देवताओं का शिवजी से ब्याह के लिये प्रार्थना करना, सप्तर्षियों का पार्वती के पास जाना
देवता शिवजी से पार्वतीजी के साथ ब्याह करने की प्रार्थना करते हैं। उधर सप्तर्षि पार्वती के पास जाकर शुभ समाचार और विवाह की दिशा में आगे की व्यवस्था करते हैं।
बालकाण्ड · प्रकरण २५ / ५९
प्रकरण पाठ
सुनि बिधि बिनय समुझि प्रभु बानी। ऐसेइ होउ कहा सुखु मानी॥ तब देवन्ह दुंदुभीं बजाईं। बरषि सुमन जय जय सुर साईं॥ ३ ॥
अर्थ:
ब्रह्माजीकी प्रार्थना सुनकर और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके वचनोंको याद करके शिवजीने प्रसन्नतापूर्वक कहा--'ऐसा ही हो।' तब देवताओंने नगाड़े बजाये और फूलोंकी वर्षा करके “जय हो! देवताओंके स्वामीकी जय हो!” ऐसा कहने लगे।
सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा। जटा मुकुट अहि मौरु सँवारा॥ कुंडल कंकन पहिरे ब्याला। तन बिभूति पट केहरि छाला॥ १ ॥
अर्थ:
शिवजी के गण शिवजी का श्रृंगार करने लगे। जटाओं का मुकुट बनाकर उस पर साँपों का मौर सजाया गया। शिवजी ने साँपों के ही कुण्डल और कंकण पहने, शरीर पर विभूति रमायी और वस्त्र की जगह बाघम्बर लपेट लिया।
कर त्रिसूल अरु डमरु बिराजा। चले बसहँ चढ़ि बाजहिं बाजा॥ देखि सिवहि सुरत्रिय मुसुकाहीं। बर लायक दुलहिनि जग नाहीं॥ ३ ॥
अर्थ:
एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में डमरू सुशोभित है। शिवजी बैल पर चढ़कर चले। बाजे बज रहे हैं। शिवजी को देखकर देवाङ्गनाएँ मुसकरा रही हैं [और कहती हैं कि] इस वर के योग्य दुलहिन जग में नहीं मिलेगी।