शिवजी की विचित्र बारात और विवाह की तैयारी
शिवजी की अलौकिक और विलक्षण बारात हिमवान के नगर की ओर चलती है। उधर पर्वतराज के घर विवाह की मंगल तैयारियाँ होती हैं और देव, ऋषि तथा स्त्रियाँ उस अद्भुत दृश्य से चकित हो उठते हैं।
बालकाण्ड · प्रकरण २६ / ५९
प्रकरण पाठ
कोउ मुखहीन बिपुल मुख काहू। बिनु पद कर कोउ बहु पद बाहू॥ बिपुल नयन कोउ नयन बिहीना। रिष्टपुष्ट कोउ अति तनखीना॥ ४ ॥
अर्थ:
कोई बिना मुख का है, किसी के बहुत-से मुख हैं, कोई बिना हाथ-पैर का है तो किसी के बहुत-से हाथ-पैर हैं। किसी के बहुत नेत्र हैं तो कोई नेत्रहीन है। कोई बहुत मोटा-ताज़ा है तो कोई अति दुबला-पतला है।
तन खीन कोउ अति पीन पावन कोउ अपावन गति धरें। भूषन कराल कपाल कर सब सद्य सोनित तन भरें॥ खर स्वान सुअर सृकाल मुख गन बेष अगनित को गनै। बहु जिनस प्रेत पिसाच जोगि जमात बरनत नहिं बनै॥
अर्थ:
कोई बहुत दुबला, कोई बहुत मोटा, कोई पवित्र और कोई अपवित्र गति धारण किये हुए है। भयानक गहने पहने, हाथ में कपाल लिये हैं और सब-के-सब ताज़े खून से लथपथ हैं। गधे, कुत्ते, सूअर और सियार-से उनके मुख हैं। गणों के अनगिनत वेषों को कौन गिने? बहुत प्रकार के प्रेत, पिशाच और योगियों की जमातें हैं। उनका वर्णन नहीं बनता॥
लघु लाग बिधि की निपुनता अवलोकि पुर सोभा सही। बन बाग कूप तड़ाग सरिता सुभग सब सक को कही॥ मंगल बिपुल तोरन पताका केतु गृह गृह सोहहीं। बनिता पुरुष सुंदर चतुर छबि देखि मुनि मन मोहहीं॥
अर्थ:
नगर की शोभा देखकर ब्रह्मा की निपुणता सचमुच तुच्छ लगती है। वन, बाग, कुएँ, तालाब, नदियाँ सभी सुन्दर हैं; उनका वर्णन कौन कर सकता है? घर-घर बहुत-से मंगल-तोरण, पताका और ध्वज सुशोभित हो रहे हैं। सुन्दर और चतुर स्त्री-पुरुषों की छवि देखकर मुनियों के मन भी मोहित हो जाते हैं॥
हियँ हरषे सुर सेन निहारी। हरिहि देखि अति भए सुखारी॥ सिव समाज जब देखन लागे। बिडरि चले बाहन सब भागे॥ २ ॥
अर्थ:
देवताओं के समाज को देखकर सब मन में प्रसन्न हुए और हरि को देखकर तो बहुत ही सुखी हुए। किन्तु जब शिवजी के दल को देखने लगे तब तो उनके सब वाहन (सवारियों के हाथी, घोड़े, रथ के बैल आदि) डरकर भाग चले।
तन छार ब्याल कपाल भूषन नगन जटिल भयंकरा। सँग भूत प्रेत पिसाच जोगिनि बिकट मुख रजनीचरा॥ जो जिअत रहिहि बरात देखत पुन्य बड़ तेहि कर सही। देखिहि सो उमा बिबाहु घर घर बात असि लरिकन्ह कही॥
अर्थ:
दूल्हे के शरीर पर राख लगी है, साँप और कपाल के गहने हैं; वह नग्न, जटाधारी और भयंकर है। उसके साथ भयानक मुखवाले भूत, प्रेत, पिशाच, योगिनियाँ और राक्षस हैं। जो बरात को देखकर जीता बचेगा, सचमुच उसके बड़े ही पुण्य हैं और वही उमा का विवाह देखेगा। लड़कों ने घर-घर यही बात कही॥
अधिक सनेहँ गोद बैठारी। स्याम सरोज नयन भरे बारी॥ जेहिं बिधि तुम्हहि रूपु अस दीन्हा। तेहिं जड़ बरु बाउर कस कीन्हा॥ ४ ॥
अर्थ:
और अत्यन्त स्नेह से गोद में बैठाकर अपने श्याम सरोज के समान नेत्रों में आँसू भरकर कहा-- जिस विधाता ने तुमको ऐसा सुन्दर रूप दिया, उस मूर्ख ने तुम्हारे वर को बावला कैसे बनाया ?
कस कीन्ह बरु बौराह बिधि जेहिं तुम्हहि सुंदरता दई। जो फलु चहिअ सुरतरुहिं सो बरबस बबूरहिं लागई॥ तुम्ह सहित गिरि तें गिरौं पावक जरौं जलनिधि महुँ परौं। घरु जाउ अपजसु होउ जग जीवत बिबाहु न हौं करौं॥
अर्थ:
जिस विधाता ने तुमको सुन्दरता दी, उसने तुम्हारे लिए वर बावला कैसे बनाया? जो फल कल्पवृक्ष में लगना चाहिए, वह जबर्दस्ती बबूल में लग रहा है। मैं तुम्हें लेकर पहाड़ से गिर पड़ूँगी, आग में जल जाऊँगी या समुद्र में कूद पड़ूँगी। चाहे घर उजड़ जाय और संसार में अपयश हो, पर जीते-जी मैं इस बावले वर से तुम्हारा विवाह न करूँगी॥
साचेहुँ उन्ह कें मोह न माया। उदासीन धनु धामु न जाया॥ पर घर घालक लाज न भीरा। बाँझ कि जान प्रसव कै पीरा॥ २ ॥
अर्थ:
सचमुच उनके न किसी का मोह है, न माया; न धन है, न घर है। वे सबसे उदासीन हैं; इसी से वे दूसरे का घर उजाड़ने वाले हैं। उन्हें न किसी की लाज है, न भीर है। भला, बाँझ स्त्री प्रसव की पीड़ा को क्या जाने।
जनि लेहु मातु कलंकु करुना परिहरहु अवसर नहीं। दुखु सुखु जो लिखा लिलार हमरें जाब जहँ पाउब तहीं॥ सुनि उमा बचन बिनीत कोमल सकल अबला सोचहीं। बहु भाँति बिधिहि लगाइ दूषन नयन बारि बिमोचहीं॥
अर्थ:
हे माता! कलंक मत लो, करुणा छोड़ो, यह अवसर विषाद करने का नहीं है। मेरे ललाट में जो दुःख-सुख लिखा है, उसे मैं जहाँ जाऊँगी, वहीं पाऊँगी। पार्वतीजी के ऐसे विनयभरे कोमल वचन सुनकर सारी स्त्रियाँ सोच करने लगीं और बहुत भाँति विधाता को दोष देकर आँखों से आँसू बहाने लगीं॥
एक बार आवत सिव संगा। देखेउ रघुकुल कमल पतंगा॥ भयउ मोहु सिव कहा न कीन्हा। भ्रम बस बेषु सीय कर लीन्हा॥ ४ ॥
अर्थ:
एक बार ये शिवजी के साथ आती हुईं [राह में] रघुकुलरूपी कमल के सूर्य श्रीरामचन्द्रजी को देखती हैं, तब इन्हें मोह हो गया और इन्होंने शिवजी का कहना न मानकर भ्रमवश सीताजी का वेष धारण कर लिया।
सिय बेषु सतीं जो कीन्ह तेहिं अपराध संकर परिहरीं। हर बिरहँ जाइ बहोरि पितु कें जग्य जोगानल जरीं॥ अब जनमि तुम्हरे भवन निज पति लागि दारुन तपु किया। अस जानि संसय तजहु गिरिजा सर्बदा संकरप्रिया॥
अर्थ:
सतीजी ने जो सीताजी का वेष धारण किया, उसी अपराध के कारण शिवजी ने उनको त्याग दिया। फिर शिव-वियोग में ये अपने पिता के यज्ञ में जाकर वहीं योगानल से जल गयीं। अब इन्होंने तुम्हारे घर जन्म लेकर अपने पति के लिये कठिन तप किया है, ऐसा जानकर सन्देह छोड़ दो, गिरिजा सदा शिवजी की प्रिया हैं॥
गारीं मधुर स्वर देहिं सुंदरि बिंग्य बचन सुनावहीं। भोजनु करहिं सुर अति बिलंबु बिनोदु सुनि सचु पावहीं॥ जेवँत जो बढ्यो अनंदु सो मुख कोटिहूँ न परै कह्यो। अचवाँइ दीन्हे पान गवने बास जहँ जाको रह्यो॥
अर्थ:
सब सुन्दरियाँ मीठे स्वर में गालियाँ देने लगीं और व्यंग्य भरे वचन सुनाने लगीं। देवगण विनोद सुन कर भोजन करने में बहुत देर लगा रहे हैं। भोजन के समय जो आनन्द बढ़ा, वह करोड़ों मुँहों से भी नहीं कहा जा सकता। अचवाँइ दीन्हे पान, फिर सब लोग जहाँ-जहाँ ठहरे थे, वहाँ चले गये॥
सिंघासनु अति दिब्य सुहावा। जाइ न बरनि बिरंचि बनावा॥ बैठे सिव बिप्रन्ह सिरु नाई। हृदयँ सुमिरि निज प्रभु रघुराई॥ २ ॥
अर्थ:
सिंहासन पर एक अत्यन्त सुन्दर दिव्य आसन था, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता; क्योंकि वह स्वयं ब्रह्माजी का बनाया हुआ था। ब्राह्मणों को सिर नवाकर और हृदय में अपने प्रभु श्रीरघुराई का स्मरण करके शिवजी उस सिंहासन पर बैठ गये।
कोटिहुँ बदन नहिं बनै बरनत जग जननि सोभा महा। सकुचहिं कहतश्रुति सेष सारद मंदमति तुलसी कहा॥ छबिखानि मातु भवानि गवनीं मध्य मंडप सिव जहाँ। अवलोकि सकहिं न सकुच पति पद कमल मनु मधुकरु तहाँ॥
अर्थ:
जगज्जननी पार्वतीजी की महान् शोभा का वर्णन करोड़ों मुखों से भी करते नहीं बनता। वेद, शेषजी और सरस्वतीजी तक उसे कहते हुए सकुचा जाते हैं, तब मन्दबुद्धि तुलसी किस गिनती में है। सुन्दरता की खान माता भवानी मण्डप के बीच में, जहाँ शिवजी थे, वहाँ गयीं। वे संकोच के मारे पति के चरणकमलों को देख नहीं सकतीं, परन्तु उनका मनरूपी भौंरा तो वहीं था॥
मुनि अनुसासन गनपतिहि पूजेउ संभु भवानि। कोउ सुनि संसय करै जनि सुर अनादि जियँ जानि॥ १०० ॥
अर्थ:
मुनियों की आज्ञा से शिवजी और पार्वतीजी ने गणेशजी का पूजन किया। मन में देवताओं को अनादि समझकर कोई इस बात को सुनकर शंका न करे [कि गणेशजी तो शिव-पार्वती की सन्तान हैं, अभी विवाह से पूर्व ही वे कहाँ से आ गये]।