पार्वती का जन्म और तपस्या
सती पुनर्जन्म लेकर हिमवान के घर पार्वती रूप में प्रकट होती हैं। वे शिवजी को पति रूप में पाने के लिए कठिन तपस्या करती हैं और उनकी अटल निष्ठा समस्त लोकों को चकित करती है।
बालकाण्ड · प्रकरण २० / ५९
प्रकरण पाठ
नारि सहित मुनि पद सिरु नावा। चरन सलिल सबु भवनु सिंचावा॥ निज सौभाग्य बहुत गिरि बरना। सुता बोलि मेली मुनि चरना॥ ४ ॥
अर्थ:
फिर अपनी स्त्री सहित मुनि के चरणों में सिर नवाया और उनके चरणोदक को सारे घर में छिड़काया। हिमाचल ने अपने सौभाग्य का बहुत बखान किया और पुत्री को बुलाकर मुनि के चरणों पर डाल दिया।
सुनि मुनि गिरा सत्य जियँ जानी। दुख दंपतिहि उमा हरषानी॥ नारदहूँ यह भेदु न जाना। दसा एक समुझब बिलगाना॥ १ ॥
अर्थ:
नारद मुनि की वाणी सुनकर और उसको हृदय में सत्य जानकर पति-पत्नी (हिमवान् और मैना) को दुःख हुआ और पार्वतीजी प्रसन्न हुईं। नारदजी ने भी इस रहस्य को नहीं जाना, क्योंकि सब की बाहरी दशा एक-सी होने पर भी भीतरी समझ भिन्न-भिन्न थी।
सकल सखीं गिरिजा गिरि मैना। पुलक सरीर भरे जल नैना॥ होइ न मृषा देवरिषि भाषा। उमा सो बचनु हृदयँ धरि राखा॥ २ ॥
अर्थ:
सारी सखियाँ, पार्वती, पर्वतराज हिमवान् और मैना सभी के शरीर पुलकित थे और सभी के नेत्रों में जल भरा था। देवर्षि के वचन असत्य नहीं हो सकते, [यह विचारकर] पार्वती ने उन वचनों को हृदय में धारण कर लिया।
उपजेउ सिव पद कमल सनेहू। मिलन कठिन मन भा संदेहू॥ जानि कुअवसरु प्रीति दुराई। सखी उछँग बैठी पुनि जाई॥ ३ ॥
अर्थ:
उन्हें शिवजी के चरणकमलों में स्नेह उत्पन्न हो आया, परन्तु मन में यह संदेह हुआ कि उनका मिलना कठिन है। अवसर ठीक न जानकर उमा ने अपने प्रेम को छिपा लिया और फिर वे सखी की गोद में जाकर बैठ गयीं।
जौं अहि सेज सयन हरि करहीं। बुध कछु तिन्ह कर दोषु न धरहीं॥ भानु कृसानु सर्ब रस खाहीं। तिन्ह कहँ मंद कहत कोउ नाहीं॥ ३ ॥
अर्थ:
जैसे विष्णुभगवान् शेषनाग की शय्या पर सोते हैं, तो भी पण्डित लोग उन पर कोई दोष नहीं लगाते। सूर्य और अग्निदेव अच्छे-बुरे सभी रसों का भक्षण करते हैं, परन्तु उनको कोई बुरा नहीं कहता।
बर दायक प्रनतारति भंजन। कृपासिंधु सेवक मन रंजन॥ इच्छित फल बिनु सिव अवराधें। लहिअ न कोटि जोग जप साधें॥ ४ ॥
अर्थ:
शिवजी वर देने वाले, शरणागतों के दुःखों का नाश करने वाले, कृपा के समुद्र और सेवकों के मन को प्रसन्न करने वाले हैं। शिवजी की आराधना किये बिना करोड़ों योग और जप साधने पर भी वांछित फल नहीं मिलता।
जौं घरु बरु कुलु होइ अनूपा। करिअ बिबाहु सुता अनुरूपा॥ न त कन्या बरु रहउ कुआरी। कंत उमा मम प्रानपिआरी॥ २ ॥
अर्थ:
जो हमारी कन्या के अनुकूल घर, वर और कुल उत्तम हो तो विवाह कीजिये। नहीं तो लड़की चाहे कुमारी ही रहे (मैं अयोग्य वर के साथ उसका विवाह नहीं करना चाहती); क्योंकि हे स्वामिन्! पार्वती मुझको प्राणों के समान प्यारी है।
जौं न मिलिहि बरु गिरिजहि जोगू। गिरि जड़ सहज कहिहि सबु लोगू॥ सोइ बिचारि पति करेहु बिबाहू। जेहिं न बहोरि होइ उर दाहू॥ ३ ॥
अर्थ:
यदि पार्वती के योग्य वर न मिला तो सब लोग कहेंगे कि पर्वत स्वभाव से ही जड़ (मूर्ख) होते हैं। हे स्वामी! इस बात को विचार कर ही विवाह कीजियेगा, जिसमें फिर पीछे हृदय में संताप न हो।
बारहिं बार लेति उर लाई। गदगद कंठ न कछु कहि जाई॥ जगत मातु सर्बग्य भवानी। मातु सुखद बोलीं मृदु बानी॥ ४ ॥
अर्थ:
फिर बार-बार उसे हृदय से लगाने लगीं। प्रेम से मैनाका गला भर आया, कुछ कहा नहीं जाता। जगज्जननी भवानीजी तो सर्वज्ञ ठहरीं। [माता के मन की दशा को जानकर] वे माता को सुख देने वाली कोमल वाणी से बोलीं--।
तपबल रचइ प्रपंचु बिधाता। तपबल बिष्नु सकल जग त्राता॥ तपबल संभु करहिं संघारा। तपबल सेषु धरइ महिभारा॥ २ ॥
अर्थ:
तप के बल से ही ब्रह्मा संसार को रचते हैं और तप के बल से ही विष्णु सारे जगत् का पालन करते हैं। तप के बल से ही शम्भु [रुद्ररूप से जगत् का] संहार करते हैं और तप के बल से ही शेषजी पृथ्वी का भार धारण करते हैं।
उर धरि उमा प्रानपति चरना। जाइ बिपिन लागीं तपु करना॥ अति सुकुमार न तनु तप जोगू। पति पद सुमिरि तजेउ सबु भोगू॥ १ ॥
अर्थ:
प्राणपति (शिवजी) के चरणों को हृदय में धारण करके पार्वतीजी वन में जाकर तप करने लगीं। पार्वतीजी का अत्यन्त सुकुमार शरीर तप के योग्य नहीं था, तो भी पति के चरणों का स्मरण करके उन्होंने सब भोगों को तज दिया।
सुनत गिरा बिधि गगन बखानी। पुलक गात गिरिजा हरषानी॥ उमा चरित सुंदर मैं गावा। सुनहु संभु कर चरित सुहावा॥ ३ ॥
अर्थ:
यह [इस प्रकार ] आकाश से कही हुई ब्रह्मा की वाणी को सुनते ही पार्वतीजी प्रसन्न हो गयीं और [हर्ष के मारे] उनका शरीर पुलकित हो गया। [याज्ञवल्क्यजी भरद्वाजजी से बोले कि] मैंने पार्वती का सुन्दर चरित्र सुनाया, अब शिवजी का सुहावना चरित्र सुनो।
कतहुँ मुनिन्ह उपदेसहिं ग्याना। कतहुँ राम गुन करहिं बखाना॥ जदपि अकाम तदपि भगवाना। भगत बिरह दुख दुखित सुजाना॥ १ ॥
अर्थ:
वे कहीं मुनियों को ज्ञान का उपदेश करते और कहीं श्रीरामचन्द्रजी के गुणों का वर्णन करते थे। यद्यपि सुजान शिवजी निष्काम हैं, तो भी वे भगवान अपने भक्त (सती) के वियोग के दुःख से दुःखी हैं।
एहि बिधि गयउ कालु बहु बीती। नित नै होइ राम पद प्रीती॥ नेमु प्रेमु संकर कर देखा। अबिचल हृदयँ भगति कै रेखा॥ २ ॥
अर्थ:
इस प्रकार बहुत समय बीत गया। श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में नित नयी प्रीति हो रही है। शिवजी के [कठोर] नियम, [अनन्य] प्रेम और उनके हृदय में भक्तिकी अटल टेक को [जब श्रीरामचन्द्रजी ने] देखा।
प्रगटे रामु कृतग्य कृपाला। रूप सील निधि तेज बिसाला॥ बहु प्रकार संकरहि सराहा। तुम्ह बिनु अस ब्रतु को निरबाहा॥ ३ ॥
अर्थ:
तब कृतज्ञ (उपकार माननेवाले), कृपालु, रूप और शील के भण्डार, महान् तेजपुञ्ज भगवान् श्रीरामचन्द्रजी प्रकट हुए। उन्होंने बहुत तरह से शिवजी की सराहना की और कहा कि आपके बिना ऐसा (कठिन) व्रत कौन निबाह सकता है।