मानस का रूप और माहात्म्य

मानस को सरोवर के रूपक में समझाते हुए उसके अंग, रस और गूढ़ अर्थों का निरूपण किया गया है। साथ ही उसके पाठ, श्रवण और मनन से होने वाले आध्यात्मिक लाभों का वर्णन है।

बालकाण्ड · प्रकरण १४ / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

एहि बिधि सब संसय करि दूरी। सिर धरि गुर पद पंकज धूरी॥ पुनि सबही बिनवउँ कर जोरी। करत कथा जेहिं लाग न खोरी॥ १ ॥

अर्थ:

इस प्रकार सब संदेहों को दूर करके और श्रीगुरु के चरणकमलों की रज को सिर पर धारण करके मैं पुनः हाथ जोड़कर सबकी विनती करता हूँ, जिससे कथा की रचना में कोई दोष स्पर्श न करने पाए।

चौपाई

सादर सिवहि नाइ अब माथा। बरनउँ बिसद राम गुन गाथा॥ संबत सोरह सै एकतीसा। करउँ कथा हरि पद धरि सीसा॥ २ ॥

अर्थ:

अब मैं आदरपूर्वक श्रीशिवजी को सिर नवाकर श्रीरामचन्द्रजी के गुणों की निर्मल कथा कहता हूँ। श्रीहरि के चरणों पर सिर रखकर संवत्‌ १६३१ में इस कथा का आरम्भ करता हूँ।

चौपाई

नौमी भौम बार मधुमासा। अवधपुरीं यह चरित प्रकासा॥ जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं। तीरथ सकल तहाँ चलि आवहिं॥ ३ ॥

अर्थ:

चैत्र मास की नवमी तिथि मंगलवार को श्रीअयोध्यापुरी में यह चरित्र प्रकाशित हुआ। जिस दिन श्रीरामजी का जन्म होता है, वेद कहते हैं कि उस दिन सारे तीर्थ वहाँ चले आते हैं।

चौपाई

असुर नाग खग नर मुनि देवा। आइ करहिं रघुनायक सेवा॥ जन्म महोत्सव रचहिं सुजाना। करहिं राम कल कीरति गाना॥ ४ ॥

अर्थ:

असुर, नाग, पक्षी, मनुष्य, मुनि और देवता सब आकर श्रीरघुनाथजी की सेवा करते हैं। बुद्धिमान लोग जन्म का महोत्सव मनाते हैं और श्रीरामजी की सुन्दर कीर्ति का गान करते हैं।

दोहा

मज्जहिं सज्जन बृंद बहु पावन सरजू नीर। जपहिं राम धरि ध्यान उर सुंदर स्याम सरीर॥ ३४ ॥

अर्थ:

सज्जनों के बहुत-से समूह उस दिन श्रीसरयूजी के पवित्र जल में स्नान करते हैं और हृदय में सुन्दर श्यामशरीर श्रीरघुनाथजी का ध्यान करके उनके नाम का जप करते हैं।

दोहा 35 के अंतर्गत
चौपाई

दरस परस मज्जन अरु पाना। हरइ पाप कह बेद पुराना॥ नदी पुनीत अमित महिमा अति। कहि न सकइ सारदा बिमल मति॥ १ ॥

अर्थ:

वेद-पुराण कहते हैं कि श्रीसरयूजी का दर्शन, स्पर्श, स्नान और जलपान पापों को हरता है। यह नदी बड़ी ही पवित्र है, इसकी महिमा अनन्त है, जिसे विमल बुद्धि वाली सरस्वतीजी भी नहीं कह सकतीं।

चौपाई

राम धामदा पुरी सुहावनि। लोक समस्त बिदित अति पावनि॥ चारि खानि जग जीव अपारा। अवध तजें तनु नहिं संसारा॥ २ ॥

अर्थ:

यह शोभायमान अयोध्यापुरी श्रीरामचन्द्रजी के परमधाम की देनेवाली है, सब लोकों में प्रसिद्ध है और अत्यन्त पवित्र है। जगत् में [अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज और जरायुज] चार खानि (प्रकार) के अनन्त जीव हैं, इनमें से जो कोई भी अयोध्याजी में शरीर छोड़ते हैं वे फिर संसार में नहीं आते (जन्म-मृत्यु के चक्कर से छूटकर भगवान् के परमधाम में निवास करते हैं)।

चौपाई

सब बिधि पुरी मनोहर जानी। सकल सिद्धिप्रद मंगल खानी॥ बिमल कथा कर कीन्ह अरंभा। सुनत नसाहिं काम मद दंभा॥ ३ ॥

अर्थ:

इस अयोध्यापुरी को सब प्रकार से मनोहर, सब सिद्धियों की देनेवाली और कल्याण की खान समझकर मैंने इस निर्मल कथा का आरम्भ किया, जिसके सुनने से काम, मद और दम्भ नष्ट हो जाते हैं।

चौपाई

रामचरितमानस एहि नामा। सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा॥ मन करि बिषय अनल बन जरई। होइ सुखी जौं एहिं सर परई॥ ४ ॥

अर्थ:

इसका नाम रामचरितमानस है, जिसके कानों से सुनते ही शान्ति मिलती है। मनरूपी हाथी विषय-रूपी दावानल में जल रहा है, वह यदि इस रामचरितमानस रूपी सरोवर में आ पड़े तो सुखी हो जाय।

चौपाई

रामचरितमानस मुनि भावन। बिरचेउ संभु सुहावन पावन॥ त्रिबिध दोष दुख दारिद दावन। कलि कुचालि कुलि कलुष नसावन॥ ५ ॥

अर्थ:

यह रामचरितमानस मुनियों का प्रिय है, इस सुहावने और पवित्र मानस की शिवजी ने रचना की। यह तीनों प्रकार के दोषों, दुःखों और दरिद्रता तथा कलियुग की कुचालों और सब पापों का नाश करनेवाला है।

चौपाई

रचि महेस निज मानस राखा। पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा॥ तातें रामचरितमानस बर। धरेउ नाम हियँ हेरि हरषि हर॥ ६ ॥

अर्थ:

श्रीमहादेवजी ने इसको रचकर अपने मन में रखा था और सुअवसर पाकर पार्वतीजी से कहा। इसीसे शिवजी ने इसको अपने हृदय में देखकर और प्रसन्न होकर इसका सुन्दर 'रामचरितमानस' नाम रखा।

चौपाई

कहउँ कथा सोइ सुखद सुहाई। सादर सुनहु सुजन मन लाई॥ ७ ॥

अर्थ:

मैं उसी सुख देनेवाली सुहावनी रामकथा को कहता हूँ, हे सज्जनो! आदरपूर्वक मन लगाकर इसे सुनिये।

दोहा

जस मानस जेहि बिधि भयउ जग प्रचार जेहि हेतु। अब सोइ कहउँ प्रसंग सब सुमिरि उमा बृषकेतु॥ ३५ ॥

अर्थ:

यह रामचरितमानस जैसा है, जिस प्रकार बना है और जिस हेतु से जगत् में इसका प्रचार हुआ, अब वही सब कथा मैं श्रीउमा-महेश्वर का स्मरण करके कहता हूँ।

दोहा 36 के अंतर्गत
चौपाई

संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी। रामचरितमानस कबि तुलसी॥ करइ मनोहर मति अनुहारी। सुजन सुचित सुनि लेहु सुधारी॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीशिवजी की कृपासे उसके हृदय में सुन्दर बुद्धि का विकास हुआ, जिससे यह तुलसीदास श्रीरामचरितमानस का कवि हुआ। अपनी बुद्धि के अनुसार तो वह इसे मनोहर ही बनाता है। किंतु फिर भी हे सज्जनो! सुन्दर चित्त से सुनकर इसे आप सुधार लीजिये।

चौपाई

सुमति भूमि थल हृदय अगाधू। बेद पुरान उदधि घन साधू॥ बरषहिं राम सुजस बर बारी। मधुर मनोहर मंगलकारी॥ २ ॥

अर्थ:

सुन्दर (सात्त्विकी) बुद्धि भूमि है, हृदय ही उसमें गहरा स्थान है, वेद-पुराण समुद्र हैं और साधु-संत मेघ हैं। वे (साधुरूपी मेघ) श्रीरामजी के सुयशरूपी सुन्दर, मधुर, मनोहर और मंगलकारी जल की वर्षा करते हैं।

चौपाई

लीला सगुन जो कहहिं बखानी। सोइ स्वच्छता करइ मल हानी॥ प्रेम भगति जो बरनि न जाई। सोइ मधुरता सुसीतलताई॥ ३ ॥

अर्थ:

श्रीराम की लीला का जो सगुण वर्णन करते हैं, वही राम-सुयशरूपी जल की निर्मलता है, जो मल का नाश करती है; और जिस प्रेम-भक्ति का वर्णन नहीं किया जा सकता, वही इस जल की मधुरता और सुन्दर शीतलता है।

चौपाई

सो जल सुकृत सालि हित होई। राम भगत जन जीवन सोई॥ मेधा महि गत सो जल पावन। सकिलि श्रवन मग चलेउ सुहावन॥ भरेउ सुमानस सुथल थिराना। सुखद सीत रुचि चारु चिराना॥ ४-५ ॥

अर्थ:

वह (राम-सुयशरूपी ) जल सत्कर्मरूपी धान के लिये हितकर है और श्रीरामजी के भक्तों का तो जीवन ही है। वह पवित्र जल बुद्धिरूपी पृथ्वी पर गिरा और सिमटकर सुहावने कानरूपी मार्ग से चला और मानस (हृदय) रूपी श्रेष्ठ स्थान में भरकर वहीं स्थिर हो गया। वही पुराना होकर सुन्दर, रुचिकर, शीतल और सुखदायी हो गया।

दोहा

सुठि सुंदर संबाद बर बिरचे बुद्धि बिचारि। तेइ एहि पावन सुभग सर घाट मनोहर चारि॥ ३६ ॥

अर्थ:

इस कथामें बुद्धिसे विचारकर जो चार अत्यन्त सुन्दर और उत्तम संवाद (भुशुण्डि-गरुड़, शिव-पार्वती, याज्ञवल्क्य-भरद्वाज और तुलसीदास और संत) रचे हैं, वही इस पवित्र और सुन्दर सरोवरके चार मनोहर घाट हैं।

दोहा 37 के अंतर्गत
चौपाई

सप्त प्रबंध सुभग सोपाना। ग्यान नयन निरखत मन माना॥ रघुपति महिमा अगुन अबाधा। बरनब सोइ बर बारि अगाधा॥ १ ॥

अर्थ:

सात काण्ड ही इस मानस-सरोवरकी सुन्दर सात सीढ़ियाँ हैं, जिनको ज्ञानरूपी नेत्रोंसे देखते ही मन प्रसन्न हो जाता है। श्रीरघुनाथजीकी निर्गुण (प्राकृतिक गुणोंसे अतीत) और निर्बाध (एकरस) महिमाका जो वर्णन किया जायगा, वही इस सुन्दर जलकी अथाह गहराई है।

चौपाई

राम सीय जस सलिल सुधासम। उपमा बीचि बिलास मनोरम॥ पुरइनि सघन चारु चौपाई। जुगुति मंजु मनि सीप सुहाई॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी का यश अमृत के समान जल है। इसमें जो उपमाएँ दी गयी हैं वही तरंगों का मनोहर विलास है। सुन्दर चौपाइयाँ ही इसमें घनी फैली हुई पुरइन (कमलिनी) हैं और कविताकी युक्तियाँ सुन्दर मणि (मोती) उत्पन्न करनेवाली सुहावनी सीपियाँ हैं।

चौपाई

छंद सोरठा सुंदर दोहा। सोइ बहुरंग कमल कुल सोहा॥ अरथ अनूप सुभाव सुभासा। सोइ पराग मकरंद सुबासा॥ ३ ॥

अर्थ:

जो सुन्दर छन्द, सोरठे और दोहे हैं, वही इसमें बहुरंगे कमलोंके समूह सुशोभित हैं। अनुपम अर्थ, ऊँचे भाव और सुन्दर भाषा ही पराग (पुष्परज), मकरन्द (पुष्परस) और सुगन्ध हैं।

चौपाई

सुकृत पुंज मंजुल अलि माला। ग्यान बिराग बिचार मराला॥ धुनि अवरेब कबित गुन जाती। मीन मनोहर ते बहुभाँती॥ ४ ॥

अर्थ:

सत्कर्मों (पुण्यों) के पुंज भौंरों की सुन्दर पंक्तियाँ हैं, ज्ञान, वैराग्य और विचार हंस हैं। कविताकी ध्वनि, अवरेब, गुण और जाति ही अनेकों प्रकारकी मनोहर मछलियाँ हैं।

चौपाई

अरथ धरम कामादिक चारी। कहब ग्यान बिग्यान बिचारी॥ नव रस जप तप जोग बिरागा। ते सब जलचर चारु तड़ागा॥ ५ ॥

अर्थ:

अर्थ, धर्म, कामादिक चारों, ज्ञान-विज्ञानका विचारके कहना, काव्यके नौ रस, जप, तप, योग और वैराग्यके प्रसंग--ये सब इस सरोवरके सुन्दर जलचर जीव हैं।

चौपाई

सुकृती साधु नाम गुन गाना। ते बिचित्र जलबिहग समाना॥ संतसभा चहुँ दिसि अवँराई। श्रद्धा रितु बसंत सम गाई॥ ६ ॥

अर्थ:

सुकृती (पुण्यात्मा) जनोंके, साधुओंके और श्रीरामनामके गुणोंका गान ही विचित्र जल-पक्षियोंके समान है। संतोंकी सभा ही इस सरोवरके चारों ओरकी अमराई (आमकी बगीचियाँ) हैं और श्रद्धा वसन्‍त ऋतुके समान कही गयी है।

चौपाई

भगति निरूपन बिबिध बिधाना। छमा दया दम लता बिताना॥ सम जम नियम फूल फल ग्याना। हरि पद रति रस बेद बखाना॥ ७ ॥

अर्थ:

नाना प्रकारसे भक्तिका निरूपण और क्षमा, दया तथा दम (इन्द्रियनिग्रह) लताओंके मण्डप हैं। मनका निग्रह, यम (अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह), नियम (शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान) ही उनके फूल हैं, ज्ञान फल है और श्रीहरिके चरणोंमें प्रेम ही इस ज्ञानरूपी फलका रस है। ऐसा वेदोंने कहा है।

चौपाई

औरउ कथा अनेक प्रसंगा। तेइ सुक पिक बहुबरन बिहंगा॥ ८ ॥

अर्थ:

इस (रामचरितमानस) में और भी जो अनेक प्रसंगों की कथाएँ हैं, वे ही इसमें तोते, कोयल आदि रंग-बिरंगे पक्षी हैं।

दोहा

पुलक बाटिका बाग बन सुख सुबिहंग बिहारु। माली सुमन सनेह जल सींचत लोचन चारु॥ ३७ ॥

अर्थ:

कथामें जो रोमाञ्च होता है वही वाटिका, बाग और वन हैं; और जो सुख होता है, वही सुन्दर पक्षियोंका विहार है। निर्मल मन ही माली है जो प्रेमरूपी जलसे सुन्दर नेत्रोंद्राय उनको सींचता है।

दोहा 38 के अंतर्गत
चौपाई

जे गावहिं यह चरित सँभारे। तेइ एहि ताल चतुर रखवारे॥ सदा सुनहिं सादर नर नारी। तेइ सुरबर मानस अधिकारी॥ १ ॥

अर्थ:

जो लोग इस चरित्र को सावधानी से गाते हैं, वे ही इस तालाब के चतुर रखवाले हैं और जो स्त्री-पुरुष सदा आदरपूर्वक इसे सुनते हैं, वे ही इस सुन्दर मानस के अधिकारी उत्तम देवता हैं।

चौपाई

अति खल जे बिषई बग कागा। एहि सर निकट न जाहिं अभागा॥ संबुक भेक सेवार समाना। इहाँ न बिषय कथा रस नाना॥ २ ॥

अर्थ:

जो अति दुष्ट और विषयी हैं वे अभागे बगुले और कौवे हैं, जो इस सरोवर के समीप नहीं जाते। क्योंकि यहाँ (इस मानस-सरोवर में) घोंघे, मेंढक और सेवार के समान विषय-रस की नाना कथाएँ नहीं हैं।

चौपाई

तेहि कारन आवत हियँ हारे। कामी काक बलाक बिचारे॥ आवत एहिं सर अति कठिनाई। राम कृपा बिनु आइ न जाई॥ ३ ॥

अर्थ:

इसी कारण बेचारे कामी कौवे और बगुले यहाँ आते हुए हृदय में हार मान जाते हैं। क्योंकि इस सरोवर तक आने में कठिनाइयाँ बहुत हैं। श्रीरामजी की कृपा बिना यहाँ नहीं आया जाता।

चौपाई

कठिन कुसंग कुपंथ कराला। तिन्ह के बचन बाघ हरि ब्याला॥ गृह कारज नाना जंजाला। ते अति दुर्गम सैल बिसाला॥ ४ ॥

अर्थ:

घोर कुसंग ही भयानक बुरा रास्ता है; उन कुसंगियों के वचन ही बाघ, सिंह और साँप हैं। घर के काम-काज और गृहस्थी के भाँति-भाँति के जंजाल ही अत्यन्त दुर्गम बड़े-बड़े पहाड़ हैं।

चौपाई

बन बहु बिषम मोह मद माना। नदीं कुतर्क भयंकर नाना॥ ५ ॥

अर्थ:

मोह, मद और मान ही बहुत-से बीहड़ वन हैं और नाना प्रकार के कुतर्क ही भयानक नदियाँ हैं।

दोहा

जे श्रद्धा संबल रहित नहिं संतन्ह कर साथ। तिन्ह कहुँ मानस अगम अति जिन्हहि न प्रिय रघुनाथ॥ ३८ ॥

अर्थ:

जिनके पास श्रद्धारूपी संबल नहीं है और संतों का साथ नहीं है और जिनको श्रीरघुनाथजी प्रिय नहीं हैं, उनके लिए यह मानस अत्यन्त ही अगम है। (अर्थात् श्रद्धा, सत्संग और भगवत्प्रेम के बिना कोई इसे नहीं पा सकता)।

दोहा 39 के अंतर्गत
चौपाई

जौं करि कष्ट जाइ पुनि कोई। जातहिं नीद जुड़ाई होई॥ जड़ता जाड़ बिषम उर लागा। गएहुँ न मज्जन पाव अभागा॥ १ ॥

अर्थ:

यदि कोई मनुष्य कष्ट उठाकर वहाँ तक पहुँच भी जाय, तो वहाँ जाते ही उसे नीद जुड़ाई होई। हृदय में मूर्खतारूपी बड़ा कड़ा जाड़ा लगने लगता है, जिससे वहाँ जाकर भी वह अभागा स्नान नहीं कर पाता।

चौपाई

करि न जाइ सर मज्जन पाना। फिरि आवइ समेत अभिमाना॥ जौं बहोरि कोउ पूछन आवा। सर निंदा करि ताहि बुझावा॥ २ ॥

अर्थ:

उससे उस सरोवर में स्नान और उसका जलपान तो किया नहीं जाता, वह अभिमान सहित लौट आता है। फिर यदि कोई उससे [वहाँ का हाल] पूछने आता है, तो वह [अपने अभाग्य की बात न कहकर] सरोवर की निन्दा करके उसे समझाता है।

चौपाई

सकल बिघ्न ब्यापहिं नहिं तेही। राम सुकृपाँ बिलोकहिं जेही॥ सोइ सादर सर मज्जनु करई। महा घोर त्रयताप न जरई॥ ३ ॥

अर्थ:

ये सारे विघ्न उसको नहीं व्यापते (बाधा नहीं देते) जिसे राम सुन्दर कृपा की दृष्टि से देखते हैं। वही आदरपूर्वक इस सरोवर में स्नान करता है और महान् भयानक त्रिताप से नहीं जलता।

चौपाई

ते नर यह सर तजहिं न काऊ। जिन्ह कें राम चरन भल भाऊ॥ जो नहाइ चह एहिं सर भाई। सो सतसंग करउ मन लाई॥ ४ ॥

अर्थ:

जिनके मन में श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में सुन्दर प्रेम है, वे इस सरोवर को कभी नहीं छोड़ते। हे भाई! जो इस सरोवर में स्नान करना चाहे वह मन लगाकर सत्संग करे।

चौपाई

अस मानस मानस चख चाही। भइ कबि बुद्धि बिमल अवगाही॥ भयउ हृदयँ आनंद उछाहू। उमगेउ प्रेम प्रमोद प्रबाहू॥ ५ ॥

अर्थ:

ऐसे मानस-सरोवर को हृदय के नेत्रों से देखकर और उसमें गोता लगाकर कवि की बुद्धि निर्मल हो गयी, हृदय में आनन्द और उत्साह भर गया और प्रेम तथा प्रमोद का प्रवाह उमड़ आया।

चौपाई

चली सुभग कबिता सरिता सो। राम बिमल जस जल भरिता सो॥ सरजू नाम सुमंगल मूला। लोक बेद मत मंजुल कूला॥ ६ ॥

अर्थ:

उससे वह सुन्दर कविता-रूपी नदी बह निकली, जिसमें श्रीरामजी का निर्मल यशरूपी जल भरा है। इसका नाम सरयू है, जो सम्पूर्ण सुन्दर मंगलों की जड़ है। लोक वेद मत इसके दो सुन्दर किनारे हैं।

चौपाई

नदी पुनीत सुमानस नंदिनि। कलिमल तृन तरु मूल निकंदिनि॥ ७ ॥

अर्थ:

यह सुन्दर मानस-सरोवर की कन्या सरयू नदी बड़ी पवित्र है और कलियुग के [छोटे-बड़े] पापरूपी तिनकों और वृक्षों को जड़ से उखाड़ फेंकने वाली है।

दोहा

श्रोता त्रिबिध समाज पुर ग्राम नगर दुहुँ कूल। संतसभा अनुपम अवध सकल सुमंगल मूल॥ ३९ ॥

अर्थ:

तीनों प्रकार के श्रोताओं का समाज ही इस नदी के दोनों किनारों पर बसे हुए पुरवे, गाँव और नगर हैं; और संतों की सभा ही सब सुन्दर मंगलों की जड़ अनुपम अवध है।

दोहा 40 के अंतर्गत
चौपाई

रामभगति सुरसरितहि जाई। मिली सुकीरति सरजु सुहाई॥ सानुज राम समर जसु पावन। मिलेउ महानदु सोन सुहावन॥ १ ॥

अर्थ:

सुन्दर कीर्तिरूपी सुहावनी सरयूजी रामभक्तिरूपी गंगाजी में जा मिलीं। छोटे भाई लक्ष्मण सहित श्रीरामजी के युद्ध का पवित्र यशरूपी सुहावना महानद सोन उसमें आ मिला।

चौपाई

जुग बिच भगति देवधुनि धारा। सोहति सहित सुबिरति बिचारा॥ त्रिबिध ताप त्रासक तिमुहानी। राम सरूप सिंधु समुहानी॥ २ ॥

अर्थ:

दोनोंके बीचमें भक्तिरूपी गङ्गाजी की धारा ज्ञान और वैराग्य के सहित शोभित हो रही है। ऐसी तीनों तापों को डरानेवाली यह तिमुहानी नदी रामस्वरूपरूपी समुद्र की ओर जा रही है।

चौपाई

मानस मूल मिली सुरसरिही। सुनत सुजन मन पावन करिही॥ बिच बिच कथा बिचित्र बिभागा। जनु सरि तीर तीर बन बागा॥ ३ ॥

अर्थ:

इस (कीर्तिरूपी सरयू) का मूल मानस (श्रीरामचरित) है और यह [रामभक्तिरूपी] गङ्गाजी में मिली है, इसलिए यह सुननेवाले सज्जनों के मन को पवित्र कर देगी। इसके बीच-बीच में जो भिन्न-भिन्न प्रकार की विचित्र कथाएँ हैं वे ही मानो नदी-तट के आस-पास के वन और बाग हैं।

चौपाई

उमा महेस बिबाह बराती। ते जलचर अगनित बहुभाँती॥ रघुबर जनम अनंद बधाई। भवँर तरंग मनोहरताई॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीपार्वतीजी और शिवजी के विवाह के बराती इस नदी में बहुत प्रकार के असंख्य जलचर जीव हैं। श्रीरघुनाथजी के जन्म की आनन्द-बधाइयाँ ही इस नदी के भँवर और तरंगों की मनोहरता है।

दोहा

बालचरित चहु बंधु के बनज बिपुल बहुरंग। नृप रानी परिजन सुकृत मधुकर बारि बिहंग॥ ४० ॥

अर्थ:

चारों भाइयों के जो बालचरित हैं, वे ही इसमें खिले हुए रंग-बिरंगे बहुत-से कमल हैं। महाराज श्रीदशरथजी तथा उनकी रानियों और कुटुम्बियों के सत्कर्म (पुण्य) ही भ्रमर और जल-पक्षी हैं।

दोहा 41 के अंतर्गत
चौपाई

सीय स्वयंबर कथा सुहाई। सरित सुहावनि सो छबि छाई॥ नदी नाव पटु प्रस्न अनेका। केवट कुसल उतर सबिबेका॥ १ ॥

अर्थ:

श्रीसीताजी के स्वयंवर की जो सुन्दर कथा है, वही इस नदी में सुहावनी छवि छा रही है। अनेकों सुन्दर विचारपूर्ण प्रश्न ही इस नदी की नावें हैं और उनके विवेकयुक्त उत्तर ही चतुर केवट हैं।

चौपाई

सुनि अनुकथन परस्पर होई। पथिक समाज सोह सरि सोई॥ घोर धार भृगुनाथ रिसानी। घाट सुबद्ध राम बर बानी॥ २ ॥

अर्थ:

इस कथा को सुनकर पीछे जो आपस में चर्चा होती है, वही इस नदी के सहारे-सहारे चलने वाले यात्रियों का समाज शोभा पा रहा है। परशुरामजी का क्रोध इस नदी की भयानक धारा है और श्रीरामचन्द्रजी के श्रेष्ठ वचन ही सुन्दर बँधे हुए घाट हैं।

चौपाई

सानुज राम बिबाह उछाहू। सो सुभ उमग सुखद सब काहू॥ कहत सुनत हरषहिं पुलकाहीं। ते सुकृती मन मुदित नहाहीं॥ ३ ॥

अर्थ:

भाइयों सहित श्रीरामचन्द्रजी के विवाह का उत्साह ही इस कथा-नदी की कल्याणकारिणी बाढ़ है, जो सभी को सुख देनेवाली है। इसके कहने-सुनने में जो हर्षित और पुलकित होते हैं, वे ही पुण्यात्मा पुरुष हैं, जो प्रसन्न मन से इस नदी में नहाते हैं।

चौपाई

राम तिलक हित मंगल साजा। परब जोग जनु जुरे समाजा॥ काई कुमति केकई केरी। परी जासु फल बिपति घनेरी॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी के राजतिलक के लिये जो मंगल-साज सजाया गया, वही मानो पर्व के समय इस नदी पर यात्रियों के समूह इकट्ठे हुए हैं। कैकेयी की कुबुद्धि ही इस नदी में काई है, जिसके फलस्वरूप बड़ी भारी विपत्ति आ पड़ी।

दोहा

समन अमित उतपात सब भरतचरित जपजाग। कलि अघ खल अवगुन कथन ते जलमल बग काग॥ ४१ ॥

अर्थ:

सम्पूर्ण अनगिनत उत्पातों को शान्त करनेवाला भरतजी का चरित्र नदी-तट पर किया जानेवाला जपयज्ञ है। कलियुग के पापों और दुष्टों के अवगुणों के जो वर्णन हैं वे ही इस नदी के जल का कीचड़ और बगुले-कौए हैं।

दोहा 42 के अंतर्गत
चौपाई

कीरति सरित छहूँ रितु रूरी। समय सुहावनि पावनि भूरी॥ हिम हिमसैलसुता सिव ब्याहू। सिसिर सुखद प्रभु जनम उछाहू॥ १ ॥

अर्थ:

यह कीर्तिरूपिणी नदी छहों ऋतुओं में सुन्दर है। सभी समय यह परम सुहावनी और अत्यन्त पवित्र है। इसमें शिव-पार्वती का विवाह हेमन्त ऋतु है। श्रीरामचन्द्रजी के जन्म का उत्सव सुखदायी शिशिर ऋतु है।

चौपाई

बरनब राम बिबाह समाजू। सो मुद मंगलमय रितुराजू॥ ग्रीषम दुसह राम बनगवनू। पंथकथा खर आतप पवनू॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी के विवाह-समाज का वर्णन ही आनन्द-मंगलमय ऋतुराज वसंत है। श्रीरामजी का वनगमन दुःसह ग्रीष्म-ऋतु है और मार्ग की कथा ही कड़ी धूप और लू है।

चौपाई

बरषा घोर निसाचर रारी। सुरकुल सालि सुमंगलकारी॥ राम राज सुख बिनय बड़ाई। बिसद सुखद सोइ सरद सुहाई॥ ३ ॥

अर्थ:

राक्षसों के साथ घोर युद्ध ही वर्षा-ऋतु है, जो देवकुलरूपी धान के लिये सुन्दर कल्याण करनेवाली है। रामचन्द्रजी के राज्यकाल का जो सुख, विनय और बड़ाई है वही निर्मल सुख देनेवाली सुहावनी शरद्-ऋतु है।

चौपाई

सती सिरोमनि सिय गुन गाथा। सोइ गुन अमल अनूपम पाथा॥ भरत सुभाउ सुसीतलताई। सदा एकरस बरनि न जाई॥ ४ ॥

अर्थ:

सती-शिरोमणि श्रीसीताजी के गुणों की जो कथा है, वही इस जल का निर्मल और अनुपम गुण है। श्रीभरतजी का स्वभाव इस नदी की सुन्दर शीतलता है, जो सदा एक-सी रहती है और जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।

दोहा

अवलोकनि बोलनि मिलनि प्रीति परसपर हास। भायप भलि चहु बंधु की जल माधुरी सुबास॥ ४२ ॥

अर्थ:

चारों भाइयों का परस्पर देखना, बोलना, मिलना, एक-दूसरे से प्रेम करना, हँसना और सुन्दर भाईपन इस जल की मधुरता और सुगन्ध हैं।

दोहा 43 के अंतर्गत
चौपाई

आरति बिनय दीनता मोरी। लघुता ललित सुबारि न थोरी॥ अदभुत सलिल सुनत गुनकारी। आस पिआस मनोमल हारी॥ १ ॥

अर्थ:

मेरा आर्तभाव, विनय और दीनता इस सुन्दर और निर्मल जल का कम हलकापन नहीं है (अर्थात्‌ अत्यन्त हलकापन है)। यह जल बड़ा ही अनोखा है, जो सुनने से ही गुणकारी है और आशा-प्यास तथा मनोमल को हर लेता है।

चौपाई

राम सुप्रेमहि पोषत पानी। हरत सकल कलि कलुष गलानी॥ भव श्रम सोषक तोषक तोषा। समन दुरित दुख दारिद दोषा॥ २ ॥

अर्थ:

यह जल श्रीरामचन्द्रजी के सुन्दर प्रेम को पुष्ट करता है, कलियुग के समस्त पापों और उनसे होनेवाली ग्लानि को हर लेता है। संसार के (जन्म-मृत्युरूप) श्रम को सोख लेता है, सन्तोष को भी सन्तुष्ट करता है और पाप, ताप, दरिद्रता और दोषों को नष्ट कर देता है।

चौपाई

काम कोह मद मोह नसावन। बिमल बिबेक बिराग बढ़ावन॥ सादर मज्जन पान किए तें। मिटहिं पाप परिताप हिए तें॥ ३ ॥

अर्थ:

यह जल काम, क्रोध, मद और मोह का नाश करनेवाला और निर्मल विवेक तथा वैराग्य को बढ़ानेवाला है। इसमें आदरपूर्वक स्नान करने से और इसे पीने से हृदय में रहनेवाले सब पाप-ताप मिट जाते हैं।

चौपाई

जिन्ह एहिं बारि न मानस धोए। ते कायर कलिकाल बिगोए॥ तृषित निरखि रबि कर भव बारी। फिरिहहिं मृग जिमि जीव दुखारी॥ ४ ॥

अर्थ:

जिन्होंने इस (राम-सुयशरूपी) जल से अपने मानस को नहीं धोया, वे कायर कलिकाल के द्वारा बिगोए गये। जैसे प्यासा हिरन सूर्य की किरणों के जल-भ्रम को वास्तविक जल समझकर पीने को दौड़ता है और जल न पाकर दुखी होता है, वैसे ही वे (कलियुग से ठगे हुए) जीव भी [विषयों के पीछे भटककर] दुःखी होंगे।

दोहा

मति अनुहारि सुबारि गुन गन गनि मन अन्हवाइ। सुमिरि भवानी संकरहि कह कबि कथा सुहाइ॥ ४३ (क) ॥

अर्थ:

अपनी बुद्धि के अनुसार इस सुन्दर जल के गुणों को गिनकर, उसमें अपने मन को स्नान कराकर और भवानी-शंकरजी को स्मरण करके कवि (तुलसीदास) सुन्दर कथा कहता है।

दोहा

अब रघुपति पद पंकरुह हियँ धरि पाइ प्रसाद। कहउँ जुगल मुनिबर्य कर मिलन सुभग संबाद॥ ४३ (ख) ॥

अर्थ:

मैं अब श्रीरघुनाथजी के चरणकमलों को हृदय में धारण कर और उनका प्रसाद पाकर दोनों श्रेष्ठ मुनियों के मिलन का सुन्दर संवाद वर्णन करता हूँ।