वाल्मीकि, वेद, ब्रह्मा, देवता, शिव, पार्वती आदि की वन्दना

वाल्मीकि, वेद, ब्रह्मा, देवता, शिव और पार्वती सहित समस्त पूज्य शक्तियों को नमन किया गया है। इस वन्दना से रामकथा को दिव्य परम्परा और आशीर्वाद से जोड़ा गया है।

बालकाण्ड · प्रकरण ९ / ५९

प्रकरण पाठ

सोरठा

बंदउँ मुनि पद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ। सखर सुकोमल मंजु दोष रहित दूषन सहित॥ १४ (घ) ॥

अर्थ:

मैं उन वाल्मीकि मुनि के चरणकमलों की वन्दना करता हूँ, जिन्होंने रामायण की रचना की है, जो खर (राक्षस) सहित होने पर भी खर (कठोर) से विपरीत बड़ी कोमल और सुन्दर है तथा जो दूषण (राक्षस) सहित होने पर भी दूषण अर्थात् दोष से रहित है।

सोरठा

बंदउँ चारिउ बेद भव बारिधि बोहित सरिस। जिन्हहि न सपनेहुँ खेद बरनत रघुबर बिसद जसु॥ १४ (ङ) ॥

अर्थ:

मैं चारों वेदों की वन्दना करता हूँ, जो संसारसमुद्र के पार होने के लिये जहाज के समान हैं तथा जिन्हें श्रीरघुनाथजी का निर्मल यश वर्णन करते स्वप्न में भी खेद (थकावट) नहीं होता।

सोरठा

बंदउँ बिधि पद रेनु भव सागर जेहिं कीन्ह जहँ। संत सुधा ससि धेनु प्रगटे खल बिष बारुनी॥ १४ (च) ॥

अर्थ:

मैं ब्रह्मजी के चरण-रज की वन्दना करता हूँ जिन्होंने भवसागर बनाया है जहाँ से एक ओर संतरूपी अमृत, चन्द्रमा और कामधेनु निकले और दूसरी ओर दुष्ट मनुष्यरूपी विष और मदिरा उत्पन्न हुए।

दोहा

बिबुध बिप्र बुध ग्रह चरन बंदि कहउँ कर जोरि। होइ प्रसन्न पुरवहु सकल मंजु मनोरथ मोरि॥ १४ (छ) ॥

अर्थ:

देवता, ब्राह्मण, पण्डित, ग्रह--इन सब के चरणों की वन्दना करके हाथ जोड़कर कहता हूँ कि आप प्रसन्न होकर मेरे सारे सुन्दर मनोरथों को पूरा करें।

दोहा 15 के अंतर्गत
चौपाई

पुनि बंदउँ सारद सुरसरिता। जुगल पुनीत मनोहर चरिता॥ मज्जन पान पाप हर एका। कहत सुनत एक हर अबिबेका॥ १ ॥

अर्थ:

फिर मैं सरस्वतीजी और सरिता (गंगा) की वन्दना करता हूँ। दोनों पवित्र और मनोहर चरित्रवाली हैं। एक (गंगा जी) स्नान करने और जल पीने से पापों को हरती हैं और दूसरी (सरस्वतीजी) गुण और यश कहने और सुनने से अज्ञान का नाश कर देती हैं।

चौपाई

गुर पितु मातु महेस भवानी। प्रनवउँ दीनबंधु दिन दानी॥ सेवक स्वामि सखा सिय पी के। हित निरुपधि सब बिधि तुलसी के॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीमहेश और पार्वती को मैं प्रणाम करता हूँ, जो मेरे गुरु, पिता और माता हैं, जो दीनबन्धु और नित्य दान करनेवाले हैं, जो सीतापति श्रीरामचन्द्रजी के सेवक, स्वामी और सखा हैं तथा मुझ तुलसीदास का सब प्रकार से कपटरहित (सच्चा) हित करनेवाले हैं।

चौपाई

कलि बिलोकि जग हित हर गिरिजा। साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा॥ अनमिल आखर अरथ न जापू। प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू॥ ३ ॥

अर्थ:

जिन शिव-पार्वती ने कलियुग को देखकर, जगत् के हित के लिये, शाबर मन्त्रसमूह की रचना की, जिन मन्त्रों के अक्षर बेमेल हैं, जिनका न कोई ठीक अर्थ होता है और न जप ही होता है, तथापि श्रीशिवजी के प्रताप से जिनका प्रभाव प्रत्यक्ष है।

चौपाई

सो उमेस मोहि पर अनुकूला। करिहिं कथा मुद मंगल मूला॥ सुमिरि सिवा सिव पाइ पसाऊ। बरनउँ रामचरित चित चाऊ॥ ४ ॥

अर्थ:

वे उमापति शिवजी मुझ पर प्रसन्न होकर [श्रीरामजी की] इस कथा को आनन्द और मंगल की मूल बनायेंगे। इस प्रकार पार्वतीजी और शिवजी दोनों का स्मरण करके और उनका प्रसाद पाकर मैं चाव भरे चित्त से श्रीरामचरित्र का वर्णन करता हूँ।

चौपाई

भनिति मोरि सिव कृपाँ बिभाती। ससि समाज मिलि मनहुँ सुराती॥ जे एहि कथहि सनेह समेता। कहिहहिं सुनिहहिं समुझि सचेता॥ होइहहिं राम चरन अनुरागी। कलि मल रहित सुमंगल भागी॥ ५-६ ॥

अर्थ:

मेरी कविता श्रीशिवजी की कृपा से ऐसी सुशोभित होगी, जैसी तारागणों के सहित चन्द्रमा के साथ रात्रि शोभित होती है। जो इस कथा को प्रेमसहित एवं सावधानी के साथ समझ-बूझकर कहेंगे-सुनेंगे, वे कलियुग के पापों से रहित और सुन्दर कल्याण के भागी होकर श्रीरामचन्द्रजी के चरणों के प्रेमी बन जायेंगे।

दोहा

सपनेहुँ साचेहुँ मोहि पर जौं हर गौरि पसाउ। तौ फुर होउ जो कहेउँ सब भाषा भनिति प्रभाउ॥ १५ ॥

अर्थ:

यदि मुझ पर श्रीशिवजी और पार्वतीजी की स्वप्न में भी सचमुच प्रसन्नता हो, तो मैंने इस भाषा, कविता का जो प्रभाव कहा है, वह सब सच हो।