सप्तर्षियों की परीक्षा में पार्वतीजी का महत्त्व
सप्तर्षि पार्वतीजी की निष्ठा की परीक्षा लेते हैं और विविध प्रकार से उन्हें विचलित करने का प्रयत्न करते हैं। पार्वतीजी अडिग रहकर अपने प्रेम, विवेक और महानता का परिचय देती हैं।
बालकाण्ड · प्रकरण २२ / ५९
प्रकरण पाठ
तेहि कें बचन मानि बिस्वासा। तुम्ह चाहहु पति सहज उदासा॥ निर्गुन निलज कुबेष कपाली। अकुल अगेह दिगंबर ब्याली॥ ३ ॥
अर्थ:
उनके वचनों पर विश्वास मानकर तुम ऐसा पति चाहती हो जो स्वभाव से ही उदासीन, निर्गुण, निर्लज्ज, बुरे वेष वाला, नर-कपालों की माला पहनने वाला, अकुल, बिना घर-बार का, नंगा और शरीर पर साँपों को लपेटे रखने वाला है।
सत्य कहेहु गिरिभव तनु एहा। हठ न छूट छूटै बरु देहा॥ कनकउ पुनि पषान तें होई। जारेहुँ सहजु न परिहर सोई॥ ३ ॥
अर्थ:
आपने यह सत्य ही कहा कि मेरा यह शरीर पर्वत से उत्पन्न हुआ है। इसलिए हठ नहीं छूटेगा, देह भले ही छूट जाए। सोना भी पत्थर से ही उत्पन्न होता है, सो उसे जलाए जाने पर भी वह अपने स्वभाव को नहीं छोड़ता।
मैं पा परउँ कहइ जगदंबा। तुम्ह गृह गवनहु भयउ बिलंबा॥ देखि प्रेमु बोले मुनि ग्यानी। जय जय जगदंबिके भवानी॥ ४ ॥
अर्थ:
जगदंबा पार्वतीजी ने फिर कहा कि मैं आपके पैरों पड़ती हूँ। आप अपने घर जाइये, बहुत देर हो गयी। [शिवजी में पार्वतीजी का ऐसा] प्रेम देखकर ज्ञानी मुनि बोले-- हे जगदंबिके! हे भवानी! आपकी जय हो! जय हो!!
एहि बिधि भलेहिं देवहित होई। मत अति नीक कहइ सबु कोई॥ अस्तुति सुरन्ह कीन्हि अति हेतू। प्रगटेउ बिषमबान झषकेतू॥ ४ ॥
अर्थ:
इस प्रकार से भले ही देवताओं का हित हो [और तो कोई उपाय नहीं है] सबने कहा—यह सम्मति बहुत अच्छी है। फिर देवताओं ने बड़े प्रेम से स्तुति की, तब विषम (पाँच) बाण धारण करनेवाला और मछली के चिह्नयुक्त ध्वजवाला कामदेव प्रकट हुआ।