रति को वरदान
रति के विलाप पर उसे आश्वासन और वरदान मिलता है कि कामदेव का कल्याण होगा। इस करुण प्रसंग में ईश्वर की दया और भविष्य की सांत्वना एक साथ प्रकट होती है।
बालकाण्ड · प्रकरण २४ / ५९
प्रकरण पाठ
जोगी अकंटक भए पति गति सुनत रति मुरुछित भई। रोदति बदति बहु भाँति करुना करति संकर पहिं गई॥ अति प्रेम करि बिनती बिबिध बिधि जोरि कर सन्मुख रही। प्रभु आसुतोष कृपाल सिव अबला निरखि बोले सही॥
अर्थ:
योगी निष्कंटक हो गये, पतिकी यह दशा सुनते ही रति मूर्च्छित हो गयी। रोती-बिलखती और अनेक प्रकार से करुणा करती हुई वह शंकर के पास गयी। अत्यन्त प्रेम से अनेक प्रकार की विनती करके हाथ जोड़कर सामने खड़ी रही। प्रभु आशुतोष कृपालु शिव अबला को देखकर बोले—
दोहा 88 के अंतर्गत