अयोध्याकाण्ड

अयोध्याकाण्ड में राम के वनवास, भरत की अनुपम भक्ति और कर्तव्य तथा त्याग की गहन शिक्षाओं का वर्णन है।

मुख्य प्रसंग: कैकेयी की माँग · राम वनवास · भरत की भक्ति

काण्ड २ · ४९ प्रकरण

छंद संख्या

दोहे
३१४
सोरठा
१३
चौपाइयाँ
१३०४
छन्द
१२
श्लोक

अयोध्याकाण्ड के प्रकरण

प्रकरण १ / ४९

मंगलाचरण

अयोध्याकांड का आरंभ भगवान शिव, गुरु और संतजनों की वंदना से होता है। तुलसीदास इस मंगलाचरण में श्रद्धा, विनय और शुभभाव का आवाहन करते हैं।

प्रकरण २ / ४९

रामराज्याभिषेक की तैयारी, देवताओं की व्याकुलता तथा सरस्वतीजी से उनकी प्रार्थना

अयोध्या में रामराज्याभिषेक की तैयारियाँ आरंभ होती हैं, पर देवता रावण-वध हेतु चिंतित हो उठते हैं। वे सरस्वतीजी से प्रार्थना करते हैं कि लीला को ऐसा मोड़ दें जिससे प्रभु का वनगमन हो।

प्रकरण ३ / ४९

सरस्वती का मंथरा की बुद्धि फेरना, कैकेयी-मंथरा-संवाद

देवताओं की प्रार्थना से सरस्वती मंथरा की बुद्धि फेर देती हैं। मंथरा कैकेयी के मन में संशय और रोष भरकर उसे वरदान माँगने के लिए उकसाती है।

प्रकरण ४ / ४९

कैकेयी का कोपभवन में जाना

मंथरा की बातों से विचलित कैकेयी कोपभवन में जा बैठती है। यहीं से अयोध्या के आनंदमय वातावरण पर संकट की छाया गहराने लगती है।

प्रकरण ५ / ४९

दशरथ-कैकेयी-संवाद और दशरथ का शोक, सुमंत्र का महल में जाना और वहाँ से लौटकर श्रीरामजी को महल में भेजना

दशरथ कैकेयी को प्रसन्न करना चाहते हैं, पर वह दो वर माँगकर उन्हें गहन शोक में डाल देती है। सुमंत्र को भेजकर श्रीरामजी को महल में बुलाया जाता है।

प्रकरण ६ / ४९

श्रीराम-कैकेयी-संवाद

कैकेयी वनवास और भरताभिषेक की बात कहती है, और श्रीरामजी उसे सहज भाव से स्वीकार कर लेते हैं। वे पिता के वचन को धर्म मानकर बिना क्षोभ के वन जाने का निश्चय करते हैं।

प्रकरण ७ / ४९

श्रीराम-दशरथ-संवाद, अवधवासियों का विषाद, कैकेयी को समझाना

श्रीरामजी व्याकुल दशरथ को सांत्वना देते हैं, पर अयोध्या का हृदय विषाद से भर उठता है। नगरवासी और परिवारजन कैकेयी को समझाने का प्रयत्न करते हैं, किंतु उसका निश्चय नहीं बदलता।

प्रकरण ८ / ४९

श्रीराम-कौसल्या-संवाद

श्रीरामजी माता कौसल्या को वनवास का समाचार देकर धैर्य और धर्म का उपदेश देते हैं। मातृहृदय व्यथा से द्रवित होता है, फिर भी वह पुत्र की मर्यादा को पहचानती है।

प्रकरण ९ / ४९

श्रीसीता-राम-संवाद

श्रीरामजी सीताजी को अयोध्या में रहने को कहते हैं, पर सीताजी पति से वियोग स्वीकार नहीं करतीं। वे प्रेम, धर्म और सहधर्मिणी के कर्तव्य का निवेदन कर वनगमन का अपना निश्चय दृढ़ करती हैं।

प्रकरण १० / ४९

श्रीराम, कौसल्या और सीता का संवाद

वनगमन से पूर्व श्रीरामजी, माता कौसल्या और सीताजी के बीच करुण और धर्ममय संवाद होता है। इस क्षण में परिवार का स्नेह, विरह और मर्यादा एक साथ प्रकट होते हैं।

प्रकरण ११ / ४९

श्रीराम-लक्ष्मण-संवाद

लक्ष्मणजी श्रीरामजी के साथ वन जाने का आग्रह करते हैं और सेवा को अपना परम सौभाग्य मानते हैं। श्रीरामजी उन्हें संयम और कर्तव्य की शिक्षा देते हैं, पर अंततः उनका प्रेम विजयी होता है।

प्रकरण १२ / ४९

श्रीलक्ष्मण-सुमित्रा-संवाद

लक्ष्मणजी माता सुमित्रा से आज्ञा लेते हैं। सुमित्राजी उन्हें यही शिक्षा देती हैं कि राम और सीता की सेवा ही उनके जीवन का सच्चा धर्म है।

प्रकरण १३ / ४९

श्रीरामजी, लक्ष्मणजी, सीताजी का महाराज दशरथ के पास विदा माँगने जाना, दशरथजी का सीताजी को समझाना

श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी महाराज दशरथ से विदा लेने पहुँचते हैं। दशरथजी स्नेहवश सीताजी को रोकना चाहते हैं, पर वह अटल भाव से वन जाने पर दृढ़ रहती हैं।

प्रकरण १४ / ४९

श्रीराम, सीता और लक्ष्मण का वनगमन और नगर निवासियों को सोए छोड़कर आगे बढ़ना

तीनों वन के लिए प्रस्थान करते हैं और अयोध्या के लोग विलाप करते हुए पीछे-पीछे चलते हैं। बाद में श्रीरामजी सबको सोता छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं, ताकि उनका मोह और दुःख न बढ़े।

प्रकरण १५ / ४९

श्रीराम का शृंगवेरपुर पहुँचना, निषादराज द्वारा सेवा

श्रीरामजी शृंगवेरपुर पहुँचते हैं, जहाँ निषादराज गुह प्रेम और विनय से उनकी सेवा करता है। वनमार्ग में भी भक्ति और आत्मीयता का यह मिलन अत्यंत मार्मिक है।

प्रकरण १६ / ४९

लक्ष्मण-निषाद-संवाद, श्रीराम-सीता से सुमंत्र का संवाद, सुमंत्र का लौटना

लक्ष्मण और निषाद के बीच गूढ़ विचारों से भरा संवाद होता है। सुमंत्र श्रीरामजी और सीताजी से आज्ञा लेकर भारी हृदय से अयोध्या लौटते हैं।

प्रकरण १७ / ४९

केवट का प्रेम और गंगा पार जाना

केवट प्रभु के चरणों को धोकर अपनी निष्कपट भक्ति अर्पित करता है। फिर वह अत्यंत प्रेम से श्रीरामजी, सीताजी और लक्ष्मणजी को गंगा पार उतारता है।

प्रकरण १८ / ४९

प्रयाग पहुँचना, श्रीराम-भरद्वाज-संवाद, यमुनातट निवासियों का प्रेम

प्रयाग पहुँचकर श्रीरामजी भरद्वाज मुनि से मिलते हैं और उनके आश्रम में आदर पाते हैं। यमुना तट के निवासी भी प्रभु पर सहज प्रेम बरसाते हैं।

प्रकरण १९ / ४९

वन मार्ग में तापस से भेंट

वनमार्ग में एक तापस से भेंट होती है, जो प्रभु के दर्शन से धन्य हो उठता है। यह संक्षिप्त मिलन भी भक्ति की गहराई और प्रभु-कृपा को उजागर करता है।

प्रकरण २० / ४९

यमुना को प्रणाम, वनवासियों का प्रेम

श्रीरामजी यमुना को प्रणाम करते हैं और आगे बढ़ते हैं। मार्ग में वनवासी और ग्रामवासी सरल प्रेम से दर्शन पाकर अपने जीवन को धन्य मानते हैं।

प्रकरण २१ / ४९

श्रीराम-वाल्मीकि-संवाद

श्रीरामजी महर्षि वाल्मीकि से मिलकर निवास के लिए उपयुक्त स्थान पूछते हैं। वाल्मीकि उन्हें गूढ़ भक्ति-भाव से उत्तर देते हैं और प्रभु के सच्चे निवास का आध्यात्मिक अर्थ बताते हैं।

प्रकरण २२ / ४९

चित्रकूट में निवास, कोल भीलों द्वारा सेवा

श्रीरामजी चित्रकूट में निवास स्थिर करते हैं। वहाँ के कोल और भील अत्यंत प्रेम से सेवा कर अपने जीवन को पवित्र मानते हैं।

प्रकरण २३ / ४९

सुमंत्र का अयोध्या लौटना और सर्वत्र शोक देखना

सुमंत्र खाली रथ लेकर अयोध्या लौटते हैं। नगर, महल और प्रजा सब ओर श्रीराम-वियोग का गहरा शोक व्याप्त मिलता है।

प्रकरण २४ / ४९

दशरथ-सुमंत्र-संवाद और दशरथ मरण

सुमंत्र से समाचार सुनते हुए महाराज दशरथ का विरह और बढ़ जाता है। अंततः श्रीराम-वियोग सह न पाने के कारण वे प्राण त्याग देते हैं।

प्रकरण २५ / ४९

मुनि वशिष्ठ का भरतजी को बुलाने के लिये दूत भेजना

महाराज दशरथ के देहावसान के बाद मुनि वशिष्ठ राज्य के आवश्यक कार्य सँभालते हैं। वे दूतों को भेजकर भरतजी और शत्रुघ्नजी को तत्काल अयोध्या बुलवाते हैं।

प्रकरण २६ / ४९

श्रीभरत-शत्रुघ्न का आगमन और शोक

भरतजी और शत्रुघ्नजी अयोध्या पहुँचते हैं, पर नगर को शोकमग्न देखकर उनका हृदय व्याकुल हो उठता है। पिता महाराज दशरथ के देहावसान और श्रीरामजी के वनगमन का समाचार पाकर वे विलाप करने लगते हैं।

प्रकरण २७ / ४९

भरत-कौसल्या संवाद और दशरथजी की अंत्येष्टि क्रिया

भरतजी माता कौसल्या के चरणों में गिरकर अपनी निष्कपटता प्रकट करते हैं, और करुणा से भरा संवाद होता है। इसके बाद गुरुजनों के मार्गदर्शन में महाराज दशरथ की अंत्येष्टि क्रिया संपन्न की जाती है।

प्रकरण २८ / ४९

वसिष्ठ-भरत संवाद, श्रीरामजी को लाने के लिए चित्रकूट जाने की तैयारी

गुरु वसिष्ठजी भरतजी को धर्म और राज्य की मर्यादा समझाते हैं, पर भरतजी का एक ही संकल्प रहता है कि श्रीरामजी को लौटा लाया जाए। इसी भावना से चित्रकूट जाने की तैयारी आरंभ होती है।

प्रकरण २९ / ४९

अयोध्यावासियों सहित श्रीभरत-शत्रुघ्न आदि का वनगमन

भरतजी, शत्रुघ्नजी, माताएँ, गुरुजन और असंख्य अयोध्यावासी श्रीरामजी से मिलने के लिए वन की ओर प्रस्थान करते हैं। समूची यात्रा प्रेम, विरह और आशा से भरी हुई है।

प्रकरण ३० / ४९

निषाद की शंका और सावधानी

भरतजी की विशाल सेना को देखकर निषादराज को आशंका होती है कि कहीं श्रीरामजी के लिए कोई संकट न हो। वे तुरंत सावधानी बरतते हैं और अपने लोगों को सजग कर देते हैं।

प्रकरण ३१ / ४९

भरत-निषाद मिलन और संवाद तथा भरतजी और नगरवासियों का प्रेम

जब निषादराज भरतजी के निर्मल हृदय और श्रीरामजी के प्रति उनके प्रेम को पहचानते हैं, तब दोनों का अत्यंत भावपूर्ण मिलन होता है। भरतजी का प्रेम देखकर साथ चले नगरवासी भी करुणा और भक्ति में डूब जाते हैं।

प्रकरण ३२ / ४९

भरतजी का प्रयाग जाना और भरत-भरद्वाज संवाद

भरतजी प्रयाग पहुँचकर तीर्थ की वंदना करते हैं और महर्षि भरद्वाज के आश्रम में उपस्थित होते हैं। वहाँ उनके हृदय की सरलता, भक्ति और धर्मनिष्ठा से युक्त संवाद होता है।

प्रकरण ३३ / ४९

भरद्वाज द्वारा भरत का सत्कार

महर्षि भरद्वाज अपने तपबल और दिव्य सामर्थ्य से भरतजी तथा उनके साथ आए सब लोगों का अद्भुत सत्कार करते हैं। ऋषि की कृपा से वन आश्रम भी राजसी अतिथि सेवा का रूप ले लेता है।

प्रकरण ३४ / ४९

इन्द्र-बृहस्पति संवाद

भरतजी के प्रेम और संकल्प को देखकर इन्द्र के मन में चिंता उत्पन्न होती है। तब बृहस्पति उन्हें समझाते हैं कि ऐसे शुद्ध भक्त की गति को कोई विघ्न वास्तव में रोक नहीं सकता।

प्रकरण ३५ / ४९

भरतजी चित्रकूट के मार्ग में

भरतजी विनय और विरह से भरे हुए चित्रकूट की ओर बढ़ते हैं। मार्ग में जो भी उन्हें देखता है, वह उनके प्रेम, त्याग और दीनभाव से प्रभावित हो उठता है।

प्रकरण ३६ / ४९

श्रीसीताजी का स्वप्न, श्रीरामजी को कोल-किरातों द्वारा भरतजी के आगमन की सूचना, रामजी का शोक, लक्ष्मणजी का क्रोध

श्रीसीताजी एक अशुभ संकेत वाला स्वप्न देखती हैं, और तभी कोल-किरात आकर भरतजी के आगमन का समाचार देते हैं। श्रीरामजी परिवार की पीड़ा से द्रवित होते हैं, जबकि लक्ष्मणजी रक्षक भाव से उद्विग्न और क्रोधित हो उठते हैं।

प्रकरण ३७ / ४९

श्रीरामजी का लक्ष्मणजी को समझाना एवं भरतजी की महिमा कहना

श्रीरामजी लक्ष्मणजी के आवेश को शांत करते हैं और भरतजी के निष्कलुष प्रेम, विनय और धर्मनिष्ठा का गान करते हैं। वे बताते हैं कि भरतजी के हृदय में किसी प्रकार का स्वार्थ या कपट नहीं है।

प्रकरण ३८ / ४९

भरतजी का मंदाकिनी स्नान, चित्रकूट में पहुँचना, भरतादि सबका परस्पर मिलाप, पिता का शोक और श्राद्ध

मंदाकिनी में स्नान करके भरतजी चित्रकूट पहुँचते हैं और श्रीरामजी, श्रीसीताजी, लक्ष्मणजी तथा समस्त परिवार से करुण मिलन होता है। पिता महाराज दशरथ के वियोग का शोक प्रकट किया जाता है और श्राद्धादि कर्तव्य संपन्न किए जाते हैं।

प्रकरण ३९ / ४९

वनवासियों द्वारा भरतजी की मंडली का सत्कार, कैकेयी का पश्चाताप

वनवासी भरतजी और उनके साथियों का प्रेमपूर्वक आदर करते हैं। दूसरी ओर कैकेयी अपने कर्मों को स्मरण कर गहन पश्चाताप से भर उठती हैं।

प्रकरण ४० / ४९

श्रीवसिष्ठजी का भाषण

चित्रकूट की सभा में श्रीवसिष्ठजी धर्म, मर्यादा और कुल परंपरा के अनुसार सबको उचित मार्ग बताते हैं। उनका वचन शोकग्रस्त जनों के लिए मार्गदर्शक और संतुलन देने वाला बनता है।

प्रकरण ४१ / ४९

श्रीराम-भरतादि का संवाद

सभा में श्रीरामजी, भरतजी और अन्य वरिष्ठ जनों के बीच धर्म, राज्य और पितृ आज्ञा को लेकर गंभीर संवाद होता है। भरतजी की विनय और श्रीरामजी की मर्यादा दोनों इस प्रसंग को अत्यंत पवित्र बनाते हैं।

प्रकरण ४२ / ४९

जनकजी का पहुँचना, कोल-किरातादि की भेंट, सबका परस्पर मिलाप

राजा जनक चित्रकूट पहुँचते हैं और कोल-किरातादि से भेंट करते हुए सबके बीच प्रेमपूर्ण मिलन होता है। ऋषि, राजपरिवार और वनवासी एक ही भाव में जुड़कर शोक और धर्म की साझा अनुभूति करते हैं।

प्रकरण ४३ / ४९

कौसल्या-सुनयना संवाद, श्रीसीताजी का शील

माता कौसल्या और सुनयना के बीच करुणा, धर्म और स्त्रीधर्म पर गहन संवाद होता है। इस वार्ता में श्रीसीताजी के शील, धैर्य और पतिव्रत की महिमा उजागर होती है।

प्रकरण ४४ / ४९

जनक-सुनयना संवाद, भरतजी की महिमा

जनक और सुनयना भरतजी के त्याग, विनय और अप्रतिम भ्रातृभक्ति की चर्चा करते हैं। उनके वचनों में भरतजी के चरित्र की ऊँचाई और आध्यात्मिक महिमा प्रकट होती है।

प्रकरण ४५ / ४९

जनक-वसिष्ठादि संवाद, इन्द्र की चिंता, सरस्वती का इन्द्र को समझाना

जनकजी, वसिष्ठजी और अन्य श्रेष्ठ जन धर्मसम्मत निर्णय पर विचार करते हैं। उधर इन्द्र के मन में चिंता उठती है, पर सरस्वती उन्हें समझाकर उनके संशय का निवारण करती हैं।

प्रकरण ४६ / ४९

श्रीराम-भरत संवाद

श्रीरामजी भरतजी को पितृ आज्ञा, लोकमर्यादा और राजधर्म का मर्म समझाते हैं। भरतजी अत्यंत विनय से सब सुनते हैं, पर उनके हृदय में श्रीरामजी के प्रति सेवा और समर्पण ही प्रधान रहता है।

प्रकरण ४७ / ४९

भरतजी का तीर्थ जल स्थापन तथा चित्रकूट भ्रमण

भरतजी विविध तीर्थों के जल को श्रद्धापूर्वक स्थापित करते हैं और चित्रकूट के पवित्र स्थलों का दर्शन करते हैं। उनका प्रत्येक आचरण इस भूमि के प्रति आदर और श्रीरामजी के प्रति प्रेम से भरा हुआ है।

प्रकरण ४८ / ४९

श्रीराम-भरत संवाद, पादुका प्रदान, भरतजी की विदाई

अंतिम संवाद में भरतजी बार-बार श्रीरामजी से अयोध्या लौटने की प्रार्थना करते हैं, पर श्रीरामजी पितृवचन की मर्यादा निभाने पर अटल रहते हैं। अंततः वे अपनी पादुकाएँ भरतजी को प्रदान करते हैं, और भरतजी उन्हें राज्य की धरोहर मानकर विदा लेते हैं।

प्रकरण ४९ / ४९

भरतजी का अयोध्या लौटना, भरतजी द्वारा पादुका की स्थापना, नंदिग्राम में निवास और श्रीभरतजी के चरित्र श्रवण की महिमा

भरतजी अयोध्या लौटकर श्रीरामजी की पादुकाओं को राज्यासन पर स्थापित करते हैं और स्वयं नंदिग्राम में तपस्वी भाव से निवास करते हैं। अंत में उनके निर्मल चरित्र और उसके श्रवण की महिमा का वर्णन किया गया है।