मानस का रूप और माहात्म्य
मानस को सरोवर के रूपक में समझाते हुए उसके अंग, रस और गूढ़ अर्थों का निरूपण किया गया है। साथ ही उसके पाठ, श्रवण और मनन से होने वाले आध्यात्मिक लाभों का वर्णन है।
बालकाण्ड · प्रकरण १४ / ५९
प्रकरण पाठ
राम धामदा पुरी सुहावनि। लोक समस्त बिदित अति पावनि॥ चारि खानि जग जीव अपारा। अवध तजें तनु नहिं संसारा॥ २ ॥
अर्थ:
यह शोभायमान अयोध्यापुरी श्रीरामचन्द्रजी के परमधाम की देनेवाली है, सब लोकों में प्रसिद्ध है और अत्यन्त पवित्र है। जगत् में [अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज और जरायुज] चार खानि (प्रकार) के अनन्त जीव हैं, इनमें से जो कोई भी अयोध्याजी में शरीर छोड़ते हैं वे फिर संसार में नहीं आते (जन्म-मृत्यु के चक्कर से छूटकर भगवान् के परमधाम में निवास करते हैं)।
रामचरितमानस मुनि भावन। बिरचेउ संभु सुहावन पावन॥ त्रिबिध दोष दुख दारिद दावन। कलि कुचालि कुलि कलुष नसावन॥ ५ ॥
अर्थ:
यह रामचरितमानस मुनियों का प्रिय है, इस सुहावने और पवित्र मानस की शिवजी ने रचना की। यह तीनों प्रकार के दोषों, दुःखों और दरिद्रता तथा कलियुग की कुचालों और सब पापों का नाश करनेवाला है।
संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी। रामचरितमानस कबि तुलसी॥ करइ मनोहर मति अनुहारी। सुजन सुचित सुनि लेहु सुधारी॥ १ ॥
अर्थ:
श्रीशिवजी की कृपासे उसके हृदय में सुन्दर बुद्धि का विकास हुआ, जिससे यह तुलसीदास श्रीरामचरितमानस का कवि हुआ। अपनी बुद्धि के अनुसार तो वह इसे मनोहर ही बनाता है। किंतु फिर भी हे सज्जनो! सुन्दर चित्त से सुनकर इसे आप सुधार लीजिये।
सुमति भूमि थल हृदय अगाधू। बेद पुरान उदधि घन साधू॥ बरषहिं राम सुजस बर बारी। मधुर मनोहर मंगलकारी॥ २ ॥
अर्थ:
सुन्दर (सात्त्विकी) बुद्धि भूमि है, हृदय ही उसमें गहरा स्थान है, वेद-पुराण समुद्र हैं और साधु-संत मेघ हैं। वे (साधुरूपी मेघ) श्रीरामजी के सुयशरूपी सुन्दर, मधुर, मनोहर और मंगलकारी जल की वर्षा करते हैं।
लीला सगुन जो कहहिं बखानी। सोइ स्वच्छता करइ मल हानी॥ प्रेम भगति जो बरनि न जाई। सोइ मधुरता सुसीतलताई॥ ३ ॥
अर्थ:
श्रीराम की लीला का जो सगुण वर्णन करते हैं, वही राम-सुयशरूपी जल की निर्मलता है, जो मल का नाश करती है; और जिस प्रेम-भक्ति का वर्णन नहीं किया जा सकता, वही इस जल की मधुरता और सुन्दर शीतलता है।
सो जल सुकृत सालि हित होई। राम भगत जन जीवन सोई॥ मेधा महि गत सो जल पावन। सकिलि श्रवन मग चलेउ सुहावन॥ भरेउ सुमानस सुथल थिराना। सुखद सीत रुचि चारु चिराना॥ ४-५ ॥
अर्थ:
वह (राम-सुयशरूपी ) जल सत्कर्मरूपी धान के लिये हितकर है और श्रीरामजी के भक्तों का तो जीवन ही है। वह पवित्र जल बुद्धिरूपी पृथ्वी पर गिरा और सिमटकर सुहावने कानरूपी मार्ग से चला और मानस (हृदय) रूपी श्रेष्ठ स्थान में भरकर वहीं स्थिर हो गया। वही पुराना होकर सुन्दर, रुचिकर, शीतल और सुखदायी हो गया।
सप्त प्रबंध सुभग सोपाना। ग्यान नयन निरखत मन माना॥ रघुपति महिमा अगुन अबाधा। बरनब सोइ बर बारि अगाधा॥ १ ॥
अर्थ:
सात काण्ड ही इस मानस-सरोवरकी सुन्दर सात सीढ़ियाँ हैं, जिनको ज्ञानरूपी नेत्रोंसे देखते ही मन प्रसन्न हो जाता है। श्रीरघुनाथजीकी निर्गुण (प्राकृतिक गुणोंसे अतीत) और निर्बाध (एकरस) महिमाका जो वर्णन किया जायगा, वही इस सुन्दर जलकी अथाह गहराई है।
राम सीय जस सलिल सुधासम। उपमा बीचि बिलास मनोरम॥ पुरइनि सघन चारु चौपाई। जुगुति मंजु मनि सीप सुहाई॥ २ ॥
अर्थ:
श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी का यश अमृत के समान जल है। इसमें जो उपमाएँ दी गयी हैं वही तरंगों का मनोहर विलास है। सुन्दर चौपाइयाँ ही इसमें घनी फैली हुई पुरइन (कमलिनी) हैं और कविताकी युक्तियाँ सुन्दर मणि (मोती) उत्पन्न करनेवाली सुहावनी सीपियाँ हैं।
सुकृती साधु नाम गुन गाना। ते बिचित्र जलबिहग समाना॥ संतसभा चहुँ दिसि अवँराई। श्रद्धा रितु बसंत सम गाई॥ ६ ॥
अर्थ:
सुकृती (पुण्यात्मा) जनोंके, साधुओंके और श्रीरामनामके गुणोंका गान ही विचित्र जल-पक्षियोंके समान है। संतोंकी सभा ही इस सरोवरके चारों ओरकी अमराई (आमकी बगीचियाँ) हैं और श्रद्धा वसन्त ऋतुके समान कही गयी है।
भगति निरूपन बिबिध बिधाना। छमा दया दम लता बिताना॥ सम जम नियम फूल फल ग्याना। हरि पद रति रस बेद बखाना॥ ७ ॥
अर्थ:
नाना प्रकारसे भक्तिका निरूपण और क्षमा, दया तथा दम (इन्द्रियनिग्रह) लताओंके मण्डप हैं। मनका निग्रह, यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह), नियम (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान) ही उनके फूल हैं, ज्ञान फल है और श्रीहरिके चरणोंमें प्रेम ही इस ज्ञानरूपी फलका रस है। ऐसा वेदोंने कहा है।
जे श्रद्धा संबल रहित नहिं संतन्ह कर साथ। तिन्ह कहुँ मानस अगम अति जिन्हहि न प्रिय रघुनाथ॥ ३८ ॥
अर्थ:
जिनके पास श्रद्धारूपी संबल नहीं है और संतों का साथ नहीं है और जिनको श्रीरघुनाथजी प्रिय नहीं हैं, उनके लिए यह मानस अत्यन्त ही अगम है। (अर्थात् श्रद्धा, सत्संग और भगवत्प्रेम के बिना कोई इसे नहीं पा सकता)।
करि न जाइ सर मज्जन पाना। फिरि आवइ समेत अभिमाना॥ जौं बहोरि कोउ पूछन आवा। सर निंदा करि ताहि बुझावा॥ २ ॥
अर्थ:
उससे उस सरोवर में स्नान और उसका जलपान तो किया नहीं जाता, वह अभिमान सहित लौट आता है। फिर यदि कोई उससे [वहाँ का हाल] पूछने आता है, तो वह [अपने अभाग्य की बात न कहकर] सरोवर की निन्दा करके उसे समझाता है।
मानस मूल मिली सुरसरिही। सुनत सुजन मन पावन करिही॥ बिच बिच कथा बिचित्र बिभागा। जनु सरि तीर तीर बन बागा॥ ३ ॥
अर्थ:
इस (कीर्तिरूपी सरयू) का मूल मानस (श्रीरामचरित) है और यह [रामभक्तिरूपी] गङ्गाजी में मिली है, इसलिए यह सुननेवाले सज्जनों के मन को पवित्र कर देगी। इसके बीच-बीच में जो भिन्न-भिन्न प्रकार की विचित्र कथाएँ हैं वे ही मानो नदी-तट के आस-पास के वन और बाग हैं।
सुनि अनुकथन परस्पर होई। पथिक समाज सोह सरि सोई॥ घोर धार भृगुनाथ रिसानी। घाट सुबद्ध राम बर बानी॥ २ ॥
अर्थ:
इस कथा को सुनकर पीछे जो आपस में चर्चा होती है, वही इस नदी के सहारे-सहारे चलने वाले यात्रियों का समाज शोभा पा रहा है। परशुरामजी का क्रोध इस नदी की भयानक धारा है और श्रीरामचन्द्रजी के श्रेष्ठ वचन ही सुन्दर बँधे हुए घाट हैं।
सानुज राम बिबाह उछाहू। सो सुभ उमग सुखद सब काहू॥ कहत सुनत हरषहिं पुलकाहीं। ते सुकृती मन मुदित नहाहीं॥ ३ ॥
अर्थ:
भाइयों सहित श्रीरामचन्द्रजी के विवाह का उत्साह ही इस कथा-नदी की कल्याणकारिणी बाढ़ है, जो सभी को सुख देनेवाली है। इसके कहने-सुनने में जो हर्षित और पुलकित होते हैं, वे ही पुण्यात्मा पुरुष हैं, जो प्रसन्न मन से इस नदी में नहाते हैं।
राम तिलक हित मंगल साजा। परब जोग जनु जुरे समाजा॥ काई कुमति केकई केरी। परी जासु फल बिपति घनेरी॥ ४ ॥
अर्थ:
श्रीरामचन्द्रजी के राजतिलक के लिये जो मंगल-साज सजाया गया, वही मानो पर्व के समय इस नदी पर यात्रियों के समूह इकट्ठे हुए हैं। कैकेयी की कुबुद्धि ही इस नदी में काई है, जिसके फलस्वरूप बड़ी भारी विपत्ति आ पड़ी।
कीरति सरित छहूँ रितु रूरी। समय सुहावनि पावनि भूरी॥ हिम हिमसैलसुता सिव ब्याहू। सिसिर सुखद प्रभु जनम उछाहू॥ १ ॥
अर्थ:
यह कीर्तिरूपिणी नदी छहों ऋतुओं में सुन्दर है। सभी समय यह परम सुहावनी और अत्यन्त पवित्र है। इसमें शिव-पार्वती का विवाह हेमन्त ऋतु है। श्रीरामचन्द्रजी के जन्म का उत्सव सुखदायी शिशिर ऋतु है।
बरषा घोर निसाचर रारी। सुरकुल सालि सुमंगलकारी॥ राम राज सुख बिनय बड़ाई। बिसद सुखद सोइ सरद सुहाई॥ ३ ॥
अर्थ:
राक्षसों के साथ घोर युद्ध ही वर्षा-ऋतु है, जो देवकुलरूपी धान के लिये सुन्दर कल्याण करनेवाली है। रामचन्द्रजी के राज्यकाल का जो सुख, विनय और बड़ाई है वही निर्मल सुख देनेवाली सुहावनी शरद्-ऋतु है।
राम सुप्रेमहि पोषत पानी। हरत सकल कलि कलुष गलानी॥ भव श्रम सोषक तोषक तोषा। समन दुरित दुख दारिद दोषा॥ २ ॥
अर्थ:
यह जल श्रीरामचन्द्रजी के सुन्दर प्रेम को पुष्ट करता है, कलियुग के समस्त पापों और उनसे होनेवाली ग्लानि को हर लेता है। संसार के (जन्म-मृत्युरूप) श्रम को सोख लेता है, सन्तोष को भी सन्तुष्ट करता है और पाप, ताप, दरिद्रता और दोषों को नष्ट कर देता है।
जिन्ह एहिं बारि न मानस धोए। ते कायर कलिकाल बिगोए॥ तृषित निरखि रबि कर भव बारी। फिरिहहिं मृग जिमि जीव दुखारी॥ ४ ॥
अर्थ:
जिन्होंने इस (राम-सुयशरूपी) जल से अपने मानस को नहीं धोया, वे कायर कलिकाल के द्वारा बिगोए गये। जैसे प्यासा हिरन सूर्य की किरणों के जल-भ्रम को वास्तविक जल समझकर पीने को दौड़ता है और जल न पाकर दुखी होता है, वैसे ही वे (कलियुग से ठगे हुए) जीव भी [विषयों के पीछे भटककर] दुःखी होंगे।