शिव-पार्वती संवाद

विवाह के बाद पार्वतीजी भगवान श्रीराम के स्वरूप और अवतार का रहस्य पूछती हैं। शिवजी प्रेमपूर्वक रामकथा का आरम्भ करते हुए उनके परम तत्त्व का निरूपण करते हैं।

बालकाण्ड · प्रकरण २८ / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

जौं मो पर प्रसन्न सुखरासी। जानिअ सत्य मोहि निज दासी॥ तौ प्रभु हरहु मोर अग्याना। कहि रघुनाथ कथा बिधि नाना॥ १ ॥

अर्थ:

हे सुख की राशि! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं और सचमुच मुझे अपनी दासी [या अपनी सच्ची दासी] जानते हैं, तो हे प्रभो! आप श्रीरघुनाथजी की नाना प्रकार की कथा कहकर मेरा अज्ञान दूर कीजिये।

चौपाई

जासु भवनु सुरतरु तर होई। सहि कि दरिद्र जनित दुखु सोई॥ ससिभूषन अस हृदयँ बिचारी। हरहु नाथ मम मति भ्रम भारी॥ २ ॥

अर्थ:

जिसका घर कल्पवृक्ष के नीचे हो, वह भला दरिद्रता से उत्पन्न दुःख को क्यों सहेगा? हे शशिभूषण! हे नाथ! हृदय में ऐसा विचारकर मेरी बुद्धि के भारी भ्रम को दूर कीजिये।

चौपाई

प्रभु जे मुनि परमारथबादी। कहहिं राम कहुँ ब्रह्म अनादी॥ सेस सारदा बेद पुराना। सकल करहिं रघुपति गुन गाना॥ ३ ॥

अर्थ:

हे प्रभो! जो परमार्थतत्त्व (ब्रह्म) के ज्ञाता और वक्ता मुनि हैं, वे श्रीरामचन्द्रजी को अनादि ब्रह्म कहते हैं; और शेष, सरस्वती, वेद और पुराण सभी श्रीरघुनाथजी का गुण गाते हैं।

चौपाई

तुम्ह पुनि राम राम दिन राती। सादर जपहु अनँग आराती॥ रामु सो अवध नृपति सुत सोई। की अज अगुन अलखगति कोई॥ ४ ॥

अर्थ:

और हे कामदेव के शत्रु। आप भी दिन-रात आदरपूर्वक राम-राम जपा करते हैं। ये राम वही अयोध्या के राजाके पुत्र हैं? या अजन्मा, निर्गुण और अगोचर कोई और राम हैं?

दोहा

जौं नृप तनय त ब्रह्म किमि नारि बिरहँ मति भोरि। देखि चरित महिमा सुनत भ्रमति बुद्धि अति मोरि॥ १०८ ॥

अर्थ:

यदि वे राजपुत्र हैं तो ब्रह्म कैसे? [और यदि ब्रह्म हैं तो] स्त्री के विरह में उनकी मति बावली कैसे हो गयी? इधर उनके ऐसे चरित्र देखकर और उधर उनकी महिमा सुनकर मेरी बुद्धि अत्यन्त चकरा रही है।

दोहा 109 के अंतर्गत
चौपाई

जौं अनीह ब्यापक बिभु कोऊ। कहहु बुझाइ नाथ मोहि सोऊ॥ अग्य जानि रिस उर जनि धरहू। जेहि बिधि मोह मिटै सोइ करहू॥ १ ॥

अर्थ:

यदि इच्छारहित, व्यापक, समर्थ ब्रह्म कोई और है, तो हे नाथ! मुझे उसे समझाकर कहिये। मुझे नादान समझकर मन में क्रोध न लाइये। जिस तरह मेरा मोह दूर हो, वही कीजिये।

चौपाई

मैं बन दीखि राम प्रभुताई। अति भय बिकल न तुम्हहि सुनाई॥ तदपि मलिन मन बोधु न आवा। सो फलु भली भाँति हम पावा॥ २ ॥

अर्थ:

मैंने [पिछले जन्म में] वन में श्रीरामचन्द्रजी की प्रभुता देखी थी, परन्तु अत्यन्त भयभीत होने के कारण मैंने वह बात आपको सुनायी नहीं। तो भी मेरे मलिन मन को बोध न हुआ। उसका फल भी मैंने अच्छी तरह पा लिया।

चौपाई

अजहूँ कछु संसउ मन मोरें। करहु कृपा बिनवउँ कर जोरें॥ प्रभु तब मोहि बहु भाँति प्रबोधा। नाथ सो समुझि करहु जनि क्रोधा॥ ३ ॥

अर्थ:

अब भी मेरे मन में कुछ सन्देह है। आप कृपा कीजिये, मैं हाथ जोड़कर विनती करती हूँ। हे प्रभो! आपने उस समय मुझे बहुत तरह से समझाया था [फिर भी मेरा सन्देह नहीं गया], हे नाथ! यह सोचकर मुझ पर क्रोध न कीजिये।

चौपाई

तब कर अस बिमोह अब नाहीं। रामकथा पर रुचि मन माहीं॥ कहहु पुनीत राम गुन गाथा। भुजगराज भूषन सुरनाथा॥ ४ ॥

अर्थ:

मुझे अब पहले-जैसा मोह नहीं है, अब तो मेरे मन में रामकथा सुनने की रुचि है। हे शेषनाग को अलंकार रूप में धारण करने वाले देवताओं के नाथ! आप श्रीरामचन्द्रजी के गुणों की पवित्र कथा कहिये।

दोहा

बंदउँ पद धरि धरनि सिरु बिनय करउँ कर जोरि। बरनहु रघुबर बिसद जसु श्रुति सिद्धांत निचोरि॥ १०९ ॥

अर्थ:

मैं पृथ्वी पर सिर टेककर आपके चरणों की वन्दना करती हूँ और हाथ जोड़कर विनती करती हूँ। आप वेदों के सिद्धांत को निचोड़कर श्रीरघुनाथजी का निर्मल यश वर्णन कीजिये।

दोहा 110 के अंतर्गत
चौपाई

जदपि जोषिता नहिं अधिकारी। दासी मन क्रम बचन तुम्हारी॥ गूढ़उ तत्त्व न साधु दुरावहिं। आरत अधिकारी जहँ पावहिं॥ १ ॥

अर्थ:

यद्यपि स्त्री होने के कारण मैं उसे सुनने की अधिकारिणी नहीं हूँ, तथापि मैं मन, वचन और कर्म से आपकी दासी हूँ। संत लोग जहाँ आर्त अधिकारी पाते हैं, वहाँ गूढ़ तत्त्व भी उससे नहीं छिपाते।

चौपाई

अति आरति पूछउँ सुरराया। रघुपति कथा कहहु करि दाया॥ प्रथम सो कारन कहहु बिचारी। निर्गुन ब्रह्म सगुन बपु धारी॥ २ ॥

अर्थ:

हे देवताओं के स्वामी! मैं बहुत ही आर्तभाव (दीनता) से पूछती हूँ, आप मुझ पर दया करके श्रीरघुनाथजी की कथा कहिये। पहले तो वह कारण विचारकर बतलाइये जिससे निर्गुण ब्रह्म सगुण रूप धारण करता है।

चौपाई

पुनि प्रभु कहहु राम अवतारा। बालचरित पुनि कहहु उदारा॥ कहहु जथा जानकी बिबाहीं। राज तजा सो दूषन काहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

फिर हे प्रभु! श्रीरामचन्द्रजी के अवतार (जन्म) की कथा कहिये तथा उनका उदार बालचरित्र कहिये। फिर जिस प्रकार उन्होंने श्रीजानकीजी से विवाह किया, वह कथा कहिये और फिर यह बतलाइये कि उन्होंने जो राज्य छोड़ा सो किस दोष से।

चौपाई

बन बसि कीन्हे चरित अपारा। कहहु नाथ जिमि रावन मारा॥ राज बैठि कीन्हीं बहु लीला। सकल कहहु संकर सुखसीला॥ ४ ॥

अर्थ:

हे नाथ! फिर उन्होंने वन में रहकर जो अपार चरित्र किये तथा जिस तरह रावण को मारा, वह कहिये। हे सुखसील शंकर! फिर आप उन सारी लीलाओं को कहिये जो उन्होंने राज्य [सिंहासन] पर बैठकर की थीं।

दोहा

बहुरि कहहु करुनायतन कीन्ह जो अचरज राम। प्रजा सहित रघुबंसमनि किमि गवने निज धाम॥ ११० ॥

अर्थ:

हे कृपाधाम! फिर वह अद्भुत चरित्र कहिये जो श्रीरामचन्द्रजी ने किया--वे रघुकुलशिरोमणि प्रजा सहित किस प्रकार अपने धाम को गये?

दोहा 111 के अंतर्गत
चौपाई

पुनि प्रभु कहहु सो तत्त्व बखानी। जेहिं बिग्यान मगन मुनि ग्यानी॥ भगति ग्यान बिग्यान बिरागा। पुनि सब बरनहु सहित बिभागा॥ १ ॥

अर्थ:

हे प्रभु! फिर आप उस तत्त्व को समझाकर कहिये, जिसकी अनुभूति में ज्ञानी मुनिगण सदा मग्र रहते हैं; और फिर भक्ति, ज्ञान, विज्ञान और वैराग्य का विभाग सहित वर्णन कीजिये।

चौपाई

औरउ राम रहस्य अनेका। कहहु नाथ अति बिमल बिबेका॥ जो प्रभु मैं पूछा नहिं होई।सोउ दयाल राखहु जनि गोई॥ २ ॥

अर्थ:

[इसके सिवा] श्रीरामचन्द्रजी के और भी जो अनेक रहस्य (छिपे हुए भाव अथवा चरित्र) हैं, उनको कहिये। हे नाथ! आपका विवेक अत्यन्त निर्मल है। हे प्रभो! जो बात मैंने न भी पूछी हो, हे दयालु! उसे भी आप छिपा न रखियेगा।

चौपाई

तुम्ह त्रिभुवन गुर बेद बखाना। आन जीव पाँवर का जाना॥ प्रस्न उमा कै सहज सुहाई। छल बिहीन सुनि सिव मन भाई॥ ३ ॥

अर्थ:

वेदों ने आपको तीनों लोकों का गुरु कहा है। दूसरे पामर जीव इस रहस्य को क्या जानें! पार्वतीजी के सहज सुन्दर और छलरहित (सरल) प्रश्न सुनकर शिवजी के मन को बहुत अच्छे लगे।

चौपाई

हर हियँ रामचरित सब आए। प्रेम पुलक लोचन जल छाए॥ श्रीरघुनाथ रूप उर आवा। परमानंद अमित सुख पावा॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीमहादेवजी के हृदय में सारे रामचरित्र आ गये। प्रेम के मारे उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रों में जल भर आया। श्रीरघुनाथजी का रूप उनके हृदय में आ गया, जिससे स्वयं परमानन्दस्वरूप शिवजी ने भी अपार सुख पाया।

दोहा

मगन ध्यान रस दंड जुग पुनि मन बाहेर कीन्ह। रघुपति चरित महेस तब हरषित बरनै लीन्ह॥ १११ ॥

अर्थ:

शिवजी दो घड़ीतक ध्यान के रस (आनन्द) में डूबे रहे; फिर उन्होंने मन को बाहर खींचा और तब वे प्रसन्न होकर श्रीरघुनाथजी का चरित्र वर्णन करने लगे।

दोहा 112 के अंतर्गत
चौपाई

झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें। जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें॥ जेहि जानें जग जाइ हेराई। जागें जथा सपन भ्रम जाई॥ १ ॥

अर्थ:

जिसके बिना जाने झूठ भी सत्य मालूम होता है, जैसे बिना पहचाने रस्सी में साँप का भ्रम हो जाता है; और जिसके जान लेने पर जगत् का उसी तरह लोप हो जाता है, जैसे जागने पर स्वप्न का भ्रम जाता रहता है।

चौपाई

बंदउँ बालरूप सोइ रामू। सब सिधि सुलभ जपत जिसु नामू॥ मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी॥ २ ॥

अर्थ:

मैं उन्हीं श्रीरामचन्द्रजी के बालरूप की वन्दना करता हूँ, जिनका नाम जपने से सब सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं। मंगल के धाम, अमंगल के हरनेवाले और श्रीदशरथजी के आँगन में खेलनेवाले वे (बालरूप) श्रीरामचन्द्रजी मुझ पर कृपा करें।

चौपाई

करि प्रनाम रामहि त्रिपुरारी। हरषि सुधा सम गिरा उचारी॥ धन्य धन्य गिरिराजकुमारी। तुम्ह समान नहिं कोउ उपकारी॥ ३ ॥

अर्थ:

त्रिपुरासुर का वध करनेवाले शिवजी श्रीरामचन्द्रजी को प्रणाम करके आनन्द में भरकर अमृत के समान वाणी बोले--हे गिरिराजकुमारी पार्वती! तुम धन्य हो! धन्य हो! तुम्हारे समान कोई उपकारी नहीं है।

चौपाई

पूँछेहु रघुपति कथा प्रसंगा। सकल लोक जग पावनि गंगा॥ तुम्ह रघुबीर चरन अनुरागी। कीन्हिहु प्रस्न जगत हित लागी॥ ४ ॥

अर्थ:

जो तुमने श्रीरघुनाथजी की कथा का प्रसंग पूछा है, जो कथा समस्त लोकों के लिए जगत् को पवित्र करनेवाली गंगा के समान है। तुमने जगत् के कल्याण के लिए ही प्रश्न पूछा है। तुम श्रीरघुबीर के चरणों में प्रेम रखनेवाली हो।

दोहा

राम कृपा तें पारबति सपनेहुँ तव मन माहिं। सोक मोह संदेह भ्रम मम बिचार कछु नाहिं॥ ११२ ॥

अर्थ:

हे पार्वती! मेरे विचार में तो श्रीरामजी की कृपा से तुम्हारे मन में स्वप्न में भी शोक, मोह, सन्देह और भ्रम कुछ भी नहीं है।

दोहा 113 के अंतर्गत
चौपाई

तदपि असंका कीन्हिहु सोई। कहत सुनत सब कर हित होई॥ जिन्ह हरिकथा सुनी नहिं काना। श्रवन रंध्र अहिभवन समाना॥ १ ॥

अर्थ:

फिर भी तुमने इसीलिये वही (पुरानी) शंका की है कि इस प्रसंग के कहने-सुनने से सबका कल्याण होगा। जिन्होंने अपने कानों से भगवान् की कथा नहीं सुनी, उनके कानों के छिद्र साँप के बिल के समान हैं।

चौपाई

नयनन्हि संत दरस नहिं देखा। लोचन मोरपंख कर लेखा॥ ते सिर कटु तुंबरि समतूला। जे न नमत हरि गुर पद मूला॥ २ ॥

अर्थ:

जिन्होंने अपने नेत्रों से संतों के दर्शन नहीं किये, उनके वे नेत्र मोर के पंख पर दीखनेवाली नकली आँखों की गिनती में हैं। वे सिर कड़वी तूँबी के समान हैं, जो श्रीहरि और गुरु के चरणतल पर नहीं झुकते।

चौपाई

जिन्ह हरिभगति हृदयँ नहिं आनी। जीवत सव समान तेइ प्रानी॥ जो नहिं करइ राम गुन गाना। जीह सो दादुर जीह समाना॥ ३ ॥

अर्थ:

जिन्होंने भगवान् की भक्ति को अपने हृदय में स्थान नहीं दिया, वे प्राणी जीते हुए ही मुर्दे के समान हैं। जो जीभ श्रीरामचन्द्रजी के गुणों का गान नहीं करती, वह मेढक की जीभ के समान है।

चौपाई

कुलिस कठोर निठुर सोइ छाती। सुनि हरिचरित न जो हरषाती॥ गिरिजा सुनहु राम कै लीला। सुर हित दनुज बिमोहनसीला॥ ४ ॥

अर्थ:

वह हृदय वज्र के समान कड़ा और निष्ठुर है, जो भगवान् के चरित्र सुनकर हर्षित नहीं होता। हे पार्वती! श्रीरामचन्द्रजी की लीला सुनो, यह देवताओं का कल्याण करनेवाली और दैत्यों को विशेषरूप से मोहित करनेवाली है।

दोहा

रामकथा सुरधेनु सम सेवत सब सुख दानि। सतसमाज सुरलोक सब को न सुनै अस जानि॥ ११३ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी की कथा कामधेनु के समान है, सेवा करने से सब सुखों को देनेवाली है, और सत्समाज तथा सुरलोक, सबको यह सुनना चाहिए, ऐसा जानकर इसे कौन न सुनेगा!।

दोहा 114 के अंतर्गत
चौपाई

रामकथा सुंदर कर तारी। संसय बिहग उड़ावनिहारी॥ रामकथा कलि बिटप कुठारी। सादर सुनु गिरिराजकुमारी॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी की कथा हाथ की सुन्दर ताली है, जो सन्देहरूपी पक्षियों को उड़ा देती है। फिर रामकथा कलियुगरूपी वृक्ष को काटने के लिए कुल्हाड़ी है। हे गिरिराजकुमारी! तुम इसे आदरपूर्वक सुनो।

चौपाई

राम नाम गुन चरित सुहाए। जनम करम अगनित श्रुति गाए॥ जथा अनंत राम भगवाना। तथा कथा कीरति गुन नाना॥ २ ॥

अर्थ:

वेदों ने श्रीरामचन्द्रजी के सुन्दर नाम, गुण, चरित्र, जन्म और कर्म सभी अनगिनत कहे हैं। जिस प्रकार भगवान् श्रीरामचन्द्रजी अनन्त हैं, उसी तरह उनकी कथा, कीर्ति और गुण भी अनन्त हैं।

चौपाई

तदपि जथा श्रुत जसि मति मोरी। कहिहउँ देखि प्रीति अति तोरी॥ उमा प्रस्न तव सहज सुहाई। सुखद संतसंमत मोहि भाई॥ ३ ॥

अर्थ:

तो भी तुम्हारी अत्यन्त प्रीति देखकर, जैसा कुछ मैंने सुना है और जैसी मेरी बुद्धि है, उसी के अनुसार मैं कहूँगा। हे पार्वती! तुम्हारा प्रश्न स्वाभाविक ही सुन्दर, सुखदायक और संतसम्मत है और मुझे तो बहुत ही अच्छा लगा है।

चौपाई

एक बात नहिं मोहि सोहानी। जदपि मोह बस कहेहु भवानी॥ तुम्ह जो कहा राम कोउ आना। जेहि श्रुति गाव धरहिं मुनि ध्याना॥ ४ ॥

अर्थ:

परन्तु हे पार्वती! एक बात मुझे अच्छी नहीं लगी, यद्यपि वह तुमने मोह के वश होकर ही कही है। तुमने जो यह कहा कि वे राम कोई और हैं, जिन्हें वेद गाते और मुनिजन जिनका ध्यान धरते हैं--।

दोहा

कहहिं सुनहिं अस अधम नर ग्रसे जे मोह पिसाच। पाषंडी हरि पद बिमुख जानहिं झूठ न साच॥ ११४ ॥

अर्थ:

जो मोहरूपी पिशाच के द्वारा ग्रस्त हैं, पाखण्डी हैं, भगवान् के चरणों से विमुख हैं और जो झूठ-सच कुछ भी नहीं जानते, ऐसे अधम मनुष्य ही इस तरह कहते-सुनते हैं।

दोहा 115 के अंतर्गत
चौपाई

अग्य अकोबिद अंध अभागी। काई बिषय मुकुर मन लागी॥ लंपट कपटी कुटिल बिसेषी। सपनेहुँ संतसभा नहिं देखी॥ १ ॥

अर्थ:

जो अज्ञानी, अकबुद्धि, अंधे और अभागे हैं और जिनके मनरूपी दर्पण पर विषयरूपी काई जमी हुई है; जो लंपट, कपटी, विशेषरूप से कुटिल हैं और जिन्होंने स्वप्न में भी संतसभा नहीं देखी;

चौपाई

कहहिं ते बेद असंमत बानी। जिन्ह कें सूझ लाभु नहिं हानी॥ मुकुर मलिन अरु नयन बिहीना। राम रूप देखहिं किमि दीना॥ २ ॥

अर्थ:

और जिन्हें अपनी लाभ-हानि नहीं सूझती, वे ही ऐसी वेदविरुद्ध बातें कहा करते हैं। जिनका हृदयरूपी दर्पण मैला है और जो नेत्रों से हीन हैं, वे बेचारे श्रीरामचन्द्रजी का रूप कैसे देखें!।

चौपाई

जिन्ह कें अगुन न सगुन बिबेका। जल्पहिं कल्पित बचन अनेका॥ हरिमाया बस जगत भ्रमाहीं। तिन्हहि कहत कछु अघटित नाहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

जिनको निर्गुण-सगुण का कुछ भी विवेक नहीं है, जो अनेक मनगढ़ंत बातें कहा करते हैं, जो हरि-माया के वश में होकर जगत् में भ्रमते रहते हैं, उनके लिए ऐसा कहना कुछ भी अनुचित नहीं है।

चौपाई

बातुल भूत बिबस मतवारे। ते नहिं बोलहिं बचन बिचारे॥ जिन्ह कृत महामोह मद पाना। तिन्ह कर कहा करिअ नहिं काना॥ ४ ॥

अर्थ:

जिन्हें वायु का रोग हो गया हो, जो भूत के वश हो गये हैं और जो नशे में चूर हैं, ऐसे लोग विचारकर वचन नहीं बोलते। जिन्होंने महामोहरूपी मदिरा पी रखी है, उनके कहने पर कान न देना चाहिए।

सोरठा

अस निज हृदयँ बिचारि तजु संसय भजु राम पद। सुनु गिरिराज कुमारि भ्रम तम रबि कर बचन मम॥ ११५ ॥

अर्थ:

अपने हृदय में ऐसा विचारकर सन्देह छोड़ दो और श्रीरामचन्द्रजी के चरणों को भजो। हे पार्वती! भ्रमरूपी अन्धकार के नाश करने के लिए सूर्य की किरणों के समान मेरे वचनों को सुनो!

दोहा 116 के अंतर्गत
चौपाई

सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा। गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा॥ अगुन अरूप अलख अज जोई। भगत प्रेम बस सगुन सो होई॥ १ ॥

अर्थ:

सगुण और निर्गुण में कुछ भी भेद नहीं है--मुनि, पुराण, पण्डित और वेद सभी ऐसा कहते हैं। जो निर्गुण, अरूप (निराकार), अलख (अव्यक्त) और अजन्मा है, वही भक्तों के प्रेमवश सगुण हो जाता है।

चौपाई

जो गुन रहित सगुन सोइ कैसें। जलु हिम उपल बिलग नहिं जैसें॥ जासु नाम भ्रम तिमिर पतंगा। तेहि किमि कहिअ बिमोह प्रसंगा॥ २ ॥

अर्थ:

जो निर्गुण है, वही सगुण कैसे है? जैसे जल और हिम में भेद नहीं होता। जिसका नाम भ्रमरूपी अन्धकार के लिए सूर्य है, उसके लिए मोह का प्रसंग कैसे कहा जा सकता है?

चौपाई

राम सच्चिदानंद दिनेसा। नहिं तहँ मोह निसा लवलेसा॥ सहज प्रकासरूप भगवाना। नहिं तहँ पुनि बिग्यान बिहाना॥ ३ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी सच्चिदानन्दस्वरूप सूर्य हैं। वहाँ मोहरूपी रात्रि का लवलेश भी नहीं है। वे स्वभाव से ही प्रकाशरूप और भगवान् हैं, वहाँ तो विज्ञानरूपी प्रातःकाल भी नहीं होता।

चौपाई

हरष बिषाद ग्यान अग्याना। जीव धर्म अहमिति अभिमाना॥ राम ब्रह्म ब्यापक जग जाना। परमानंद परेस पुराना॥ ४ ॥

अर्थ:

हर्ष, विषाद, ज्ञान, अज्ञान, अहंता और अभिमान--ये सब जीव के धर्म हैं। श्रीरामचन्द्रजी तो व्यापक ब्रह्म, परमानन्दस्वरूप, परे से परे और पुराणपुरुष हैं। इस बात को सारा जगत् जानता है।

दोहा

पुरुष प्रसिद्ध प्रकास निधि प्रगट परावर नाथ। रघुकुलमनि मम स्वामि सोइ कहि सिवँ नायउ माथ॥ ११६ ॥

अर्थ:

जो प्रसिद्ध पुरुष हैं, प्रकाश के भण्डार हैं, प्रकट रूप से पर और अपर के नाथ हैं, वे ही रघुकुलमणि मेरे स्वामी हैं--ऐसा कहकर शिवजी ने मस्तक नवाया।

दोहा 117 के अंतर्गत
चौपाई

निज भ्रम नहिं समुझहिं अग्यानी। प्रभु पर मोह धरहिं जड़ प्रानी॥ जथा गगन घन पटल निहारी। झाँपेउ भानु कहहिं कुबिचारी॥ १ ॥

अर्थ:

अज्ञानी मनुष्य अपने भ्रम को तो समझते नहीं और वे मूर्ख प्रभु श्रीरामचन्द्रजी पर उसका आरोप करते हैं, जैसे आकाश में बादलों का पर्दा देखकर कुविचारी (अज्ञानी) लोग कहते हैं कि बादलों ने सूर्य को ढक लिया।

चौपाई

चितव जो लोचन अंगुलि लाएँ। प्रगट जुगल ससि तेहि के भाएँ॥ उमा राम बिषइक अस मोहा। नभ तम धूम धूरि जिमि सोहा॥ २ ॥

अर्थ:

जो मनुष्य आँख में उँगली लगाकर देखता है, उसके लिए तो दो चन्द्रमा प्रकट (प्रत्यक्ष) हैं। हे पार्वती! श्रीरामचन्द्रजी के विषय में इस प्रकार मोह की कल्पना करना वैसा ही है जैसा आकाश में अन्धकार, धूएँ और धूल का सोहना (दीखना)। [आकाश जैसे निर्मल और निर्लेप है, उसको कोई मलिन या स्पर्श नहीं कर सकता, इसी प्रकार भगवान् श्रीरामचन्द्रजी नित्य निर्मल और निर्लेप हैं]।

चौपाई

बिषय करन सुर जीव समेता। सकल एक तें एक सचेता॥ सब कर परम प्रकासक जोई। राम अनादि अवधपति सोई॥ ३ ॥

अर्थ:

विषय, इन्द्रियाँ, इन्द्रियों के देवता और जीवात्मा--ये सब एक की सहायतासे एक चेतन होते हैं। (अर्थात् विषयों का प्रकाश इन्द्रियों से, इन्द्रियों का इन्द्रियों के देवताओं से और इन्द्रियदेवताओं का चेतन जीवात्मा से प्रकाश होता है।) इन सब का जो परम प्रकाशक है (अर्थात् जिससे इन सब का प्रकाश होता है), वही अनादि ब्रह्म अयोध्यानरेश श्रीरामचन्द्रजी हैं।

चौपाई

जगत प्रकास्य प्रकासक रामू। मायाधीस ग्यान गुन धामू॥ जासु सत्यता तें जड़ माया। भास सत्य इव मोह सहाया॥ ४ ॥

अर्थ:

यह जगत प्रकाश्य है और श्रीरामचन्द्रजी इसके प्रकाशक हैं। वे मायाके स्वामी और ज्ञान तथा गुणों के धाम हैं। जिनकी सत्ता से, मोह की सहायता पाकर जड़ माया भी सत्य-सी भासित होती है।

दोहा

रजत सीप महुँ भास जिमि जथा भानु कर बारि। जदपि मृषा तिहुँ काल सोइ भ्रम न सकइ कोउ टारि॥ ११७ ॥

अर्थ:

जैसे सीप में चाँदी की और सूर्य की किरणों में पानी की [बिना हुए भी] प्रतीति होती है। यद्यपि यह प्रतीति तीनों कालों में झूठ है, तथापि इस भ्रम को कोई हटा नहीं सकता।

दोहा 118 के अंतर्गत
चौपाई

एहि बिधि जग हरि आश्रित रहई। जदपि असत्य देत दुख अहई॥ जौं सपनें सिर काटै कोई। बिनु जागें न दूरि दुख होई॥ १ ॥

अर्थ:

इसी तरह यह संसार भगवान् के आश्रित रहता है। यद्यपि यह असत्य है, तो भी दुःख तो देता ही है; जिस तरह स्वप्न में कोई सिर काट ले तो बिना जागे वह दुःख दूर नहीं होता।

चौपाई

जासु कृपाँ अस भ्रम मिटि जाई। गिरिजा सोइ कृपाल रघुराई॥ आदि अंत कोउ जासु न पावा। मति अनुमानि निगम अस गावा॥ २ ॥

अर्थ:

हे पार्वती! जिनकी कृपा से इस प्रकार का भ्रम मिट जाता है, वही कृपालु श्रीरघुनाथजी हैं। जिनका आदि और अन्त किसी ने नहीं [जान] पाया। वेदों ने अपनी बुद्धि से अनुमान करके इस प्रकार (नीचे लिखे अनुसार) गाया है--।

चौपाई

बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना॥ आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥ ३ ॥

अर्थ:

वह (ब्रह्म) बिना ही पैर के चलता है, बिना ही कान के सुनता है, बिना ही हाथ के नाना प्रकार के काम करता है, बिना मुँह (जिह्वा) के ही सारे (छहों) रसों का आनन्द लेता है और बिना ही वाणी के बहुत योग्य वक्ता है।

चौपाई

तन बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा॥ असि सब भाँति अलौकिक करनी। महिमा जासु जाइ नहिं बरनी॥ ४ ॥

अर्थ:

वह बिना ही शरीर (त्वचा) के स्पर्श करता है, बिना ही आँखों के देखता है और बिना ही नाक के सब गन्धों को ग्रहण करता है (सूँघता है)। उस ब्रह्म की करनी सभी प्रकार से ऐसी अलौकिक है कि जिसकी महिमा कही नहीं जा सकती।

दोहा

जेहि इमि गावहिं बेद बुध जाहि धरहिं मुनि ध्यान। सोइ दसरथ सुत भगत हित कोसलपति भगवान॥ ११८ ॥

अर्थ:

जिसका वेद और पण्डित इस प्रकार वर्णन करते हैं और मुनि जिसका ध्यान धरते हैं, वही दशरथनन्दन, भक्तों के हितकारी, अयोध्या के स्वामी भगवान् श्रीरामचन्द्रजी हैं।

दोहा 119 के अंतर्गत
चौपाई

कासीं मरत जंतु अवलोकी। जासु नाम बल करउँ बिसोकी॥ सोइ प्रभु मोर चराचर स्वामी। रघुबर सब उर अंतरजामी॥ १ ॥

अर्थ:

[हे पार्वती!] जिनके नाम के बल से काशी में मरते हुए प्राणी को देखकर मैं उसे [राममन्त्र देकर] शोकरहित कर देता हूँ, वही मेरे प्रभु रघुश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी जड़-चेतन के स्वामी और सब के हृदय के भीतर की जाननेवाले हैं।

चौपाई

बिबसहुँ जासु नाम नर कहहीं। जनम अनेक रचित अघ दहहीं॥ सादर सुमिरन जे नर करहीं। भव बारिधि गोपद इव तरहीं॥ २ ॥

अर्थ:

विवश होकर (बिना इच्छा के) भी जिनका नाम लेने से मनुष्यों के अनेक जन्मों में किये हुए पाप जल जाते हैं। फिर जो मनुष्य आदरपूर्वक उनका स्मरण करते हैं, वे तो संसाररूपी [दुस्तर] समुद्र को गाय के खुर से बने हुए गड्ढे के समान (अर्थात् बिना किसी परिश्रम के) पार कर जाते हैं।

चौपाई

राम सो परमातमा भवानी। तहँ भ्रम अति अबिहित तव बानी॥ अस संसय आनत उर माहीं। ग्यान बिराग सकल गुन जाहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

हे पार्वती! वही परमात्मा श्रीरामचन्द्रजी हैं। उनमें भ्रम [देखने में आता] है, तुम्हारा ऐसा कहना अत्यन्त ही अनुचित है। इस प्रकार का सन्देह मन में लाते ही मनुष्य के ज्ञान, वैराग्य आदि सारे सद्गुण नष्ट हो जाते हैं।

चौपाई

सुनि सिव के भ्रम भंजन बचना। मिटि गै सब कुतरक कै रचना॥ भइ रघुपति पद प्रीति प्रतीती। दारुन असंभावना बीती॥ ४ ॥

अर्थ:

शिवजी के भ्रमभंजन वचनों को सुनकर पार्वतीजी के सब कुतर्कों की रचना मिट गयी। श्रीरघुनाथजी के चरणों में उनका प्रेम और विश्वास हो गया और कठिन असम्भावना (जिसका होना सम्भव नहीं, ऐसी मिथ्या कल्पना) जाती रही।

दोहा

पुनि पुनि प्रभु पद कमल गहि जोरि पंकरुह पानि। बोलीं गिरिजा बचन बर मनहुँ प्रेम रस सानि॥ ११९ ॥

अर्थ:

बार-बार स्वामी (शिवजी) के चरणकमलों को पकड़कर और अपने कमल के समान हाथों को जोड़कर पार्वतीजी मानो प्रेमरस में सानकर सुन्दर वचन बोलीं।

दोहा 120 के अंतर्गत
चौपाई

ससि कर सम सुनि गिरा तुम्हारी। मिटा मोह सरदातप भारी॥ तुम्ह कृपाल सबु संसउ हरेऊ। राम स्वरूप जानि मोहि परेऊ॥ १ ॥

अर्थ:

आपकी चन्द्रमा की किरणों के समान शीतल वाणी सुनकर मेरा अज्ञानरूपी शरद् ऋतु (क्वार) की धूप का भारी ताप मिट गया। हे कृपालु! आपने मेरा सब सन्देह हर लिया, अब श्रीरामचन्द्रजी का यथार्थ स्वरूप मेरी समझ में आ गया।

चौपाई

नाथ कृपाँ अब गयउ बिषादा। सुखी भयउँ प्रभु चरन प्रसादा॥ अब मोहि आपनि किंकरि जानी। जदपि सहज जड़ नारि अयानी॥ २ ॥

अर्थ:

हे नाथ! आपकी कृपा से अब मेरा विषाद जाता रहा और आपके चरणों के अनुग्रह से मैं सुखी हो गयी। यद्यपि मैं स्त्री होने के कारण स्वभाव से ही मूर्ख और ज्ञानहीन हूँ, तो भी अब आप मुझे अपनी दासी जानकर--।