पति के अपमान से दुःखी होकर सती का योगाग्नि से जल जाना, दक्ष यज्ञ विध्वंस

दक्ष के यज्ञ में शिवजी का अपमान देखकर सती अत्यंत व्यथित हो उठती हैं और योगाग्नि में शरीर त्याग देती हैं। इसके परिणामस्वरूप यज्ञ का विध्वंस होता है और देवसभा शोक व भय से भर उठती है।

बालकाण्ड · प्रकरण १९ / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

सुनहु सभासद सकल मुनिंदा। कही सुनी जिन्ह संकर निंदा॥ सो फलु तुरत लहब सब काहूँ। भली भाँति पछिताब पिताहूँ॥ १ ॥

अर्थ:

हे सभासदो और सभी मुनीश्वरों! सुनो। जिन लोगों ने यहाँ शिवजी की निंदा की या सुनी है, उन सबको उसका फल तुरंत ही मिलेगा और मेरे पिता दक्ष भी भली भाँति पछतायेंगे।

चौपाई

संत संभु श्रीपति अपबादा। सुनिअ जहाँ तहँ असि मरजादा॥ काटिअ तासु जीभ जो बसाई। श्रवन मूदि न त चलिअ पराई॥ २ ॥

अर्थ:

जहाँ संत, शिवजी और लक्ष्मीपति विष्णुभगवान् की निंदा सुनी जाय वहाँ ऐसी मर्यादा है कि यदि अपना वश चले तो उस (निंदा करनेवाले) की जीभ काट ले और नहीं तो कान मूँदकर वहाँ से भाग जाए।

चौपाई

जगदातमा महेसु पुरारी। जगत जनक सब के हितकारी॥ पिता मंदमति निंदत तेही। दच्छ सुक्र संभव यह देही॥ ३ ॥

अर्थ:

त्रिपुर दैत्य को मारनेवाले भगवान् महेश्वर सम्पूर्ण जगत् के आत्मा हैं, वे जगत्पिता और सब का हित करनेवाले हैं। मेरा मंदबुद्धि पिता उनकी निंदा करता है; और मेरा यह शरीर दक्ष ही के वीर्य से उत्पन्न है।

चौपाई

तजिहउँ तुरत देह तेहि हेतू। उर धरि चंद्रमौलि बृषकेतू॥ अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। भयउ सकल मख हाहाकारा॥ ४ ॥

अर्थ:

इसलिए चन्द्रमौलि वृषकेतु शिवजी को हृदय में धारण करके मैं इस शरीर को तुरंत ही त्याग दूँगी। ऐसा कहकर सतीजी ने योगाग्नि में अपना शरीर भस्म कर डाला। सारी यज्ञशाला में हाहाकार मच गया।

दोहा

सती मरनु सुनि संभु गन लगे करन मख खीस। जग्य बिधंस बिलोकि भृगु रच्छा कीन्हि मुनीस॥ ६४ ॥

अर्थ:

सती का मरण सुनकर शिवजी के गण यज्ञ विध्वंस करने लगे। यज्ञ विध्वंस होते देखकर मुनीश्वर भृगुजी ने उसकी रक्षा की।

दोहा 65 के अंतर्गत
चौपाई

समाचार सब संकर पाए। बीरभद्रु करि कोप पठाए॥ जग्य बिधंस जाइ तिन्ह कीन्हा। सकल सुरन्ह बिधिवत फलु दीन्हा॥ १ ॥

अर्थ:

ये सब समाचार शिवजी को मिले, तब उन्होंने क्रोध करके वीरभद्र को भेजा। उन्होंने वहाँ जाकर यज्ञ विध्वंस कर डाला और सब देवताओं को यथोचित फल (दण्ड) दिया।

चौपाई

भै जगबिदित दच्छ गति सोई। जसि कछु संभु बिमुख कै होई॥ यह इतिहास सकल जग जानी। ताते मैं संछेप बखानी॥ २ ॥

अर्थ:

दक्ष की जगत्प्रसिद्ध वही गति हुई जो शिवद्रोही की हुआ करती है। यह इतिहास सारा संसार जानता है, इसलिये मैंने संक्षेप में वर्णन किया।