श्रीसीताराम धाम परिकर वन्दना
श्रीसीताराम, उनके धाम और उनके सेवक-परिकर को श्रद्धापूर्वक वन्दन किया गया है। यह स्मरण भक्त को प्रभु की करुणा, सान्निध्य और दिव्य लोक से जोड़ता है।
बालकाण्ड · प्रकरण १० / ५९
प्रकरण पाठ
बंदउँ अवध पुरी अति पावनि। सरजू सरि कलि कलुष नसावनि॥ प्रनवउँ पुर नर नारि बहोरी। ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी॥ १ ॥
अर्थ:
मैं अति पवित्र श्रीअयोध्यापुरी और कलियुग के पापों का नाश करनेवाली श्रीसरयू नदी की वन्दना करता हूँ। फिर अवधपुरी के उन नर-नारियों को प्रणाम करता हूँ जिन पर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी की ममता थोड़ी नहीं है (अर्थात् बहुत है)।
सिय निंदक अघ ओघ नसाए। लोक बिसोक बनाइ बसाए॥ बंदउँ कौसल्या दिसि प्राची। कीरति जासु सकल जग माची॥ २ ॥
अर्थ:
उन्होंने [अपनी पुरी में रहनेवाले] सीताजी की निन्दा करनेवाले (धोबी और उसके समर्थक पुर-नर-नारियों) के पापसमूह को नाश कर उनको शोकरहित बनाकर अपने लोक (धाम) में बसा दिया। मैं कौसल्यारूपी पूर्व दिशा की वन्दना करता हूँ, जिसकी कीर्ति समस्त संसार में फैल रही है।
प्रगटेउ जहँ रघुपति ससि चारू। बिस्व सुखद खल कमल तुसारू॥ दसरथ राउ सहित सब रानी। सुकृत सुमंगल मूरति मानी॥ करउँ प्रनाम करम मन बानी। करहु कृपा सुत सेवक जानी॥ जिन्हहि बिरचि बड़ भयउ बिधाता। महिमा अवधि राम पितु माता॥ ३-४ ॥
अर्थ:
जहाँ (कौसल्यारूपी पूर्व दिशा) से विश्व को सुख देनेवाले और दुष्टरूपी कमलों के लिये पाले के समान श्रीरामचन्द्रजीरूपी सुन्दर चन्द्रमा प्रकट हुए। सब रानियों सहित राजा दशरथजी को पुण्य और सुन्दर कल्याण की मूर्ति मानकर मैं मन, वचन और कर्म से प्रणाम करता हूँ। अपने पुत्र का सेवक जानकर वे मुझ पर कृपा करें, जिनको रचकर ब्रह्माजी ने भी बड़ाई पायी तथा जो श्रीरामजी के माता-पिता होने के कारण महिमा की सीमा हैं।
प्रनवउँ प्रथम भरत के चरना। जासु नेम ब्रत जाइ न बरना॥ राम चरन पंकज मन जासू। लुबुध मधुप इव तजइ न पासू॥ २ ॥
अर्थ:
[ भाइयों में] सबसे पहले मैं श्रीभरतजी के चरणों को प्रणाम करता हूँ, जिनका नियम और व्रत वर्णन नहीं किया जा सकता तथा जिनका मन श्रीरामजी के चरणकमलों में भौरे की तरह लुब्ध है, कभी उनका साथ नहीं छोड़ता।
सेष सहस्रसीस जग कारन। जो अवतरेउ भूमि भय टारन॥ सदा सो सानुकूल रह मो पर। कृपासिंधु सौमित्रि गुनाकर॥ ४ ॥
अर्थ:
जो हजार सिरवाले और जगत् के कारण (हजार सिरों पर जगत् को धारण कर रखनेवाले) शेषजी हैं, जिन्होंने पृथ्वी का भय दूर करने के लिये अवतार लिया, वे गुणों की खानि कृपासिंधु सौमित्रि मुझ पर सदा सानुकूल रहें।
रिपुसूदन पद कमल नमामी। सूर सुसील भरत अनुगामी॥ महाबीर बिनवउँ हनुमाना। राम जासु जस आप बखाना॥ ५ ॥
अर्थ:
मैं श्रीशत्रुघ्नजी के चरणकमलों को प्रणाम करता हूँ, जो बड़े वीर, सुशील और श्रीभरतजी के पीछे चलनेवाले हैं। मैं महावीर श्रीहनुमानजी की विनती करता हूँ, जिनके यश का श्रीरामचन्द्रजी ने स्वयं (अपने श्रीमुख से) वर्णन किया है।
कपिपति रीछ निसाचर राजा। अंगदादि जे कीस समाजा॥ बंदउँ सब के चरन सुहाए। अधम सरीर राम जिन्ह पाए॥ १ ॥
अर्थ:
वानरों के राजा सुग्रीवजी, रीछों के राजा जाम्बवानजी, राक्षसों के राजा विभीषणजी और अंगदजी आदि जितने वानरों का समाज है, सबके सुन्दर चरणों की मैं वन्दना करता हूँ, जिन्होंने अधम शरीर में भी श्रीरामचन्द्रजी को प्राप्त कर लिया।