श्रीराम-लक्ष्मण सहित विश्वामित्र का यज्ञशाला में प्रवेश
विश्वामित्र श्रीराम और लक्ष्मण को साथ लेकर यज्ञशाला की विशाल सभा में प्रवेश करते हैं। वहाँ एकत्र राजाओं, मुनियों और जनसमूह की दृष्टि उन पर ठहर जाती है।
बालकाण्ड · प्रकरण ४७ / ५९
प्रकरण पाठ
बिदुषन्ह प्रभु बिराटमय दीसा। बहु मुख कर पग लोचन सीसा॥ जनक जाति अवलोकहिं कैसें। सजन सगे प्रिय लागहिं जैसें॥ १ ॥
अर्थ:
विद्वानों को प्रभु विराट् रूप में दिखायी दिये, जिसके बहुत-से मुँह, हाथ, पैर, नेत्र और सिर हैं। जनक जाति वाले प्रभु को किस तरह प्रिय रूप में देखते हैं, जैसे सगे सजन प्रिय लगते हैं।
उर अनुभवति न कहि सक सोऊ। कवन प्रकार कहै कबि कोऊ॥ एहि बिधि रहा जाहि जस भाऊ। तेहिं तस देखेउ कोसलराऊ॥ ४ ॥
अर्थ:
उस (स्नेह और सुख) का वे हृदय में अनुभव कर रही हैं, पर वे भी उसे कह नहीं सकतीं। फिर कोई कवि उसे किस प्रकार कह सकता है। इस प्रकार जिसका जैसा भाव था, उसने कोसलाधीश श्रीरामचन्द्रजी को वैसा ही देखा।
सहज मनोहर मूरति दोऊ। कोटि काम उपमा लघु सोऊ॥ सरद चंद निंदक मुख नीके। नीरज नयन भावते जी के॥ १ ॥
अर्थ:
दोनों मूर्तियाँ स्वभाव से ही (बिना किसी बनाव-श्रृंगार के) मन को हरनेवाली हैं। करोड़ों कामदेवों की उपमा भी उनके लिये तुच्छ है। उनके सुन्दर मुख शरद पूर्णिमा के चन्द्रमा की भी निन्दा करनेवाले हैं और कमल के समान नेत्र मन को बहुत ही भाते हैं।
चितवनि चारु मार मनु हरनी। भावति हृदय जाति नहिं बरनी॥ कल कपोल श्रुति कुंडल लोला। चिबुक अधर सुंदर मृदु बोला॥ २ ॥
अर्थ:
सुन्दर चितवन [सारे संसार के मन को हरनेवाली] कामदेव के भी मन को हरनेवाली है। वह हृदय को बहुत ही प्यारी लगती है, पर उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। सुन्दर गाल हैं, कानों में चञ्चल कुण्डल हैं। ठोड़ी और अधर (ओठ) सुन्दर हैं, कोमल वाणी है।
कुमुदबंधु कर निंदक हाँसा। भृकुटी बिकट मनोहर नासा॥ भाल बिसाल तिलक झलकाहीं। कच बिलोकि अलि अवलि लजाहीं॥ ३ ॥
अर्थ:
हँसी चन्द्रमा की किरणों का तिरस्कार करनेवाली है। भौंहें टेढ़ी और नासिका मनोहर है। [ऊँचे] चौड़े ललाट पर तिलक झलक रहे हैं (दीप्तिमान् हो रहे हैं)। [काले घुँघराले] बालों को देखकर भौंरों की पंक्तियाँ भी लजा जाती हैं।
पीत चौतनीं सिरन्हि सुहाईं। कुसुम कलीं बिच बीच बनाईं॥ रेखें रुचिर कंबु कल गीवाँ। जनु त्रिभुवन सुषमा की सीवाँ॥ ४ ॥
अर्थ:
पीली चौकोनी टोपियाँ सिरों पर सुशोभित हैं, जिनके बीच-बीच में फूलों की कलियाँ बनायी हुई हैं। शंख के समान सुन्दर (गोल) गले में मनोहर तीन रेखाएँ हैं, जो मानो तीनों लोकों की सुन्दरताकी सीमा [को बता रही] हैं।
कटि तूनीर पीत पट बाँधें। कर सर धनुष बाम बर काँधें॥ पीत जग्य उपबीत सुहाए। नख सिख मंजु महाछबि छाए॥ १ ॥
अर्थ:
कमर में तरकस और पीताम्बर बाँधे हैं। [दाहिने] हाथों में बाण और बायें सुन्दर कंधों पर धनुष तथा पीले यज्ञोपवीत (जनेऊ) सुशोभित हैं। नख से लेकर शिखा तक सब अंग सुन्दर हैं, उन पर महान् शोभा छायी हुई है।
निज निज रुख रामहि सबु देखा। कोउ न जान कछु मरमु बिसेषा॥ भलि रचना मुनि नृप सन कहेऊ। राजाँ मुदित महासुख लहेऊ॥ ४ ॥
अर्थ:
सबने रामजी को अपनी-अपनी ओर ही मुख किये हुए देखा; परन्तु इसका कुछ भी विशेष रहस्य कोई नहीं जान सका। मुनि ने राजा से कहा--रंगभूमि की रचना बड़ी सुन्दर है। [विश्वामित्र-जैसे निःस्पृह, विरक्त और ज्ञानी मुनि से रचना की प्रशंसा सुनकर] राजा प्रसन्न हुए और उन्हें बड़ा सुख मिला।
प्रभुहि देखि सब नृप हियँ हारे। जनु राकेस उदय भएँ तारे॥ असि प्रतीति सब के मन माहीं। राम चाप तोरब सक नाहीं॥ १ ॥
अर्थ:
प्रभु को देखकर सब राजा हृदय में ऐसे हार गये (निराश एवं उत्साहहीन हो गये) जैसे पूर्ण चन्द्रमा के उदय होने पर तारे प्रकाशहीन हो जाते हैं। [उनके तेज को देखकर] सबके मन में ऐसा विश्वास हो गया कि रामचन्द्रजी ही धनुष को तोड़ेंगे, इसमें सन्देह नहीं।
बिनु भंजेहुँ भव धनुषु बिसाला। मेलिहि सीय राम उर माला॥ अस बिचारि गवनहु घर भाई। जसु प्रतापु बलु तेजु गवाँई॥ २ ॥
अर्थ:
[इधर उनके रूप को देखकर सबके मन में यह निश्चय हो गया कि] शिवजी के विशाल धनुष को [जो सम्भव है न टूट सके] बिना तोड़े भी सीताजी श्रीरामचन्द्रजी के ही गले में जयमाल डालेंगी (अर्थात् दोनों तरह से ही हमारी हार होगी और विजय श्रीरामचन्द्रजी के हाथ रहेगी)। [यों सोचकर वे कहने लगे--] हे भाई! ऐसा विचारकर यश, प्रताप, बल और तेज गँवाकर अपने-अपने घर चलो।
बिहसे अपर भूप सुनि बानी। जे अबिबेक अंध अभिमानी॥ तोरेहुँ धनुषु ब्याहु अवगाहा। बिनु तोरें को कुअँरि बिआहा॥ ३ ॥
अर्थ:
दूसरे राजा, जो अविवेक से अंधे हो रहे थे और अभिमानी थे, यह बात सुनकर बहुत हँसे। [उन्होंने कहा--] धनुष तोड़ने पर भी विवाह होना कठिन है (अर्थात् सहज ही में हम जानकी को हाथ से जाने नहीं देंगे), फिर बिना तोड़े तो राजकुमारी को ब्याह ही कौन सकता है।
सीय बिआहबि राम गरब दूरि करि नृपन्ह के। जीति को सक संग्राम दसरथ के रन बाँकुरे॥ २४५ ॥
अर्थ:
[उन्होंने कहा--] राजाओं के गर्व दूर करके (जो धनुष किसी से नहीं टूट सकेगा उसे तोड़कर) श्रीरामचन्द्रजी सीताजी को ब्याहेंगे। [रही युद्ध की बात, सो] महाराज दशरथ के रण में बाँके पुत्रों को युद्ध में जीत ही कौन सकता है।
ब्यर्थ मरहु जनि गाल बजाई। मन मोदकन्हि कि भूख बुताई॥ सिख हमारि सुनि परम पुनीता। जगदंबा जानहु जियँ सीता॥ १ ॥
अर्थ:
गाल बजाकर व्यर्थ ही मत मरो। मन के लड्डुओं से भी कहीं भूख बुझती है? हमारी परम पवित्र (निष्कपट) सीख को सुनकर सीताजी को अपने जी में साक्षात् जगज्जननी समझो (उन्हें पत्नीरूप में पाने की आशा एवं लालसा छोड़ दो)।
जगत पिता रघुपतिहि बिचारी। भरि लोचन छबि लेहु निहारी॥ सुंदर सुखद सकल गुन रासी। ए दोउ बंधु संभु उर बासी॥ २ ॥
अर्थ:
और श्रीरघुनाथजी को जगत् का पिता (परमेश्वर) विचारकर, नेत्र भरकर उनकी छबि देख लो [ऐसा अवसर बार-बार नहीं मिलेगा]। सुन्दर, सुख देनेवाले और समस्त गुणों की राशि ये दोनों भाई शिवजी के हृदय में बसनेवाले हैं (स्वयं शिवजी भी जिन्हें सदा हृदय में छिपाये रखते हैं, वे तुम्हारे नेत्रों के सामने आ गये हैं)।
सुधा समुद्र समीप बिहाई। मृगजलु निरखि मरहु कत धाई॥ करहु जाइ जा कहुँ जोइ भावा। हम तौ आजु जनम फलु पावा॥ ३ ॥
अर्थ:
समीप आये हुए (भगवद्-दर्शनरूप) अमृत के समुद्र को छोड़कर तुम [जगज्जननी जानकी को पत्नीरूप में पाने की दुराशारूप मिथ्या] मृगजल को देखकर दौड़कर क्यों मरते हो? फिर [भाई! ] जिसको जो अच्छा लगे वही जाकर करो। हमने तो [श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन करके] आज जन्म लेने का फल पा लिया (जीवन और जन्म को सफल कर लिया)।
अस कहि भले भूप अनुरागे। रूप अनूप बिलोकन लागे॥ देखहिं सुर नभ चढ़े बिमाना। बरषहिं सुमन करहिं कल गाना॥ ४ ॥
अर्थ:
ऐसा कहकर अच्छे राजा प्रेममग्न होकर श्रीरामजी का अनुपम रूप देखने लगे। [मनुष्यों की तो बात ही क्या] देवता लोग भी आकाश से विमानों पर चढ़े हुए दर्शन कर रहे हैं और सुन्दर गान करते हुए फूल बरसा रहे हैं।
सिय सोभा नहिं जाइ बखानी। जगदंबिका रूप गुन खानी॥ उपमा सकल मोहि लघु लागीं। प्राकृत नारि अंग अनुरागीं॥ १ ॥
अर्थ:
रूप और गुणों की खान जगज्जननी जानकीजी की शोभा का वर्णन नहीं हो सकता। उनके लिये मुझे [काव्य की] सब उपमाएँ तुच्छ लगती हैं; क्योंकि वे लौकिक स्त्रियों के अंगों से अनुराग रखनेवाली हैं (अर्थात् वे जगत् की स्त्रियों के अंगों से ली जाती हैं)। [काव्य की उपमाएँ सब त्रिगुणात्मक, मायिक जगत् से ली गयी हैं, उन्हें भगवान् की स्वरूपाशक्ति श्रीजानकीजी के अप्राकृत, चिन्मय अंगों के लिये प्रयुक्त करना उनका अपमान करना और अपने को उपहासास्पद बनाना है]।
सिय बरनिअ तेइ उपमा देई। कुकबि कहाइ अजसु को लेई॥ जौं पटतरिअ तीय सम सीया। जग असि जुबति कहाँ कमनीया॥ २ ॥
अर्थ:
सीताजी के वर्णन में उन्हीं उपमाओं को देकर कौन कुकवि कहलाये और अपयश का भागी बने (अर्थात् सीताजी के लिये उन उपमाओं का प्रयोग करना सुकवि के पद से च्युत होना और अपकीर्ति मोल लेना है, कोई भी सुकवि ऐसी नादानी एवं अनुचित कार्य नहीं करेगा)। यदि किसी स्त्री के साथ सीताजी की तुलना की जाय तो जगत् में ऐसी सुन्दर युवती है ही कहाँ [जिसकी उपमा उन्हें दी जाय]।
गिरा मुखर तन अरध भवानी। रति अति दुखित अतनु पति जानी॥ बिष बारुनी बंधु प्रिय जेही। कहिअ रमासम किमि बैदेही॥ ३ ॥
अर्थ:
[पृथ्वी की स्त्रियों की तो बात ही क्या, देवताओं की स्त्रियों को भी यदि देखा जाय तो हमारी अपेक्षा कहीं अधिक दिव्य और सुन्दर हैं, तो उनमें] सरस्वती तो बहुत बोलनेवाली हैं; पार्वती अर्द्धांगिनी हैं (अर्थात् अर्द्ध-नारीनटेश्वर के रूप में उनका आधा ही अंग स्त्री का है, शेष आधा अंग पुरुष--शिवजी का है), कामदेव की स्त्री रति पतिको बिना शरीर का (अनंग) जानकर बहुत दुखी रहती है और जिनके विष और बारुनी-जैसे [समुद्र से उत्पन्न होने के नाते] प्रिय भाई हैं, उन लक्ष्मी के समान तो जानकीजी को कहा ही कैसे जाय।
जौं छबि सुधा पयोनिधि होई। परम रूपमय कच्छपु सोई॥ सोभा रजु मंदरु सिंगारू। मथै पानि पंकज निज मारू॥ ४ ॥
अर्थ:
[जिन लक्ष्मीजी की बात ऊपर कही गयी है वे निकली थीं खारे समुद्र से, जिसको मथने के लिये भगवान् ने अति कर्कश पीठवाले कच्छप का रूप धारण किया, रस्सी बनायी गयी महान् विषधर वासुकि नाग की, मथानी का कार्य किया अतिशय कठोर मन्दराचल पर्वत ने और उसे मथा सारे देवताओं और दैत्यों ने मिलकर। जिन लक्ष्मी को अतिशय शोभा की खान और अनुपम सुन्दरी कहते हैं, उनको प्रकट करने में हेतु बने ये सब असुन्दर एवं स्वाभाविक ही कठोर उपकरण। ऐसे उपकरणों से प्रकट हुई लक्ष्मी श्रीजानकीजी की समता को कैसे पा सकती हैं। हाँ, इसके विपरीत] यदि छबिरूपी अमृत का समुद्र हो, परम रूपमय कच्छप हो, शोभारूप रस्सी हो, श्रृंगार [रस] पर्वत हो और [उस छबि के समुद्र को] स्वयं कामदेव अपने ही करकमल से मथे,