पृथ्वी और देवतादि की करुण पुकार
रावण के अत्याचारों से पीड़ित पृथ्वी गौ के रूप में विलाप करती है। देवता भी ब्रह्मा के साथ मिलकर भगवान से रक्षा की करुण प्रार्थना करते हैं।
बालकाण्ड · प्रकरण ३५ / ५९
प्रकरण पाठ
सुर मुनि गंधर्बा मिलि करि सर्बा गे बिरंचि के लोका। सँग गोतनुधारी भूमि बिचारी परम बिकल भय सोका॥ ब्रह्माँ सब जाना मन अनुमाना मोर कछू न बसाई। जा करि तैं दासी सो अबिनासी हमरेउ तोर सहाई॥
अर्थ:
तब देवता, मुनि और गन्धर्व सब मिलकर ब्रह्माजी के लोक (सत्यलोक) को गये। भय और शोक से अत्यन्त व्याकुल बेचारी पृथ्वी भी गौ का शरीर धारण किये हुए उनके साथ थी। ब्रह्माजी सब जान गये। उन्होंने मन में अनुमान किया कि इसमें मेरा कुछ भी वश नहीं चलने का। [तब उन्होंने पृथ्वी से कहा कि--] जिसकी तू दासी है, वही अविनाशी हमारा और तुम्हारा दोनों का सहायक है॥।
बैठे सुर सब करहिं बिचारा। कहँ पाइअ प्रभु करिअ पुकारा॥ पुर बैकुंठ जान कह कोई। कोउ कह पयनिधि बस प्रभु सोई॥ १ ॥
अर्थ:
सब देवता बैठकर विचार करने लगे कि प्रभु को कहाँ पावें ताकि उनके सामने पुकार (फरियाद) करें। कोई वैकुण्ठपुरी जाने को कहता था और कोई कहता था कि वही प्रभु क्षीरसमुद्र में निवास करते हैं।
अग जगमय सब रहित बिरागी। प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी॥ मोर बचन सब के मन माना। साधु साधु करि ब्रह्म बखाना॥ ४ ॥
अर्थ:
वे चराचरमय होते हुए भी सबसे रहित हैं और विरक्त हैं (उनकी कहीं आसक्ति नहीं है); वे प्रेम से प्रकट होते हैं, जैसे अग्नि। मेरी बात सब के मन को मान्य हुई। ब्रह्मा ने 'साधु, साधु!' कहकर बखान किया।
जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता। गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिंधुसुता प्रिय कंता॥ पालन सुर धरनी अद्भुत करनी मरम न जानइ कोई। जो सहज कृपाला दीनदयाला करउ अनुग्रह सोई॥ १ ॥
अर्थ:
है देवताओं के स्वामी, सेवकों को सुख देनेवाले, शरणागत की रक्षा करनेवाले भगवान्! आपकी जय हो! जय हो!! हे गो-ब्राह्मणों का हित करनेवाले, असुरों का विनाश करनेवाले, समुद्र की कन्या (श्रीलक्ष्मीजी) के प्रिय स्वामी! आपकी जय हो। हे देवता और पृथ्वी का पालन करनेवाले! आपकी लीला अद्भुत है, उसका भेद कोई नहीं जानता। ऐसे जो स्वभाव से ही कृपालु और दीनदयालु हैं, वे ही हम पर कृपा करें।
जय जय अबिनासी सब घट बासी ब्यापक परमानंदा। अबिगत गोतीतं चरित पुनीतं मायारहित मुकुंदा॥ जेहि लागि बिरागी अति अनुरागी बिगत मोह मुनिबृंदा। निसि बासर ध्यावहिं गुनगन गावहिं जयति सच्चिदानंदा॥ २ ॥
अर्थ:
है अविनाशी, सब के हृदय में निवास करनेवाले (अन्तर्यामी), सर्वव्यापक परम आनन्दस्वरूप, अविगत, गोतीत, पवित्रचरित्र, मायारहित मुकुन्द! आपकी जय हो! जय हो!! [इस लोक और परलोक के सब भोगों से] विरक्त तथा मोह से सर्वथा छूटे हुए मुनिवृन्द भी अत्यन्त अनुरागी बनकर जिनका रात-दिन ध्यान करते हैं और जिनके गुणों के समूह का गान करते हैं, उन सच्चिदानन्द की जय हो।
जेहिं सृष्टि उपाई त्रिबिध बनाई संग सहाय न दूजा। सो करउ अघारी चिंत हमारी जानिअ भगति न पूजा॥ जो भव भय भंजन मुनि मन रंजन गंजन बिपति बरूथा। मन बच क्रम बानी छाड़ि सयानी सरन सकल सुरजूथा॥ ३ ॥
अर्थ:
जिन्होंने बिना किसी दूसरे संगी अथवा सहायक के अकेले ही तीन प्रकार की सृष्टि उत्पन्न की, वे पापों का नाश करनेवाले भगवान् हमारी सुधि लें। हम न भक्ति जानते हैं, न पूजा। जो संसार के (जन्म-मृत्यु के) भय का नाश करनेवाले, मुनियों के मन को आनन्द देनेवाले और विपत्तियों के समूह को नष्ट करनेवाले हैं। हम सब देवताओं के समूह मन, वचन और कर्म से चतुराई करने की बान छोड़कर उन (भगवान्) की शरण आए हैं।
सारद श्रुति सेषा रिषय असेषा जा कहुँ कोउ नहिं जाना। जेहि दीन पिआरे बेद पुकारे द्रवउ सो श्रीभगवाना॥ भव बारिधि मंदर सब बिधि सुंदर गुनमंदिर सुखपुंजा। मुनि सिद्ध सकल सुर परम भयातुर नमत नाथ पद कंजा॥ ४ ॥
अर्थ:
सरस्वती, श्रुति, शेषजी और सम्पूर्ण ऋषि—कोई भी जिनको नहीं जानते, जिन्हें दीन प्रिय हैं, ऐसा वेद पुकारकर कहते हैं, वे ही श्रीभगवान् हम पर दया करें। हे संसाररूपी समुद्र के [मथने के] लिये मन्दराचलरूप, सब प्रकार से सुन्दर, गुणों के धाम और सुखों की राशि नाथ! आपके चरणकमलों में मुनि, सिद्ध और सारे देवता भय से अत्यन्त व्याकुल होकर नमस्कार करते हैं।