विश्वामित्र का राजा दशरथ से राम-लक्ष्मण को माँगना

ऋषि विश्वामित्र अयोध्या आकर अपने यज्ञ की रक्षा के लिए राम और लक्ष्मण को माँगते हैं। दशरथ पहले संकोच करते हैं, पर गुरु वशिष्ठ की सम्मति से दोनों कुमार उनके साथ जाते हैं।

बालकाण्ड · प्रकरण ३९ / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

मुनि आगमन सुना जब राजा। मिलन गयउ लै बिप्र समाजा॥ करि दंडवत मुनिहि सनमानी। निज आसन बैठारेन्हि आनी॥ १ ॥

अर्थ:

राजा ने जब मुनि का आगमन सुना, तब वे ब्राह्मणों के समाज को साथ लेकर मिलने गये और दण्डवत् करके मुनि का सम्मान करते हुए उन्हें लाकर अपने आसन पर बैठाया।

चौपाई

चरन पखारि कीन्हि अति पूजा। मो सम आजु धन्य नहिं दूजा॥ बिबिध भाँति भोजन करवावा। मुनिबर हृदयँ हरष अति पावा॥ २ ॥

अर्थ:

चरणों को धोकर बहुत पूजा की और कहा—मेरे समान धन्य आज दूसरा कोई नहीं है। फिर अनेक प्रकार के भोजन करवाये, जिससे श्रेष्ठ मुनि ने अपने हृदय में बहुत ही हर्ष प्राप्त किया।

चौपाई

पुनि चरननि मेले सुत चारी। राम देखि मुनि देह बिसारी॥ भए मगन देखत मुख सोभा। जनु चकोर पूरन ससि लोभा॥ ३ ॥

अर्थ:

फिर राजा ने चारों पुत्रों को मुनि के चरणों पर डाल दिया (उनसे प्रणाम कराया)। श्रीरामचन्द्रजी को देखकर मुनि अपनी देह की सुधि भूल गये। वे श्रीरामजी के मुख की शोभा देखते ही ऐसे मग्र हो गये, मानो चकोर पूर्ण चन्द्रमा को देखकर लुभा गया हो।

चौपाई

तब मन हरषि बचन कह राऊ। मुनि अस कृपा न कीन्हिहु काऊ॥ केहि कारन आगमन तुम्हारा। कहहु सो करत न लावउँ बारा॥ ४ ॥

अर्थ:

तब राजा ने मन में हर्षित होकर ये वचन कहे—हे मुनि! इस प्रकार की कृपा तो आपने कभी नहीं की। आपके आगमन का क्या कारण है? कहिये, मैं उसे पूरा करने में देर नहीं लगाऊँगा।

चौपाई

असुर समूह सतावहिं मोही। मैं जाचन आयउँ नृप तोही॥ अनुज समेत देहु रघुनाथा। निसिचर बध मैं होब सनाथा॥ ५ ॥

अर्थ:

राक्षसों के समूह मुझे बहुत सताते हैं। मैं तुमसे माँगने आया हूँ, हे नृप! छोटे भाई सहित रघुनाथ को दे दो। राक्षसों के वध के बाद मैं सनाथ हो जाऊँगा।

दोहा

देहु भूप मन हरषित तजहु मोह अग्यान। धर्म सुजस प्रभु तुम्ह कौं इन्ह कहँ अति कल्यान॥ २०७ ॥

अर्थ:

हे राजन्‌! प्रसन्न मन से इनको दो, मोह और अज्ञान को छोड़ दो। हे स्वामी! इससे तुम्हें धर्म और सुयश की प्राप्ति होगी और इनका परम कल्याण होगा।

दोहा 208 के अंतर्गत
चौपाई

सुनि राजा अति अप्रिय बानी। हृदय कंप मुख दुति कुमुलानी॥ चौथेंपन पायउँ सुत चारी। बिप्र बचन नहिं कहेहु बिचारी॥ १ ॥

अर्थ:

इस अत्यन्त अप्रिय वाणी को सुनकर राजा का हृदय काँप उठा और उनके मुख की कान्ति फीकी पड़ गयी। [उन्होंने कहा—] हे ब्राह्मण! मैंने चौथेपन में चार पुत्र पाये हैं, आपने विचार कर बात नहीं कही।

चौपाई

मागहु भूमि धेनु धन कोसा। सर्बस देउँ आजु सहरोसा॥ देह प्रान तें प्रिय कछु नाहीं। सोउ मुनि देउँ निमिष एक माहीं॥ २ ॥

अर्थ:

हे मुनि! आप पृथ्वी, धेनु, धन और कोष माँग लीजिये, मैं आज बड़े हर्ष के साथ अपना सर्वस्व दे दूँगा। देह और प्राण से अधिक प्यारा कुछ भी नहीं होता, मैं उसे भी एक पल में दे दूँगा।

चौपाई

सब सुत प्रिय मोहि प्रान कि नाईं। राम देत नहिं बनइ गोसाईं॥ कहँ निसिचर अति घोर कठोरा। कहँ सुंदर सुत परम किसोरा॥ ३ ॥

अर्थ:

सभी पुत्र मुझे प्राणों के समान प्यारे हैं; उनमें भी हे प्रभो! राम को तो [किसी प्रकार भी] देना नहीं बनता। कहाँ अत्यन्त डरावने और क्रूर राक्षस और कहाँ सुन्दर, परम किशोर अवस्था के (बिलकुल सुकुमार) मेरे पुत्र!

चौपाई

सुनि नृप गिरा प्रेम रस सानी। हृदयँ हरष माना मुनि ग्यानी॥ तब बसिष्ठ बहुबिधि समुझावा। नृप संदेह नास कहँ पावा॥ ४ ॥

अर्थ:

प्रेम-रस में सनी हुई राजा की वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि विश्वामित्रजी ने हृदय में बड़ा हर्ष माना। तब वसिष्ठजी ने राजा को बहुत प्रकार से समझाया, जिससे राजा का सन्देह नाश को प्राप्त हुआ।

चौपाई

अति आदर दोउ तनय बोलाए। हृदयँ लाइ बहु भाँति सिखाए॥ मेरे प्रान नाथ सुत दोऊ। तुम्ह मुनि पिता आन नहिं कोऊ॥ ५ ॥

अर्थ:

राजा ने बड़े ही आदर से दोनों पुत्रों को बुलाया और हृदय से लगाकर बहुत प्रकार से उन्हें शिक्षा दी। [फिर कहा—] हे नाथ! ये दोनों पुत्र मेरे प्राण हैं। हे मुनि! [अब] आप ही इनके पिता हैं, दूसरा कोई नहीं।

दोहा

सौंपे भूप रिषिहि सुत बहुबिधि देइ असीस। जननी भवन गए प्रभु चले नाइ पद सीस॥ २०८ (क) ॥

अर्थ:

राजा ने बहुत प्रकार से आशीर्वाद देकर पुत्रों को ऋषि के हवाले कर दिया। फिर प्रभु माता के भवन में गये और उनके चरणों में सिर नवाकर चले।

सोरठा

पुरुषसिंह दोउ बीर हरषि चले मुनि भय हरन। कृपासिंधु मतिधीर अखिल बिस्व कारन करन॥ २०८ (ख) ॥

अर्थ:

पुरुषों में सिंह रूप दोनों भाई (राम-लक्ष्मण) मुनि का भय हरने के लिये प्रसन्न होकर चले। वे कृपा के समुद्र, धीरबुद्धि और सम्पूर्ण विश्व के कारण के भी कारण हैं।

दोहा 209 के अंतर्गत
चौपाई

अरुन नयन उर बाहु बिसाला। नील जलज तनु स्याम तमाला॥ कटि पट पीत कसें बर भाथा। रुचिर चाप सायक दुहुँ हाथा॥ १ ॥

अर्थ:

भगवान् के लाल नेत्र हैं, चौड़ी छाती और विशाल भुजाएँ हैं, नील कमल और तमाल के वृक्ष की तरह श्याम शरीर है, कमर में पीत वस्त्र [पहने] और सुन्दर तरकस कसे हुए हैं। दोनों हाथों में [क्रमशः] सुन्दर धनुष और बाण हैं।

चौपाई

स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। बिस्वामित्र महानिधि पाई॥ प्रभु ब्रह्मन्यदेव मैं जाना। मोहि निति पिता तजेउ भगवाना॥ २ ॥

अर्थ:

श्याम और गौर वर्ण के दोनों भाई परम सुन्दर हैं। विश्वामित्रजी को महान् निधि प्राप्त हो गयी। [वे सोचने लगे—] मैं जान गया कि प्रभु ब्रह्मण्यदेव (ब्राह्मणों के भक्त) हैं। मेरे लिये भगवान् ने अपने पिताको भी छोड़ दिया।

चौपाई

चले जात मुनि दीन्हि देखाई। सुनि ताड़का क्रोध करि धाई॥ एकहिं बान प्रान हरि लीन्हा। दीन जानि तेहि निज पद दीन्हा॥ ३ ॥

अर्थ:

मार्ग में चले जाते हुए मुनि ने ताड़का को दिखलाया। सुनते ही वह क्रोध करके दौड़ी। श्रीरामजी ने एक ही बाण से उसके प्राण हर लिये और दीन जानकर उसको निजपद (अपना दिव्य स्वरूप) दिया।

चौपाई

तब रिषि निज नाथहि जियँ चीन्ही। बिद्यानिधि कहुँ बिद्या दीन्ही॥ जाते लाग न छुधा पिपासा। अतुलित बल तनु तेज प्रकासा॥ ४ ॥

अर्थ:

तब ऋषि ने प्रभु को मन में पहचानकर विद्या का भण्डार समझते हुए भी [लीला को पूर्ण करने के लिये] ऐसी विद्या दी, जिससे भूख-प्यास न लगे और शरीर में अतुलित बल और तेज का प्रकाश हो।

दोहा

आयुध सर्ब समर्पि कै प्रभु निज आश्रम आनि। कंद मूल फल भोजन दीन्ह भगति हित जानि॥ २०९ ॥

अर्थ:

सब अस्त्र-शस्त्र समर्पण करके मुनि प्रभु श्रीरामजी को अपने आश्रम में ले आये; और उन्हें परम हितू जानकर भक्तिपूर्वक कन्द, मूल और फल का भोजन कराया।