विश्वामित्र का राजा दशरथ से राम-लक्ष्मण को माँगना
ऋषि विश्वामित्र अयोध्या आकर अपने यज्ञ की रक्षा के लिए राम और लक्ष्मण को माँगते हैं। दशरथ पहले संकोच करते हैं, पर गुरु वशिष्ठ की सम्मति से दोनों कुमार उनके साथ जाते हैं।
बालकाण्ड · प्रकरण ३९ / ५९
प्रकरण पाठ
पुनि चरननि मेले सुत चारी। राम देखि मुनि देह बिसारी॥ भए मगन देखत मुख सोभा। जनु चकोर पूरन ससि लोभा॥ ३ ॥
अर्थ:
फिर राजा ने चारों पुत्रों को मुनि के चरणों पर डाल दिया (उनसे प्रणाम कराया)। श्रीरामचन्द्रजी को देखकर मुनि अपनी देह की सुधि भूल गये। वे श्रीरामजी के मुख की शोभा देखते ही ऐसे मग्र हो गये, मानो चकोर पूर्ण चन्द्रमा को देखकर लुभा गया हो।
सुनि राजा अति अप्रिय बानी। हृदय कंप मुख दुति कुमुलानी॥ चौथेंपन पायउँ सुत चारी। बिप्र बचन नहिं कहेहु बिचारी॥ १ ॥
अर्थ:
इस अत्यन्त अप्रिय वाणी को सुनकर राजा का हृदय काँप उठा और उनके मुख की कान्ति फीकी पड़ गयी। [उन्होंने कहा—] हे ब्राह्मण! मैंने चौथेपन में चार पुत्र पाये हैं, आपने विचार कर बात नहीं कही।
सब सुत प्रिय मोहि प्रान कि नाईं। राम देत नहिं बनइ गोसाईं॥ कहँ निसिचर अति घोर कठोरा। कहँ सुंदर सुत परम किसोरा॥ ३ ॥
अर्थ:
सभी पुत्र मुझे प्राणों के समान प्यारे हैं; उनमें भी हे प्रभो! राम को तो [किसी प्रकार भी] देना नहीं बनता। कहाँ अत्यन्त डरावने और क्रूर राक्षस और कहाँ सुन्दर, परम किशोर अवस्था के (बिलकुल सुकुमार) मेरे पुत्र!
सुनि नृप गिरा प्रेम रस सानी। हृदयँ हरष माना मुनि ग्यानी॥ तब बसिष्ठ बहुबिधि समुझावा। नृप संदेह नास कहँ पावा॥ ४ ॥
अर्थ:
प्रेम-रस में सनी हुई राजा की वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि विश्वामित्रजी ने हृदय में बड़ा हर्ष माना। तब वसिष्ठजी ने राजा को बहुत प्रकार से समझाया, जिससे राजा का सन्देह नाश को प्राप्त हुआ।
अति आदर दोउ तनय बोलाए। हृदयँ लाइ बहु भाँति सिखाए॥ मेरे प्रान नाथ सुत दोऊ। तुम्ह मुनि पिता आन नहिं कोऊ॥ ५ ॥
अर्थ:
राजा ने बड़े ही आदर से दोनों पुत्रों को बुलाया और हृदय से लगाकर बहुत प्रकार से उन्हें शिक्षा दी। [फिर कहा—] हे नाथ! ये दोनों पुत्र मेरे प्राण हैं। हे मुनि! [अब] आप ही इनके पिता हैं, दूसरा कोई नहीं।
अरुन नयन उर बाहु बिसाला। नील जलज तनु स्याम तमाला॥ कटि पट पीत कसें बर भाथा। रुचिर चाप सायक दुहुँ हाथा॥ १ ॥
अर्थ:
भगवान् के लाल नेत्र हैं, चौड़ी छाती और विशाल भुजाएँ हैं, नील कमल और तमाल के वृक्ष की तरह श्याम शरीर है, कमर में पीत वस्त्र [पहने] और सुन्दर तरकस कसे हुए हैं। दोनों हाथों में [क्रमशः] सुन्दर धनुष और बाण हैं।
स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। बिस्वामित्र महानिधि पाई॥ प्रभु ब्रह्मन्यदेव मैं जाना। मोहि निति पिता तजेउ भगवाना॥ २ ॥
अर्थ:
श्याम और गौर वर्ण के दोनों भाई परम सुन्दर हैं। विश्वामित्रजी को महान् निधि प्राप्त हो गयी। [वे सोचने लगे—] मैं जान गया कि प्रभु ब्रह्मण्यदेव (ब्राह्मणों के भक्त) हैं। मेरे लिये भगवान् ने अपने पिताको भी छोड़ दिया।
चले जात मुनि दीन्हि देखाई। सुनि ताड़का क्रोध करि धाई॥ एकहिं बान प्रान हरि लीन्हा। दीन जानि तेहि निज पद दीन्हा॥ ३ ॥
अर्थ:
मार्ग में चले जाते हुए मुनि ने ताड़का को दिखलाया। सुनते ही वह क्रोध करके दौड़ी। श्रीरामजी ने एक ही बाण से उसके प्राण हर लिये और दीन जानकर उसको निजपद (अपना दिव्य स्वरूप) दिया।
तब रिषि निज नाथहि जियँ चीन्ही। बिद्यानिधि कहुँ बिद्या दीन्ही॥ जाते लाग न छुधा पिपासा। अतुलित बल तनु तेज प्रकासा॥ ४ ॥
अर्थ:
तब ऋषि ने प्रभु को मन में पहचानकर विद्या का भण्डार समझते हुए भी [लीला को पूर्ण करने के लिये] ऐसी विद्या दी, जिससे भूख-प्यास न लगे और शरीर में अतुलित बल और तेज का प्रकाश हो।