रति को वरदान

रति के विलाप पर उसे आश्वासन और वरदान मिलता है कि कामदेव का कल्याण होगा। इस करुण प्रसंग में ईश्वर की दया और भविष्य की सांत्वना एक साथ प्रकट होती है।

बालकाण्ड · प्रकरण २४ / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

हाहाकार भयउ जग भारी। डरपे सुर भए असुर सुखारी॥ समुझि कामसुखु सोचहिं भोगी। भए अकंटक साधक जोगी॥ ४ ॥

अर्थ:

जगत् में बड़ा हाहाकार मच गया। देवता डर गये, असुर सुखी हुए। भोगी लोग कामसुख को सोचकर चिन्ता करने लगे और साधक योगी निष्कंटक हो गये।

छन्द

जोगी अकंटक भए पति गति सुनत रति मुरुछित भई। रोदति बदति बहु भाँति करुना करति संकर पहिं गई॥ अति प्रेम करि बिनती बिबिध बिधि जोरि कर सन्मुख रही। प्रभु आसुतोष कृपाल सिव अबला निरखि बोले सही॥

अर्थ:

योगी निष्कंटक हो गये, पतिकी यह दशा सुनते ही रति मूर्च्छित हो गयी। रोती-बिलखती और अनेक प्रकार से करुणा करती हुई वह शंकर के पास गयी। अत्यन्त प्रेम से अनेक प्रकार की विनती करके हाथ जोड़कर सामने खड़ी रही। प्रभु आशुतोष कृपालु शिव अबला को देखकर बोले—

दोहा

अब तें रति तव नाथ कर होइहि नामु अनंगु। बिनु बपु ब्यापिहि सबहि पुनि सुनु निज मिलन प्रसंगु॥ ८७ ॥

अर्थ:

अब से रति, तेरे स्वामी का नाम अनंग होगा। बिना शरीर के वह सब में व्याप्त होगा। अब अपने पति से मिलने के प्रसंग को सुन।

दोहा 88 के अंतर्गत
चौपाई

जब जदुबंस कृष्न अवतारा। होइहि हरन महा महिभारा॥ कृष्न तनय होइहि पति तोरा। बचनु अन्यथा होइ न मोरा॥ १ ॥

अर्थ:

जब यदुवंश में कृष्ण अवतार लेंगे और पृथ्वी के बड़े भारी भार को हर लेंगे, तब तेरा पति उनके पुत्र के रूप में उत्पन्न होगा। मेरा वचन अन्यथा नहीं होगा।

चौपाई

रति गवनी सुनि संकर बानी। कथा अपर अब कहउँ बखानी॥ देवन्ह समाचार सब पाए। ब्रह्मादिक बैकुंठ सिधाए॥ २ ॥

अर्थ:

शिवजी के वचन सुनकर रति चली गयी। अब दूसरी कथा कहता हूँ। देवताओं ने यह सब समाचार पाए, तो ब्रह्मादि वैकुण्ठ चले गये।