शिवजी की विचित्र बारात और विवाह की तैयारी

शिवजी की अलौकिक और विलक्षण बारात हिमवान के नगर की ओर चलती है। उधर पर्वतराज के घर विवाह की मंगल तैयारियाँ होती हैं और देव, ऋषि तथा स्त्रियाँ उस अद्भुत दृश्य से चकित हो उठते हैं।

बालकाण्ड · प्रकरण २६ / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

कोउ मुखहीन बिपुल मुख काहू। बिनु पद कर कोउ बहु पद बाहू॥ बिपुल नयन कोउ नयन बिहीना। रिष्टपुष्ट कोउ अति तनखीना॥ ४ ॥

अर्थ:

कोई बिना मुख का है, किसी के बहुत-से मुख हैं, कोई बिना हाथ-पैर का है तो किसी के बहुत-से हाथ-पैर हैं। किसी के बहुत नेत्र हैं तो कोई नेत्रहीन है। कोई बहुत मोटा-ताज़ा है तो कोई अति दुबला-पतला है।

छन्द

तन खीन कोउ अति पीन पावन कोउ अपावन गति धरें। भूषन कराल कपाल कर सब सद्य सोनित तन भरें॥ खर स्वान सुअर सृकाल मुख गन बेष अगनित को गनै। बहु जिनस प्रेत पिसाच जोगि जमात बरनत नहिं बनै॥

अर्थ:

कोई बहुत दुबला, कोई बहुत मोटा, कोई पवित्र और कोई अपवित्र गति धारण किये हुए है। भयानक गहने पहने, हाथ में कपाल लिये हैं और सब-के-सब ताज़े खून से लथपथ हैं। गधे, कुत्ते, सूअर और सियार-से उनके मुख हैं। गणों के अनगिनत वेषों को कौन गिने? बहुत प्रकार के प्रेत, पिशाच और योगियों की जमातें हैं। उनका वर्णन नहीं बनता॥

सोरठा

नाचहिं गावहिं गीत परम तरंगी भूत सब। देखत अति बिपरीत बोलहिं बचन बिचित्र बिधि॥ ९३ ॥

अर्थ:

भूत-प्रेत नाचते और गाते हैं; वे सब बड़े तरंगी हैं। देखने में बहुत ही बेढंगे जान पड़ते हैं और बड़े ही विचित्र ढंग से बोलते हैं।

दोहा 94 के अंतर्गत
चौपाई

जस दूलहु तसि बनी बराता। कौतुक बिबिध होहिं मग जाता॥ इहाँ हिमाचल रचेउ बिताना। अति बिचित्र नहिं जाइ बखाना॥ १ ॥

अर्थ:

जैसा दूल्हा है, वैसी ही बरात बन गयी है। मार्ग में चलते हुए भाँति-भाँति के कौतुक होते जाते हैं। इधर हिमाचल ने ऐसा विचित्र वितान बनाया कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता।

चौपाई

सैल सकल जहँ लगि जग माहीं। लघु बिसाल नहिं बरनि सिराहीं॥ बन सागर सब नदीं तलावा। हिमगिरि सब कहुँ नेवत पठावा॥ २ ॥

अर्थ:

जगत् में जितने छोटे-बड़े पर्वत थे, जिनका वर्णन करके सिर नहीं आता तथा जितने वन, समुद्र, नदियाँ और तालाब थे, हिमाचल ने सबको न्योता भेजा।

चौपाई

कामरूप सुंदर तन धारी। सहित समाज सहित बर नारी॥ गए सकल तुहिनाचल गेहा। गावहिं मंगल सहित सनेहा॥ ३ ॥

अर्थ:

वे सब अपने इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले सुन्दर शरीर धारण कर सुन्दरी स्त्रियों और समाजों के साथ हिमाचल के घर गये। सभी स्नेहसहित मंगलगीत गाते हैं।

चौपाई

प्रथमहिं गिरि बहु गृह सँवराए। जथाजोगु तहँ तहँ सब छाए॥ पुर सोभा अवलोकि सुहाई। लागइ लघु बिरंचि निपुनाई॥ ४ ॥

अर्थ:

हिमाचल ने पहले ही बहुत-से घर सजवा रखे थे। यथायोग्य उन-उन स्थानों में सब लोग ठहर गये। नगर की सुन्दर शोभा देखकर ब्रह्मा की रचना-चातुरी भी तुच्छ लगती थी।

छन्द

लघु लाग बिधि की निपुनता अवलोकि पुर सोभा सही। बन बाग कूप तड़ाग सरिता सुभग सब सक को कही॥ मंगल बिपुल तोरन पताका केतु गृह गृह सोहहीं। बनिता पुरुष सुंदर चतुर छबि देखि मुनि मन मोहहीं॥

अर्थ:

नगर की शोभा देखकर ब्रह्मा की निपुणता सचमुच तुच्छ लगती है। वन, बाग, कुएँ, तालाब, नदियाँ सभी सुन्दर हैं; उनका वर्णन कौन कर सकता है? घर-घर बहुत-से मंगल-तोरण, पताका और ध्वज सुशोभित हो रहे हैं। सुन्दर और चतुर स्त्री-पुरुषों की छवि देखकर मुनियों के मन भी मोहित हो जाते हैं॥

दोहा

जगदंबा जहँ अवतरी सो पुरु बरनि कि जाइ। रिद्धि सिद्धि संपत्ति सुख नित नूतन अधिकाइ॥ ९४ ॥

अर्थ:

जिस नगर में स्वयं जगदम्बा ने अवतार लिया, क्या उसका वर्णन हो सकता है? वहाँ ऋद्धि, सिद्धि, सम्पत्ति और सुख नित-नये बढ़ते जाते हैं।

दोहा 95 के अंतर्गत
चौपाई

नगर निकट बरात सुनि आई। पुर खरभरु सोभा अधिकाई॥ करि बनाव सजि बाहन नाना। चले लेन सादर अगवाना॥ १ ॥

अर्थ:

बरात को नगर के निकट आयी सुनकर नगर में चहल-पहल मच गयी, जिससे उसकी शोभा बढ़ गयी। अगवानी करनेवाले लोग बनाव-श्रृंगार करके तथा नाना प्रकार की सवारियों को सजाकर आदरसहित बरात को लेने चले।

चौपाई

हियँ हरषे सुर सेन निहारी। हरिहि देखि अति भए सुखारी॥ सिव समाज जब देखन लागे। बिडरि चले बाहन सब भागे॥ २ ॥

अर्थ:

देवताओं के समाज को देखकर सब मन में प्रसन्न हुए और हरि को देखकर तो बहुत ही सुखी हुए। किन्तु जब शिवजी के दल को देखने लगे तब तो उनके सब वाहन (सवारियों के हाथी, घोड़े, रथ के बैल आदि) डरकर भाग चले।

चौपाई

धरि धीरजु तहँ रहे सयाने। बालक सब लै जीव पराने॥ गएँ भवन पूछहिं पितु माता। कहहिं बचन भय कंपित गाता॥ ३ ॥

अर्थ:

कुछ बड़ी उम्र के समझदार लोग धीरज धरकर वहाँ डटे रहे। लड़के तो सब अपने प्राण लेकर भागे। घर पहुँचने पर जब माता-पिता पूछते हैं, तब वे भय से काँपते हुए शरीर से ऐसा वचन कहते हैं--।

चौपाई

कहिअ काह कहि जाइ न बाता। जम कर धार किधौं बरिआता॥ बरु बौराह बसहँ असवारा। ब्याल कपाल बिभूषन छारा॥ ४ ॥

अर्थ:

क्या कहें, कोई बात कही नहीं जाती। यह बरात है या यमराज की सेना? दूल्हा पागल है और बैल पर सवार है। साँप, कपाल और राख ही उसके गहने हैं।

छन्द

तन छार ब्याल कपाल भूषन नगन जटिल भयंकरा। सँग भूत प्रेत पिसाच जोगिनि बिकट मुख रजनीचरा॥ जो जिअत रहिहि बरात देखत पुन्य बड़ तेहि कर सही। देखिहि सो उमा बिबाहु घर घर बात असि लरिकन्ह कही॥

अर्थ:

दूल्हे के शरीर पर राख लगी है, साँप और कपाल के गहने हैं; वह नग्न, जटाधारी और भयंकर है। उसके साथ भयानक मुखवाले भूत, प्रेत, पिशाच, योगिनियाँ और राक्षस हैं। जो बरात को देखकर जीता बचेगा, सचमुच उसके बड़े ही पुण्य हैं और वही उमा का विवाह देखेगा। लड़कों ने घर-घर यही बात कही॥

दोहा

समुझि महेस समाज सब जननि जनक मुसुकाहिं। बाल बुझाए बिबिध बिधि निडर होहु डरु नाहिं॥ ९५ ॥

अर्थ:

महेश्वर (शिवजी) का समाज समझकर सब लड़कों के माता-पिता मुसकराते हैं। उन्होंने बहुत तरह से लड़कों को समझाया कि निडर हो जाओ, डर की कोई बात नहीं है।

दोहा 96 के अंतर्गत
चौपाई

लै अगवान बरातहि आए। दिए सबहि जनवास सुहाए॥ मैनाँ सुभ आरती सँवारी। संग सुमंगल गावहिं नारी॥ १ ॥

अर्थ:

अगवान लोग बरात को लिवा लाये, उन्होंने सबको सुन्दर जनवासे दिये। मैना (पार्वतीजी की माता) ने शुभ आरती सजायी और उनके साथ की स्त्रियाँ उत्तम मंगलगीत गाने लगीं।

चौपाई

कंचन थार सोह बर पानी। परिछन चली हरहि हरषानी॥ बिकट बेष रुद्रहि जब देखा। अबलन्ह उर भय भयउ बिसेषा॥ २ ॥

अर्थ:

सुन्दर हाथों में सोने का थाल शोभित है; इस प्रकार मैना हर्ष के साथ शिवजी का परछन करने चलीं। जब महादेवजी को भयानक वेष में देखा तब स्त्रियों के मन में बड़ा भारी भय उत्पन्न हो गया।

चौपाई

भागि भवन पैठीं अति त्रासा। गए महेसु जहाँ जनवासा॥ मैना हृदयँ भयउ दुखु भारी। लीन्ही बोलि गिरीसकुमारी॥ ३ ॥

अर्थ:

बहुत ही डर के मारे भागकर वे घर में घुस गयीं और शिवजी जहाँ जनवासा था, वहाँ चले गये। मैना के हृदय में बड़ा दुःख हुआ। उन्होंने पार्वतीजी को अपने पास बुला लिया।

चौपाई

अधिक सनेहँ गोद बैठारी। स्याम सरोज नयन भरे बारी॥ जेहिं बिधि तुम्हहि रूपु अस दीन्हा। तेहिं जड़ बरु बाउर कस कीन्हा॥ ४ ॥

अर्थ:

और अत्यन्त स्नेह से गोद में बैठाकर अपने श्याम सरोज के समान नेत्रों में आँसू भरकर कहा-- जिस विधाता ने तुमको ऐसा सुन्दर रूप दिया, उस मूर्ख ने तुम्हारे वर को बावला कैसे बनाया ?

छन्द

कस कीन्ह बरु बौराह बिधि जेहिं तुम्हहि सुंदरता दई। जो फलु चहिअ सुरतरुहिं सो बरबस बबूरहिं लागई॥ तुम्ह सहित गिरि तें गिरौं पावक जरौं जलनिधि महुँ परौं। घरु जाउ अपजसु होउ जग जीवत बिबाहु न हौं करौं॥

अर्थ:

जिस विधाता ने तुमको सुन्दरता दी, उसने तुम्हारे लिए वर बावला कैसे बनाया? जो फल कल्पवृक्ष में लगना चाहिए, वह जबर्दस्ती बबूल में लग रहा है। मैं तुम्हें लेकर पहाड़ से गिर पड़ूँगी, आग में जल जाऊँगी या समुद्र में कूद पड़ूँगी। चाहे घर उजड़ जाय और संसार में अपयश हो, पर जीते-जी मैं इस बावले वर से तुम्हारा विवाह न करूँगी॥

दोहा

भईं बिकल अबला सकल दुखित देखि गिरिनारि। करि बिलापु रोदति बदति सुता सनेहु सँभारि॥ ९६ ॥

अर्थ:

हिमाचल की स्त्री (मैना) को दुःखी देखकर सारी स्त्रियाँ व्याकुल हो गयीं। मैना अपनी कन्या के स्नेह को याद करके विलाप करती, रोती और कहती थीं--।

दोहा 97 के अंतर्गत
चौपाई

नारद कर मैं काह बिगारा। भवनु मोर जिन्ह बसत उजारा॥ अस उपदेसु उमहि जिन्ह दीन्हा। बौरे बरहि लागि तपु कीन्हा॥ १ ॥

अर्थ:

मैंने नारद का क्या बिगाड़ा था, जिन्होंने मेरा बसता हुआ घर उजाड़ दिया और जिन्होंने पार्वती को ऐसा उपदेश दिया कि जिससे उसने बावले वर के लिए तप किया।

चौपाई

साचेहुँ उन्ह कें मोह न माया। उदासीन धनु धामु न जाया॥ पर घर घालक लाज न भीरा। बाँझ कि जान प्रसव कै पीरा॥ २ ॥

अर्थ:

सचमुच उनके न किसी का मोह है, न माया; न धन है, न घर है। वे सबसे उदासीन हैं; इसी से वे दूसरे का घर उजाड़ने वाले हैं। उन्हें न किसी की लाज है, न भीर है। भला, बाँझ स्त्री प्रसव की पीड़ा को क्या जाने।

चौपाई

जननिहि बिकल बिलोकि भवानी। बोली जुत बिबेक मृदु बानी॥ अस बिचारि सोचहि मति माता। सो न टरइ जो रचइ बिधाता॥ ३ ॥

अर्थ:

माता को विकल देखकर पार्वतीजी विवेकयुक्त कोमल वाणी बोलीं--हे माता! जो विधाता रच देते हैं, वह टलता नहीं; ऐसा विचारकर तुम सोच मत करो!।

चौपाई

करम लिखा जौं बाउर नाहू। तौ कत दोसु लगाइअ काहू॥ तुम्ह सन मिटहिं कि बिधि के अंका। मातु ब्यर्थ जनि लेहु कलंका॥ ४ ॥

अर्थ:

जो मेरे भाग्य में बावला ही पति लिखा है तो किसी को क्यों दोष लगाया जाय? हे माता! क्या विधाता के अंक तुमसे मिट सकते हैं ? वृथा कलंक का टीका मत लो।

छन्द

जनि लेहु मातु कलंकु करुना परिहरहु अवसर नहीं। दुखु सुखु जो लिखा लिलार हमरें जाब जहँ पाउब तहीं॥ सुनि उमा बचन बिनीत कोमल सकल अबला सोचहीं। बहु भाँति बिधिहि लगाइ दूषन नयन बारि बिमोचहीं॥

अर्थ:

हे माता! कलंक मत लो, करुणा छोड़ो, यह अवसर विषाद करने का नहीं है। मेरे ललाट में जो दुःख-सुख लिखा है, उसे मैं जहाँ जाऊँगी, वहीं पाऊँगी। पार्वतीजी के ऐसे विनयभरे कोमल वचन सुनकर सारी स्त्रियाँ सोच करने लगीं और बहुत भाँति विधाता को दोष देकर आँखों से आँसू बहाने लगीं॥

दोहा

तेहि अवसर नारद सहित अरु रिषि सप्त समेत। समाचार सुनि तुहिनगिरि गवने तुरत निकेत॥ ९७ ॥

अर्थ:

इस समाचार को सुनते ही हिमाचल उसी समय नारदजी और सप्तर्षियों को साथ लेकर अपने घर गये।

दोहा 98 के अंतर्गत
चौपाई

तब नारद सबही समुझावा। पूरुब कथाप्रसंगु सुनावा॥ मयना सत्य सुनहु मम बानी। जगदंबा तव सुता भवानी॥ १ ॥

अर्थ:

तब नारदजी ने पूर्व जन्म की कथा सुनाकर सबको समझाया [और कहा] कि हे मैना! तुम मेरी सच्ची बात सुनो, तुम्हारी यह लड़की साक्षात् जगज्जननी भवानी है।

चौपाई

अजा अनादि सक्ति अबिनासिनि। सदा संभु अरधंग निवासिनि॥ जग संभव पालन लय कारिनि। निज इच्छा लीला बपु धारिनि॥ २ ॥

अर्थ:

ये अजन्मा, अनादि और अविनाशिनी शक्ति हैं। सदा शिवजी के अर्द्धांग में रहती हैं। ये जगत् की उत्पत्ति, पालन और संहार करनेवाली हैं; और अपनी इच्छा से ही लीला-शरीर धारण करती हैं।

चौपाई

जनमीं प्रथम दच्छ गृह जाई। नामु सती सुंदर तनु पाई॥ तहँहुँ सती संकरहि बिबाहीं। कथा प्रसिद्ध सकल जग माहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

पहले ये दक्ष के घर जाकर जन्मीं थीं, तब इनका नाम सती था, और बहुत सुन्दर शरीर पाया था। वहाँ भी सती शिवजी से ही ब्याही गयी थीं। यह कथा सारे जगत् में प्रसिद्ध है।

चौपाई

एक बार आवत सिव संगा। देखेउ रघुकुल कमल पतंगा॥ भयउ मोहु सिव कहा न कीन्हा। भ्रम बस बेषु सीय कर लीन्हा॥ ४ ॥

अर्थ:

एक बार ये शिवजी के साथ आती हुईं [राह में] रघुकुलरूपी कमल के सूर्य श्रीरामचन्द्रजी को देखती हैं, तब इन्हें मोह हो गया और इन्होंने शिवजी का कहना न मानकर भ्रमवश सीताजी का वेष धारण कर लिया।

छन्द

सिय बेषु सतीं जो कीन्ह तेहिं अपराध संकर परिहरीं। हर बिरहँ जाइ बहोरि पितु कें जग्य जोगानल जरीं॥ अब जनमि तुम्हरे भवन निज पति लागि दारुन तपु किया। अस जानि संसय तजहु गिरिजा सर्बदा संकरप्रिया॥

अर्थ:

सतीजी ने जो सीताजी का वेष धारण किया, उसी अपराध के कारण शिवजी ने उनको त्याग दिया। फिर शिव-वियोग में ये अपने पिता के यज्ञ में जाकर वहीं योगानल से जल गयीं। अब इन्होंने तुम्हारे घर जन्म लेकर अपने पति के लिये कठिन तप किया है, ऐसा जानकर सन्देह छोड़ दो, गिरिजा सदा शिवजी की प्रिया हैं॥

दोहा

सुनि नारद के बचन तब सब कर मिटा बिषाद। छन महुँ ब्यापेउ सकल पुर घर घर यह संबाद॥ ९८ ॥

अर्थ:

तब नारद के वचन सुनकर सबका विषाद मिट गया और क्षणभर में यह समाचार सारे नगर में घर-घर फैल गया।

दोहा 99 के अंतर्गत
चौपाई

तब मयना हिमवंतु अनंदे। पुनि पुनि पारबती पद बंदे॥ नारि पुरुष सिसु जुबा सयाने। नगर लोग सब अति हरषाने॥ १ ॥

अर्थ:

तब मैना और हिमवान् आनन्द में मग्न हो गये और उन्होंने बार-बार पार्वती के चरणों की वन्दना की। स्त्री, पुरुष, बालक, युवा और सयाने, नगर के सभी लोग बहुत हर्षित हुए।

चौपाई

लगे होन पुर मंगल गाना। सजे सबहिं हाटक घट नाना॥ भाँति अनेक भई जेवनारा। सूपसास्त्र जस कछु ब्यवहारा॥ २ ॥

अर्थ:

नगर में मंगलगीत गाये जाने लगे और सबने भाँति-भाँति के हाटक के कलश सजाये। भाँति अनेक भई जेवनारा। सूपसास्त्र जस कछु ब्यवहारा॥

चौपाई

सो जेवनार कि जाइ बखानी। बसहिं भवन जेहिं मातु भवानी॥ सादर बोले सकल बराती। बिष्नु बिरंचि देव सब जाती॥ ३ ॥

अर्थ:

जिस घर में स्वयं माता भवानी रहती हों, उस जेवनार का वर्णन कैसे किया जा सकता है? हिमाचल ने आदरपूर्वक सब बरातियों को—विष्णु, ब्रह्मा और सब जाति के देवताओं को—बुलाया।

चौपाई

बिबिधि पाँति बैठी जेवनारा। लागे परुसन निपुन सुआरा॥ नारिबृंद सुर जेवँत जानी। लगीं देन गारीं मृदु बानी॥ ४ ॥

अर्थ:

भोजन करने वालों की बहुत-सी पाँतियाँ बैठीं। चतुर रसोइये परोसने लगे। स्त्रियों की मण्डलियाँ देवताओं को भोजन करते जान कर कोमल वाणी से गालियाँ देने लगीं।

छन्द

गारीं मधुर स्वर देहिं सुंदरि बिंग्य बचन सुनावहीं। भोजनु करहिं सुर अति बिलंबु बिनोदु सुनि सचु पावहीं॥ जेवँत जो बढ्यो अनंदु सो मुख कोटिहूँ न परै कह्यो। अचवाँइ दीन्हे पान गवने बास जहँ जाको रह्यो॥

अर्थ:

सब सुन्दरियाँ मीठे स्वर में गालियाँ देने लगीं और व्यंग्य भरे वचन सुनाने लगीं। देवगण विनोद सुन कर भोजन करने में बहुत देर लगा रहे हैं। भोजन के समय जो आनन्द बढ़ा, वह करोड़ों मुँहों से भी नहीं कहा जा सकता। अचवाँइ दीन्हे पान, फिर सब लोग जहाँ-जहाँ ठहरे थे, वहाँ चले गये॥

दोहा

बहुरि मुनिन्ह हिमवंत कहुँ लगन सुनाई आइ। समय बिलोकि बिबाह कर पठए देव बोलाइ॥ ९९ ॥

अर्थ:

फिर मुनियों ने लौटकर हिमवान् को लगन सुनायी और विवाह का समय देखकर देवताओं को बुला भेजा।

दोहा 100 के अंतर्गत
चौपाई

बोलि सकल सुर सादर लीन्हे। सबहि जथोचित आसन दीन्हे॥ बेदी बेद बिधान सँवारी। सुभग सुमंगल गावहिं नारी॥ १ ॥

अर्थ:

सब देवताओं को आदर सहित बुला लिया और सबको यथायोग्य आसन दिये। वेदी वेद-विधान से सजायी गयी और स्त्रियाँ सुन्दर मंगलगीत गाने लगीं।

चौपाई

सिंघासनु अति दिब्य सुहावा। जाइ न बरनि बिरंचि बनावा॥ बैठे सिव बिप्रन्ह सिरु नाई। हृदयँ सुमिरि निज प्रभु रघुराई॥ २ ॥

अर्थ:

सिंहासन पर एक अत्यन्त सुन्दर दिव्य आसन था, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता; क्योंकि वह स्वयं ब्रह्माजी का बनाया हुआ था। ब्राह्मणों को सिर नवाकर और हृदय में अपने प्रभु श्रीरघुराई का स्मरण करके शिवजी उस सिंहासन पर बैठ गये।

चौपाई

बहुरि मुनीसन्ह उमा बोलाईं। करि सिंगारु सखीं लै आईं॥ देखत रूपु सकल सुर मोहे। बरनै छबि अस जग कबि को है॥ ३ ॥

अर्थ:

फिर मुनीश्वरों ने उमा को बुलाया। सखियों ने श्रृंगार करके उन्हें ले आयीं। देखते ही उनके रूप से सब देवता मोहित हो गये। संसार में ऐसा कौन कवि है जो उस छवि का वर्णन कर सके !।

चौपाई

जगदंबिका जानि भव भामा। सुरन्ह मनहिं मन कीन्ह प्रनामा॥ सुंदरता मरजाद भवानी। जाइ न कोटिहुँ बदन बखानी॥ ४ ॥

अर्थ:

पार्वतीजी को जगदम्बा और शिवजी की पत्नी समझकर देवताओं ने मन-ही-मन प्रणाम किया। भवानीजी सुन्दरता की सीमा हैं। करोड़ों मुखों से भी उनकी शोभा नहीं कही जा सकती।

छन्द

कोटिहुँ बदन नहिं बनै बरनत जग जननि सोभा महा। सकुचहिं कहतश्रुति सेष सारद मंदमति तुलसी कहा॥ छबिखानि मातु भवानि गवनीं मध्य मंडप सिव जहाँ। अवलोकि सकहिं न सकुच पति पद कमल मनु मधुकरु तहाँ॥

अर्थ:

जगज्जननी पार्वतीजी की महान् शोभा का वर्णन करोड़ों मुखों से भी करते नहीं बनता। वेद, शेषजी और सरस्वतीजी तक उसे कहते हुए सकुचा जाते हैं, तब मन्दबुद्धि तुलसी किस गिनती में है। सुन्दरता की खान माता भवानी मण्डप के बीच में, जहाँ शिवजी थे, वहाँ गयीं। वे संकोच के मारे पति के चरणकमलों को देख नहीं सकतीं, परन्तु उनका मनरूपी भौंरा तो वहीं था॥

दोहा

मुनि अनुसासन गनपतिहि पूजेउ संभु भवानि। कोउ सुनि संसय करै जनि सुर अनादि जियँ जानि॥ १०० ॥

अर्थ:

मुनियों की आज्ञा से शिवजी और पार्वतीजी ने गणेशजी का पूजन किया। मन में देवताओं को अनादि समझकर कोई इस बात को सुनकर शंका न करे [कि गणेशजी तो शिव-पार्वती की सन्तान हैं, अभी विवाह से पूर्व ही वे कहाँ से आ गये]।