदों ने उन्हें अलग-अलग कर दिया है। वेद, इतिहास और पुराण कहते हैं कि ब्रह्मा की यह सृष्टि गुण-अवगुणों से सनी हुई है।
दुख सुख पाप पुन्य दिन राती। साधु असाधु सुजाति कुजाती॥ दानव देव ऊँच अरु नीचू। अमिअ सुजीवनु माहुरु मीचू॥ माया ब्रह्म जीव जगदीसा। लच्छि अलच्छि रंक अवनीसा॥ कासी मग सुरसरि क्रमनासा। मरु मारव महिदेव गवासा॥ सरग नरक अनुराग बिरागा। निगमागम गुन दोष बिभागा॥ ३-५ ॥
अर्थ:
दुःख-सुख, पाप-पुण्य, दिन-रात, साधु-असाधु, सुजाति-कुजाति, दानव-देव, ऊँच-नीच, अमृत, सुजीवन, विष, मृत्यु, माया-ब्रह्म, जीव-जगदीश, लक्ष्मी-अलक्ष्मी, रंक-अवनीश, काशी-मगध-गंगाजी-कर्मनाशा, मरु-मारवाड़-महिदेव-गवासा, स्वर्ग-नरक, अनुराग-वैराग्य, और निगम-आगम के गुण-दोष-विभाग—ये सब ब्रह्मा की सृष्टि में हैं।
अस बिबेक जब देइ बिधाता। तब तजि दोष गुनहिं मनु राता॥ काल सुभाउ करम बरिआईं। भलेउ प्रकृति बस चुकइ भलाईं॥ १ ॥
अर्थ:
विधाता जब इस प्रकारका (हंसका-सा) विवेक देते हैं, तब दोषों को छोड़कर मन गुणों में अनुरक्त होता है। काल-स्वभाव और कर्म की प्रबलता से भले लोग (साधु) भी माया के वश में होकर कभी-कभी भलाई से चूक जाते हैं।
सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं। दलि दुख दोष बिमल जसु देहीं॥ खलउ करहिं भल पाइ सुसंगू। मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगू॥ २ ॥
अर्थ:
भगवान् के भक्त जैसे उस चूक को सुधार लेते हैं और दुःख-दोषों को मिटाकर निर्मल यश देते हैं, वैसे ही दुष्ट भी कभी-कभी उत्तम संग पाकर भलाई करते हैं; परन्तु उनका कभी भंग न होनेवाला मलिन स्वभाव नहीं मिटता।
लखि सुबेष जग बंचक जेऊ। बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ॥ उघरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू॥ ३ ॥
अर्थ:
जो [वेषधारी] ठग हैं, उन्हें भी अच्छा (साधु का-सा) वेष बनाया देखकर वेष के प्रताप से जगत् पूजता है; परन्तु एक-न-एक दिन वे उघड़ ही आते हैं, अंत तक उनका कपट नहीं निभता, जैसे कालनेमि, रावण और राहु का हाल हुआ।
किएहुँ कुबेषु साधु सनमानू। जिमि जग जामवंत हनुमानू॥ हानि कुसंग सुसंगति लाहू। लोकहुँ बेद बिदित सब काहू॥ ४ ॥
अर्थ:
बुरा वेष बना लेने पर भी साधु का सम्मान ही होता है, जैसे जगत् में जाम्बवान् और हनुमानजी का हुआ। बुरे संग से हानि और अच्छे संग से लाभ होता है, यह बात लोक और वेद में है और सभी लोग इसको जानते हैं।
गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा। कीचहिं मिलइ नीच जल संगा॥ साधु असाधु सदन सुक सारीं। सुमिरहिं राम देहिं गनि गारीं॥ ५ ॥
अर्थ:
पवन के संग से धूल आकाश पर चढ़ जाती है और वही नीच (नीचे की ओर बहने वाले) जल के संग से कीचड़ में मिल जाती है। साधु के घर के तोता-मैना राम-राम सुमिरते हैं और असाधु के घर के तोता-मैना गिन-गिनकर गालियाँ देते हैं।
सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि कीन्ह। ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह॥ ७ (ख) ॥
अर्थ:
महीने के दोनों पखवाड़ों में उजियाला और अँधेरा समान ही रहता है, परन्तु विधाता ने इनके नाम में भेद कर दिया है (एक का नाम शुक्ल और दूसरे का नाम कृष्ण रख दिया)। एक को चन्द्रमा का बढ़ाने वाला और दूसरे को उसका घटाने वाला समझकर जगत् ने एक को सुयश और दूसरे को अपयश दे दिया।