सती का दक्ष यज्ञ में जाना

शिवजी की अनुमति न होने पर भी सती पिता दक्ष के यज्ञ में जाने का निश्चय करती हैं। यह यात्रा आगे होने वाले अत्यंत करुण और निर्णायक प्रसंग की भूमिका बनती है।

बालकाण्ड · प्रकरण १८ / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

पिता भवन जब गईं भवानी। दच्छ त्रास काहुँ न सनमानी॥ सादर भलेहिं मिली एक माता। भगिनीं मिलीं बहुत मुसुकाता॥ १ ॥

अर्थ:

भवानी जब पिता (दक्ष) के घर पहुँचीं, तब दक्ष के डर के मारे किसी ने उनकी आवभगत नहीं की, केवल एक माता भली ही आदर से मिली। बहिनें बहुत मुसकराती हुई मिलीं।

चौपाई

दच्छ न कछु पूछी कुसलाता। सतिहि बिलोकि जरे सब गाता॥ सतीं जाइ देखेउ तब जागा। कतहुँ न दीख संभु कर भागा॥ २ ॥

अर्थ:

दक्ष ने तो उनकी कुछ कुशल तक नहीं पूछी, सतीजी को देखकर उलटे उनके सारे अंग जल उठे। तब सती ने जाकर यज्ञ देखा तो वहाँ कहीं शिवजी का भाग दिखायी नहीं दिया।

चौपाई

तब चित चढ़ेउ जो संकर कहेऊ। प्रभु अपमानु समुझि उर दहेऊ॥ पाछिल दुखु न हृदयँ अस ब्यापा। जस यह भयउ महा परितापा॥ ३ ॥

अर्थ:

तब शिवजी ने जो कहा था वह उनकी समझ में आया। स्वामी का अपमान समझकर सती का हृदय जल उठा। पिछला दुःख उनके हृदय में उतना नहीं व्यापा था, जितना महान् दुःख इस समय हुआ।

चौपाई

जद्यपि जग दारुन दुख नाना। सब तें कठिन जाति अवमाना॥ समुझि सो सतिहि भयउ अति क्रोधा। बहु बिधि जननीं कीन्ह प्रबोधा॥ ४ ॥

अर्थ:

यद्यपि जगत् में अनेक प्रकार के दारुण दुःख हैं, तथापि जाति-अपमान सबसे बढ़कर कठिन है। यह समझकर सतीजी को बड़ा क्रोध हो आया। माता ने उन्हें बहुत प्रकार से समझाया-बुझाया।

दोहा

सिव अपमानु न जाइ सहि हृदयँ न होइ प्रबोध। सकल सभहि हठि हटकि तब बोलीं बचन सक्रोध॥ ६३ ॥

अर्थ:

परन्तु उनसे शिवजी का अपमान सहा नहीं गया, इससे उनके हृदय में कुछ भी प्रबोध नहीं हुआ। तब वे सारी सभा को हठपूर्वक डाँटकर क्रोधभरे वचन बोलीं--।