श्रीसीताजी का पार्वती पूजन एवं वरदानप्राप्ति तथा राम-लक्ष्मण संवाद
सीताजी पार्वतीजी का पूजन कर मनोवांछित वर की प्रार्थना करती हैं और उन्हें मंगलमय आश्वासन मिलता है। उधर राम और लक्ष्मण के बीच जनकपुर और स्वयंवर को लेकर सुंदर संवाद होता है।
बालकाण्ड · प्रकरण ४६ / ५९
प्रकरण पाठ
सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायनी पुरारि पिआरी॥ देबि पूजि पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे॥ १ ॥
अर्थ:
हे [भक्तों को मुँहमाँगा] वर देनेवाली! हे त्रिपुर के शत्रु शिवजी की प्रिय पत्नी! आपकी सेवा करने से चारों फल सुलभ हो जाते हैं। हे देवि! आपके चरणकमलों की पूजा करके देवता, मनुष्य और मुनि सभी सुखी हो जाते हैं।
बिनय प्रेम बस भई भवानी। खसी माल मूरति मुसुकानी॥ सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ। बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ॥ ३ ॥
अर्थ:
गिरिजाजी सीताजी के विनय और प्रेम के वश में हो गयीं। उन (के गले) की माला खिसक पड़ी और मूर्ति मुसकरायी। सीताजी ने आदरपूर्वक उस प्रसाद (माला) को सिर पर धारण किया। गौरीजी का हृदय हर्ष से भर गया और वे बोलीं—
सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी॥ नारद बचन सदा सुचि साचा। सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा॥ ४ ॥
अर्थ:
हे सीता! हमारी सच्ची आसीस सुनो, तुम्हारी मनःकामना पूरी होगी। नारदजी का वचन सदा पवित्र (संशय, भ्रम आदि दोषों से रहित) और सत्य है। जिसमें तुम्हारा मन अनुरक्त हो गया है, वही वर तुमको मिलेगा।
मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो। करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो॥ एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली। तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली॥
अर्थ:
जिसमें तुम्हारा मन अनुरक्त हो गया है, वही स्वभाव से ही सुन्दर साँवला वर (श्रीरामचन्द्रजी) तुमको मिलेगा। वह दयाका खजाना और सुजान (सर्वज्ञ) है, तुम्हारा शील और स्नेह जानता है। इस प्रकार श्रीगौरीजी का आशीर्वाद सुनकर जानकीजी समेत हृदय में हर्षित हुईं। तुलसीदासजी कहते हैं—भवानीजी को बार-बार पूजकर सीताजी प्रसन्न मन से राजमहल को लौट चलीं।
जनमु सिंधु पुनि बंधु बिषु दिन मलीन सकलंक। सिय मुख समता पाव किमि चंदु बापुरो रंक॥ २३७ ॥
अर्थ:
खारे समुद्र में तो इसका जन्म, फिर [उसी समुद्र से उत्पन्न होने के कारण] विष इसका भाई; दिन में यह मलिन (शोभाहीन, निस्तेज) रहता है, और कलंकित (काले दाग से युक्त) है। बेचारा गरीब चन्द्रमा सीताजी के मुख की बराबरी कैसे पा सकता है?
घटइ बढ़इ बिरहिनि दुखदाई। ग्रसइ राहु निज संधिहिं पाई॥ कोक सोकप्रद पंकज द्रोही। अवगुन बहुत चंद्रमा तोही॥ १ ॥
अर्थ:
फिर यह घटता-बढ़ता है और विरहिणी स्त्रियों को दुःख देनेवाला है; राहु अपनी सन्धि में पाकर इसे ग्रस लेता है। चकवे को [चकवी के वियोग का] शोक देनेवाला और कमल का वैरी (उसे मुरझा देनेवाला) है। हे चन्द्रमा! तुझमें बहुत-से अवगुण हैं [जो सीताजी में नहीं हैं]।
बैदेही मुख पटतर दीन्हे। होइ दोषु बड़ अनुचित कीन्हे॥ सिय मुखछबि बिधु ब्याज बखानी। गुर पहिं चले निसा बड़ि जानी॥ २ ॥
अर्थ:
अतः जानकीजी के मुख की उपमा देने में बड़ा अनुचित कर्म करने का दोष लगेगा। इस प्रकार चन्द्रमा के बहाने सीताजी के मुख की छवि का वर्णन करके, बड़ी रात हो गयी जानकर, वे गुरुजी के पास चले।
रबि निज उदय ब्याज रघुराया। प्रभु प्रतापु सब नृपन्ह दिखाया॥ तव भुज बल महिमा उदघाटी। प्रगटी धनु बिघटन परिपाटी॥ ३ ॥
अर्थ:
हे रघुनाथजी। सूर्य ने अपने उदय के बहाने सब राजाओं को प्रभु (आप) का प्रताप दिखलाया है। आपकी भुजाओं के बल की महिमाको उद्घाटित करने (खोलकर दिखाने) के लिये ही धनुष तोड़नेकी यह पद्धति प्रकट हुई है।
बंधु बचन सुनि प्रभु मुसुकाने। होइ सुचि सहज पुनीत नहाने॥ नित्यक्रिया करि गुरु पहिं आए। चरन सरोज सुभग सिर नाए॥ ४ ॥
अर्थ:
भाई के वचन सुनकर प्रभु मुसकराये। फिर स्वभाव से ही पवित्र श्रीरामजी ने शौच से निवृत्त होकर स्नान किया और नित्यकर्म करके वे गुरुजी के पास आये। आकर उन्होंने गुरुजी के सुन्दर चरणकमलों में सिर नवाया।