देवताओं का शिवजी से ब्याह के लिये प्रार्थना करना, सप्तर्षियों का पार्वती के पास जाना

देवता शिवजी से पार्वतीजी के साथ ब्याह करने की प्रार्थना करते हैं। उधर सप्तर्षि पार्वती के पास जाकर शुभ समाचार और विवाह की दिशा में आगे की व्यवस्था करते हैं।

बालकाण्ड · प्रकरण २५ / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

सब सुर बिष्नु बिरंचि समेता। गए जहाँ सिव कृपानिकेता॥ पृथक पृथक तिन्ह कीन्हि प्रसंसा। भए प्रसन्न चंद्र अवतंसा॥ ३ ॥

अर्थ:

फिर वहाँसे विष्णु और ब्रह्मासहित सब देवता वहाँ गये जहाँ कृपाके धाम शिवजी थे। उन सबने शिवजीकी अलग-अलग स्तुति की, तब शशिभूषण शिवजी प्रसन्न हो गये।

चौपाई

बोले कृपासिंधु बृषकेतू। कहहु अमर आए केहि हेतू॥ कह बिधि तुम्ह प्रभु अंतरजामी। तदपि भगति बस बिनवउँ स्वामी॥ ४ ॥

अर्थ:

कृपाके समुद्र शिवजी बोले--हे देवताओ ! कहिये, आप किसलिये आये हैं ? ब्रह्माजीने कहा-- हे प्रभो! आप अन्तर्यामी हैं, तथापि हे स्वामी! भक्तिवश मैं आपसे विनती करता हूँ।

दोहा

सकल सुरन्ह के हृदयँ अस संकर परम उछाहु। निज नयनन्हि देखा चहहिं नाथ तुम्हार बिबाहु॥ ८८ ॥

अर्थ:

हे शंकर! सब देवताओंके मनमें ऐसा परम उत्साह है कि हे नाथ! वे अपनी आँखोंसे आपका विवाह देखना चाहते हैं।

दोहा 89 के अंतर्गत
चौपाई

यह उत्सव देखिअ भरि लोचन। सोइ कछु करहु मदन मद मोचन॥ कामु जारि रति कहुँ बरु दीन्हा। कृपासिंधु यह अति भल कीन्हा॥ १ ॥

अर्थ:

हे कामदेवके मदको चूर करनेवाले! आप ऐसा कुछ कीजिये जिससे सब लोग इस उत्सवको नेत्र भरकर देखें। हे कृपाके सागर! कामदेवको भस्म करके आपने रतिको जो वरदान दिया सो बहुत ही अच्छा किया।

चौपाई

सासति करि पुनि करहिं पसाऊ। नाथ प्रभुन्ह कर सहज सुभाऊ॥ पारबतीं तपु कीन्ह अपारा। करहु तासु अब अंगीकारा॥ २ ॥

अर्थ:

हे नाथ! श्रेष्ठ स्वामियोंका यह सहज स्वभाव ही है कि वे पहले दण्ड देकर फिर कृपा किया करते हैं। पार्वतीने अपार तप किया है, अब उन्हें अंगीकार कीजिये।

चौपाई

सुनि बिधि बिनय समुझि प्रभु बानी। ऐसेइ होउ कहा सुखु मानी॥ तब देवन्ह दुंदुभीं बजाईं। बरषि सुमन जय जय सुर साईं॥ ३ ॥

अर्थ:

ब्रह्माजीकी प्रार्थना सुनकर और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके वचनोंको याद करके शिवजीने प्रसन्नतापूर्वक कहा--'ऐसा ही हो।' तब देवताओंने नगाड़े बजाये और फूलोंकी वर्षा करके “जय हो! देवताओंके स्वामीकी जय हो!” ऐसा कहने लगे।

चौपाई

अवसरु जानि सप्तरिषि आए। तुरतहिं बिधि गिरिभवन पठाए॥ प्रथम गए जहँ रहीं भवानी। बोले मधुर बचन छल सानी॥ ४ ॥

अर्थ:

उचित अवसर जानकर सप्तर्षि आये और ब्रह्माजीने तुरंत ही उन्हें हिमाचलके घर भेज दिया। वे पहले वहाँ गये जहाँ पार्वतीजी थीं और उनसे छलसे भरे मीठे (विनोदयुक्त, आनन्द पहुँचानेवाले) वचन बोले--।

दोहा

कहा हमार न सुनेहु तब नारद कें उपदेस। अब भा झूठ तुम्हार पन जारेउ कामु महेस॥ ८९ ॥

अर्थ:

नारदजीके उपदेशसे तुमने उस समय हमारी बात नहीं सुनी। अब तो तुम्हारा प्रण झूठा हो गया, क्‍योंकि महादेवजीने कामको ही भस्म कर डाला।

दोहा 90 के अंतर्गत
चौपाई

सुनि बोलीं मुसुकाइ भवानी। उचित कहेहु मुनिबर बिग्यानी॥ तुम्हरें जान कामु अब जारा। अब लगि संभु रहे सबिकारा॥ १ ॥

अर्थ:

यह सुनकर पार्वतीजी मुसकराकर बोलीं--हे विज्ञानी मुनिवरो ! आपने उचित ही कहा। आपकी समझमें शिवजीने कामदेवको अब जलाया है, अबतक तो वे विकार्युक्त (कामी) ही रहे !।

चौपाई

हमरें जान सदा सिव जोगी। अज अनवद्य अकाम अभोगी॥ जौं मैं सिव सेये अस जानी। प्रीति समेत कर्म मन बानी॥ २ ॥

अर्थ:

किन्तु हमारी समझसे तो शिवजी सदासे ही योगी, अजन्मा, अनिन्द्य, कामरहित और भोगहीन हैं और यदि मैंने शिवजीको ऐसा समझकर ही मन, वचन और कर्मसे प्रेमसहित उनकी सेवा की है--।

चौपाई

तौ हमार पन सुनहु मुनीसा। करिहहिं सत्य कृपानिधि ईसा॥ तुम्ह जो कहा हर जारेउ मारा। सोइ अति बड़ अबिबेकु तुम्हारा॥ ३ ॥

अर्थ:

तो हे मुनीश्वरो! सुनिये, वे कृपानिधान भगवान् मेरी प्रतिज्ञाको सत्य करेंगे। आपने जो यह कहा कि शिवजीने कामदेवको भस्म कर दिया, यही आपका बड़ा भारी अविवेक है।

चौपाई

तात अनल कर सहज सुभाऊ। हिम तेहि निकट जाइ नहिं काऊ॥ गएँ समीप सो अवसि नसाई। असि मन्मथ महेस की नाई॥ ४ ॥

अर्थ:

हे तात! अग्रिका तो यह सहज स्वभाव ही है कि पाला उसके समीप कभी जा ही नहीं सकता और जानेपर वह अवश्य नष्ट हो जायगा। महादेवजी और कामदेवके सम्बन्धमें भी यही न्याय (बात) समझना चाहिये।

दोहा

हियँ हरषे मुनि बचन सुनि देखि प्रीति बिस्वास। चले भवानिहि नाइ सिर गए हिमाचल पास॥ ९० ॥

अर्थ:

पार्वतीके वचन सुनकर और उनका प्रेम तथा विश्वास देखकर मुनि हृदयमें बड़े प्रसन्न हुए। वे भवानीको सिर नवाकर चल दिये और हिमाचलके पास पहुँचे।

दोहा 91 के अंतर्गत
चौपाई

सबु प्रसंगु गिरिपतिहि सुनावा। मदन दहन सुनि अति दुखु पावा॥ बहुरि कहेउ रति कर बरदाना। सुनि हिमवंत बहुत सुखु माना॥ १ ॥

अर्थ:

उन्होंने पर्वतराज हिमाचल को सब हाल सुनाया। कामदेव का भस्म होना सुनकर हिमाचल बहुत दुखी हुए। फिर मुनियों ने रति के वरदान की बात कही, उसे सुनकर हिमवान् ने बहुत सुख माना।

चौपाई

हृदयँ बिचारि संभु प्रभुताई। सादर मुनिबर लिए बोलाई॥ सुदिनु सुनखतु सुघरी सोचाई। बेगि बेदबिधि लगन धराई॥ २ ॥

अर्थ:

शिवजी के प्रभाव को मन में विचारकर हिमाचल ने श्रेष्ठ मुनियों को आदरपूर्वक बुला लिया और उनसे शुभ दिन, शुभ नक्षत्र और शुभ घड़ी सोचवाकर वेद की विधि के अनुसार शीघ्र ही लग्न धराई।

चौपाई

पत्री सप्तरिषिन्ह सोइ दीन्ही। गहि पद बिनय हिमाचल कीन्ही॥ जाइ बिधिहि दीन्हि सो पाती। बाचत प्रीति न हृदयँ समाती॥ ३ ॥

अर्थ:

फिर हिमाचल ने वह लग्नपत्रिका सप्तर्षियों को दे दी और चरण पकड़कर उनकी विनती की। उन्होंने जाकर वह लग्नपत्रिका ब्रह्माजी को दी। उसको पढ़ते समय उनके हृदय में प्रेम समाता न था।

चौपाई

लगन बाचि अज सबहि सुनाई। हरषे मुनि सब सुर समुदाई॥ सुमन बृष्टि नभ बाजन बाजे। मंगल कलस दसहुँ दिसि साजे॥ ४ ॥

अर्थ:

ब्रह्माजी ने लग्न पढ़कर सबको सुनाया, उसे सुनकर सब मुनि और देवताओं का सारा समाज हर्षित हो गया। आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी, बाजे बजने लगे और दसों दिशाओं में मंगल कलश सजा दिये गये।

दोहा

लगे सँवारन सकल सुर बाहन बिबिध बिमान। होहिं सगुन मंगल सुभद करहिं अपछरा गान॥ ९१ ॥

अर्थ:

सब देवता अपने भाँति-भाँति के वाहन और विमान सजाने लगे, कल्याणप्रद मंगल शकुन होने लगे और अप्सराएँ गाने लगीं।

दोहा 92 के अंतर्गत
चौपाई

सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा। जटा मुकुट अहि मौरु सँवारा॥ कुंडल कंकन पहिरे ब्याला। तन बिभूति पट केहरि छाला॥ १ ॥

अर्थ:

शिवजी के गण शिवजी का श्रृंगार करने लगे। जटाओं का मुकुट बनाकर उस पर साँपों का मौर सजाया गया। शिवजी ने साँपों के ही कुण्डल और कंकण पहने, शरीर पर विभूति रमायी और वस्त्र की जगह बाघम्बर लपेट लिया।

चौपाई

ससि ललाट सुंदर सिर गंगा। नयन तीनि उपबीत भुजंगा॥ गरल कंठ उर नर सिर माला। असिव बेष सिवधाम कृपाला॥ २ ॥

अर्थ:

शिवजी के सुन्दर मस्तक पर चन्द्रमा, सिर पर गंगा, तीन नेत्र, साँपों का जनेऊ, गले में विष और छाती पर नरमुंडों की माला थी। इस प्रकार उनका वेष अशुभ होने पर भी वे कल्याण के धाम और कृपालु हैं।

चौपाई

कर त्रिसूल अरु डमरु बिराजा। चले बसहँ चढ़ि बाजहिं बाजा॥ देखि सिवहि सुरत्रिय मुसुकाहीं। बर लायक दुलहिनि जग नाहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में डमरू सुशोभित है। शिवजी बैल पर चढ़कर चले। बाजे बज रहे हैं। शिवजी को देखकर देवाङ्गनाएँ मुसकरा रही हैं [और कहती हैं कि] इस वर के योग्य दुलहिन जग में नहीं मिलेगी।

चौपाई

बिष्नु बिरंचि आदि सुरब्राता। चढ़ि चढ़ि बाहन चले बराता॥ सुर समाज सब भाँति अनूपा। नहिं बरात दूलह अनुरूपा॥ ४ ॥

अर्थ:

विष्णु और ब्रह्मा आदि देवताओं के समूह अपने-अपने वाहनों पर चढ़कर बरात में चले। देवताओं का समाज सब प्रकार से अनुपम था, पर दूल्हे के योग्य बरात न थी।

दोहा

बिष्नु कहा अस बिहसि तब बोलि सकल दिसिराज। बिलग बिलग होइ चलहु सब निज निज सहित समाज॥ ९२ ॥

अर्थ:

तब विष्णुभगवान् ने सब दिक्पालों को बुलाकर हँसकर ऐसा कहा—सब लोग अपने-अपने दल समेत अलग-अलग होकर चलो।

दोहा 93 के अंतर्गत
चौपाई

बर अनुहारि बरात न भाई। हँसी करैहहु पर पुर जाई॥ बिष्नु बचन सुनि सुर मुसुकाने। निज निज सेन सहित बिलगाने॥ १ ॥

अर्थ:

हे भाई! हमारी यह बरात वर के योग्य नहीं है। क्या पराये नगर में जाकर हँसी कराओगे? विष्णु भगवान् की बात सुनकर देवता मुसकराये और वे अपनी-अपनी सेना सहित अलग हो गये।

चौपाई

मनहीं मन महेसु मुसुकाहीं। हरि के बिंग्य बचन नहिं जाहीं॥ अति प्रिय बचन सुनत प्रिय केरे। भृंगिहि प्रेरि सकल गन टेरे॥ २ ॥

अर्थ:

महादेवजी [यह देखकर] मन-ही-मन मुसकराते हैं कि हरि के व्यंग्य-वचन नहीं जाते। अपने प्रिय के अति प्रिय वचनों को सुनकर शिवजी ने भृंगी को प्रेरित कर अपने सब गणों को बुला लिया।

चौपाई

सिव अनुसासन सुनि सब आए। प्रभु पद जलज सीस तिन्ह नाए॥ नाना बाहन नाना बेषा। बिहसे सिव समाज निज देखा॥ ३ ॥

अर्थ:

शिवजी की आज्ञा सुनते ही सब चले आये और उन्होंने स्वामी के चरणकमलों में सिर नवाया। तरह-तरह की सवारियों और तरह-तरह के वेष वाले अपने समाज को देखकर शिवजी हँसे।