शिवजी द्वारा सती का त्याग, शिवजी की समाधि

सती के आचरण से शिवजी भीतर से विरक्त हो जाते हैं और उन्हें पत्नीभाव से स्वीकार नहीं करते। इसके बाद वे गहन समाधि में स्थित होकर जगत से मानो अलग हो जाते हैं।

बालकाण्ड · प्रकरण १७ / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

तब संकर प्रभु पद सिरु नावा। सुमिरत रामु हृदयँ अस आवा॥ एहिं तन सतिहि भेट मोहि नाहीं। सिव संकल्पु कीन्ह मन माहीं॥ १ ॥

अर्थ:

तब शिवजी ने प्रभु के चरणों में सिर नवाया और श्रीरामजी का स्मरण करते ही उनके हृदय में ऐसा आया कि इस शरीर से सती से मेरी [पति-पत्नीरूप में] भेंट नहीं हो सकती। शिवजी ने अपने मन में यह संकल्प कर लिया।

चौपाई

अस बिचारि संकरु मतिधीरा। चले भवन सुमिरत रघुबीरा॥ चलत गगन भै गिरा सुहाई। जय महेस भलि भगति दृढ़ाई॥ २ ॥

अर्थ:

ऐसा विचारकर स्थिरबुद्धि शंकरजी श्रीरघुनाथजी का स्मरण करते हुए अपने भवन (कैलास) को चले। चलते समय सुन्दर आकाशवाणी हुई कि हे महेश! आपकी जय हो। आपने भक्ति की अच्छी दृढ़ता की।

चौपाई

अस पन तुम्ह बिनु करइ को आना। रामभगत समरथ भगवाना॥ सुनि नभगिरा सती उर सोचा। पूछा सिवहि समेत सकोचा॥ ३ ॥

अर्थ:

आपके बिना दूसरा कौन ऐसी प्रतिज्ञा कर सकता है? आप श्रीरामचन्द्रजी के भक्त हैं, समर्थ हैं और भगवान हैं। इस आकाशवाणी को सुनकर सतीजी के मन में चिन्ता हुई और उन्होंने सकुचाते हुए शिवजी से पूछा--।

चौपाई

कीन्ह कवन पन कहहु कृपाला। सत्यधाम प्रभु दीनदयाला॥ जदपि सतीं पूछा बहु भाँती। तदपि न कहेउ त्रिपुर आराती॥ ४ ॥

अर्थ:

हे कृपालु ! कहिये, आपने कौन-सी प्रतिज्ञा की है ? हे प्रभो! आप सत्य के धाम और दीनदयालु हैं। यद्यपि सतीजी ने बहुत प्रकार से पूछा, परन्तु त्रिपुरारि शिवजी ने कुछ न कहा।

दोहा

सतीं हृदयँ अनुमान किय सबु जानेउ सर्बग्य। कीन्ह कपटु मैं संभु सन नारि सहज जड़ अग्य॥ ५७ (क) ॥

अर्थ:

सतीजी ने हृदय में अनुमान किया कि सर्वज्ञ शिवजी सब जान गये। मैंने शिवजी से कपट किया, स्त्री स्वभाव से ही जड़ और अज्ञानी होती हूँ।

सोरठा

जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि। बिलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुनि॥ ५७ (ख) ॥

अर्थ:

प्रीति की सुन्दर रीति देखिये कि जल भी [दूध के साथ मिलकर] दूध के समान भाव बिकता है; परन्तु फिर कपटरूपी खटाई पड़ते ही पानी अलग हो जाता है (दूध फट जाता है) और स्वाद [प्रेम] जाता रहता है।

दोहा 58 के अंतर्गत
चौपाई

हृदयँ सोचु समुझत निज करनी। चिंता अमित जाइ नहिं बरनी॥ कृपासिंधु सिव परम अगाधा। प्रगट न कहेउ मोर अपराधा॥ १ ॥

अर्थ:

अपनी करनी को याद करके सतीजी के हृदय में इतना सोच है और इतनी अपार चिन्ता है कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। [उन्होंने समझ लिया कि] शिवजी कृपा के परम अथाह सागर हैं, इससे प्रकट में उन्होंने मेरा अपराध नहीं कहा।

चौपाई

संकर रुख अवलोकि भवानी। प्रभु मोहि तजेउ हृदयँ अकुलानी॥ निज अघ समुझि न कछु कहि जाई। तपइ अवाँ इव उर अधिकाई॥ २ ॥

अर्थ:

शिवजी का रुख देखकर सतीजी ने जान लिया कि स्वामी ने मेरा त्याग कर दिया और वे हृदय में व्याकुल हो उठीं। अपना पाप समझकर कुछ कहते नहीं बनता, परन्तु हृदय [भीतर-ही-भीतर] कुम्हार के आँवे के समान अत्यन्त जलने लगा।

चौपाई

सतिहि ससोच जानि बृषकेतू। कहीं कथा सुंदर सुखहेतू॥ बरनत पंथ बिबिध इतिहासा। बिस्वनाथ पहुँचे कैलासा॥ ३ ॥

अर्थ:

वृषकेतु शिवजी ने सती को चिन्तायुक्त जानकर उन्हें सुख देने के लिये सुन्दर कथाएँ कहीं। इस प्रकार मार्ग में विविध प्रकार के इतिहासों को कहते हुए विश्वनाथ कैलास जा पहुँचे।

चौपाई

तहँ पुनि संभु समुझि पन आपन। बैठे बटतर करि कमलासन॥ संकर सहज सरूपु सम्हारा। लागि समाधि अखंड अपारा॥ ४ ॥

अर्थ:

वहाँ फिर शिवजी अपनी प्रतिज्ञा को याद करके बटतर के नीचे पद्मासन लगाकर बैठ गये। शिवजी ने अपना स्वाभाविक रूप सँभाला। उनकी अखण्ड और अपार समाधि लग गयी।

दोहा

सती बसहिं कैलास तब अधिक सोचु मन माहिं। मरमु न कोऊ जान कछु जुग सम दिवस सिराहिं॥ ५८ ॥

अर्थ:

तब सतीजी कैलास पर रहने लगीं। उनके मन में बड़ा दुःख था। इस रहस्य को कोई कुछ भी नहीं जानता था। उनका एक-एक दिन युग के समान बीत रहा था।

दोहा 59 के अंतर्गत
चौपाई

नित नव सोचु सती उर भारा। कब जैहउँ दुख सागर पारा॥ मैं जो कीन्ह रघुपति अपमाना। पुनि पतिबचनु मृषा करि जाना॥ १ ॥

अर्थ:

सतीजी के हृदय में नित्य नया और भारी सोच हो रहा था कि मैं इस दुःख-समुद्र के पार कब जाऊँगी। मैंने जो श्रीरघुनाथजी का अपमान किया और फिर पति के वचनों को झूठ जाना--।

चौपाई

सो फलु मोहि बिधाताँ दीन्हा। जो कछु उचित रहा सोइ कीन्हा॥ अब बिधि अस बूझिअ नहिं तोही। संकर बिमुख जिआवसि मोही॥ २ ॥

अर्थ:

उसका फल विधाता ने मुझको दिया, जो उचित था वही किया; परन्तु हे विधाता! अब तुझे यह उचित नहीं है कि शंकर से विमुख होने पर भी मुझे जिला रहा है।

चौपाई

कहि न जाइ कछु हृदय गलानी। मन महुँ रामहि सुमिर सयानी॥ जौं प्रभु दीनदयालु कहावा। आरति हरन बेद जसु गावा॥ ३ ॥

अर्थ:

सतीजी के हृदय की ग्लानि कुछ कही नहीं जाती। बुद्धिमती सतीजी ने मन में श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण किया और कहा-हे प्रभो! यदि आप दीनदयालु कहलाते हैं और वेदों ने आपका यह यश गाया है कि आप दुःख को हरने वाले हैं,

चौपाई

तौ मैं बिनय करउँ कर जोरी। छूटउ बेगि देह यह मोरी॥ जौं मोरें सिव चरन सनेहू। मन क्रम बचन सत्य ब्रतु एहू॥ ४ ॥

अर्थ:

तो मैं हाथ जोड़कर विनती करती हूँ कि मेरी यह देह जल्दी छूट जाय। यदि मेरा शिवजी के चरणों में प्रेम है और मेरा यह [प्रेम का] व्रत मन, वचन और कर्म से सत्य है,

दोहा

तौ सबदरसी सुनिअ प्रभु करउ सो बेगि उपाइ। होइ मरनु जेहिं बिनहिं श्रम दुसह बिपत्ति बिहाइ॥ ५९ ॥

अर्थ:

तो हे सर्वदर्शी प्रभो! सुनिये और शीघ्र वह उपाय कीजिये जिससे मेरा मरण हो और बिना ही परिश्रम यह [पति-परित्यागरूपी] असह्य विपत्ति दूर हो जाय।

दोहा 60 के अंतर्गत
चौपाई

एहि बिधि दुखित प्रजेसकुमारी। अकथनीय दारुन दुखु भारी॥ बीतें संबत सहस सतासी। तजी समाधि संभु अबिनासी॥ १ ॥

अर्थ:

दक्षसुता सतीजी इस प्रकार बहुत दुःखित थीं, उनको इतना दारुण दुःख था कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। सत्तासी हजार वर्ष बीत जानेपर अविनाशी शिवजी ने समाधि खोली।

चौपाई

राम नाम सिव सुमिरन लागे। जानेउ सतीं जगतपति जागे॥ जाइ संभु पद बंदनु कीन्हा। सनमुख संकर आसनु दीन्हा॥ २ ॥

अर्थ:

शिवजी राम नाम का स्मरण करने लगे, तब सतीजी ने जाना कि जगत् के स्वामी जागे। उन्होंने जाकर शिवजी के चरणों में प्रणाम किया। शिवजी ने उनको बैठने के लिये सामने आसन दिया।

चौपाई

लगे कहन हरिकथा रसाला। दच्छ प्रजेस भए तेहि काला॥ देखा बिधि बिचारि सब लायक। दच्छहि कीन्ह प्रजापति नायक॥ ३ ॥

अर्थ:

शिवजी भगवान् हरि की रसमयी कथाएँ कहने लगे। उसी समय दक्ष प्रजापति हुए। ब्रह्माजी ने सब प्रकार से योग्य देख-समझकर दक्ष को प्रजापतियों का नायक बना दिया।

चौपाई

बड़ अधिकार दच्छ जब पावा। अति अभिमानु हृदयँ तब आवा॥ नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

जब दक्ष ने इतना बड़ा अधिकार पाया तब उनके हृदय में अत्यन्त अभिमान आ गया। जगत् में ऐसा कोई नहीं पैदा हुआ जिसको प्रभुता पाकर मद न हो।

दोहा

दच्छ लिए मुनि बोलि सब करन लगे बड़ जाग। नेवते सादर सकल सुर जे पावत मख भाग॥ ६० ॥

अर्थ:

दक्ष ने सब मुनियों को बुला लिया और वे बड़ा यज्ञ करने लगे। जो देवता यज्ञ का भाग पाते हैं, दक्ष ने उन सबको आदरसहित निमन्त्रित किया।

दोहा 61 के अंतर्गत
चौपाई

किंनर नाग सिद्ध गंधर्बा। बधुन्ह समेत चले सुर सर्बा॥ बिष्नु बिरंचि महेसु बिहाई। चले सकल सुर जान बनाई॥ १ ॥

अर्थ:

[दक्षका निमन्त्रण पाकर] किन्नर, नाग, सिद्ध, गन्धर्व और सब देवता अपनी-अपनी स्त्रियोंसहित चले। विष्णु, ब्रह्मा और महादेवजी को छोड़कर सभी देवता अपना-अपना विमान सजाकर चले।

चौपाई

सतीं बिलोके ब्योम बिमाना। जात चले सुंदर बिधि नाना॥ सुर सुंदरी करहिं कल गाना। सुनत श्रवन छूटहिं मुनि ध्याना॥ २ ॥

अर्थ:

सतीजी ने देखा अनेकों प्रकार के सुन्दर विमान आकाश में चले जा रहे हैं। देव-सुन्दरियाँ मधुर गान कर रही हैं, जिन्हें सुनकर मुनियों का ध्यान छूट जाता है।

चौपाई

पूछेउ तब सिवँ कहेउ बखानी। पिता जग्य सुनि कछु हरषानी॥ जौं महेसु मोहि आयसु देहीं। कछु दिन जाइ रहौं मिस एहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

सतीजी ने [विमानों में देवताओं के जाने का कारण] पूछा, तब शिवजी ने सब बातें बतलायीं। पिताके यज्ञ की बात सुनकर सती कुछ प्रसन्न हुईं और सोचने लगीं कि यदि महादेवजी मुझे आज्ञा दें, तो इसी बहाने कुछ दिन पिताके घर जाकर रहूँ।

चौपाई

पति परित्याग हृदयँ दुखु भारी। कहइ न निज अपराध बिचारी॥ बोली सती मनोहर बानी। भय संकोच प्रेम रस सानी॥ ४ ॥

अर्थ:

क्योंकि उनके हृदय में पति के परित्याग का बड़ा भारी दुःख था, पर अपना अपराध समझकर वे कुछ कहती न थीं। आखिर सतीजी भय, संकोच और प्रेमरस में सनी हुई मनोहर वाणी से बोलीं--।

दोहा

पिता भवन उत्सव परम जौं प्रभु आयसु होइ। तौ मैं जाउँ कृपायतन सादर देखन सोइ॥ ६१ ॥

अर्थ:

हे प्रभो! मेरे पिताके घर बहुत बड़ा उत्सव है। यदि आपकी आज्ञा हो तो हे कृपाधाम ! मैं आदरसहित उसे देखने जाऊँ।

दोहा 62 के अंतर्गत
चौपाई

कहेहु नीक मोरेहुँ मन भावा। यह अनुचित नहिं नेवत पठावा॥ दच्छ सकल निज सुता बोलाईं। हमरें बयर तुम्हउ बिसराईं॥ १ ॥

अर्थ:

शिवजी ने कहा--तुमने बात तो अच्छी कही, यह मेरे मन को भी पसंद आयी। पर उन्होंने न्योता नहीं भेजा, यह अनुचित है। दक्ष ने अपनी सब लड़कियों को बुलाया है; किन्तु हमारे वैर के कारण उन्होंने तुमको भी भुला दिया।

चौपाई

ब्रह्मसभाँ हम सन दुखु माना। तेहि तें अजहुँ करहिं अपमाना॥ जौं बिनु बोलें जाहु भवानी। रहइ न सीलु सनेहु न कानी॥ २ ॥

अर्थ:

एक बार ब्रह्मा की सभा में हमसे अप्रसन्न हो गये थे, उसी से वे अब भी हमारा अपमान करते हैं। हे भवानी ! जो तुम बिना बुलाये जाओगी तो न शील-स्नेह ही रहेगा और न मान-मर्यादा ही रहेगी।

चौपाई

जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा। जाइअ बिनु बोलेहुँ न सँदेहा॥ तदपि बिरोध मान जहँ कोई। तहाँ गएँ कल्यानु न होई॥ ३ ॥

अर्थ:

यद्यपि इसमें सन्देह नहीं कि मित्र, स्वामी, पिता और गुरु के घर बिना बुलाये भी जाना चाहिये, तो भी जहाँ कोई विरोध मानता हो, उसके घर जाने से कल्याण नहीं होता।

चौपाई

भाँति अनेक संभु समुझावा। भावी बस न ग्यानु उर आवा॥ कह प्रभु जाहु जो बिनहिं बोलाएँ। नहिं भलि बात हमारे भाएँ॥ ४ ॥

अर्थ:

शिवजी ने बहुत प्रकार से समझाया, पर होनहारवश सती के हृदय में बोध नहीं हुआ। फिर शिवजी ने कहा कि यदि बिना बुलाये जाओगी, तो हमारी समझ में अच्छी बात न होगी।

दोहा

कहि देखा हर जतन बहु रहइ न दच्छकुमारि। दिए मुख्य गन संग तब बिदा कीन्ह त्रिपुरारि॥ ६२ ॥

अर्थ:

शिवजी ने बहुत प्रकार से कहकर देख लिया, किन्तु जब सती किसी प्रकार भी नहीं रुकीं, तब त्रिपुरारि महादेवजी ने अपने मुख्य गणों को साथ देकर उनको विदा कर दिया।