श्रीराम-लक्ष्मण सहित विश्वामित्र का जनकपुर में प्रवेश

विश्वामित्र श्रीराम और लक्ष्मण को साथ लेकर जनकपुर पहुँचते हैं। मिथिला की पावन भूमि पर उनके आगमन से नगर में कौतूहल और आनंद फैल जाता है।

बालकाण्ड · प्रकरण ४२ / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

चले राम लछिमन मुनि संगा। गए जहाँ जग पावनि गंगा॥ गाधिसूनु सब कथा सुनाई। जेहि प्रकार सुरसरि महि आई॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी और लक्ष्मणजी मुनि के साथ चले। वे वहाँ गये, जहाँ जगत् को पवित्र करने वाली गंगाजी थीं। महाराज गाधि के पुत्र विश्वामित्रजी ने वह सब कथा कह सुनायी, जिस प्रकार देवनदी गंगाजी पृथ्वी पर आयी थीं।

चौपाई

तब प्रभु रिषिन्ह समेत नहाए। बिबिध दान महिदेवन्हि पाए॥ हरषि चले मुनि बृंद सहाया। बेगि बिदेह नगर निअराया॥ २ ॥

अर्थ:

तब प्रभु ने ऋषियों सहित [गंगाजी में] स्नान किया। ब्राह्मणों ने भाँति-भाँति के दान पाए। फिर मुनिवृन्द के साथ वे प्रसन्न होकर चले और शीघ्र ही जनकपुर के निकट पहुँच गये।

चौपाई

पुर रम्यता राम जब देखी। हरषे अनुज समेत बिसेषी॥ बापीं कूप सरित सर नाना। सलिल सुधासम मनि सोपाना॥ ३ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी ने जब जनकपुर की शोभा देखी, तब वे छोटे भाई लक्ष्मण सहित अत्यन्त हर्षित हुए। वहाँ अनेक बावलियाँ, कुएँ, नदी और तालाब हैं, जिनमें अमृत के समान जल है और मणियों की सीढ़ियाँ [बनी हुई] हैं।

चौपाई

गुंजत मंजु मत्त रस भृंगा। कूजत कल बहुबरन बिहंगा॥ बरन बरन बिकसे बनजाता। त्रिबिध समीर सदा सुखदाता॥ ४ ॥

अर्थ:

मकरन्द-रस से मतवाले होकर भौंरे सुन्दर गुंजार कर रहे हैं। रंग-बिरंगे [बहुत-से] पक्षी मधुर शब्द कर रहे हैं। रंग-रंग के कमल खिले हैं। सदा (सब ऋतुओं में) सुख देने वाला शीतल, मन्द, सुगन्ध पवन बह रहा है।

दोहा

सुमन बाटिका बाग बन बिपुल बिहंग निवास। फूलत फलत सुपल्लवत सोहत पुर चहुँ पास॥ २१२ ॥

अर्थ:

पुष्पवाटिका (फुलवारी), बाग और वन, जिनमें बहुत-से पक्षियों का निवास है, फूलते, फलते और सुन्दर पत्तों से लदे हुए नगर के चारों ओर सुशोभित हैं।

दोहा 213 के अंतर्गत
चौपाई

बनइ न बरनत नगर निकाई। जहाँ जाइ मन तहँइँ लोभाई॥ चारु बजारु बिचित्र अँबारी। मनिमय बिधि जनु स्वकर सँवारी॥ १ ॥

अर्थ:

नगर की सुन्दरताका वर्णन करते नहीं बनता। मन जहाँ जाता है, वहीं लुभा जाता (रम जाता) है। सुन्दर बाजार है, मणियों से बने हुए विचित्र छज्जे हैं, मानो ब्रह्मा ने उन्हें अपने हाथों से बनाया है।

चौपाई

धनिक बनिक बर धनद समाना। बैठे सकल बस्तु लै नाना॥ चौहट सुंदर गलीं सुहाई। संतत रहहिं सुगंध सिंचाई॥ २ ॥

अर्थ:

कुबेर के समान श्रेष्ठ धनी व्यापारी सब प्रकार की अनेक वस्तुएँ लेकर [दूकानों में] बैठे हैं। सुन्दर चौराहे और सुहावनी गलियाँ सदा सुगन्ध से सिंची रहती हैं।

चौपाई

मंगलमय मंदिर सब केरें। चित्रित जनु रतिनाथ चितेरें॥ पुर नर नारि सुभग सुचि संता। धरमसील ग्यानी गुनवंता॥ ३ ॥

अर्थ:

सबके घर मंगलमय हैं और उन पर चित्र बने हुए हैं, जिन्हें मानो कामदेवरूपी चित्रकार ने अंकित किया है। नगर के [सभी] स्त्री-पुरुष सुन्दर, पवित्र, साधु-स्वभाव वाले, धर्मात्मा, ज्ञानी और गुणवान् हैं।

चौपाई

अति अनूप जहँ जनक निवासू। बिथकहिं बिबुध बिलोकि बिलासू॥ होत चकित चित कोट बिलोकी। सकल भुवन सोभा जनु रोकी॥ ४ ॥

अर्थ:

जहाँ जनकजी का अत्यन्त अनुपम (सुन्दर) निवासस्थान (महल) है, वहाँ के विलास (ऐश्वर्य) को देखकर देवता भी थकित (स्तम्भित) हो जाते हैं [मनुष्यों की तो बात ही क्या!]. कोट (राजमहल के परकोटे) को देखकर चित्त चकित हो जाता है, [ऐसा मालूम होता है] मानो उसने समस्त लोकों की शोभा को रोक (घेर) रखा है।

दोहा

धवल धाम मनि पुरट पट सुघटित नाना भाँति। सिय निवास सुंदर सदन सोभा किमि कहि जाति॥ २१३ ॥

अर्थ:

उज्ज्वल महलों में अनेक प्रकार के सुन्दर रीतिसे बने हुए मणिजटित सोने की जरी के परदे लगे हैं। सीताजी के रहने के सुन्दर महल की शोभा का वर्णन किया ही कैसे जा सकता है।

दोहा 214 के अंतर्गत
चौपाई

सुभग द्वार सब कुलिस कपाटा। भूप भीर नट मागध भाटा॥ बनी बिसाल बाजि गज साला। हय गय रथ संकुल सब काला॥ १ ॥

अर्थ:

राजमहल के सब दरवाजे (फाटक) सुन्दर हैं, जिनमें वज्र के (मजबूत अथवा हीरों के चमकते हुए) किवाड़ लगे हैं। वहाँ [मातहत] राजाओं, नटों, मागधों और भाटों की भीड़ लगी रहती है। घोड़ों और हाथियों के लिये बहुत बड़ी-बड़ी घुड़शालाएँ और गजशालाएँ (फीलखाने) बनी हुई हैं; जो सब समय घोड़े, हाथी और रथों से भरी रहती हैं।

चौपाई

सूर सचिव सेनप बहुतेरे। नृपगृह सरिस सदन सब केरे॥ पुर बाहेर सर सरित समीपा। उतरे जहँ तहँ बिपुल महीपा॥ २ ॥

अर्थ:

बहुत-से शूरवीर, मन्त्री और सेनापति हैं। उन सबके घर भी राजमहल-सरीखे ही हैं। नगर के बाहर तालाब और नदी के निकट जहाँ-तहाँ बहुत-से राजालोग उतरे हुए (डेरा डाले हुए) हैं।

चौपाई

देखि अनूप एक अँवराई। सब सुपास सब भाँति सुहाई॥ कौसिक कहेउ मोर मनु माना। इहाँ रहिअ रघुबीर सुजाना॥ ३ ॥

अर्थ:

[वहीं] आमों का एक अनुपम बाग देखकर, जहाँ सब प्रकार के सुभीते थे और जो सब तरह से सुहावना था, विश्वामित्रजी ने कहा— हे सुजान रघुवीर! मेरा मन कहता है कि यहीं रहा जाय।

चौपाई

भलेहिं नाथ कहि कृपानिकेता। उतरे तहँ मुनिबृंद समेता॥ बिस्वामित्र महामुनि आए। समाचार मिथिलापति पाए॥ ४ ॥

अर्थ:

कृपाके धाम श्रीरामचन्द्रजी 'बहुत अच्छा, स्वामिन्!' कहकर वहीं मुनियों के समूह के साथ ठहर गये। मिथिलापति जनकजी ने जब यह समाचार पाया कि महामुनि विश्वामित्र आये हैं,

दोहा

संग सचिव सुचि भूरि भट भूसुर बर गुर ग्याति। चले मिलन मुनिनायकहि मुदित राउ एहि भाँति॥ २१४ ॥

अर्थ:

तब उन्होंने पवित्र हृदय के (ईमानदार, स्वामिभक्त) मन्त्री, बहुत-से योद्धा, श्रेष्ठ ब्राह्मण, गुरु (शतानन्दजी) और अपनी जाति के श्रेष्ठ लोगों को साथ लिया और इस प्रकार प्रसन्नता के साथ राजा मुनियों के स्वामी विश्वामित्रजी से मिलने चले।