पार्वती का जन्म और तपस्या

सती पुनर्जन्म लेकर हिमवान के घर पार्वती रूप में प्रकट होती हैं। वे शिवजी को पति रूप में पाने के लिए कठिन तपस्या करती हैं और उनकी अटल निष्ठा समस्त लोकों को चकित करती है।

बालकाण्ड · प्रकरण २० / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

सतीं मरत हरि सन बरु मागा। जनम जनम सिव पद अनुरागा॥ तेहि कारन हिमगिरि गृह जाई। जनमीं पारबती तनु पाई॥ ३ ॥

अर्थ:

सती ने मरते समय भगवान् हरि से यह वर माँगा कि मेरा जन्म-जन्म में शिवजी के चरणों में अनुराग रहे। इसी कारण उन्होंने हिमाचल के घर जाकर पार्वती के शरीर से जन्म लिया।

चौपाई

जब तें उमा सैल गृह जाईं। सकल सिद्धि संपति तहँ छाईं॥ जहँ तहँ मुनिन्ह सुआश्रम कीन्हे। उचित बास हिम भूधर दीन्हे॥ ४ ॥

अर्थ:

जब से उमाजी हिमाचल के घर जन्मीं तब से वहाँ सारी सिद्धियाँ और सम्पत्तियाँ छा गयीं। मुनियों ने जहाँ-तहाँ सुन्दर आश्रम बना लिये और हिमाचल ने उनको उचित स्थान दिये।

दोहा

सदा सुमन फल सहित सब द्रुम नव नाना जाति। प्रगटीं सुंदर सैल पर मनि आकर बहु भाँति॥ ६५ ॥

अर्थ:

उस सुन्दर पर्वत पर बहुत प्रकार के सब नये-नये वृक्ष सदा पुष्प-फलयुक्त हो गये और वहाँ बहुत तरह की मणियों की खानें प्रकट हो गयीं।

दोहा 66 के अंतर्गत
चौपाई

सरिता सब पुनीत जलु बहहीं। खग मृग मधुप सुखी सब रहहीं॥ सहज बयरु सब जीवन्ह त्यागा। गिरि पर सकल करहिं अनुरागा॥ १ ॥

अर्थ:

सारी नदियों में पवित्र जल बहता है और पक्षी, मृग, भौंरे सभी सुखी रहते हैं। सब जीवों ने अपना स्वाभाविक वैर छोड़ दिया और पर्वत पर सभी परस्पर प्रेम करते हैं।

चौपाई

सोह सैल गिरिजा गृह आएँ। जिमि जनु रामभगति के पाएँ॥ नित नूतन मंगल गृह तासू। ब्रह्मादिक गावहिं जसु जासू॥ २ ॥

अर्थ:

पार्वतीजी के घर आ जाने से पर्वत ऐसा शोभायमान हो रहा है जैसा रामभक्ति को पाकर भक्त शोभायमान होता है। उस (पर्वतराज) के घर नित्य नये-नये मंगल होते हैं, जिसका ब्रह्मादि यश गाते हैं।

चौपाई

नारद समाचार सब पाए। कौतुकहीं गिरि गेह सिधाए॥ सैलराज बड़ आदर कीन्हा। पद पखारि बर आसनु दीन्हा॥ ३ ॥

अर्थ:

जब नारदजी ने ये सब समाचार सुने तो वे कौतुक ही से हिमाचल के घर पधारे। पर्वतराज ने उनका बड़ा आदर किया और चरण धोकर उनको उत्तम आसन दिया।

चौपाई

नारि सहित मुनि पद सिरु नावा। चरन सलिल सबु भवनु सिंचावा॥ निज सौभाग्य बहुत गिरि बरना। सुता बोलि मेली मुनि चरना॥ ४ ॥

अर्थ:

फिर अपनी स्त्री सहित मुनि के चरणों में सिर नवाया और उनके चरणोदक को सारे घर में छिड़काया। हिमाचल ने अपने सौभाग्य का बहुत बखान किया और पुत्री को बुलाकर मुनि के चरणों पर डाल दिया।

दोहा

त्रिकालग्य सर्बग्य तुम्ह गति सर्बत्र तुम्हारि॥ कहहु सुता के दोष गुन मुनिबर हृदयँ बिचारि॥ ६६ ॥

अर्थ:

और कहा— हे मुनिवर! आप त्रिकालज्ञ और सर्वज्ञ हैं, आपकी गति सर्वत्र है। अतः आप हृदय में विचारकर कन्या के दोष-गुण कहिये।

दोहा 67 के अंतर्गत
चौपाई

कह मुनि बिहसि गूढ़ मृदु बानी। सुता तुम्हारि सकल गुन खानी॥ सुंदर सहज सुसील सयानी। नाम उमा अंबिका भवानी॥ १ ॥

अर्थ:

नारद मुनि ने हँसकर रहस्ययुक्त कोमल वाणी से कहा— तुम्हारी कन्या सब गुणों की खान है। यह स्वभाव से ही सुन्दर, सुशील और समझदार है। उमा, अम्बिका और भवानी इसके नाम हैं।

चौपाई

सब लच्छन संपन्न कुमारी। होइहि संतत पियहि पिआरी॥ सदा अचल एहि कर अहिवाता। एहि तें जसु पैहहिं पितु माता॥ २ ॥

अर्थ:

कन्या सब सुलक्षणों से सम्पन्न है, यह अपने पति को सदा प्यारी होगी। इसका सुहाग सदा अचल रहेगा और इससे इसके माता-पिता यश पावेंगे।

चौपाई

होइहि पूज्य सकल जग माहीं। एहि सेवत कछु दुर्लभ नाहीं॥ एहि कर नामु सुमिरि संसारा। त्रिय चढ़िहहिं पतिब्रत असिधारा॥ ३ ॥

अर्थ:

यह सारे जगत् में पूज्य होगी और इसकी सेवा करने से कुछ भी दुर्लभ न होगा। संसार में स्त्रियाँ इसका नाम स्मरण करके पतिव्रतरूपी तलवार की धार पर चढ़ जायेंगी।

चौपाई

सैल सुलच्छन सुता तुम्हारी। सुनहु जे अब अवगुन दुइ चारी॥ अगुन अमान मातु पितु हीना। उदासीन सब संसय छीना॥ ४ ॥

अर्थ:

हे पर्वतराज! तुम्हारी कन्या सुलक्षणी है। अब इसमें जो दो-चार अवगुण हैं, उन्हें भी सुन लो। अगुण, अमान, माता-पिता हीना, उदासीन, सब संशय छीना।

दोहा

जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल बेष। अस स्वामी एहि कहँ मिलिहि परी हस्त असि रेख॥ ६७ ॥

अर्थ:

योगी, जटिल, अकाम मन, नग्न, अमंगल वेषवाला, ऐसा स्वामी इसको मिलेगा। इसके हाथ में ऐसी ही रेखा पड़ी है।

दोहा 68 के अंतर्गत
चौपाई

सुनि मुनि गिरा सत्य जियँ जानी। दुख दंपतिहि उमा हरषानी॥ नारदहूँ यह भेदु न जाना। दसा एक समुझब बिलगाना॥ १ ॥

अर्थ:

नारद मुनि की वाणी सुनकर और उसको हृदय में सत्य जानकर पति-पत्नी (हिमवान् और मैना) को दुःख हुआ और पार्वतीजी प्रसन्न हुईं। नारदजी ने भी इस रहस्य को नहीं जाना, क्योंकि सब की बाहरी दशा एक-सी होने पर भी भीतरी समझ भिन्न-भिन्न थी।

चौपाई

सकल सखीं गिरिजा गिरि मैना। पुलक सरीर भरे जल नैना॥ होइ न मृषा देवरिषि भाषा। उमा सो बचनु हृदयँ धरि राखा॥ २ ॥

अर्थ:

सारी सखियाँ, पार्वती, पर्वतराज हिमवान् और मैना सभी के शरीर पुलकित थे और सभी के नेत्रों में जल भरा था। देवर्षि के वचन असत्य नहीं हो सकते, [यह विचारकर] पार्वती ने उन वचनों को हृदय में धारण कर लिया।

चौपाई

उपजेउ सिव पद कमल सनेहू। मिलन कठिन मन भा संदेहू॥ जानि कुअवसरु प्रीति दुराई। सखी उछँग बैठी पुनि जाई॥ ३ ॥

अर्थ:

उन्हें शिवजी के चरणकमलों में स्नेह उत्पन्न हो आया, परन्तु मन में यह संदेह हुआ कि उनका मिलना कठिन है। अवसर ठीक न जानकर उमा ने अपने प्रेम को छिपा लिया और फिर वे सखी की गोद में जाकर बैठ गयीं।

चौपाई

झूठि न होइ देवरिषि बानी। सोचहिं दंपति सखीं सयानी॥ उर धरि धीर कहइ गिरिराऊ। कहहु नाथ का करिअ उपाऊ॥ ४ ॥

अर्थ:

देवर्षि की वाणी झूठी न होगी, यह विचारकर हिमवान्, मैना और सारी चतुर सखियाँ चिन्ता करने लगीं। फिर हृदय में धीरज धरकर पर्वतराज ने कहा--हे नाथ! कहिये, अब क्या उपाय किया जाय?

दोहा

कह मुनीस हिमवंत सुनु जो बिधि लिखा लिलार। देव दनुज नर नाग मुनि कोउ न मेटनिहार॥ ६८ ॥

अर्थ:

मुनीश ने कहा--हे हिमवान्! सुनो, विधाता ने ललाट पर जो कुछ लिख दिया है, उसको देवता, दानव, मनुष्य, नाग और मुनि कोई भी नहीं मिटा सकते।

दोहा 69 के अंतर्गत
चौपाई

तदपि एक मैं कहउँ उपाई। होइ करै जौं दैउ सहाई॥ जस बरु मैं बरनेउँ तुम्ह पाहीं। मिलिहि उमहि तस संसय नाहीं॥ १ ॥

अर्थ:

तो भी एक उपाय मैं बताता हूँ। यदि दैव सहायता करें तो वह सिद्ध हो सकता है। उमा को वर तो निःसन्देह वैसा ही मिलेगा जैसा मैंने तुम्हारे सामने वर्णन किया है।

चौपाई

जे जे बर के दोष बखाने। ते सब सिव पहिं मैं अनुमाने॥ जौं बिबाहु संकर सन होई। दोषउ गुन सम कह सबु कोई॥ २ ॥

अर्थ:

परन्तु मैंने वर के जो-जो दोष बतलाये हैं, मेरे अनुमान से वे सब शिवजी में हैं। यदि शिवजी के साथ विवाह हो जाय तो दोषों को भी सब लोग गुणों के समान कहेंगे।

चौपाई

जौं अहि सेज सयन हरि करहीं। बुध कछु तिन्ह कर दोषु न धरहीं॥ भानु कृसानु सर्ब रस खाहीं। तिन्ह कहँ मंद कहत कोउ नाहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

जैसे विष्णुभगवान् शेषनाग की शय्या पर सोते हैं, तो भी पण्डित लोग उन पर कोई दोष नहीं लगाते। सूर्य और अग्निदेव अच्छे-बुरे सभी रसों का भक्षण करते हैं, परन्तु उनको कोई बुरा नहीं कहता।

चौपाई

सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई। सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई॥ समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं। रबि पावक सुरसरि की नाईं॥ ४ ॥

अर्थ:

गंगाजी में शुभ और अशुभ सभी जल बहता है, पर कोई उसे अपवित्र नहीं कहता। समर्थ को कोई दोष नहीं लगता, गोसाईं, सूर्य, अग्नि और गंगाजी की तरह।

दोहा

जौं अस हिसिषा करहिं नर जड़ बिबेक अभिमान। परहिं कलप भरि नरक महुँ जीव कि ईस समान॥ ६९ ॥

अर्थ:

यदि मूर्ख मनुष्य विवेक के अभिमान से इस प्रकार होड़ करते हैं तो वे कल्प भर के लिए नरक में पड़ते हैं। भला, कहीं जीव भी ईश्वर के समान हो सकता है?

दोहा 70 के अंतर्गत
चौपाई

सुरसरि जल कृत बारुनि जाना। कबहुँ न संत करहिं तेहि पाना॥ सुरसरि मिलें सो पावन जैसें। ईस अनीसहि अंतरु तैसें॥ १ ॥

अर्थ:

गंगाजल से बनी हुई मदिरा को जानकर संत लोग कभी उसका पान नहीं करते। पर वही गंगाजी में मिल जाने पर जैसे पवित्र हो जाती है, ईश्वर और जीव में भी वैसा ही भेद है।

चौपाई

संभु सहज समरथ भगवाना। एहि बिबाहँ सब बिधि कल्याना॥ दुराराध्य पै अहहिं महेसू। आसुतोष पुनि किएँ कलेसू॥ २ ॥

अर्थ:

शिवजी सहज ही समर्थ हैं, क्योंकि वे भगवान् हैं। इसलिए इस विवाह में सब प्रकार कल्याण है। परन्तु महेशजी की आराधना बड़ी कठिन है, फिर भी कष्ट करने से वे बहुत जल्द सन्तुष्ट हो जाते हैं।

चौपाई

जौं तपु करै कुमारि तुम्हारी। भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी॥ जद्यपि बर अनेक जग माहीं। एहि कहँ सिव तजि दूसर नाहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

यदि तुम्हारी कन्या तप करे, तो त्रिपुरारि महादेवजी होनहार को मिटा सकते हैं। यद्यपि संसार में वर अनेक हैं, पर इसके लिए शिवजी को छोड़कर दूसरा वर नहीं है।

चौपाई

बर दायक प्रनतारति भंजन। कृपासिंधु सेवक मन रंजन॥ इच्छित फल बिनु सिव अवराधें। लहिअ न कोटि जोग जप साधें॥ ४ ॥

अर्थ:

शिवजी वर देने वाले, शरणागतों के दुःखों का नाश करने वाले, कृपा के समुद्र और सेवकों के मन को प्रसन्न करने वाले हैं। शिवजी की आराधना किये बिना करोड़ों योग और जप साधने पर भी वांछित फल नहीं मिलता।

दोहा

अस कहि नारद सुमिरि हरि गिरिजहि दीन्हि असीस। होइहि यह कल्यान अब संसय तजहु गिरीस॥ ७० ॥

अर्थ:

ऐसा कहकर नारदजी ने हरि का स्मरण करके गिरिजा को आशीर्वाद दिया। [और कहा कि--] अब यह कल्याण ही होगा, हे गिरीश! तुम सन्देह का त्याग कर दो।

दोहा 71 के अंतर्गत
चौपाई

कहि अस ब्रह्मभवन मुनि गयऊ। आगिल चरित सुनहु जस भयऊ॥ पतिहि एकांत पाइ कह मैना। नाथ न मैं समुझे मुनि बैना॥ १ ॥

अर्थ:

यों कहकर नारद मुनि ब्रह्मलोक को चले गये। अब आगे जो चरित्र हुआ उसे सुनो। पति को एकान्त में पाकर मैना ने कहा-हे नाथ! मैंने मुनि के वचनों का अर्थ नहीं समझा।

चौपाई

जौं घरु बरु कुलु होइ अनूपा। करिअ बिबाहु सुता अनुरूपा॥ न त कन्या बरु रहउ कुआरी। कंत उमा मम प्रानपिआरी॥ २ ॥

अर्थ:

जो हमारी कन्या के अनुकूल घर, वर और कुल उत्तम हो तो विवाह कीजिये। नहीं तो लड़की चाहे कुमारी ही रहे (मैं अयोग्य वर के साथ उसका विवाह नहीं करना चाहती); क्योंकि हे स्वामिन्! पार्वती मुझको प्राणों के समान प्यारी है।

चौपाई

जौं न मिलिहि बरु गिरिजहि जोगू। गिरि जड़ सहज कहिहि सबु लोगू॥ सोइ बिचारि पति करेहु बिबाहू। जेहिं न बहोरि होइ उर दाहू॥ ३ ॥

अर्थ:

यदि पार्वती के योग्य वर न मिला तो सब लोग कहेंगे कि पर्वत स्वभाव से ही जड़ (मूर्ख) होते हैं। हे स्वामी! इस बात को विचार कर ही विवाह कीजियेगा, जिसमें फिर पीछे हृदय में संताप न हो।

चौपाई

अस कहि परी चरन धरि सीसा। बोले सहित सनेह गिरीसा॥ बरु पावक प्रगटै ससि माहीं। नारद बचनु अन्यथा नाहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

इस प्रकार कहकर मैना पति के चरणों पर मस्तक रखकर गिर पड़ीं। तब हिमवान ने प्रेम से कहा-चाहे चन्द्रमा में अग्नि प्रकट हो जाय, पर नारदजी के वचन झूठे नहीं हो सकते।

दोहा

प्रिया सोचु परिहरहु सबु सुमिरहु श्रीभगवान। पारबतिहि निरमयउ जेहिं सोइ करिहि कल्यान॥ ७१ ॥

अर्थ:

हे प्रिये! सब सोच छोड़कर श्रीभगवान् का स्मरण करो। जिन्होंने पार्वती को रचा है, वे ही कल्याण करेंगे।

दोहा 72 के अंतर्गत
चौपाई

अब जौं तुम्हहि सुता पर नेहू। तौ अस जाइ सिखावनु देहू॥ करै सो तपु जेहिं मिलहिं महेसू। आन उपायँ न मिटिहि कलेसू॥ १ ॥

अर्थ:

अब यदि तुम्हें कन्या पर प्रेम है तो जाकर उसे यह शिक्षा दो कि वह ऐसा तप करे जिससे शिवजी मिल जायँ। दूसरे उपाय से यह क्लेश नहीं मिटेगा।

चौपाई

नारद बचन सगर्भ सहेतू। सुंदर सब गुन निधि बृषकेतू॥ अस बिचारि तुम्ह तजहु असंका। सबहि भाँति संकरु अकलंका॥ २ ॥

अर्थ:

नारदजी के वचन रहस्य से युक्त और सकारण हैं और शिवजी समस्त सुन्दर गुणों के भण्डार हैं। यह विचारकर तुम [मिथ्या] सन्देह को छोड़ दो। शिवजी सभी तरह से निष्कलंक हैं।

चौपाई

सुनि पति बचन हरषि मन माहीं। गई तुरत उठि गिरिजा पाहीं॥ उमहि बिलोकि नयन भरे बारी। सहित सनेह गोद बैठारी॥ ३ ॥

अर्थ:

पति के वचन सुन मन में प्रसन्न होकर मैना उठकर तुरंत पार्वती के पास गयीं। पार्वती को देखकर उनकी आँखों में आँसू भर आये। उसे स्नेह के साथ गोद में बैठा लिया।

चौपाई

बारहिं बार लेति उर लाई। गदगद कंठ न कछु कहि जाई॥ जगत मातु सर्बग्य भवानी। मातु सुखद बोलीं मृदु बानी॥ ४ ॥

अर्थ:

फिर बार-बार उसे हृदय से लगाने लगीं। प्रेम से मैनाका गला भर आया, कुछ कहा नहीं जाता। जगज्जननी भवानीजी तो सर्वज्ञ ठहरीं। [माता के मन की दशा को जानकर] वे माता को सुख देने वाली कोमल वाणी से बोलीं--।

दोहा

सुनहि मातु मैं दीख अस सपन सुनावउँ तोहि। सुंदर गौर सुबिप्रबर अस उपदेसेउ मोहि॥ ७२ ॥

अर्थ:

माँ! सुन, मैं तुझे सुनाती हूँ; मैंने ऐसा स्वप्न देखा है कि मुझे एक सुन्दर गौरवर्ण श्रेष्ठ ब्राह्मण ने ऐसा उपदेश दिया है--।

दोहा 73 के अंतर्गत
चौपाई

करहि जाइ तपु सैलकुमारी। नारद कहा सो सत्य बिचारी॥ मातु पितहि पुनि यह मत भावा। तपु सुखप्रद दुख दोष नसावा॥ १ ॥

अर्थ:

हे पार्वती ! नारदजी ने जो कहा है, उसे सत्य समझकर तू जाकर तप कर। फिर यह बात तेरे माता-पिता को भी अच्छी लगी है। तप सुख देनेवाला और दुःख-दोष का नाश करनेवाला है।

चौपाई

तपबल रचइ प्रपंचु बिधाता। तपबल बिष्नु सकल जग त्राता॥ तपबल संभु करहिं संघारा। तपबल सेषु धरइ महिभारा॥ २ ॥

अर्थ:

तप के बल से ही ब्रह्मा संसार को रचते हैं और तप के बल से ही विष्णु सारे जगत् का पालन करते हैं। तप के बल से ही शम्भु [रुद्ररूप से जगत् का] संहार करते हैं और तप के बल से ही शेषजी पृथ्वी का भार धारण करते हैं।

चौपाई

तप अधार सब सृष्टि भवानी। करहि जाइ तपु अस जियँ जानी॥ सुनत बचन बिसमित महतारी। सपन सुनायउ गिरिहि हँकारी॥ ३ ॥

अर्थ:

हे भवानी! सारी सृष्टि तप के ही आधार पर है। ऐसा जी में जानकर तू जाकर तप कर। यह बात सुनकर माता को बड़ा अचरज हुआ और उसने हिमवान् को बुलाकर वह स्वप्न सुनाया।

चौपाई

मातु पितहि बहुबिधि समुझाई। चलीं उमा तप हित हरषाई॥ प्रिय परिवार पिता अरु माता। भए बिकल मुख आव न बाता॥ ४ ॥

अर्थ:

माता-पिता को बहुत तरह से समझाकर बड़े हर्ष के साथ पार्वतीजी तप करने के लिये चलीं। प्यारे परिवार, पिता और माता सब व्याकुल हो गये। किसी के मुँह से बात नहीं निकलती।

दोहा

बेदसिरा मुनि आइ तब सबहि कहा समुझाइ। पारबती महिमा सुनत रहे प्रबोधहि पाइ॥ ७३ ॥

अर्थ:

तब वेदशिरा मुनि ने आकर सब को समझाकर कहा। पार्वतीजी की महिमा सुनकर सब को समाधान हो गया।

दोहा 74 के अंतर्गत
चौपाई

उर धरि उमा प्रानपति चरना। जाइ बिपिन लागीं तपु करना॥ अति सुकुमार न तनु तप जोगू। पति पद सुमिरि तजेउ सबु भोगू॥ १ ॥

अर्थ:

प्राणपति (शिवजी) के चरणों को हृदय में धारण करके पार्वतीजी वन में जाकर तप करने लगीं। पार्वतीजी का अत्यन्त सुकुमार शरीर तप के योग्य नहीं था, तो भी पति के चरणों का स्मरण करके उन्होंने सब भोगों को तज दिया।

चौपाई

नित नव चरन उपज अनुरागा। बिसरी देह तपहिं मनु लागा॥ संबत सहस मूल फल खाए। सागु खाइ सत बरष गवाँए॥ २ ॥

अर्थ:

स्वामी के चरणों में नित्य नया अनुराग उत्पन्न होने लगा और तप में ऐसा मन लगा कि शरीर की सारी सुध बिसर गयी। एक हजार वर्ष तक उन्होंने मूल और फल खाये, फिर सौ वर्ष साग खाकर बिताये।

चौपाई

कछु दिन भोजनु बारि बतासा। किए कठिन कछु दिन उपबासा॥ बेल पाती महि परइ सुखाई। तीनि सहस संबत सोइ खाई॥ ३ ॥

अर्थ:

कुछ दिन जल और वायु का भोजन किया और फिर कुछ दिन कठोर उपवास किये। जो बेलपत्र सूखकर पृथ्वी पर गिरते थे, तीन हजार वर्ष तक उन्हीं को खाया।

चौपाई

पुनि परिहरे सुखानेउ परना। उमहि नामु तब भयउ अपरना॥ देखि उमहि तप खीन सरीरा। ब्रह्मगिरा भै गगन गभीरा॥ ४ ॥

अर्थ:

फिर सूखे पत्ते भी छोड़ दिये, तभी पार्वती का नाम “अपर्णा' हुआ। तप से उमा का शरीर क्षीण देखकर आकाश से गम्भीर ब्रह्मवाणी हुई--।

दोहा

भयउ मनोरथ सुफल तव सुनु गिरिराजकुमारि। परिहरु दुसह कलेस सब अब मिलिहहिं त्रिपुरारि॥ ७४ ॥

अर्थ:

हे पर्वतराज की कुमारी ! सुन, तेरा मनोरथ सफल हुआ। तू अब सारे असह्य क्लेशों को (कठिन तप को) त्याग दे। अब तुझे त्रिपुरारि मिलेंगे।

दोहा 75 के अंतर्गत
चौपाई

अस तपु काहुँ न कीन्ह भवानी। भए अनेक धीर मुनि ग्यानी॥ अब उर धरहु ब्रह्म बर बानी। सत्य सदा संतत सुचि जानी॥ १ ॥

अर्थ:

हे भवानी! ऐसा तप किसी ने नहीं किया। अनेक धीर, मुनि और ज्ञानी हुए हैं। अब तू ब्रह्म की श्रेष्ठ वाणी को सदा सत्य, निरन्तर और पवित्र जानकर हृदय में धारण कर।

चौपाई

आवै पिता बोलावन जबहीं। हठ परिहरि घर जाएहु तबहीं॥ मिलहिं तुम्हहि जब सप्त रिषीसा। जानेहु तब प्रमान बागीसा॥ २ ॥

अर्थ:

जब तेरे पिता बुलाने को आवें, तब हठ छोड़कर घर चली जाना और जब तुम्हें सप्तर्षि मिलें तब इस वाणी को ठीक समझना।

चौपाई

सुनत गिरा बिधि गगन बखानी। पुलक गात गिरिजा हरषानी॥ उमा चरित सुंदर मैं गावा। सुनहु संभु कर चरित सुहावा॥ ३ ॥

अर्थ:

यह [इस प्रकार ] आकाश से कही हुई ब्रह्मा की वाणी को सुनते ही पार्वतीजी प्रसन्न हो गयीं और [हर्ष के मारे] उनका शरीर पुलकित हो गया। [याज्ञवल्क्यजी भरद्वाजजी से बोले कि] मैंने पार्वती का सुन्दर चरित्र सुनाया, अब शिवजी का सुहावना चरित्र सुनो।

चौपाई

जब तें सतीं जाइ तनु त्यागा। तब तें सिव मन भयउ बिरागा॥ जपहिं सदा रघुनायक नामा। जहँ तहँ सुनहिं राम गुन ग्रामा॥ ४ ॥

अर्थ:

जब से सती ने जाकर शरीर त्याग किया, तब से शिवजी के मन में वैराग्य हो गया। वे सदा श्रीरघुनाथजी का नाम जपने लगे और जहाँ-तहाँ श्रीरामचन्द्रजी के गुणों की कथाएँ सुनने लगे।

दोहा

चिदानंद सुखधाम सिव बिगत मोह मद काम। बिचरहिं महि धरि हृदयँ हरि सकल लोक अभिराम॥ ७५ ॥

अर्थ:

चिदानन्द, सुख के धाम, मोह, मद और काम से रहित शिवजी सम्पूर्ण लोकों को आनन्द देनेवाले भगवान् श्रीहरि (श्रीरामचन्द्रजी) को हृदय में धारण कर (भगवान् के ध्यान में मस्त हुए) पृथ्वी पर विचरने लगे।

दोहा 76 के अंतर्गत
चौपाई

कतहुँ मुनिन्ह उपदेसहिं ग्याना। कतहुँ राम गुन करहिं बखाना॥ जदपि अकाम तदपि भगवाना। भगत बिरह दुख दुखित सुजाना॥ १ ॥

अर्थ:

वे कहीं मुनियों को ज्ञान का उपदेश करते और कहीं श्रीरामचन्द्रजी के गुणों का वर्णन करते थे। यद्यपि सुजान शिवजी निष्काम हैं, तो भी वे भगवान अपने भक्त (सती) के वियोग के दुःख से दुःखी हैं।

चौपाई

एहि बिधि गयउ कालु बहु बीती। नित नै होइ राम पद प्रीती॥ नेमु प्रेमु संकर कर देखा। अबिचल हृदयँ भगति कै रेखा॥ २ ॥

अर्थ:

इस प्रकार बहुत समय बीत गया। श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में नित नयी प्रीति हो रही है। शिवजी के [कठोर] नियम, [अनन्य] प्रेम और उनके हृदय में भक्तिकी अटल टेक को [जब श्रीरामचन्द्रजी ने] देखा।

चौपाई

प्रगटे रामु कृतग्य कृपाला। रूप सील निधि तेज बिसाला॥ बहु प्रकार संकरहि सराहा। तुम्ह बिनु अस ब्रतु को निरबाहा॥ ३ ॥

अर्थ:

तब कृतज्ञ (उपकार माननेवाले), कृपालु, रूप और शील के भण्डार, महान् तेजपुञ्ज भगवान् श्रीरामचन्द्रजी प्रकट हुए। उन्होंने बहुत तरह से शिवजी की सराहना की और कहा कि आपके बिना ऐसा (कठिन) व्रत कौन निबाह सकता है।

चौपाई

बहुबिधि राम सिवहि समुझावा। पारबती कर जन्मु सुनावा॥ अति पुनीत गिरिजा कै करनी। बिस्तर सहित कृपानिधि बरनी॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी ने बहुत प्रकार से शिवजी को समझाया और पार्वतीजी का जन्म सुनाया। कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजी ने विस्तारपूर्वक पार्वतीजी की अत्यन्त पवित्र करनी का वर्णन किया।