श्रीरामगुण और श्रीरामचरित की महिमा
श्रीराम के गुण, करुणा और चरित्र की महिमा का वर्णन किया गया है। उनकी कथा को सुनना और गाना जीव के लिए पवित्र, मंगलमय और मुक्तिदायक बताया गया है।
बालकाण्ड · प्रकरण १२ / ५९
प्रकरण पाठ
भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥ सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा। करउँ नाइ रघुनाथहि माथा॥ १ ॥
अर्थ:
अच्छे भाव (प्रेम) से, बुरे भाव (वैर) से, क्रोध से या आलस्य से, किसी तरह से भी नाम जपने से दसों दिशाओं में कल्याण होता है। उसी (परम कल्याणकारी) रामनाम का स्मरण करके और श्रीरघुनाथजी को मस्तक नवाकर मैं रामजी के गुणों का वर्णन करता हूँ।
मोरि सुधारिहि सो सब भाँती। जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती॥ राम सुस्वामि कुसेवकु मोसो। निज दिसि देखि दयानिधि पोसो॥ २ ॥
अर्थ:
वे (श्रीरामजी) मेरी [बिगड़ी] सब तरह से सुधार लेंगे; जिनकी कृपा कृपा करने से नहीं अघाती। राम-से उत्तम स्वामी और मुझ-सरीखा बुरा सेवक! इतने पर भी उन दयानिधि ने अपनी ओर देखकर मेरा पालन किया है।
सुनि सनमानहिं सबहि सुबानी। भनिति भगति नति गति पहिचानी॥ यह प्राकृत महिपाल सुभाऊ। जान सिरोमनि कोसलराऊ॥ ५ ॥
अर्थ:
सब की सुनकर और उनकी वाणी, भक्ति, विनय और चाल को पहचानकर सुन्दर (मीठी) वाणी से सब का यथायोग्य सम्मान करते हैं। यह स्वभाव तो संसारी राजाओं का है, कोसलनाथ श्रीरामचन्द्रजी तो चतुरशिरोमणि हैं।
अति बड़ि मोरि ढिठाई खोरी। सुनि अघ नरकहुँ नाक सकोरी॥ समुझि सहम मोहि अपडर अपनें। सो सुधि राम कीन्हि नहिं सपनें॥ १ ॥
अर्थ:
यह मेरी बहुत बड़ी ढिठाई और दोष है, मेरे पाप को सुनकर नरक ने भी नाक सिकोड़ ली है (अर्थात् नरक में भी मेरे लिये ठौर नहीं है)। यह समझकर मुझे अपने ही कल्पित डर से डर हो रहा है, किंतु भगवान् श्रीरामचन्द्रजी ने तो स्वप्न में भी इस पर (मेरी इस ढिठाई और दोष पर) ध्यान नहीं दिया।
सुनि अवलोकि सुचित चख चाही। भगति मोरि मति स्वामि सराही॥ कहत नसाइ होइ हियँ नीकी। रीझत राम जानि जन जी की॥ २ ॥
अर्थ:
वर मेरे प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने तो इस बात को सुनकर, देखकर और अपने सुचित्तरूपी चक्षु से निरीक्षण कर मेरी भक्ति और बुद्धि की [उलटे] सराहना की। क्योंकि कहने में चाहे बिगड़ जाए (अर्थात् मैं चाहे अपने को भगवान् का सेवक कहता-कहलाता रहूँ), परंतु हृदय में अच्छापन होना चाहिये। (हृदय में तो अपने को उनका सेवक बनने योग्य नहीं मानकर पापी और दीन ही मानता हूँ, यह अच्छापन है।) श्रीरामचन्द्रजी भी दास के हृदय की [अच्छी] स्थिति जानकर रीझ जाते हैं।
रहति न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की॥ जेहिं अघ बधेउ ब्याध जिमि बाली। फिरि सुकंठ सोइ कीन्हि कुचाली॥ ३ ॥
अर्थ:
प्रभु के चित्त में अपने भक्तों की की हुई भूल-चूक याद नहीं रहती (वे उसे भूल जाते हैं) और उनके हृदय की अच्छाई को सौ-सौ बार याद करते रहते हैं। जिस पाप के कारण उन्होंने बाली को व्याध की तरह मारा था, वैसी ही कुचाल फिर सुग्रीव ने चली।
सोइ करतूति बिभीषन केरी। सपनेहुँ सो न राम हियँ हेरी॥ ते भरतहि भेंटत सनमाने। राजसभाँ रघुबीर बखाने॥ ४ ॥
अर्थ:
वही करनी विभीषण की थी, परन्तु श्रीरामचन्द्रजी ने स्वप्न में भी उसका हृदय में विचार नहीं किया। उलटे भरतजी से मिलते समय श्रीरघुनाथजी ने उनका सम्मान किया और राजसभा में भी उनके गुणों का बखान किया।
प्रभु तरु तर कपि डार पर ते किए आपु समान। तुलसी कहूँ न राम से साहिब सीलनिधान॥ २९ (क) ॥
अर्थ:
प्रभु (श्रीरामचन्द्रजी) तो वृक्ष के नीचे और बंदर डाली पर (अर्थात् कहाँ मर्यादापुरुषोत्तम सच्चिदानन्दघन परमात्मा श्रीरामजी और कहाँ पेड़ों की शाखाओं पर कूदनेवाले बंदर)। परन्तु ऐसे बंदरों को भी उन्होंने अपने समान बना लिया। तुलसीदासजी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्रजी-सरीखे शीलनिधान स्वामी कहीं भी नहीं हैं।
तेहि सन जागबलिक पुनि पावा। तिन्ह पुनि भरद्वाज प्रति गावा॥ ते श्रोता बकता समसीला। सवँदरसी जानहिं हरिलीला॥ ३ ॥
अर्थ:
उन काकभुशुण्डिजी से फिर याज्ञवल्क्यजी ने पाया और उन्होंने फिर उसे भरद्वाजजी को गाकर सुनाया। वे दोनों वक्ता और श्रोता (याज्ञवल्क्य और भरद्वाज) समान शीलवाले और समदर्शा हैं और श्रीहरि की लीला को जानते हैं।
जानहिं तीनि काल निज ग्याना। करतल गत आमलक समाना॥ औरउ जे हरिभगत सुजाना। कहहिं सुनहिं समुझहिं बिधि नाना॥ ४ ॥
अर्थ:
वे अपने ज्ञान से तीनों कालों की बातों को हथेली पर रखे हुए आँवले के समान (प्रत्यक्ष) जानते हैं। और भी जो सुजान (भगवान् की लीलाओं का रहस्य जाननेवाले) हरिभक्त हैं, वे इस चरित्र को नाना प्रकार से कहते, सुनते और समझते हैं।
जस कछु बुधि बिबेक बल मेरें। तस कहिहउँ हियँ हरि के प्रेरें॥ निज संदेह मोह भ्रम हरनी। करउँ कथा भव सरिता तरनी॥ २ ॥
अर्थ:
जैसी कुछ मुझमें बुद्धि और विवेक का बल है, मैं हृदय में हरि की प्रेरणा से उसी के अनुसार कहूँगा। मैं अपने सन्देह, अज्ञान और भ्रम को हरनेवाली कथा रचता हूँ, जो संसाररूपी नदी के पार करने के लिये नाव है।
बुध बिश्राम सकल जन रंजनि। रामकथा कलि कलुष बिभंजनि॥ रामकथा कलि पंनग भरनी। पुनि बिबेक पावक कहुँ अरनी॥ ३ ॥
अर्थ:
रामकथा पंडितों को विश्राम देनेवाली, सब मनुष्यों को प्रसन्न करनेवाली और कलियुग के पापों का नाश करनेवाली है। रामकथा कलियुगरूपी साँप के लिये मोरनी है और विवेकरूपी अग्नि के प्रकट करने के लिये अरणि (मंथन की जानेवाली लकड़ी) है, (अर्थात् इस कथा से ज्ञान की प्राप्ति होती है)।
रामकथा कलि कामद गाई। सुजन सजीवनि मूरि सुहाई॥ सोइ बसुधातल सुधा तरंगिनि। भय भंजनि भ्रम भेक भुअंगिनि॥ ४ ॥
अर्थ:
यह रामकथा कलियुग में सब मनोरथों को पूर्ण करनेवाली कामधेनु गौ है और सज्जनों के लिये सुन्दर संजीवनी जड़ी है। पृथ्वी पर यही अमृत की नदी है, जन्म-मरणरूपी भय का नाश करनेवाली और भ्रमरूपी मेढकों को खाने के लिये सर्पिणी है।
असुर सेन सम नरक निकंदिनि। साधु बिबुध कुल हित गिरिनंदिनि॥ संत समाज पयोधि रमा सी। बिस्व भार भर अचल छमा सी॥ ५ ॥
अर्थ:
यह रामकथा असुरों की सेना के समान नरकों का नाश करनेवाली और साधुरूप देवताओं के कुल का हित करनेवाली पार्वती (दुर्गा) है। यह संत-समाजरूपी क्षीरसमुद्र के लिये लक्ष्मीजी के समान है और सम्पूर्ण विश्व का भार उठाने में अचल पृथ्वी के समान है।
जम गन मुहँ मसि जग जमुना सी। जीवन मुकुति हेतु जनु कासी॥ रामहि प्रिय पावनि तुलसी सी। तुलसिदास हित हियँ हुलसी सी॥ ६ ॥
अर्थ:
यमदूतों के मुख पर कालिख लगाने के लिये यह जगत् में यमुना जी के समान है और जीवों को मुक्ति देने के लिये मानो काशी ही है। यह श्रीरामजी को पवित्र तुलसी के समान प्रिय है और तुलसीदास के लिये हुलसी (तुलसीदासजी की माता) के समान हृदय से हित करनेवाली है।
सिवप्रिय मेकल सैल सुता सी। सकल सिद्धि सुख संपति रासी॥ सदगुन सुरगन अंब अदिति सी। रघुबर भगति प्रेम परमिति सी॥ ७ ॥
अर्थ:
यह रामकथा शिवजी को नर्मदाजी के समान प्यारी है, यह सब सिद्धियों की तथा सुख-सम्पत्ति की राशि है। सद्गुणरूपी देवताओं के उत्पन्न और पालन-पोषण करने के लिये माता अदिति के समान है। श्रीरघुनाथजी की भक्ति और प्रेम की परम सीमा-सी है।
रामचरित चिंतामनि चारू। संत सुमति तिय सुभग सिंगारू॥ जग मंगल गुनग्राम राम के। दानि मुकुति धन धरम धाम के॥ १ ॥
अर्थ:
श्रीरामचन्द्रजी का चरित्र सुन्दर चिन्तामणि है और संतों की सुबुद्धिरूपी स्त्री का सुन्दर श्रृंगार है। श्रीरामचन्द्रजी के गुणसमूह जगत् का कल्याण करनेवाले और मुक्ति, धन, धर्म और परमधाम के देनेवाले हैं।
सदगुर ग्यान बिराग जोग के। बिबुध बैद भव भीम रोग के॥ जननि जनक सिय राम प्रेम के। बीज सकल ब्रत धरम नेम के॥ २ ॥
अर्थ:
ज्ञान, वैराग्य और योग के लिए सद्गुरु हैं और संसाररूपी भयंकर रोग का नाश करने के लिए देवताओं के वैद्य (अश्विनीकुमार) के समान हैं। ये श्रीसीतारामजी के प्रेम के उत्पन्न करने के लिए माता-पिता हैं और सम्पूर्ण व्रत, धर्म और नियमों के बीज हैं।
काम कोह कलिमल करिगन के। केहरि सावक जन मन बन के॥ अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के। कामद घन दारिद दवारि के॥ ४ ॥
अर्थ:
भक्तों के मनरूपी वन में बसनेवाले काम, क्रोध और कलियुग के पापरूपी हाथियों के मारने के लिए सिंह के बच्चे हैं। शिवजी के पूज्य और प्रियतम अतिथि हैं और दरिद्रतारूपी दावानल के बुझाने के लिए कामना पूर्ण करनेवाले मेघ हैं।
मंत्र महामनि बिषय ब्याल के। मेटत कठिन कुअंक भाल के॥ हरन मोह तम दिनकर कर से। सेवक सालि पाल जलधर से॥ ५ ॥
अर्थ:
विषयरूपी साँप का जहर उतारने के लिए मन्त्र और महामणि हैं। ये ललाट पर लिखे हुए कठिनता से मिटने वाले बुरे लेखों (मन्द प्रारब्ध) को मिटा देनेवाले हैं। अज्ञानरूपी अन्धकार के हरण करने के लिए सूर्यकिरणों के समान और सेवकरूपी धान के पालन करने में मेघ के समान हैं।
अभिमत दानि देवतरु बर से। सेवत सुलभ सुखद हरि हर से॥ सुकबि सरद नभ मन उडगन से। रामभगत जन जीवन धन से॥ ६ ॥
अर्थ:
मनोवांछित वस्तु देने में श्रेष्ठ कल्पवृक्ष के समान हैं और सेवा करने में हरि-हर के समान सुलभ और सुख देनेवाले हैं। सुकवि शरद् ऋतु के मनरूपी आकाश को सुशोभित करने के लिए तारागण के समान और श्रीरामजी के भक्तों का तो जीवनधन ही हैं।
सकल सुकृत फल भूरि भोग से। जग हित निरुपधि साधु लोग से॥ सेवक मन मानस मराल से। पावन गंग तरंग माल से॥ ७ ॥
अर्थ:
सम्पूर्ण पुण्यों के फल महान् भोगों के समान हैं। जगत् का छलरहित (यथार्थ) हित करने में साधु-संतों के समान हैं। सेवकों के मनरूपी मानसरोवर के लिए हंस के समान और पवित्र करने में गंगा की तरंगमालाओं के समान हैं।