शिव-पार्वती संवाद
विवाह के बाद पार्वतीजी भगवान श्रीराम के स्वरूप और अवतार का रहस्य पूछती हैं। शिवजी प्रेमपूर्वक रामकथा का आरम्भ करते हुए उनके परम तत्त्व का निरूपण करते हैं।
बालकाण्ड · प्रकरण २८ / ५९
प्रकरण पाठ
मैं बन दीखि राम प्रभुताई। अति भय बिकल न तुम्हहि सुनाई॥ तदपि मलिन मन बोधु न आवा। सो फलु भली भाँति हम पावा॥ २ ॥
अर्थ:
मैंने [पिछले जन्म में] वन में श्रीरामचन्द्रजी की प्रभुता देखी थी, परन्तु अत्यन्त भयभीत होने के कारण मैंने वह बात आपको सुनायी नहीं। तो भी मेरे मलिन मन को बोध न हुआ। उसका फल भी मैंने अच्छी तरह पा लिया।
अजहूँ कछु संसउ मन मोरें। करहु कृपा बिनवउँ कर जोरें॥ प्रभु तब मोहि बहु भाँति प्रबोधा। नाथ सो समुझि करहु जनि क्रोधा॥ ३ ॥
अर्थ:
अब भी मेरे मन में कुछ सन्देह है। आप कृपा कीजिये, मैं हाथ जोड़कर विनती करती हूँ। हे प्रभो! आपने उस समय मुझे बहुत तरह से समझाया था [फिर भी मेरा सन्देह नहीं गया], हे नाथ! यह सोचकर मुझ पर क्रोध न कीजिये।
जदपि जोषिता नहिं अधिकारी। दासी मन क्रम बचन तुम्हारी॥ गूढ़उ तत्त्व न साधु दुरावहिं। आरत अधिकारी जहँ पावहिं॥ १ ॥
अर्थ:
यद्यपि स्त्री होने के कारण मैं उसे सुनने की अधिकारिणी नहीं हूँ, तथापि मैं मन, वचन और कर्म से आपकी दासी हूँ। संत लोग जहाँ आर्त अधिकारी पाते हैं, वहाँ गूढ़ तत्त्व भी उससे नहीं छिपाते।
अति आरति पूछउँ सुरराया। रघुपति कथा कहहु करि दाया॥ प्रथम सो कारन कहहु बिचारी। निर्गुन ब्रह्म सगुन बपु धारी॥ २ ॥
अर्थ:
हे देवताओं के स्वामी! मैं बहुत ही आर्तभाव (दीनता) से पूछती हूँ, आप मुझ पर दया करके श्रीरघुनाथजी की कथा कहिये। पहले तो वह कारण विचारकर बतलाइये जिससे निर्गुण ब्रह्म सगुण रूप धारण करता है।
पुनि प्रभु कहहु राम अवतारा। बालचरित पुनि कहहु उदारा॥ कहहु जथा जानकी बिबाहीं। राज तजा सो दूषन काहीं॥ ३ ॥
अर्थ:
फिर हे प्रभु! श्रीरामचन्द्रजी के अवतार (जन्म) की कथा कहिये तथा उनका उदार बालचरित्र कहिये। फिर जिस प्रकार उन्होंने श्रीजानकीजी से विवाह किया, वह कथा कहिये और फिर यह बतलाइये कि उन्होंने जो राज्य छोड़ा सो किस दोष से।
औरउ राम रहस्य अनेका। कहहु नाथ अति बिमल बिबेका॥ जो प्रभु मैं पूछा नहिं होई।सोउ दयाल राखहु जनि गोई॥ २ ॥
अर्थ:
[इसके सिवा] श्रीरामचन्द्रजी के और भी जो अनेक रहस्य (छिपे हुए भाव अथवा चरित्र) हैं, उनको कहिये। हे नाथ! आपका विवेक अत्यन्त निर्मल है। हे प्रभो! जो बात मैंने न भी पूछी हो, हे दयालु! उसे भी आप छिपा न रखियेगा।
हर हियँ रामचरित सब आए। प्रेम पुलक लोचन जल छाए॥ श्रीरघुनाथ रूप उर आवा। परमानंद अमित सुख पावा॥ ४ ॥
अर्थ:
श्रीमहादेवजी के हृदय में सारे रामचरित्र आ गये। प्रेम के मारे उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रों में जल भर आया। श्रीरघुनाथजी का रूप उनके हृदय में आ गया, जिससे स्वयं परमानन्दस्वरूप शिवजी ने भी अपार सुख पाया।
झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें। जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें॥ जेहि जानें जग जाइ हेराई। जागें जथा सपन भ्रम जाई॥ १ ॥
अर्थ:
जिसके बिना जाने झूठ भी सत्य मालूम होता है, जैसे बिना पहचाने रस्सी में साँप का भ्रम हो जाता है; और जिसके जान लेने पर जगत् का उसी तरह लोप हो जाता है, जैसे जागने पर स्वप्न का भ्रम जाता रहता है।
बंदउँ बालरूप सोइ रामू। सब सिधि सुलभ जपत जिसु नामू॥ मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी॥ २ ॥
अर्थ:
मैं उन्हीं श्रीरामचन्द्रजी के बालरूप की वन्दना करता हूँ, जिनका नाम जपने से सब सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं। मंगल के धाम, अमंगल के हरनेवाले और श्रीदशरथजी के आँगन में खेलनेवाले वे (बालरूप) श्रीरामचन्द्रजी मुझ पर कृपा करें।
करि प्रनाम रामहि त्रिपुरारी। हरषि सुधा सम गिरा उचारी॥ धन्य धन्य गिरिराजकुमारी। तुम्ह समान नहिं कोउ उपकारी॥ ३ ॥
अर्थ:
त्रिपुरासुर का वध करनेवाले शिवजी श्रीरामचन्द्रजी को प्रणाम करके आनन्द में भरकर अमृत के समान वाणी बोले--हे गिरिराजकुमारी पार्वती! तुम धन्य हो! धन्य हो! तुम्हारे समान कोई उपकारी नहीं है।
पूँछेहु रघुपति कथा प्रसंगा। सकल लोक जग पावनि गंगा॥ तुम्ह रघुबीर चरन अनुरागी। कीन्हिहु प्रस्न जगत हित लागी॥ ४ ॥
अर्थ:
जो तुमने श्रीरघुनाथजी की कथा का प्रसंग पूछा है, जो कथा समस्त लोकों के लिए जगत् को पवित्र करनेवाली गंगा के समान है। तुमने जगत् के कल्याण के लिए ही प्रश्न पूछा है। तुम श्रीरघुबीर के चरणों में प्रेम रखनेवाली हो।
तदपि असंका कीन्हिहु सोई। कहत सुनत सब कर हित होई॥ जिन्ह हरिकथा सुनी नहिं काना। श्रवन रंध्र अहिभवन समाना॥ १ ॥
अर्थ:
फिर भी तुमने इसीलिये वही (पुरानी) शंका की है कि इस प्रसंग के कहने-सुनने से सबका कल्याण होगा। जिन्होंने अपने कानों से भगवान् की कथा नहीं सुनी, उनके कानों के छिद्र साँप के बिल के समान हैं।
नयनन्हि संत दरस नहिं देखा। लोचन मोरपंख कर लेखा॥ ते सिर कटु तुंबरि समतूला। जे न नमत हरि गुर पद मूला॥ २ ॥
अर्थ:
जिन्होंने अपने नेत्रों से संतों के दर्शन नहीं किये, उनके वे नेत्र मोर के पंख पर दीखनेवाली नकली आँखों की गिनती में हैं। वे सिर कड़वी तूँबी के समान हैं, जो श्रीहरि और गुरु के चरणतल पर नहीं झुकते।
कुलिस कठोर निठुर सोइ छाती। सुनि हरिचरित न जो हरषाती॥ गिरिजा सुनहु राम कै लीला। सुर हित दनुज बिमोहनसीला॥ ४ ॥
अर्थ:
वह हृदय वज्र के समान कड़ा और निष्ठुर है, जो भगवान् के चरित्र सुनकर हर्षित नहीं होता। हे पार्वती! श्रीरामचन्द्रजी की लीला सुनो, यह देवताओं का कल्याण करनेवाली और दैत्यों को विशेषरूप से मोहित करनेवाली है।
तदपि जथा श्रुत जसि मति मोरी। कहिहउँ देखि प्रीति अति तोरी॥ उमा प्रस्न तव सहज सुहाई। सुखद संतसंमत मोहि भाई॥ ३ ॥
अर्थ:
तो भी तुम्हारी अत्यन्त प्रीति देखकर, जैसा कुछ मैंने सुना है और जैसी मेरी बुद्धि है, उसी के अनुसार मैं कहूँगा। हे पार्वती! तुम्हारा प्रश्न स्वाभाविक ही सुन्दर, सुखदायक और संतसम्मत है और मुझे तो बहुत ही अच्छा लगा है।
एक बात नहिं मोहि सोहानी। जदपि मोह बस कहेहु भवानी॥ तुम्ह जो कहा राम कोउ आना। जेहि श्रुति गाव धरहिं मुनि ध्याना॥ ४ ॥
अर्थ:
परन्तु हे पार्वती! एक बात मुझे अच्छी नहीं लगी, यद्यपि वह तुमने मोह के वश होकर ही कही है। तुमने जो यह कहा कि वे राम कोई और हैं, जिन्हें वेद गाते और मुनिजन जिनका ध्यान धरते हैं--।
कहहिं ते बेद असंमत बानी। जिन्ह कें सूझ लाभु नहिं हानी॥ मुकुर मलिन अरु नयन बिहीना। राम रूप देखहिं किमि दीना॥ २ ॥
अर्थ:
और जिन्हें अपनी लाभ-हानि नहीं सूझती, वे ही ऐसी वेदविरुद्ध बातें कहा करते हैं। जिनका हृदयरूपी दर्पण मैला है और जो नेत्रों से हीन हैं, वे बेचारे श्रीरामचन्द्रजी का रूप कैसे देखें!।
निज भ्रम नहिं समुझहिं अग्यानी। प्रभु पर मोह धरहिं जड़ प्रानी॥ जथा गगन घन पटल निहारी। झाँपेउ भानु कहहिं कुबिचारी॥ १ ॥
अर्थ:
अज्ञानी मनुष्य अपने भ्रम को तो समझते नहीं और वे मूर्ख प्रभु श्रीरामचन्द्रजी पर उसका आरोप करते हैं, जैसे आकाश में बादलों का पर्दा देखकर कुविचारी (अज्ञानी) लोग कहते हैं कि बादलों ने सूर्य को ढक लिया।
चितव जो लोचन अंगुलि लाएँ। प्रगट जुगल ससि तेहि के भाएँ॥ उमा राम बिषइक अस मोहा। नभ तम धूम धूरि जिमि सोहा॥ २ ॥
अर्थ:
जो मनुष्य आँख में उँगली लगाकर देखता है, उसके लिए तो दो चन्द्रमा प्रकट (प्रत्यक्ष) हैं। हे पार्वती! श्रीरामचन्द्रजी के विषय में इस प्रकार मोह की कल्पना करना वैसा ही है जैसा आकाश में अन्धकार, धूएँ और धूल का सोहना (दीखना)। [आकाश जैसे निर्मल और निर्लेप है, उसको कोई मलिन या स्पर्श नहीं कर सकता, इसी प्रकार भगवान् श्रीरामचन्द्रजी नित्य निर्मल और निर्लेप हैं]।
बिषय करन सुर जीव समेता। सकल एक तें एक सचेता॥ सब कर परम प्रकासक जोई। राम अनादि अवधपति सोई॥ ३ ॥
अर्थ:
विषय, इन्द्रियाँ, इन्द्रियों के देवता और जीवात्मा--ये सब एक की सहायतासे एक चेतन होते हैं। (अर्थात् विषयों का प्रकाश इन्द्रियों से, इन्द्रियों का इन्द्रियों के देवताओं से और इन्द्रियदेवताओं का चेतन जीवात्मा से प्रकाश होता है।) इन सब का जो परम प्रकाशक है (अर्थात् जिससे इन सब का प्रकाश होता है), वही अनादि ब्रह्म अयोध्यानरेश श्रीरामचन्द्रजी हैं।
जासु कृपाँ अस भ्रम मिटि जाई। गिरिजा सोइ कृपाल रघुराई॥ आदि अंत कोउ जासु न पावा। मति अनुमानि निगम अस गावा॥ २ ॥
अर्थ:
हे पार्वती! जिनकी कृपा से इस प्रकार का भ्रम मिट जाता है, वही कृपालु श्रीरघुनाथजी हैं। जिनका आदि और अन्त किसी ने नहीं [जान] पाया। वेदों ने अपनी बुद्धि से अनुमान करके इस प्रकार (नीचे लिखे अनुसार) गाया है--।
बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना॥ आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥ ३ ॥
अर्थ:
वह (ब्रह्म) बिना ही पैर के चलता है, बिना ही कान के सुनता है, बिना ही हाथ के नाना प्रकार के काम करता है, बिना मुँह (जिह्वा) के ही सारे (छहों) रसों का आनन्द लेता है और बिना ही वाणी के बहुत योग्य वक्ता है।
तन बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा॥ असि सब भाँति अलौकिक करनी। महिमा जासु जाइ नहिं बरनी॥ ४ ॥
अर्थ:
वह बिना ही शरीर (त्वचा) के स्पर्श करता है, बिना ही आँखों के देखता है और बिना ही नाक के सब गन्धों को ग्रहण करता है (सूँघता है)। उस ब्रह्म की करनी सभी प्रकार से ऐसी अलौकिक है कि जिसकी महिमा कही नहीं जा सकती।
कासीं मरत जंतु अवलोकी। जासु नाम बल करउँ बिसोकी॥ सोइ प्रभु मोर चराचर स्वामी। रघुबर सब उर अंतरजामी॥ १ ॥
अर्थ:
[हे पार्वती!] जिनके नाम के बल से काशी में मरते हुए प्राणी को देखकर मैं उसे [राममन्त्र देकर] शोकरहित कर देता हूँ, वही मेरे प्रभु रघुश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी जड़-चेतन के स्वामी और सब के हृदय के भीतर की जाननेवाले हैं।
बिबसहुँ जासु नाम नर कहहीं। जनम अनेक रचित अघ दहहीं॥ सादर सुमिरन जे नर करहीं। भव बारिधि गोपद इव तरहीं॥ २ ॥
अर्थ:
विवश होकर (बिना इच्छा के) भी जिनका नाम लेने से मनुष्यों के अनेक जन्मों में किये हुए पाप जल जाते हैं। फिर जो मनुष्य आदरपूर्वक उनका स्मरण करते हैं, वे तो संसाररूपी [दुस्तर] समुद्र को गाय के खुर से बने हुए गड्ढे के समान (अर्थात् बिना किसी परिश्रम के) पार कर जाते हैं।
राम सो परमातमा भवानी। तहँ भ्रम अति अबिहित तव बानी॥ अस संसय आनत उर माहीं। ग्यान बिराग सकल गुन जाहीं॥ ३ ॥
अर्थ:
हे पार्वती! वही परमात्मा श्रीरामचन्द्रजी हैं। उनमें भ्रम [देखने में आता] है, तुम्हारा ऐसा कहना अत्यन्त ही अनुचित है। इस प्रकार का सन्देह मन में लाते ही मनुष्य के ज्ञान, वैराग्य आदि सारे सद्गुण नष्ट हो जाते हैं।
सुनि सिव के भ्रम भंजन बचना। मिटि गै सब कुतरक कै रचना॥ भइ रघुपति पद प्रीति प्रतीती। दारुन असंभावना बीती॥ ४ ॥
अर्थ:
शिवजी के भ्रमभंजन वचनों को सुनकर पार्वतीजी के सब कुतर्कों की रचना मिट गयी। श्रीरघुनाथजी के चरणों में उनका प्रेम और विश्वास हो गया और कठिन असम्भावना (जिसका होना सम्भव नहीं, ऐसी मिथ्या कल्पना) जाती रही।
ससि कर सम सुनि गिरा तुम्हारी। मिटा मोह सरदातप भारी॥ तुम्ह कृपाल सबु संसउ हरेऊ। राम स्वरूप जानि मोहि परेऊ॥ १ ॥
अर्थ:
आपकी चन्द्रमा की किरणों के समान शीतल वाणी सुनकर मेरा अज्ञानरूपी शरद् ऋतु (क्वार) की धूप का भारी ताप मिट गया। हे कृपालु! आपने मेरा सब सन्देह हर लिया, अब श्रीरामचन्द्रजी का यथार्थ स्वरूप मेरी समझ में आ गया।
नाथ कृपाँ अब गयउ बिषादा। सुखी भयउँ प्रभु चरन प्रसादा॥ अब मोहि आपनि किंकरि जानी। जदपि सहज जड़ नारि अयानी॥ २ ॥
अर्थ:
हे नाथ! आपकी कृपा से अब मेरा विषाद जाता रहा और आपके चरणों के अनुग्रह से मैं सुखी हो गयी। यद्यपि मैं स्त्री होने के कारण स्वभाव से ही मूर्ख और ज्ञानहीन हूँ, तो भी अब आप मुझे अपनी दासी जानकर--।