भगवान का वरदान

देवताओं की विनती सुनकर भगवान आश्वासन देते हैं कि वे रघुकुल में अवतार लेकर अधर्म का नाश करेंगे। यह वचन सुनकर सबके हृदय में शांति और आशा जाग उठती है।

बालकाण्ड · प्रकरण ३६ / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा। तुम्हहि लागि धरिहउँ नर बेसा॥ अंसन्ह सहित मनुज अवतारा। लेहउँ दिनकर बंस उदारा॥ १ ॥

अर्थ:

हे मुनि, सिद्ध और देवताओं के स्वामियो! डरो मत। तुम्हारे लिये मैं मनुष्य का रूप धारण करूँगा और उदार सूर्यवंश में अंशों सहित मनुष्य का अवतार लूँगा।

चौपाई

कस्यप अदिति महातप कीन्हा। तिन्ह कहुँ मैं पूरब बर दीन्हा॥ ते दसरथ कौसल्या रूपा। कोसलपुरीं प्रगट नरभूपा॥ २ ॥

अर्थ:

कश्यप और अदिति ने बड़ा भारी तप किया था। मैं पहले ही उनको वर दे चुका हूँ। वे ही दशरथ और कौसल्या के रूप में मनुष्यों के राजा होकर कोसलपुरी में प्रकट हुए हैं।

चौपाई

तिन्ह कें गृह अवतरिहउँ जाई। रघुकुल तिलक सो चारिउ भाई॥ नारद बचन सत्य सब करिहउँ। परम सक्ति समेत अवतरिहउँ॥ ३ ॥

अर्थ:

उन्हीं के घर जाकर मैं रघुकुल में श्रेष्ठ चार भाईयों के रूप में अवतार लूँगा। नारद के सब वचन मैं सत्य करूँगा और अपनी परम शक्ति के सहित अवतरित होऊँगा।

चौपाई

हरिहउँ सकल भूमि गरुआई। निर्भय होहु देव समुदाई॥ गगन ब्रह्मबानी सुनि काना। तुरत फिरे सुर हृदय जुड़ाना॥ ४ ॥

अर्थ:

मैं पृथ्वी का सब भार हर लूँगा। हे देवसमुदाय! तुम निर्भय हो जाओ। आकाश में ब्रह्मवाणी को कान से सुनकर देवता तुरंत लौट गये। उनका हृदय जुड़ गया।

चौपाई

तब ब्रह्माँ धरनिहि समुझावा। अभय भई भरोस जियँ आवा॥ ५ ॥

अर्थ:

तब ब्रह्माजी ने धरती को समझाया। वह भी निर्भय हुई और उसके जी में भरोसा आ गया।

दोहा

निज लोकहि बिरंचि गे देवन्ह इहइ सिखाइ। बानर तनु धरि धरि महि हरि पद सेवहु जाइ॥ १८७ ॥

अर्थ:

देवताओं को यही सिखाकर कि वानर का तन धर-धरकर तुम लोग पृथ्वी पर जाकर भगवान् के चरणों की सेवा करो, ब्रह्माजी अपने लोक को चले गये।

दोहा 188 के अंतर्गत
चौपाई

गए देव सब निज निज धामा। भूमि सहित मन कहुँ बिश्रामा॥ जो कछु आयसु ब्रह्माँ दीन्हा। हरषे देव बिलंब न कीन्हा॥ १ ॥

अर्थ:

सब देवता अपने-अपने लोक को गये। पृथ्वी सहित सब के मन को शान्ति मिली। ब्रह्माजी ने जो कुछ आज्ञा दी, उससे देवता बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने देर नहीं की।

चौपाई

बनचर देह धरी छिति माहीं। अतुलित बल प्रताप तिन्ह पाहीं॥ गिरि तरु नख आयुध सब बीरा। हरि मारग चितवहिं मतिधीरा॥ २ ॥

अर्थ:

पृथ्वी पर उन्होंने वानर देह धारण की। उनमें अतुलित बल और प्रताप था। सभी शूरवीर थे; पर्वत, वृक्ष और नख ही उनके शस्त्र थे। वे धीर बुद्धिवाले भगवान् के आने की राह देखने लगे।

चौपाई

गिरि कानन जहँ तहँ भरि पूरी। रहे निज निज अनीक रचि रूरी॥ यह सब रुचिर चरित मैं भाषा। अब सो सुनहु जो बीचहिं राखा॥ ३ ॥

अर्थ:

वे पर्वतों और जंगलों में जहाँ-तहाँ अपनी-अपनी सुन्दर सेनाएँ रचकर भर गये। यह सब रुचिर चरित्र मैंने भाषा में कहा। अब वह सुनो जो बीच में छोड़ दिया गया था।