जयमाल पहनाना
धनुषभंग के बाद जनकनंदिनी सीताजी लज्जा और आनंद से भरकर श्रीरामजी के गले में जयमाल पहनाती हैं। देवता पुष्पवर्षा करते हैं और मंगलध्वनि गूंज उठती है।
बालकाण्ड · प्रकरण ५३ / ५९
प्रकरण पाठ
सोहत जनु जुग जलज सनाला। ससिहि सभीत देत जयमाला॥ गावहिं छबि अवलोकि सहेली। सियँ जयमाल राम उर मेली॥ ४ ॥
अर्थ:
[उस समय उनके हाथ ऐसे सुशोभित हो रहे हैं] मानो डंडियों सहित दो कमल चन्द्रमा को डराते हुए जयमाला दे रहे हों। इस छबि को देखकर सखियाँ गाने लगीं। तब सीताजी ने श्रीरामजी के गले में जयमाला पहना दी।
महि पाताल नाक जसु ब्यापा। राम बरी सिय भंजेउ चापा॥ करहिं आरती पुर नर नारी। देहिं निछावरि बित्त बिसारी॥ ३ ॥
अर्थ:
पृथ्वी, पाताल और स्वर्ग तीनों लोकों में यश फैल गया कि श्रीरामचन्द्रजी ने धनुष तोड़ दिया और सीताजी को वरण कर लिया। नगर के नर-नारी आरती कर रहे हैं और अपनी पूँजी भुलाकर निछावर कर रहे हैं।
सोहति सीय राम कै जोरी। छबि सिंगारु मनहुँ एक ठोरी॥ सखीं कहहिं प्रभुपद गहु सीता। करति न चरन परस अति भीता॥ ४ ॥
अर्थ:
श्रीसीता-रामजी की जोड़ी ऐसी सुशोभित हो रही है मानो सुन्दरता और श्रृंगाररस एकत्र हो गये हों। सखियाँ कह रही हैं—सीते! स्वामी के चरण छुओ; किन्तु सीताजी अत्यन्त भयभीत होकर उनके चरण नहीं छूतीं।
बलु प्रतापु बीरता बड़ाई। नाक पिनाकहि संग सिधाई॥ सोइ सूरता कि अब कहुँ पाई। असि बुधि तौ बिधि मुहँ मसि लाई॥ ४ ॥
अर्थ:
आह ! तुम्हारा बल, प्रताप, वीरता, बड़ाई और नाक (प्रतिष्ठा) तो धनुष के साथ ही चली गयी। वही वीरता थी कि अब कहीं से मिली है? ऐसी दुष्ट बुद्धि है, तभी तो विधाता ने तुम्हारे मुख पर कालिख लगा दी।
लोभी लोलुप कल कीरति चहई। अकलंकता कि कामी लहई॥ हरि पद बिमुख परम गति चाहा। तस तुम्हार लालचु नरनाहा॥ २ ॥
अर्थ:
लोभी-लालची सुन्दर कीर्ति चाहे, कामी मनुष्य निष्कलंकता [चाहे तो] क्या पा सकता है? और जैसे श्रीहरि के चरणों से विमुख मनुष्य परम गति (मोक्ष) चाहे, हे राजाओ ! सीता के लिए तुम्हारा लालच भी वैसा ही व्यर्थ है।
रानिन्ह सहित सोचबस सीया। अब धौं बिधिहि काह करनीया॥ भूप बचन सुनि इत उत तकहीं। लखनु राम डर बोलि न सकहीं॥ ४ ॥
अर्थ:
रानियों सहित सीताजी [दुष्ट राजाओं के दुर्बचन सुनकर] सोच के वश हैं कि न जाने विधाता अब क्या करनेवाले हैं। राजाओं के वचन सुनकर लक्ष्मणजी इधर-उधर ताकते हैं; किन्तु श्रीरामचन्द्रजी के डर से कुछ बोल नहीं सकते।
बृषभ कंध उर बाहु बिसाला। चारु जनेउ माल मृगछाला॥ कटि मुनिबसन तून दुइ बाँधें। धनु सर कर कुठारु कल काँधें॥ ४ ॥
अर्थ:
बैल के समान ऊँचे और पुष्ट कंधे हैं; छाती और भुजाएँ विशाल हैं। सुन्दर यज्ञोपवीत धारण किये, माला पहने और मृगचर्म लिये हैं। कमर में मुनियों का वस्त्र और दो तरकस बाँधे हैं। हाथ में धनुष-बाण और सुन्दर कंधे पर फरसा धारण किये हैं।
आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गईं सयानीं॥ बिस्वामित्रु मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई॥ ३ ॥
अर्थ:
सखियों ने आशीर्वाद दिया। सखियाँ हर्षित हुईं और, [वहाँ अब अधिक देर ठहरना ठीक न समझकर], वे सयानी सखियाँ उनको अपनी मण्डली में ले गयीं। फिर विश्वामित्रजी आकर मिले और उन्होंने दोनों भाइयों को उनके चरणकमलों पर झुकाया।
रामु लखनु दसरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा॥ रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन॥ ४ ॥
अर्थ:
[विश्वामित्रजी ने कहा--] ये राम और लक्ष्मण राजा दशरथ के पुत्र हैं। उनकी सुन्दर जोड़ी देखकर परशुरामजी ने आशीर्वाद दिया। कामदेव के भी मद को छुड़ानेवाले श्रीरामचन्द्रजी के अपार रूप को देखकर उनके नेत्र थकित (स्तम्भित) हो रहे।
अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥ सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥ ३ ॥
अर्थ:
राजा को अत्यन्त डर लगा, जिसके कारण वे उत्तर नहीं देते। यह देखकर कुटिल राजा मन में बड़े प्रसन्न हुए। देवता, मुनि, नाग और नगर के स्त्री-पुरुष सभी सोचने लगे; सबके हृदय में बड़ा भय है।