श्रीराम-लक्ष्मण को देखकर जनकजी की प्रेममुग्धता
जनकजी जब श्रीराम और लक्ष्मण के मनोहर रूप को देखते हैं, तो प्रेम में मग्न हो जाते हैं। उनके हृदय में दिव्य आकर्षण और आदर उमड़ पड़ता है।
बालकाण्ड · प्रकरण ४३ / ५९
प्रकरण पाठ
कीन्ह प्रनामु चरन धरि माथा। दीन्हि असीस मुदित मुनिनाथा॥ बिप्रबृंद सब सादर बंदे। जानि भाग्य बड़ राउ अनंदे॥ १ ॥
अर्थ:
राजा ने मुनि के चरणों पर मस्तक रखकर प्रणाम किया। मुनियों के स्वामी विश्वामित्रजी ने प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया। फिर सारी ब्राह्मणमण्डली को आदरसहित प्रणाम किया और अपना बड़ा भाग्य जानकर राजा आनन्दित हुए।
स्याम गौर मृदु बयस किसोरा। लोचन सुखद बिस्व चित चोरा॥ उठे सकल जब रघुपति आए। बिस्वामित्र निकट बैठाए॥ ३ ॥
अर्थ:
सुकुमार किशोर अवस्थावाले, श्याम और गौर वर्ण के दोनों कुमार नेत्रों को सुख देने वाले और सारे विश्व के चित्त को चुराने वाले हैं। जब रघुनाथजी आये तब सभी [उनके रूप एवं तेज से प्रभावित होकर] उठकर खड़े हो गये। विश्वामित्रजी ने उनको अपने पास बैठा लिया।
भए सब सुखी देखि दोउ भ्राता। बारि बिलोचन पुलकित गाता॥ मूरति मधुर मनोहर देखी। भयउ बिदेहु बिदेहु बिसेषी॥ ४ ॥
अर्थ:
दोनों भाइयों को देखकर सभी सुखी हुए। सबके नेत्रों में जल भर आया (आनन्द और प्रेम के आँसू उमड़ पड़े) और शरीर रोमांचित हो उठे। रामजी की मधुर मनोहर मूर्ति को देखकर विदेह (जनक) विशेष रूप से विदेह (देह की सुध-बुध से रहित) हो गये।
सहज बिरागरूप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा॥ ताते प्रभु पूछउँ सतिभाऊ। कहहु नाथ जनि करहु दुराऊ॥ २ ॥
अर्थ:
मेरा मन जो स्वभाव से ही वैराग्यरूप [बना हुआ] है, [इन्हें देखकर] इस तरह मुग्ध हो रहा है जैसे चन्द्रमा को देखकर चकोर। हे प्रभो! इसलिये मैं आपसे सत्य भाव से पूछता हूँ। हे नाथ! बताइये, छिपाव न कीजिये।
ये प्रिय सबहि जहाँ लगि प्रानी। मन मुसुकाहिं रामु सुनि बानी॥ रघुकुल मनि दसरथ के जाए। मम हित लागि नरेस पठाए॥ ४ ॥
अर्थ:
जगत् में जहाँ तक जितने भी प्राणी हैं, ये सभी को प्रिय हैं। मुनि की [रहस्यभरी] वाणी सुनकर श्रीरामजी मन ही मन मुस्कराते हैं। [तब मुनि ने कहा—] ये रघुकुलमणि महाराज दशरथ के पुत्र हैं। मेरे हित के लिये राजा ने इन्हें मेरे साथ भेजा है।
इन्ह कै प्रीति परसपर पावनि। कहि न जाइ मन भाव सुहावनि॥ सुनहु नाथ कह मुदित बिदेहू। ब्रह्म जीव इव सहज सनेहू॥ २ ॥
अर्थ:
इनकी आपस की प्रीति बड़ी पवित्र और सुहावनी है, वह मन को बहुत भाती है, पर वाणी से कही नहीं जा सकती। विदेह (जनकजी) आनन्दित होकर कहते हैं—हे नाथ! सुनिये, ब्रह्म और जीव की तरह इनमें स्वाभाविक प्रेम है।
लखन हृदयँ लालसा बिसेषी। जाइ जनकपुर आइअ देखी॥ प्रभु भय बहुरि मुनिहि सकुचाहीं। प्रगट न कहहिं मनहिं मुसुकाहीं॥ १ ॥
अर्थ:
लक्ष्मणजी के हृदय में विशेष लालसा है कि जाकर जनकपुर देख आवें। परन्तु प्रभु श्रीरामचन्द्रजी का भय है और फिर मुनि से भी सकुचाते हैं। इसलिये प्रकट में कुछ नहीं कहते; मन ही मन मुसकरा रहे हैं।