खल वन्दना
तुलसीदास खलों को भी वन्दन करते हैं, क्योंकि उनके स्वभाव को जानकर साधक सावधान रहता है। वे अप्रत्यक्ष रूप से उनसे विघ्न न डालने की प्रार्थना भी करते हैं।
बालकाण्ड · प्रकरण ४ / ५९
प्रकरण पाठ
बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ। जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ॥ पर हित हानि लाभ जिन्ह केरें। उजरें हरष बिषाद बसेरें॥ १ ॥
अर्थ:
अब मैं सच्चे भाव से दुष्टों को प्रणाम करता हूँ, जो बिना ही प्रयोजन, अपना हित करने वाले के भी प्रतिकूल आचरण करते हैं। दूसरों के हित की हानि ही जिनकी दृष्टि में लाभ है, जिनको दूसरों के उजड़ने में हर्ष और बसने में विषाद होता है।
हरि हर जस राकेस राहु से। पर अकाज भट सहसबाहु से॥ जे पर दोष लखहिं सहसाखी। पर हित घृत जिन्ह के मन माखी॥ २ ॥
अर्थ:
जो हरि और हर के यशरूपी पूर्णिमाके चन्द्रमा के लिये राहु के समान हैं (अर्थात् जहाँ कहीं भगवान् विष्णु या शिव के यश का वर्णन होता है, उसमें वे बाधा देते हैं) और दूसरों की बुराई करने में सहस्रबाहु के समान वीर हैं। जो दूसरों के दोषों को हजार आँखों से देखते हैं और दूसरों के हितरूपी घी के लिये जिनका मन मक्खी के समान है (अर्थात् जिस प्रकार मक्खी घी में गिरकर उसे खराब कर देती है और स्वयं भी मर जाती है, उसी प्रकार दुष्ट लोग दूसरों के बने-बनाये काम को अपनी हानि करके भी बिगाड़ देते हैं)।
तेज कृसानु रोष महिषेसा। अघ अवगुन धन धनी धनेसा॥ उदय केत सम हित सब ही के। कुंभकरन सम सोवत नीके॥ ३ ॥
अर्थ:
जो तेज (दूसरों को जलाने वाले ताप) में अग्नि और क्रोध में यमराज के समान हैं, पाप और अवगुणरूपी धन में कुबेर के समान धनी हैं, जिनकी बढ़ती सभी के हित का नाश करने के लिये केतु (पुच्छल तारे) के समान है, और जिनके कुम्भकर्ण की तरह सोते रहने में ही भलाई है।
पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं। जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं॥ बंदउँ खल जस सेष सरोषा। सहस बदन बरनइ पर दोषा॥ ४ ॥
अर्थ:
जैसे ओले खेती का नाश करके आप भी गल जाते हैं, वैसे ही वे दूसरों का काम बिगाड़ने के लिये अपना शरीर तक छोड़ देते हैं। मैं दुष्टों की [हजार मुखवाले] शेषजी के समान समझकर प्रणाम करता हूँ, जो पराये दोषों का हजार मुखों से बड़े रोष के साथ वर्णन करते हैं।
पुनि प्रनवउँ पृथुराज समाना। पर अघ सुनइ सहस दस काना॥ बहुरि सक्र सम बिनवउँ तेही। संतत सुरानीक हित जेही॥ ५ ॥
अर्थ:
पुनः उनको राजा पृथु के समान जानकर प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने भगवान् का यश सुनने के लिये दस हजार कान माँगे थे, जो दस हजार कानों से दूसरों के पापों को सुनते हैं। फिर इन्द्र के समान मानकर उनकी विनय करता हूँ, जिनको सदा देवताओं की सेना हितकारी मालूम देती है [इन्द्र के लिये भी सुरानीक अर्थात् देवताओं की सेना हितकारी है]।
बंदउँ संत असज्जन चरना। दुखप्रद उभय बीच कछु बरना॥ बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं। मिलत एक दुख दारुन देहीं॥ २ ॥
अर्थ:
अब मैं संत और असंत दोनों के चरणों की वन्दना करता हूँ; दोनों ही दुःख देनेवाले हैं, परन्तु उनमें कुछ अन्तर कहा गया है। वह अन्तर यह है कि एक (संत) तो बिछुड़ते समय प्राण हर लेते हैं और दूसरे (असंत) मिलते हैं तब दारुण दुःख देते हैं। (अर्थात् संतों का बिछुड़ना मरने के समान दुःखदायी होता है और असंतों का मिलना)।
उपजहिं एक संग जग माहीं। जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं॥ सुधा सुरा सम साधु असाधू। जनक एक जग जलधि अगाधू॥ ३ ॥
अर्थ:
दोनों (संत और असंत) जगत् में एक साथ पैदा होते हैं; पर [एक साथ पैदा होनेवाले] कमल और जोंक की तरह उनके गुण अलग-अलग होते हैं। (कमल दर्शन और स्पर्श से सुख देता है, किन्तु जोंक शरीर का स्पर्श पाते ही रक्त चूसने लगती है।) साधु अमृत के समान (मृत्युरूपी संसार से उबारनेवाला) और असाधु मदिरा के समान (मोह, प्रमाद और जड़ता उत्पन्न करनेवाला) है, दोनों को उत्पन्न करने वाला जगद्रूपी अगाध समुद्र एक ही है। [शास्त्रों में समुद्रमन्थन से ही अमृत और मदिरा दोनों की उत्पत्ति बतायी गयी है]।
भल अनभल निज निज करतूती। लहत सुजस अपलोक बिभूती॥ सुधा सुधाकर सुरसरि साधू। गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू॥ गुन अवगुन जानत सब कोई। जो जेहि भाव नीक तेहि सोई॥ ४-५ ॥
अर्थ:
भले और बुरे अपनी-अपनी करतूती के अनुसार सुयश और अपयश की विभूति पाते हैं। सुधा, सुधाकर, सुरसरि और साधु; गरल, अनल, कलिमल-सरि और व्याध—इनके गुण-अवगुण सब कोई जानते हैं; किन्तु जिसे जो भाता है, उसे वही अच्छा लगता है।