सती का भ्रम, श्रीरामजी का ऐश्वर्य और सती का खेद

सती, श्रीरामजी के मानवरूप को देखकर उनके परम ऐश्वर्य पर संशय करती हैं और परीक्षा लेने का प्रयास करती हैं। प्रभु की दिव्यता प्रकट होते ही उन्हें अपनी भूल का गहरा खेद होता है।

बालकाण्ड · प्रकरण १६ / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

संभु समय तेहि रामहि देखा। उपजा हियँ अति हरषु बिसेषा॥ भरि लोचन छबिसिंधु निहारी। कुसमय जानि न कीन्हि चिन्हारी॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीशिवजी ने उसी अवसर पर श्रीरामजी को देखा और उनके हृदय में बहुत भारी आनन्द उत्पन्न हुआ। उन शोभाके समुद्र (श्रीरामचन्द्रजी) को शिवजी ने नेत्र भरकर देखा, परन्तु अवसर ठीक न जानकर परिचय नहीं किया।

चौपाई

जय सच्चिदानंद जग पावन। अस कहि चलेउ मनोज नसावन॥ चले जात सिव सती समेता। पुनि पुनि पुलकत कृपानिकेता॥ २ ॥

अर्थ:

जगत् के पवित्र करनेवाले सच्चिदानन्द की जय हो, इस प्रकार कहकर कामदेव का नाश करनेवाले श्रीशिवजी चल पड़े। कृपानिकेत शिवजी बार-बार आनन्द से पुलकित होते हुए सतीजी के साथ चले जा रहे थे।

चौपाई

सतीं सो दसा संभु कै देखी। उर उपजा संदेहु बिसेषी॥ संकरु जगतबंद्य जगदीसा। सुर नर मुनि सब नावत सीसा॥ ३ ॥

अर्थ:

सतीजी ने शंकरजी की वह दशा देखी तो उनके मन में बड़ा सन्देह उत्पन्न हो गया। [वे मन-ही-मन कहने लगीं कि] शंकरजी की सारा जगत् वन्दना करता है, वे जगत् के ईश्वर हैं; देवता, मनुष्य, मुनि सब उनके प्रति सिर नवाते हैं।

चौपाई

तिन्ह नृपसुतहि कीन्ह परनामा। कहि सच्चिदानंद परधामा॥ भए मगन छबि तासु बिलोकी। अजहुँ प्रीति उर रहति न रोकी॥ ४ ॥

अर्थ:

उन्होंने एक राजपुत्र को सच्चिदानन्द परमधाम कहकर प्रणाम किया और उसकी शोभा देखकर वे इतने प्रेममग्न हो गये कि अब तक उनके हृदय में प्रीति रोकने से भी नहीं रुकती।

दोहा

ब्रह्म जो ब्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद। सो कि देह धरि होइ नर जाहि न जानत बेद॥ ५० ॥

अर्थ:

जो ब्रह्म सर्वव्यापक, बिरज, अज, अकल, अनीह और अभेद है, और जिसे वेद भी नहीं जानते, क्या वह देह धारण करके मनुष्य हो सकता है?

दोहा 51 के अंतर्गत
चौपाई

बिष्नु जो सुर हित नरतनु धारी। सोउ सर्बग्य जथा त्रिपुरारी॥ खोजइ सो कि अग्य इव नारी। ग्यानधाम श्रीपति असुरारी॥ १ ॥

अर्थ:

देवताओं के हित के लिये मनुष्यशरीर धारण करनेवाले जो विष्णुभगवान् हैं, वे भी शिवजी की ही भाँति सर्वज्ञ हैं। वे ज्ञान के भण्डार, लक्ष्मीपति और असुरों के शत्रु भगवान् विष्णु क्या अज्ञानी की तरह स्त्री को खोजेंगे?

चौपाई

संभुगिरा पुनि मृषा न होई। सिव सर्बग्य जान सबु कोई॥ अस संसय मन भयउ अपारा। होइ न हृदयँ प्रबोध प्रचारा॥ २ ॥

अर्थ:

फिर शिवजी के वचन भी झूठे नहीं हो सकते। सब कोई जानते हैं कि शिवजी सर्वज्ञ हैं। सती के मन में इस प्रकार का अपार सन्देह उठ खड़ा हुआ, किसी तरह भी उनके हृदय में ज्ञान का प्रादुर्भाव नहीं होता था।

चौपाई

जद्यपि प्रगट न कहेउ भवानी। हर अंतरजामी सब जानी॥ सुनहि सती तव नारि सुभाऊ। संसय अस न धरिअ उर काऊ॥ ३ ॥

अर्थ:

यद्यपि भवानीजी ने प्रकट कुछ नहीं कहा, पर अन्तर्यामी शिवजी सब जान गये। वे बोले-- हे सती! सुनो, तुम्हारा स्त्रीस्वभाव है। ऐसा सन्देह मन में कभी न रखना चाहिये।

चौपाई

जासु कथा कुंभज रिषि गाई। भगति जासु मैं मुनिहि सुनाई॥ सोइ मम इष्टदेव रघुबीरा। सेवत जाहि सदा मुनि धीरा॥ ४ ॥

अर्थ:

जिनकी कथा का अगस्त्य ऋषि ने गान किया और जिनकी भक्ति मैंने मुनि को सुनायी, ये वही मेरे इष्टदेव श्रीरघुवीरजी हैं, जिनकी सेवा ज्ञानी मुनि सदा किया करते हैं।

छन्द

मुनि धीर जोगी सिद्ध संतत बिमल मन जेहि ध्यावहीं। कहि नेति निगम पुरान आगम जासु कीरति गावहीं॥ सोइ रामु ब्यापक ब्रह्म भुवन निकाय पति माया धनी। अवतरेउ अपने भगत हित निजतंत्र नित रघुकुलमनी॥

अर्थ:

ज्ञानी मुनि, योगी और सिद्ध निरन्तर निर्मल चित्त से जिनका ध्यान करते हैं तथा वेद, पुराण और शास्त्र “नेति-नेति” कहकर जिनकी कीर्ति गाते हैं, उन्हीं सर्वव्यापक, समस्त ब्रह्माण्डों के स्वामी, मायापति, नित्य परम स्वतन्त्र ब्रह्मरूप भगवान् श्रीरामजी ने अपने भक्तों के हित के लिये [अपनी इच्छासे] रघुकुल के मणिरूप में अवतार लिया है।

सोरठा

लाग न उर उपदेसु जदपि कहेउ सिवँ बार बहु। बोले बिहसि महेसु हरिमाया बलु जानि जियँ॥ ५१ ॥

अर्थ:

यद्यपि शिवजी ने बहुत बार समझाया, फिर भी सतीजी के हृदय में उनका उपदेश नहीं बैठा। तब महादेवजी मन में भगवान् की मायाका बल जानकर मुसकराते हुए बोले--

दोहा 52 के अंतर्गत
चौपाई

जौं तुम्हरें मन अति संदेहू। तौ किन जाइ परीछा लेहू॥ तब लगि बैठ अहउँ बटछाहीं। जब लगि तुम्ह ऐहहु मोहि पाहीं॥ १ ॥

अर्थ:

जो तुम्हारे मन में बहुत सन्देह है तो तुम जाकर परीक्षा क्यों नहीं लेती? जब तक तुम मेरे पास लौट आओगी तब तक मैं इसी बटछाहीं में बैठा हूँ।

चौपाई

जैसें जाइ मोह भ्रम भारी। करेहु सो जतनु बिबेक बिचारी॥ चलीं सती सिव आयसु पाई। करहिं बिचारु करौं का भाई॥ २ ॥

अर्थ:

जिस प्रकार तुम्हारा यह अज्ञानजनित भारी भ्रम दूर हो, [भलीभाँति] विवेक के द्वारा सोच-समझकर तुम वही करना। शिवजी की आज्ञा पाकर सती चलीं और मन में सोचने लगीं कि भाई ! क्या करूँ (कैसे परीक्षा लूँ) ?।

चौपाई

इहाँ संभु अस मन अनुमाना। दच्छसुता कहुँ नहिं कल्याना॥ मोरेहु कहें न संसय जाहीं। बिधि बिपरीत भलाई नाहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

इधर शिवजी ने मन में ऐसा अनुमान किया कि दक्षसुता का कल्याण नहीं है। मेरे कहने से भी सन्देह दूर नहीं होते, [मालूम होता है] विधि विपरीत है, भलाई नहीं है।

चौपाई

होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥ अस कहि लगे जपन हरिनामा। गईं सती जहँ प्रभु सुखधामा॥ ४ ॥

अर्थ:

जो कुछ राम ने रच रखा है, वही होगा। तर्क करके कौन शाखा (विस्तार) बढ़ावे। [मन में] ऐसा कहकर शिवजी भगवान् श्रीहरि का नाम जपने लगे और सतीजी वहाँ गयीं जहाँ सुख के धाम प्रभु श्रीरामचन्द्रजी थे।

दोहा

पुनि पुनि हृदयँ बिचारु करि धरि सीता कर रूप। आगें होइ चलि पंथ तेहिं जेहिं आवत नरभूप॥ ५२ ॥

अर्थ:

सती बार-बार हृदय में विचारकर सीताजी का रूप धारण करके उस मार्ग की ओर आगे होकर चलीं, जिससे [सतीजी के विचारानुसार] मनुष्यों के राजा रामचन्द्रजी आ रहे थे।

दोहा 53 के अंतर्गत
चौपाई

लछिमन दीख उमाकृत बेषा। चकित भए भ्रम हृदयँ बिसेषा॥ कहि न सकत कछु अति गंभीरा। प्रभु प्रभाउ जानत मतिधीरा॥ १ ॥

अर्थ:

सतीजी के बनावटी वेष को देखकर लक्ष्मणजी चकित हो गये और उनके हृदय में बड़ा भ्रम हो गया। वे बहुत गम्भीर हो गये, कुछ कह नहीं सके। धीरबुद्धि लक्ष्मण प्रभु के प्रभाव को जानते थे।

चौपाई

सती कपटु जानेउ सुरस्वामी। सबदरसी सब अंतरजामी॥ सुमिरत जाहि मिटइ अग्याना। सोइ सरबग्य रामु भगवाना॥ २ ॥

अर्थ:

सब कुछ देखनेवाले और सबके हृदय की जाननेवाले देवताओं के स्वामी श्रीरामचन्द्रजी ने सती के कपट को जान गये; जिनके स्मरणमात्र से अज्ञान का नाश हो जाता है, वही सर्वज्ञ भगवान् श्रीरामचन्द्रजी हैं।

चौपाई

सती कीन्ह चह तहँहुँ दुराऊ। देखहु नारि सुभाव प्रभाऊ॥ निज माया बलु हृदयँ बखानी। बोले बिहसि रामु मृदु बानी॥ ३ ॥

अर्थ:

स्त्रीस्वभाव का असर तो देखो कि वहाँ (उन सर्वज्ञ भगवान् के सामने) भी सतीजी छिपाव करना चाहती हैं। अपनी मायाके बल को हृदय में बखानकर, श्रीरामचन्द्रजी हँसकर कोमल वाणी से बोले।

चौपाई

जोरि पानि प्रभु कीन्ह प्रनामू। पिता समेत लीन्ह निज नामू॥ कहेउ बहोरि कहाँ बृषकेतू। बिपिन अकेलि फिरहु केहि हेतू॥ ४ ॥

अर्थ:

पहले प्रभु ने हाथ जोड़कर सती को प्रणाम किया और पितासहित अपना नाम बताया। फिर कहा कि वृषकेतु शिवजी कहाँ हैं? आप यहाँ वन में अकेली किसलिये फिर रही हैं?

दोहा

राम बचन मृदु गूढ़ सुनि उपजा अति संकोचु। सती सभीत महेस पहिं चलीं हृदयँ बड़ सोचु॥ ५३ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी के कोमल और रहस्यभरे वचन सुनकर सतीजी को बड़ा संकोच हुआ। वे डरती हुई (चुपचाप) शिवजी के पास चलीं, उनके हृदय में बड़ी चिन्ता हो गयी--

दोहा 54 के अंतर्गत
चौपाई

मैं संकर कर कहा न माना। निज अग्यानु राम पर आना॥ जाइ उतरु अब देहउँ काहा। उर उपजा अति दारुन दाहा॥ १ ॥

अर्थ:

—कि मैंने शंकरजी का कहना न माना और अपने अज्ञान का श्रीरामचन्द्रजी पर आरोप किया। अब जाकर मैं शिवजी को क्या उत्तर दूँगी? [यों सोचते-सोचते] सतीजी के हृदय में अत्यन्त भयानक जलन पैदा हो गयी।

चौपाई

जाना राम सतीं दुखु पावा। निज प्रभाउ कछु प्रगटि जनावा॥ सतीं दीख कौतुकु मग जाता। आगें रामु सहित श्री भ्राता॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी ने जान लिया कि सतीजी को दुःख हुआ; तब उन्होंने अपना कुछ प्रभाव प्रकट करके उन्हें दिखलाया। सतीजी ने मार्ग में जाते हुए यह कौतुक देखा कि श्रीरामचन्द्रजी सीताजी और लक्ष्मणजी सहित आगे चले जा रहे हैं। [इस अवसर पर सीताजी को इसलिए दिखाया कि सतीजी श्रीराम के सच्चिदानन्दमय रूप को देखें, वियोग और दुःख की कल्पना जो उन्हें हुई थी वह दूर हो जाय तथा वे प्रकृतिस्थ हों]।

चौपाई

फिरि चितवा पाछें प्रभु देखा। सहित बंधु सिय सुंदर बेषा॥ जहँ चितवहिं तहँ प्रभु आसीना। सेवहिं सिद्ध मुनीस प्रबीना॥ ३ ॥

अर्थ:

[तब उन्होंने] पीछे की ओर फिरकर देखा, तो वहाँ भी भाई लक्ष्मणजी और सीताजी के साथ श्रीरामचन्द्रजी सुन्दर वेष में दिखायी दिये। वे जिधर देखती हैं, उधर ही प्रभु श्रीरामचन्द्रजी विराजमान हैं और सुचतुर सिद्ध मुनीश्वर उनकी सेवा कर रहे हैं।

चौपाई

देखे सिव बिधि बिष्नु अनेका। अमित प्रभाउ एक तें एका॥ बंदत चरन करत प्रभु सेवा। बिबिध बेष देखे सब देवा॥ ४ ॥

अर्थ:

सतीजी ने अनेक शिव, ब्रह्मा और विष्णु देखे, जो एक-से-एक बढ़कर असीम प्रभाव वाले थे। [उन्होंने देखा कि] भाँति-भाँति के वेष धारण किये सभी देवता श्रीरामचन्द्रजी की चरणवन्दना और सेवा कर रहे हैं।

दोहा

सती बिधात्री इंदिरा देखीं अमित अनूप। जेहिं जेहिं बेष अजादि सुर तेहि तेहि तन अनुरूप॥ ५४ ॥

अर्थ:

उन्होंने अनगिनत अनुपम सती, ब्रह्माणी और लक्ष्मी देखीं। जिस-जिस रूप में ब्रह्मा आदि देवता थे, उसी के अनुकूल रूप में [उनकी] ये सब [शक्तियाँ] भी थीं।

दोहा 55 के अंतर्गत
चौपाई

देखे जहँ तहँ रघुपति जेते। सक्तिन्ह सहित सकल सुर तेते॥ जीव चराचर जो संसारा। देखे सकल अनेक प्रकारा॥ १ ॥

अर्थ:

सतीजी ने जहाँ-तहाँ जितने रघुपति देखे, शक्तियों सहित वहाँ उतने ही सारे देवताओं को भी देखा। संसार में जो चराचर जीव हैं, वे भी अनेक प्रकार से सब देखे।

चौपाई

पूजहिं प्रभुहि देव बहु बेषा। राम रूप दूसर नहिं देखा॥ अवलोके रघुपति बहुतेरे। सीता सहित न बेष घनेरे॥ २ ॥

अर्थ:

[उन्होंने देखा कि] अनेकों वेष धारण करके देवता प्रभु श्रीरामचन्द्रजी की पूजा कर रहे हैं। परन्तु श्रीरामचन्द्रजी का दूसरा रूप कहीं नहीं देखा। सीतासहित श्रीरघुनाथजी बहुत-से देखे, परन्तु उनके वेष अनेक नहीं थे।

चौपाई

सोइ रघुबर सोइ लछिमनु सीता। देखि सती अति भईं सभीता॥ हृदय कंप तन सुधि कछु नाहीं। नयन मूदि बैठीं मग माहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

[सब जगह] वही रघुनाथजी, वही लक्ष्मण और वही सीताजी—सती ऐसा देखकर बहुत ही डर गयीं। उनका हृदय काँपने लगा और देह की सारी सुध-बुध जाती रही। वे आँख मूँदकर मार्ग में बैठ गयीं।

चौपाई

बहुरि बिलोकेउ नयन उघारी। कछु न दीख तहँ दच्छकुमारी॥ पुनि पुनि नाइ राम पद सीसा। चलीं तहाँ जहँ रहे गिरीसा॥ ४ ॥

अर्थ:

फिर आँख खोलकर देखा, तो वहाँ दक्षकुमारी (सतीजी) को कुछ भी न दीख पड़ा। तब वे बार-बार श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में सिर नवाकर वहाँ चलीं जहाँ श्रीशिवजी थे।

दोहा

गईं समीप महेस तब हँसि पूछी कुसलात। लीन्हि परीछा कवन बिधि कहहु सत्य सब बात॥ ५५ ॥

अर्थ:

जब पास पहुँचीं, तब श्रीशिवजी ने हँसकर कुशल-प्रश्न करके कहा कि तुमने रामजी की किस प्रकार परीक्षा ली, सारी बात सच-सच कहो।

दोहा 56 के अंतर्गत
चौपाई

सतीं समुझि रघुबीर प्रभाऊ। भय बस सिव सन कीन्ह दुराऊ॥ कछु न परीछा लीन्हि गोसाईं। कीन्ह प्रनामु तुम्हारिहि नाईं॥ १ ॥

अर्थ:

सतीजी ने श्रीरघुनाथजी के प्रभाव को समझकर डर के मारे शिवजी से छिपाव किया और कहा— हे स्वामिन्! मैंने कुछ भी परीक्षा नहीं ली, [वहाँ जाकर] आपकी ही तरह प्रणाम किया।

चौपाई

जो तुम्ह कहा सो मृषा न होई। मोरें मन प्रतीति अति सोई॥ तब संकर देखेउ धरि ध्याना। सतीं जो कीन्ह चरित सबु जाना॥ २ ॥

अर्थ:

आपने जो कहा वह झूठ नहीं हो सकता, मेरे मन में यह बड़ा (पूरा) विश्वास है। तब शिवजी ने ध्यान करके देखा और सतीजी ने जो चरित्र किया था, सब जान लिया।

चौपाई

बहुरि राममायहि सिरु नावा। प्रेरि सतिहि जेहिं झूँठ कहावा॥ हरि इच्छा भावी बलवाना। हृदयँ बिचारत संभु सुजाना॥ ३ ॥

अर्थ:

फिर श्रीरामचन्द्रजी की मायाको सिर नवाया, जिसने प्रेरणा करके सती के मुँह से भी झूठ कहला दिया। सुजान शिवजी ने मन में विचार किया कि हरि की इच्छा और भावी प्रबल है।

चौपाई

सतीं कीन्ह सीता कर बेषा। सिव उर भयउ बिषाद बिसेषा॥ जौं अब करउँ सती सन प्रीती। मिटइ भगति पथु होइ अनीती॥ ४ ॥

अर्थ:

सतीजी ने सीताजी का वेष धारण किया, यह जानकर शिवजी के हृदय में बड़ा विषाद हुआ। उन्होंने सोचा कि यदि मैं अब सती से प्रीति करता हूँ तो भक्तिमार्ग लुप्त हो जाता है और बड़ा अन्याय होता है।

दोहा

परम पुनीत न जाइ तजि किएँ प्रेम बड़ पापु। प्रगटि न कहत महेसु कछु हृदयँ अधिक संतापु॥ ५६ ॥

अर्थ:

सती परम पवित्र हैं, इसलिये इन्हें छोड़ते भी नहीं बनता और प्रेम करने में बड़ा पाप है। प्रकट करके महादेवजी कुछ भी नहीं कहते, परन्तु उनके हृदय में बड़ा संताप है।