सप्तर्षियों की परीक्षा में पार्वतीजी का महत्त्व

सप्तर्षि पार्वतीजी की निष्ठा की परीक्षा लेते हैं और विविध प्रकार से उन्हें विचलित करने का प्रयत्न करते हैं। पार्वतीजी अडिग रहकर अपने प्रेम, विवेक और महानता का परिचय देती हैं।

बालकाण्ड · प्रकरण २२ / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

रिषिन्ह गौरि देखी तहँ कैसी। मूरतिमंत तपस्या जैसी॥ बोले मुनि सुनु सैलकुमारी। करहु कवन कारन तपु भारी॥ १ ॥

अर्थ:

ऋषियों ने [वहाँ जाकर] पार्वती को कैसी देखा, मानो मूर्तिमान् तपस्या ही हो। मुनि बोले-- हे शैलकुमारी! सुनो, तुम किसलिए इतना कठोर तप कर रही हो?

चौपाई

केहि अवराधहु का तुम्ह चहहू। हम सन सत्य मरमु किन कहहू॥ कहत बचन मनु अति सकुचाई। हँसिहहु सुनि हमारि जड़ताई॥ २ ॥

अर्थ:

तुम किसकी आराधना करती हो और क्या चाहती हो? हमसे अपना सच्चा भेद क्यों नहीं कहतीं? [पार्वती ने कहा--] बात कहते मन बहुत सकुचाता है। आप लोग मेरी मूर्खता सुनकर हँसेंगे।

चौपाई

मनु हठ परा न सुनइ सिखावा। चहत बारि पर भीति उठावा॥ नारद कहा सत्य सोइ जाना। बिनु पंखन्ह हम चहहिं उड़ाना॥ ३ ॥

अर्थ:

मन ने हठ पकड़ लिया है, वह उपदेश नहीं सुनता और जल पर दीवार उठाना चाहता है। नारद ने जो कह दिया, उसे सत्य जानकर मैं बिना पंखों के उड़ना चाहती हूँ।

चौपाई

देखहु मुनि अबिबेकु हमारा। चाहिअ सदा सिवहि भरतारा॥ ४ ॥

अर्थ:

हे मुनियो! आप मेरा अज्ञान तो देखिए कि मैं सदा शिवजी को ही पति बनाना चाहती हूँ।

दोहा

सुनत बचन बिहसे रिषय गिरिसंभव तव देह। नारद कर उपदेसु सुनि कहहु बसेउ किसु गेह॥ ७८ ॥

अर्थ:

पार्वतीजी की बात सुनते ही ऋषि लोग हँस पड़े और बोले-- तुम्हारा शरीर पर्वत से ही तो उत्पन्न हुआ है! भला, कहो तो नारद के उपदेश सुनकर आज तक किसका घर बसा है?

दोहा 79 के अंतर्गत
चौपाई

दच्छसुतन्ह उपदेसेन्हि जाई। तिन्ह फिरि भवनु न देखा आई॥ चित्रकेतु कर घरु उन घाला। कनककसिपु कर पुनि अस हाला॥ १ ॥

अर्थ:

उन्होंने जाकर दक्ष के पुत्रों को उपदेश दिया था, जिससे उन्होंने फिर लौटकर घर का मुँह भी नहीं देखा। चित्रकेतु के घर को नारद ने ही चौपट किया। फिर यही हाल हिरण्यकशिपु का हुआ।

चौपाई

नारद सिख जे सुनहिं नर नारी। अवसि होहिं तजि भवनु भिखारी॥ मन कपटी तन सज्जन चीन्हा। आपु सरिस सबही चह कीन्हा॥ २ ॥

अर्थ:

जो स्त्री-पुरुष नारद की सीख सुनते हैं, वे घर-बार छोड़कर अवश्य ही भिखारी हो जाते हैं। उनका मन तो कपटी है, शरीर पर सज्जनों के चिह्न हैं। वे सभी को अपने समान बनाना चाहते हैं।

चौपाई

तेहि कें बचन मानि बिस्वासा। तुम्ह चाहहु पति सहज उदासा॥ निर्गुन निलज कुबेष कपाली। अकुल अगेह दिगंबर ब्याली॥ ३ ॥

अर्थ:

उनके वचनों पर विश्वास मानकर तुम ऐसा पति चाहती हो जो स्वभाव से ही उदासीन, निर्गुण, निर्लज्ज, बुरे वेष वाला, नर-कपालों की माला पहनने वाला, अकुल, बिना घर-बार का, नंगा और शरीर पर साँपों को लपेटे रखने वाला है।

चौपाई

कहहु कवन सुखु अस बरु पाएँ। भल भूलिहु ठग के बौराएँ॥ पंच कहें सिवँ सती बिबाही। पुनि अवडेरि मराएन्हि ताही॥ ४ ॥

अर्थ:

ऐसे वर के मिलने से कहो, तुम्हें क्या सुख होगा? तुम उस ठग (नारद) के बहकावे में आकर खूब भूलीं। पंचों के कहने से शिव ने सती से विवाह किया था, परन्तु फिर उसे त्यागकर मरवा डाला।

दोहा

अब सुख सोवत सोचु नहिं भीख मागि भव खाहिं। सहज एकाकिन्ह के भवन कबहुँ कि नारि खटाहिं॥ ७९ ॥

अर्थ:

अब शिव को कोई चिन्ता नहीं रही, भीख माँगकर खा लेते हैं और सुख से सोते हैं। ऐसे स्वभाव से ही अकेले रहने वालों के घर भला क्या कभी स्त्रियाँ टिक सकती हैं?

दोहा 80 के अंतर्गत
चौपाई

अजहूँ मानहु कहा हमारा। हम तुम्ह कहुँ बरु नीक बिचारा॥ अति सुंदर सुचि सुखद सुसीला। गावहिं बेद जासु जस लीला॥ १ ॥

अर्थ:

अब भी हमारा कहा मानो, हमने तुम्हारे लिए अच्छा वर विचारा है। वह बहुत ही सुन्दर, पवित्र, सुखदायक और सुशील है, जिसका यश और लीला वेद गाते हैं।

चौपाई

दूषन रहित सकल गुन रासी। श्रीपति पुर बैकुंठ निवासी॥ अस बरु तुम्हहि मिलाउब आनी। सुनत बिहसि कह बचन भवानी॥ २ ॥

अर्थ:

वह दोषों से रहित, सारे सद्गुणों की राशि, श्रीपति और वैकुण्ठपुरी का रहनेवाला है। हम ऐसे वर को लाकर तुमसे मिला देंगे। यह सुनते ही पार्वतीजी हँसकर बोलीं--

चौपाई

सत्य कहेहु गिरिभव तनु एहा। हठ न छूट छूटै बरु देहा॥ कनकउ पुनि पषान तें होई। जारेहुँ सहजु न परिहर सोई॥ ३ ॥

अर्थ:

आपने यह सत्य ही कहा कि मेरा यह शरीर पर्वत से उत्पन्न हुआ है। इसलिए हठ नहीं छूटेगा, देह भले ही छूट जाए। सोना भी पत्थर से ही उत्पन्न होता है, सो उसे जलाए जाने पर भी वह अपने स्वभाव को नहीं छोड़ता।

चौपाई

नारद बचन न मैं परिहरऊँ। बसउ भवनु उजरउ नहिं डरऊँ॥ गुर कें बचन प्रतीति न जेही। सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही॥ ४ ॥

अर्थ:

अतः मैं नारदजी के वचनों को नहीं छोड़ूँगी; चाहे घर बसे या उजड़े, इससे मैं नहीं डरती। जिसे गुरु के वचनों में विश्वास नहीं है, उसे सपने में भी सुख और सिद्धि सहज नहीं होती।

दोहा

महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम। जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम॥ ८० ॥

अर्थ:

माना कि महादेवजी अवगुणों के भवन हैं और विष्णु समस्त सद्गुणों के धाम हैं; पर जिसका मन जिसमें रम गया, उसको तो उसी से काम है।

दोहा 81 के अंतर्गत
चौपाई

जौं तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा। सुनतिउँ सिख तुम्हारि धरि सीसा॥ अब मैं जन्मु संभु हित हारा। को गुन दूषन करै बिचारा॥ १ ॥

अर्थ:

हे मुनीशों! यदि आप पहले मिलते, तो मैं आपका उपदेश सिर-माथे रखकर सुनती। परंतु अब तो मैं अपना जन्म शिवजी के लिए हार चुकी। फिर गुण-दोषों का विचार कौन करे?

चौपाई

जौं तुम्हरे हठ हृदयँ बिसेषी। रहि न जाइ बिनु किएँ बरेषी॥ तौ कौतुकिअन्ह आलसु नाहीं। बर कन्या अनेक जग माहीं॥ २ ॥

अर्थ:

यदि आपके हृदय में बहुत ही हठ है और विवाह की बातचीत किए बिना आपसे रहा ही नहीं जाता, तो संसार में वर-कन्याएँ बहुत हैं। खिलवाड़ करने वालों को आलस्य तो होता नहीं।

चौपाई

जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी॥ तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहिं सत बार महेसू॥ ३ ॥

अर्थ:

मेरा तो करोड़ जन्मों तक यही आग्रह रहेगा कि या तो शिवजी को वरूँगी, नहीं तो कुमारी ही रहूँगी। स्वयं शिवजी सौ बार कहें, तो भी नारदजी के उपदेश को न छोड़ूँगी।

चौपाई

मैं पा परउँ कहइ जगदंबा। तुम्ह गृह गवनहु भयउ बिलंबा॥ देखि प्रेमु बोले मुनि ग्यानी। जय जय जगदंबिके भवानी॥ ४ ॥

अर्थ:

जगदंबा पार्वतीजी ने फिर कहा कि मैं आपके पैरों पड़ती हूँ। आप अपने घर जाइये, बहुत देर हो गयी। [शिवजी में पार्वतीजी का ऐसा] प्रेम देखकर ज्ञानी मुनि बोले-- हे जगदंबिके! हे भवानी! आपकी जय हो! जय हो!!

दोहा

तुम्ह माया भगवान सिव सकल जगत पितु मातु। नाइ चरन सिर मुनि चले पुनि पुनि हरषत गातु॥ ८१ ॥

अर्थ:

आप माया हैं और शिवजी भगवान् हैं। आप दोनों समस्त जगत के माता-पिता हैं। [यह कहकर ] मुनि पार्वतीजी के चरणों में सिर नवाकर चल दिये। उनके शरीर बार-बार पुलकित हो रहे थे।

दोहा 82 के अंतर्गत
चौपाई

जाइ मुनिन्ह हिमवंतु पठाए। करि बिनती गिरजहिं गृह ल्याए॥ बहुरि सप्तरिषि सिव पहिं जाई। कथा उमा कै सकल सुनाई॥ १ ॥

अर्थ:

मुनियों ने जाकर हिमवान् को पार्वतीजी के पास भेजा और वे विनती करके उनको घर ले आये; फिर सप्तर्षियों ने शिवजी के पास जाकर उनको पार्वतीजी की सारी कथा सुनायी।

चौपाई

भए मगन सिव सुनत सनेहा। हरषि सप्तरिषि गवने गेहा॥ मनु थिर करि तब संभु सुजाना। लगे करन रघुनायक ध्याना॥ २ ॥

अर्थ:

पार्वतीजी का प्रेम सुनते ही शिवजी आनन्दमग्न हो गये। सप्तर्षि प्रसन्न होकर अपने घर (ब्रह्मलोक) को चले गये। तब सुजान शिवजी मन को स्थिर करके श्रीरघुनाथजी का ध्यान करने लगे।

चौपाई

तारकु असुर भयउ तेहि काला। भुज प्रताप बल तेज बिसाला॥ तेहिं सब लोक लोकपति जीते। भए देव सुख संपति रीते॥ ३ ॥

अर्थ:

उसी समय तारक नाम का असुर हुआ, जिसकी भुजाओं का बल, प्रताप और तेज बहुत बड़ा था। उसने सब लोक और लोकपालों को जीत लिया, सब देवता सुख और सम्पत्ति से रहित हो गये।

चौपाई

अजर अमर सो जीति न जाई। हारे सुर करि बिबिध लराई॥ तब बिरंचि सन जाइ पुकारे। देखे बिधि सब देव दुखारे॥ ४ ॥

अर्थ:

वह अजर-अमर था, इसलिए किसी से जीता नहीं जाता था। देवता उसके साथ बहुत तरह की लड़ाइयाँ लड़कर हार गये। तब उन्होंने ब्रह्माजी के पास जाकर पुकार मचायी। ब्रह्माजी ने सब देवताओं को दुःखी देखा।

दोहा

सब सन कहा बुझाइ बिधि दनुज निधन तब होइ। संभु सुक्र संभूत सुत एहि जीतइ रन सोइ॥ ८२ ॥

अर्थ:

ब्रह्माजी ने सबको समझाकर कहा-- इस दैत्य की मृत्यु तब होगी जब शिवजी के वीर्य से पुत्र उत्पन्न हो; इसको युद्ध में वही जीतेगा।

दोहा 83 के अंतर्गत
चौपाई

मोर कहा सुनि करहु उपाई। होइहि ईस्वर करिहि सहाई॥ सतीं जो तजी दच्छ मख देहा। जनमी जाइ हिमाचल गेहा॥ १ ॥

अर्थ:

मेरी बात सुनकर उपाय करो। ईश्वर सहायता करेंगे और काम हो जाएगा। सतीजी ने जो दक्ष के यज्ञ में देह का त्याग किया था, उन्होंने अब हिमाचल के घर जाकर जन्म लिया है।

चौपाई

तेहिं तपु कीन्ह संभु पति लागी। सिव समाधि बैठे सबु त्यागी॥ जदपि अहइ असमंजस भारी। तदपि बात एक सुनहु हमारी॥ २ ॥

अर्थ:

उन्होंने शिवजी को पति बनाने के लिये तप किया है, इधर शिवजी सब छोड़-छाड़कर समाधि लगा बैठे हैं। यद्यपि यह बड़ी असमंजस की बात है; तथापि मेरी एक बात सुनो।

चौपाई

पठवहु कामु जाइ सिव पाहीं। करै छोभु संकर मन माहीं॥ तब हम जाइ सिवहि सिर नाई। करवाउब बिबाहु बरिआई॥ ३ ॥

अर्थ:

तुम जाकर कामदेव को शिवजी के पास भेजो, वह शिवजी के मन में क्षोभ उत्पन्न करे (उनकी समाधि भंग करे)। तब हम जाकर शिवजी के चरणों में सिर रख देंगे और जबरदस्ती (उन्हें राजी करके) विवाह करा देंगे।

चौपाई

एहि बिधि भलेहिं देवहित होई। मत अति नीक कहइ सबु कोई॥ अस्तुति सुरन्ह कीन्हि अति हेतू। प्रगटेउ बिषमबान झषकेतू॥ ४ ॥

अर्थ:

इस प्रकार से भले ही देवताओं का हित हो [और तो कोई उपाय नहीं है] सबने कहा—यह सम्मति बहुत अच्छी है। फिर देवताओं ने बड़े प्रेम से स्तुति की, तब विषम (पाँच) बाण धारण करनेवाला और मछली के चिह्नयुक्त ध्वजवाला कामदेव प्रकट हुआ।

दोहा

सुरन्ह कही निज बिपति सब सुनि मन कीन्ह बिचार। संभु बिरोध न कुसल मोहि बिहसि कहेउ अस मार॥ ८३ ॥

अर्थ:

देवताओं ने कामदेव से अपनी सारी विपत्ति कही। सुनकर कामदेव ने मन में विचार किया और हँसकर देवताओं से यों कहा कि शिवजी के साथ विरोध करने में मेरी कुशल नहीं है।