राजाओं से धनुष न उठना, जनक की निराशाजनक वाणी

अनेक बलवान राजा प्रयास करने पर भी शिवधनुष को हिला तक नहीं पाते। इससे जनकजी खिन्न होकर ऐसी वाणी कहते हैं, जिसे सुनकर सभा स्तब्ध रह जाती है।

बालकाण्ड · प्रकरण ५० / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

सुनि पन सकल भूप अभिलाषे। भटमानी अतिसय मन माखे॥ परिकर बाँधि उठे अकुलाई। चले इष्टदेवन्ह सिर नाई॥ ३ ॥

अर्थ:

प्रण सुनकर सभी राजा लालायित हो उठे। जो वीरता के अभिमानी थे, वे मन में बहुत ही तमतमा उठे। कमर कसकर अकुलाते हुए उठे और अपने-अपने इष्टदेवों को सिर नवाकर चले।

चौपाई

तमकि ताकि तकि सिवधनु धरहीं। उठइ न कोटि भाँति बलु करहीं॥ जिन्ह के कछु बिचारु मन माहीं। चाप समीप महीप न जाहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

वे तमककर धनुष की ओर देखते हैं और फिर उसे पकड़ते हैं, करोड़ों प्रकार से बल लगाते हैं, पर वह उठता नहीं। जिन राजाओं के मन में कुछ विचार है, वे धनुष के पास ही नहीं जाते।

दोहा

तमकि धरहिं धनु मूढ़ नृप उठइ न चलहिं लजाइ। मनहुँ पाइ भट बाहुबलु अधिकु अधिकु गरुआइ॥ २५० ॥

अर्थ:

वे मूढ़ राजा तमककर धनुष को पकड़ते हैं, परन्तु जब नहीं उठता तो लजाकर चले जाते हैं, मानो वीरों के बाहुबल को पाकर वह धनुष अधिक-अधिक गरुआता जाता हो।

दोहा 251 के अंतर्गत
चौपाई

भूप सहस दस एकहि बारा। लगे उठावन टरइ न टारा॥ डगइ न संभु सरासनु कैसें। कामी बचन सती मनु जैसें॥ १ ॥

अर्थ:

तब दस हजार राजा एक ही बार धनुष उठाने लगे, तो भी वह टलता नहीं। शिवजी का वह सरासन कैसे नहीं डिगता था, जैसे कामी पुरुष के वचनों से सती का मन कभी नहीं चलता।

चौपाई

सब नृप भए जोगु उपहासी। जैसें बिनु बिराग संन्यासी॥ कीरति बिजय बीरता भारी। चले चाप कर बरबस हारी॥ २ ॥

अर्थ:

सब राजा उपहास के योग्य हो गये। जैसे वैराग्य के बिना संन्यासी उपहास के योग्य हो जाता है। कीर्ति, विजय, बड़ी वीरता—इन सबको वे धनुष के हाथों बरबस हारकर चले गये।

चौपाई

श्रीहत भए हारि हियँ राजा। बैठे निज निज जाइ समाजा॥ नृपन्ह बिलोकि जनकु अकुलाने। बोले बचन रोष जनु साने॥ ३ ॥

अर्थ:

राजालोग हृदय से हारकर श्रीहीन हो गये और अपने-अपने समाज में जाकर बैठ गये। राजाओं को देखकर जनक अकुला उठे और ऐसे वचन बोले जो मानो क्रोध में सने हुए थे।

चौपाई

दीप दीप के भूपति नाना। आए सुनि हम जो पनु ठाना॥ देव दनुज धरि मनुज सरीरा। बिपुल बीर आए रनधीरा॥ ४ ॥

अर्थ:

मैंने जो प्रण ठाना था, उसे सुनकर द्वीप-द्वीप के अनेक राजा आये। देवता और दैत्य भी मनुष्य का शरीर धारण करके आये तथा बहुत-से रणधीर वीर आये।

दोहा

कुअँरि मनोहर बिजय बड़ि कीरति अति कमनीय। पावनिहार बिरंचि जनु रचेउ न धनु दमनीय॥ २५१ ॥

अर्थ:

कन्या, सुंदर विजय, बड़ी कीर्ति और अत्यन्त मनोहरता—यह सब पानेवाला मानो ब्रह्मा ने ही धनुष न रचा हो, जो दमाया जा सके।

दोहा 252 के अंतर्गत
चौपाई

कहहु काहि यहु लाभु न भावा। काहुँ न संकर चाप चढ़ावा॥ रहउ चढ़ाउब तोरब भाई। तिलु भरि भूमि न सके छड़ाई॥ १ ॥

अर्थ:

कहिए, यह लाभ किसको अच्छा नहीं लगता। किसी ने भी शंकरजी का धनुष नहीं चढ़ाया। उसे चढ़ाना और तोड़ना तो दूर रहा; तिल भर भूमि भी कोई छुड़ा न सका।

चौपाई

अब जनि कोउ माखै भट मानी। बीर बिहीन मही मैं जानी॥ तजहु आस निज निज गृह जाहू। लिखा न बिधि बैदेहि बिबाहू॥ २ ॥

अर्थ:

अब कोई वीरता का अभिमानी नाराज़ न हो। मैंने जान लिया है कि पृथ्वी वीरों से खाली हो गई है। अब आशा छोड़कर अपने-अपने घर जाओ; विधि ने बैदेही के विवाह का लेख नहीं लिखा।

चौपाई

सुकृतु जाइ जौं पनु परिहरऊँ। कुअँरि कुआरि रहउ का करऊँ॥ जौं जनतेउँ बिनु भट भुबि भाई। तौ पनु करि होतेउँ न हँसाई॥ ३ ॥

अर्थ:

यदि प्रण छोड़ दूँ तो पुण्य चला जाएगा; इसलिए क्या करूँ, कन्या कुँआरी ही रहे। यदि मैं जानता कि पृथ्वी वीरों से शून्य है, तो प्रण करके उपहास का पात्र न बनता।