विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा

राम और लक्ष्मण विश्वामित्र के साथ वन में जाकर ताड़का का वध करते हैं और यज्ञ की रक्षा करते हैं। वे मारीच और सुबाहु को परास्त कर ऋषियों को निर्भय कर देते हैं।

बालकाण्ड · प्रकरण ४० / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

प्रात कहा मुनि सन रघुराई। निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाई॥ होम करन लागे मुनि झारी। आपु रहे मख कीं रखवारी॥ १ ॥

अर्थ:

सबेरे श्रीरघुनाथजी ने मुनि से कहा—आप जाकर निडर होकर यज्ञ कीजिये। यह सुनकर सब मुनि हवन करने लगे। आप (श्रीरामजी) यज्ञ की रखवाली पर रहे।

चौपाई

सुनि मारीच निसाचर क्रोही। लै सहाय धावा मुनिद्रोही॥ बिनु फर बान राम तेहि मारा। सत जोजन गा सागर पारा॥ २ ॥

अर्थ:

यह समाचार सुनकर मुनियों का शत्रु क्रोधी राक्षस मारीच अपने सहायकों को लेकर दौड़ा। श्रीरामजी ने बिना फल वाला बाण उसको मारा, जिससे वह सौ योजन के समुद्र पार जा गिरा।

चौपाई

पावक सर सुबाहु पुनि मारा। अनुज निसाचर कटकु सँघारा॥ मारि असुर द्विज निर्भयकारी। अस्तुति करहिं देव मुनि झारी॥ ३ ॥

अर्थ:

फिर सुबाहु को अग्निबाण मारा। इधर छोटे भाई लक्ष्मणजी ने राक्षसों की सेना का संहार कर डाला। इस प्रकार श्रीरामजी ने राक्षसों को मारकर ब्राह्मणों को निर्भय कर दिया। तब सारे देवता और मुनि स्तुति करने लगे।

चौपाई

तहँ पुनि कछुक दिवस रघुराया। रहे कीन्हि बिप्रन्ह पर दाया॥ भगति हेतु बहु कथा पुराना। कहे बिप्र जद्यपि प्रभु जाना॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी ने वहाँ कुछ दिन और रहकर ब्राह्मणों पर दया की। भक्ति के कारण ब्राह्मणों ने उन्हें पुराणों की बहुत-सी कथाएँ कहीं, यद्यपि प्रभु सब जानते थे।

चौपाई

तब मुनि सादर कहा बुझाई। चरित एक प्रभु देखिअ जाई॥ धनुषजग्य सुनि रघुकुल नाथा। हरषि चले मुनिबर के साथा॥ ५ ॥

अर्थ:

तदनन्तर मुनि ने आदरपूर्वक समझाकर कहा—हे प्रभो! चलकर एक चरित्र देखिये। रघुकुल के स्वामी श्रीरामचन्द्रजी धनुषयज्ञ [की बात] सुनकर मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रजी के साथ प्रसन्न होकर चले।

चौपाई

आश्रम एक दीख मग माहीं। खग मृग जीव जंतु तहँ नाहीं॥ पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी। सकल कथा मुनि कहा बिसेषी॥ ६ ॥

अर्थ:

मार्ग में एक आश्रम दिखायी पड़ा। वहाँ पशु-पक्षी, कोई भी जीव-जन्तु नहीं था। पत्थर की एक शिला को देखकर प्रभु ने पूछा, तब मुनि ने विस्तारपूर्वक सब कथा कही।

दोहा

गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर। चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर॥ २१० ॥

अर्थ:

गौतम मुनि की स्त्री शापवश पत्थर की देह धारण किये बड़े धीरज से आपके चरणकमलों की धूलि चाहती है। हे रघुबीर! इस पर कृपा कीजिये।