पति के अपमान से दुःखी होकर सती का योगाग्नि से जल जाना, दक्ष यज्ञ विध्वंस
दक्ष के यज्ञ में शिवजी का अपमान देखकर सती अत्यंत व्यथित हो उठती हैं और योगाग्नि में शरीर त्याग देती हैं। इसके परिणामस्वरूप यज्ञ का विध्वंस होता है और देवसभा शोक व भय से भर उठती है।
बालकाण्ड · प्रकरण १९ / ५९
प्रकरण पाठ
जगदातमा महेसु पुरारी। जगत जनक सब के हितकारी॥ पिता मंदमति निंदत तेही। दच्छ सुक्र संभव यह देही॥ ३ ॥
अर्थ:
त्रिपुर दैत्य को मारनेवाले भगवान् महेश्वर सम्पूर्ण जगत् के आत्मा हैं, वे जगत्पिता और सब का हित करनेवाले हैं। मेरा मंदबुद्धि पिता उनकी निंदा करता है; और मेरा यह शरीर दक्ष ही के वीर्य से उत्पन्न है।
दोहा 65 के अंतर्गत