याज्ञवल्क्य-भरद्वाज संवाद तथा प्रयाग माहात्म्य
प्रयाग की पवित्र भूमि में भरद्वाज और याज्ञवल्क्य का संवाद आरम्भ होता है। तीर्थ-माहात्म्य और जिज्ञासा के इस प्रसंग से आगे रामकथा की भूमिका तैयार होती है।
बालकाण्ड · प्रकरण १५ / ५९
प्रकरण पाठ
तहाँ होइ मुनि रिषय समाजा। जाहिं जे मज्जन तीरथराजा॥ मज्जहिं प्रात समेत उछाहा। कहहिं परसपर हरि गुन गाहा॥ ४ ॥
अर्थ:
तीर्थराज प्रयाग में जो स्नान करने जाते हैं, उन ऋषि-मुनियों का समाज वहाँ (भरद्वाज के आश्रम में) जुटता है। प्रातःकाल सब उत्साहपूर्वक स्नान करते हैं और फिर परस्पर हरि के गुणों की कथाएँ कहते हैं।
नाथ एक संसउ बड़ मोरें। करगत बेदतत्त्व सबु तोरें॥ कहत सो मोहि लागत भय लाजा। जौं न कहउँ बड़ होइ अकाजा॥ ४ ॥
अर्थ:
हे नाथ! मेरे मन में एक बड़ा सन्देह है; वेदों का तत्त्व सब आपकी मुट्ठी में है (अर्थात् आप ही वेद का तत्त्व जाननेवाले होने के कारण मेरा सन्देह निवारण कर सकते हैं) पर उस सन्देह को कहते मुझे भय और लाज आती है [ भय इसलिये कि कहीं आप यह न समझें कि मेरी परीक्षा ले रहा है, लाज इसलिये कि इतनी आयु बीत गयी, अब तक ज्ञान न हुआ] और यदि नहीं कहता तो बड़ी हानि होती है [क्योंकि अज्ञानी बना रहता हूँ]।
सोपि राम महिमा मुनिराया। सिव उपदेसु करत करि दाया॥ रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही। कहिअ बुझाइ कृपानिधि मोही॥ ३ ॥
अर्थ:
हे मुनिराज! वह भी राम [नाम] की ही महिमा है, क्योंकि शिवजी महाराज दया करके [काशी में मरनेवाले जीव को] रामनाम का ही उपदेश करते हैं [इसीसे उनको परमपद मिलता है]। हे प्रभो! मैं आपसे पूछता हूँ कि वे राम कौन हैं? हे कृपानिधान! मुझे समझाकर कहिये।
रामभगत तुम्ह मन क्रम बानी। चतुराई तुम्हारि मैं जानी॥ चाहहु सुनै राम गुन गूढ़ा। कीन्हिहु प्रस्न मनहुँ अति मूढ़ा॥ २ ॥
अर्थ:
तुम मन, कर्म और वाणी से श्रीरामजी के भक्त हो। तुम्हारी चतुराई को मैं जान गया। तुम श्रीरामजी के रहस्यमय गुणों को सुनना चाहते हो; इसी से तुमने ऐसा प्रश्न किया है मानो बड़े ही मूढ़ हो।
संकर उर अति छोभु सती न जानहिं मरमु सोइ। तुलसी दरसन लोभु मन डरु लोचन लालची॥ ४८ (ख) ॥
अर्थ:
श्रीशंकरजी के हृदय में इस बात को लेकर बड़ी खलबली उत्पन्न हो गयी, परन्तु सतीजी इस भेद को नहीं जानती थीं। तुलसीदासजी कहते हैं कि शिवजी के मन में [भेद खुलने का] डर था, परन्तु दर्शन के लोभ से उनके नेत्र ललचा रहे थे।
रावन मरन मनुज कर जाचा। प्रभु बिधि बचनु कीन्ह चह साचा॥ जौं नहिं जाउँ रहइ पछितावा। करत बिचारु न बनत बनावा॥ १ ॥
अर्थ:
रावण ने [ब्रह्माजी से] अपनी मृत्यु मनुष्य के हाथ से माँगी थी। ब्रह्माजी के वचनों को प्रभु सत्य करना चाहते हैं। मैं जो पास नहीं जाता हूँ तो बड़ा पछतावा रह जायगा। इस प्रकार शिवजी विचार करते थे, परन्तु कोई भी युक्ति ठीक नहीं बैठती थी।
करि छलु मूढ़ हरी बैदेही। प्रभु प्रभाउ तस बिदित न तेही॥ मृग बधि बंधु सहित हरि आए। आश्रमु देखि नयन जल छाए॥ ३ ॥
अर्थ:
मूर्ख (रावण) ने छल करके सीताजी को हर लिया। उसे श्रीरामचन्द्रजी के वास्तविक प्रभाव का कुछ भी पता न था। मृग को मारकर भाई लक्ष्मण सहित श्रीहरि आश्रम में आये और उसे खाली देखकर (अर्थात् वहाँ सीताजी को न पाकर) उनके नेत्रों में आँसू भर आये।