जयमाल पहनाना

धनुषभंग के बाद जनकनंदिनी सीताजी लज्जा और आनंद से भरकर श्रीरामजी के गले में जयमाल पहनाती हैं। देवता पुष्पवर्षा करते हैं और मंगलध्वनि गूंज उठती है।

बालकाण्ड · प्रकरण ५३ / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

सखिन्ह मध्य सिय सोहति कैसें। छबिगन मध्य महाछबि जैसें॥ कर सरोज जयमाल सुहाई। बिस्व बिजय सोभा जेहिं छाई॥ १ ॥

अर्थ:

सखियों के बीच में सीताजी कैसी शोभित हो रही हैं; जैसे बहुत-सी छबियों के बीच में महाछबि हो। करकमल में सुन्दर जयमाला है, जिसमें विश्वविजय की शोभा छायी हुई है।

चौपाई

तन सकोचु मन परम उछाहू। गूढ़ प्रेमु लखि परइ न काहू॥ जाइ समीप राम छबि देखी। रहि जनु कुअँरि चित्र अवरेखी॥ २ ॥

अर्थ:

सीताजी के शरीर में संकोच है, पर मन में परम उत्साह है। उनका यह गूढ़ प्रेम किसी को जान नहीं पड़ रहा है। समीप जाकर श्रीरामजी की छवि देखकर राजकुमारी चित्र में लिखी-सी रह गयीं।

चौपाई

चतुर सखीं लखि कहा बुझाई। पहिरावहु जयमाल सुहाई॥ सुनत जुगल कर माल उठाई। प्रेम बिबस पहिराइ न जाई॥ ३ ॥

अर्थ:

चतुर सखी ने यह दशा देखकर समझाकर कहा—सुहावनी जयमाला पहनाओ। यह सुनकर सीताजी ने दोनों हाथों से माला उठायी, पर प्रेम के वश होने से पहनायी नहीं जाती।

चौपाई

सोहत जनु जुग जलज सनाला। ससिहि सभीत देत जयमाला॥ गावहिं छबि अवलोकि सहेली। सियँ जयमाल राम उर मेली॥ ४ ॥

अर्थ:

[उस समय उनके हाथ ऐसे सुशोभित हो रहे हैं] मानो डंडियों सहित दो कमल चन्द्रमा को डराते हुए जयमाला दे रहे हों। इस छबि को देखकर सखियाँ गाने लगीं। तब सीताजी ने श्रीरामजी के गले में जयमाला पहना दी।

सोरठा

रघुबर उर जयमाल देखि देव बरिसहिं सुमन। सकुचे सकल भुआल जनु बिलोकि रबि कुमुदगन॥ २६४ ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी के हृदय पर जयमाला देखकर देवता फूल बरसाने लगे। समस्त राजागण इस प्रकार सकुचा गये मानो सूर्य को देखकर कुमुदों का समूह सिकुड़ गया हो।

दोहा 265 के अंतर्गत
चौपाई

पुर अरु ब्योम बाजने बाजे। खल भए मलिन साधु सब राजे॥ सुर किंनर नर नाग मुनीसा। जय जय जय कहि देहिं असीसा॥ १ ॥

अर्थ:

नगर और आकाश में बाजे बजने लगे। दुष्ट लोग उदास हो गये और सज्जन लोग सब प्रसन्न हो गये। देवता, किन्नर, मनुष्य, नाग और मुनीश्वर जय-जयकार करके आशीर्वाद दे रहे हैं।

चौपाई

नाचहिं गावहिं बिबुध बधूटीं। बार बार कुसुमांजलि छूटीं॥ जहँ तहँ बिप्र बेदधुनि करहीं। बंदी बिरिदावलि उच्चरहीं॥ २ ॥

अर्थ:

देवताओं की स्त्रियाँ नाचती-गाती हैं। बार-बार हाथों से पुष्पों की अंजलियाँ छूट रही हैं। जहाँ-तहाँ ब्राह्मण वेदध्वनि कर रहे हैं और भाट लोग विरुदावली (कुलकीर्ति) बखान रहे हैं।

चौपाई

महि पाताल नाक जसु ब्यापा। राम बरी सिय भंजेउ चापा॥ करहिं आरती पुर नर नारी। देहिं निछावरि बित्त बिसारी॥ ३ ॥

अर्थ:

पृथ्वी, पाताल और स्वर्ग तीनों लोकों में यश फैल गया कि श्रीरामचन्द्रजी ने धनुष तोड़ दिया और सीताजी को वरण कर लिया। नगर के नर-नारी आरती कर रहे हैं और अपनी पूँजी भुलाकर निछावर कर रहे हैं।

चौपाई

सोहति सीय राम कै जोरी। छबि सिंगारु मनहुँ एक ठोरी॥ सखीं कहहिं प्रभुपद गहु सीता। करति न चरन परस अति भीता॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीसीता-रामजी की जोड़ी ऐसी सुशोभित हो रही है मानो सुन्दरता और श्रृंगाररस एकत्र हो गये हों। सखियाँ कह रही हैं—सीते! स्वामी के चरण छुओ; किन्तु सीताजी अत्यन्त भयभीत होकर उनके चरण नहीं छूतीं।

दोहा

गौतम तिय गति सुरति करि नहिं परसति पग पानि। मन बिहसे रघुबंसमनि प्रीति अलौकिक जानि॥ २६५ ॥

अर्थ:

गौतमजी की स्त्री अहल्या की गति का स्मरण करके सीताजी श्रीरामजी के चरणों को हाथों से स्पर्श नहीं कर रही हैं। सीताजी की अलौकिक प्रीति जानकर रघुकुलमणि श्रीरामचन्द्रजी मन में हँसे।

दोहा 266 के अंतर्गत
चौपाई

तब सिय देखि भूप अभिलाषे। कूर कपूत मूढ़ मन माखे॥ उठि उठि पहिरि सनाह अभागे। जहँ तहँ गाल बजावन लागे॥ १ ॥

अर्थ:

उस समय सीताजी को देखकर कुछ राजा लोग ललचा उठे। वे दुष्ट, कुपूत और मूढ़ राजा मन में बहुत तमतमा गये। वे अभागे उठ-उठकर कवच पहनकर जहाँ-तहाँ गाल बजाने लगे।

चौपाई

लेहु छड़ाइ सीय कह कोऊ। धरि बाँधहु नृप बालक दोऊ॥ तोरें धनुषु चाड़ नहिं सरई। जीवत हमहि कुअँरि को बरई॥ २ ॥

अर्थ:

कोई कहते हैं, सीता को छीन लो और दोनों राजकुमारों को पकड़कर बाँध लो। धनुष तोड़ने से ही चाह नहीं सरेगी (पूरी होगी)। हमारे जीते-जी राजकुमारी को कौन ब्याह सकता है ?

चौपाई

जौं बिदेहु कछु करै सहाई। जीतहु समर सहित दोउ भाई॥ साधु भूप बोले सुनि बानी। राजसमाजहि लाज लजानी॥ ३ ॥

अर्थ:

यदि जनक कुछ सहायता करे, तो युद्ध में दोनों भाइयों सहित उसे भी जीत लो। ये वचन सुनकर साधु राजा बोले—इस राजसमाज को देखकर तो लाज भी लजा गयी।

चौपाई

बलु प्रतापु बीरता बड़ाई। नाक पिनाकहि संग सिधाई॥ सोइ सूरता कि अब कहुँ पाई। असि बुधि तौ बिधि मुहँ मसि लाई॥ ४ ॥

अर्थ:

आह ! तुम्हारा बल, प्रताप, वीरता, बड़ाई और नाक (प्रतिष्ठा) तो धनुष के साथ ही चली गयी। वही वीरता थी कि अब कहीं से मिली है? ऐसी दुष्ट बुद्धि है, तभी तो विधाता ने तुम्हारे मुख पर कालिख लगा दी।

दोहा

देखहु रामहि नयन भरि तजि इरिषा मदु कोहु। लखन रोषु पावकु प्रबल जानि सलभ जनि होहु॥ २६६ ॥

अर्थ:

ईर्ष्या, घमंड और क्रोध छोड़कर नेत्र भरकर श्रीरामजी [की छबि] को देख लो। लक्ष्मण के क्रोध को प्रबल अग्नि जानकर उसमें पतंगे मत बनो।

दोहा 267 के अंतर्गत
चौपाई

बैनतेय बलि जिमि चह कागू। जिमि ससु चहै नाग अरि भागू॥ जिमि चह कुसल अकारन कोही। सब संपदा चहै सिवद्रोही॥ १ ॥

अर्थ:

जैसे गरुड़ का भाग कौआ चाहे, जैसे ससु का भाग नाग-शत्रु चाहे, बिना कारण क्रोध करनेवाला अपनी कुशल चाहे, शिवद्रोही सब सम्पदा चाहे।

चौपाई

लोभी लोलुप कल कीरति चहई। अकलंकता कि कामी लहई॥ हरि पद बिमुख परम गति चाहा। तस तुम्हार लालचु नरनाहा॥ २ ॥

अर्थ:

लोभी-लालची सुन्दर कीर्ति चाहे, कामी मनुष्य निष्कलंकता [चाहे तो] क्या पा सकता है? और जैसे श्रीहरि के चरणों से विमुख मनुष्य परम गति (मोक्ष) चाहे, हे राजाओ ! सीता के लिए तुम्हारा लालच भी वैसा ही व्यर्थ है।

चौपाई

कोलाहलु सुनि सीय सकानी। सखीं लवाइ गईं जहँ रानी॥ रामु सुभायँ चले गुरु पाहीं। सिय सनेहु बरनत मन माहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

कोलाहल सुनकर सीताजी शंकित हो गयीं। तब सखियाँ उन्हें वहाँ ले गयीं जहाँ रानी थीं। श्रीरामचन्द्रजी मन में सीताजी के प्रेम का बखान करते हुए स्वाभाविक चाल से गुरुजी के पास चले।

चौपाई

रानिन्ह सहित सोचबस सीया। अब धौं बिधिहि काह करनीया॥ भूप बचन सुनि इत उत तकहीं। लखनु राम डर बोलि न सकहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

रानियों सहित सीताजी [दुष्ट राजाओं के दुर्बचन सुनकर] सोच के वश हैं कि न जाने विधाता अब क्या करनेवाले हैं। राजाओं के वचन सुनकर लक्ष्मणजी इधर-उधर ताकते हैं; किन्तु श्रीरामचन्द्रजी के डर से कुछ बोल नहीं सकते।

दोहा

अरुन नयन भृकुटी कुटिल चितवत नृपन्ह सकोप। मनहुँ मत्त गजगन निरखि सिंघकिसोरहि चोप॥ २६७ ॥

अर्थ:

उनके नेत्र लाल और भौंहें टेढ़ी हो गयीं और वे क्रोध से राजाओं की ओर देखने लगे; मानो मतवाले हाथियों का झुंड देखकर सिंह के बच्चे को जोश आ गया हो।

दोहा 268 के अंतर्गत
चौपाई

खरभरु देखि बिकल पुर नारीं। सब मिलि देहिं महीपन्ह गारीं॥ तेहिं अवसर सुनि सिवधनु भंगा। आयउ भृगुकुल कमल पतंगा॥ १ ॥

अर्थ:

खलबली देखकर जनकपुर की स्त्रियाँ व्याकुल हो गयीं और सब मिलकर राजाओं को गालियाँ देने लगीं। उसी मौके पर शिवजी के धनुष का टूटना सुनकर भृगुकुलरूपी कमल के सूर्य परशुरामजी आये।

चौपाई

देखि महीप सकल सकुचाने। बाज झपट जनु लवा लुकाने॥ गौरि सरीर भूति भल भ्राजा। भाल बिसाल त्रिपुंड बिराजा॥ २ ॥

अर्थ:

इन्हें देखकर सब राजा सकुचा गये, मानो बाज के झपटने पर बटेर लुक (छिप) गये हों। गोरे शरीर पर विभूति बड़ी फब रही है और विशाल ललाट पर त्रिपुण्ड्र विशेष शोभा दे रहा है।

चौपाई

सीस जटा ससिबदनु सुहावा। रिसबस कछुक अरुन होइ आवा॥ भृकुटी कुटिल नयन रिस राते। सहजहुँ चितवत मनहुँ रिसाते॥ ३ ॥

अर्थ:

सिर पर जटा है, सुन्दर मुखचन्द्र क्रोध के कारण कुछ लाल हो आया है। भौंहें टेढ़ी और आँखें क्रोध से लाल हैं। सहज ही देखते हैं, तो भी ऐसा जान पड़ता है मानो क्रोध कर रहे हैं।

चौपाई

बृषभ कंध उर बाहु बिसाला। चारु जनेउ माल मृगछाला॥ कटि मुनिबसन तून दुइ बाँधें। धनु सर कर कुठारु कल काँधें॥ ४ ॥

अर्थ:

बैल के समान ऊँचे और पुष्ट कंधे हैं; छाती और भुजाएँ विशाल हैं। सुन्दर यज्ञोपवीत धारण किये, माला पहने और मृगचर्म लिये हैं। कमर में मुनियों का वस्त्र और दो तरकस बाँधे हैं। हाथ में धनुष-बाण और सुन्दर कंधे पर फरसा धारण किये हैं।

दोहा

सांत बेषु करनी कठिन बरनि न जाइ सरूप। धरि मुनितनु जनु बीर रसु आयउ जहँ सब भूप॥ २६८ ॥

अर्थ:

शान्त वेष है, परन्तु करनी बहुत कठिन है; स्वरूप का वर्णन नहीं किया जा सकता। मानो वीर-रस ही मुनि का शरीर धारण करके, जहाँ सब राजालोग हैं, वहाँ आ गया हो।

दोहा 269 के अंतर्गत
चौपाई

देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला॥ पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा॥ १ ॥

अर्थ:

परशुरामजी का भयानक वेष देखकर सब राजा भय से व्याकुल हो उठ खड़े हुए और पितासहित अपना नाम कह-कहकर सब दण्डवत्-प्रणाम करने लगे।

चौपाई

जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खुटानी॥ जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा॥ २ ॥

अर्थ:

परशुरामजी हित समझकर भी सहज ही जिसकी ओर देख लेते हैं, वह समझता है मानो मेरी आयु पूरी हो गयी। फिर जनकजी ने आकर सिर नवाया और सीताजी को बुलाकर प्रणाम कराया।

चौपाई

आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गईं सयानीं॥ बिस्वामित्रु मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई॥ ३ ॥

अर्थ:

सखियों ने आशीर्वाद दिया। सखियाँ हर्षित हुईं और, [वहाँ अब अधिक देर ठहरना ठीक न समझकर], वे सयानी सखियाँ उनको अपनी मण्डली में ले गयीं। फिर विश्वामित्रजी आकर मिले और उन्होंने दोनों भाइयों को उनके चरणकमलों पर झुकाया।

चौपाई

रामु लखनु दसरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा॥ रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन॥ ४ ॥

अर्थ:

[विश्वामित्रजी ने कहा--] ये राम और लक्ष्मण राजा दशरथ के पुत्र हैं। उनकी सुन्दर जोड़ी देखकर परशुरामजी ने आशीर्वाद दिया। कामदेव के भी मद को छुड़ानेवाले श्रीरामचन्द्रजी के अपार रूप को देखकर उनके नेत्र थकित (स्तम्भित) हो रहे।

दोहा

बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर। पूँछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर॥ २६९ ॥

अर्थ:

फिर सब को देखकर, जानते हुए भी अनजान की तरह जनकजी से पूछते हैं कि कहो, यह बड़ी भारी भीड़ कैसी है? उनके शरीर में क्रोध छा गया।

दोहा 270 के अंतर्गत
चौपाई

समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए॥ सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे॥ १ ॥

अर्थ:

जिस कारण सब राजा आये थे, राजा जनक ने वे सब समाचार कह सुनाये। जनक के वचन सुनकर परशुरामजी ने फिरकर दूसरी ओर देखा तो धनुष के टुकड़े पृथ्वी पर पड़े हुए दिखायी दिये।

चौपाई

अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥ बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥ २ ॥

अर्थ:

अत्यन्त क्रोध में भरकर वे कठोर वचन बोले-रे मूर्ख जनक! बता, धनुष किसने तोड़ा? उसे शीघ्र दिखा, नहीं तो अरे मूढ़! आज मैं जहाँ तक तेरा राज्य है, वहाँ तक की पृथ्वी उलट दूँगा।

चौपाई

अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥ सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥ ३ ॥

अर्थ:

राजा को अत्यन्त डर लगा, जिसके कारण वे उत्तर नहीं देते। यह देखकर कुटिल राजा मन में बड़े प्रसन्न हुए। देवता, मुनि, नाग और नगर के स्त्री-पुरुष सभी सोचने लगे; सबके हृदय में बड़ा भय है।

चौपाई

मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी॥ भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता॥ ४ ॥

अर्थ:

सीताजी की माता मन में पछता रही हैं कि हाय! विधि ने अब सँवरी बात बिगाड़ दी। परशुरामजी का स्वभाव सुनकर सीताजी को आधा निमेष भी कल्प के समान बीतने लगा।

दोहा

सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु। हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥ २७० ॥

अर्थ:

तब श्रीरघुबीर ने सब लोगों को भयभीत देखकर और सीताजी को डरी हुई जानकर बोले-- उनके हृदय में न कुछ हर्ष था, न विषाद--।