याज्ञवल्क्य-भरद्वाज संवाद तथा प्रयाग माहात्म्य

प्रयाग की पवित्र भूमि में भरद्वाज और याज्ञवल्क्य का संवाद आरम्भ होता है। तीर्थ-माहात्म्य और जिज्ञासा के इस प्रसंग से आगे रामकथा की भूमिका तैयार होती है।

बालकाण्ड · प्रकरण १५ / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा। तिन्हहि राम पद अति अनुरागा॥ तापस सम दम दया निधाना। परमारथ पथ परम सुजाना॥ १ ॥

अर्थ:

भरद्वाज मुनि प्रयाग में बसते हैं, उनका श्रीरामजी के चरणों में अत्यन्त प्रेम है। वे तपस्वी, निगृहीतचित्त, जितेन्द्रिय, दया के निधान और परमार्थ के मार्ग में बड़े ही चतुर हैं।

चौपाई

माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई॥ देव दनुज किंनर नर श्रेनीं। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं॥ २ ॥

अर्थ:

माघ में जब सूर्य मकर राशि पर जाते हैं तब सब लोग तीर्थराज प्रयाग को आते हैं। देवता, दैत्य, किन्नर और मनुष्यों के समूह सब आदरपूर्वक त्रिवेणी में स्नान करते हैं।

चौपाई

पूजहिं माधव पद जलजाता। परसि अखय बटु हरषहिं गाता॥ भरद्वाज आश्रम अति पावन। परम रम्य मुनिबर मन भावन॥ ३ ॥

अर्थ:

श्रीवेणीमाधवजी के चरणकमलों को पूजते हैं और अक्षय बटु का स्पर्श कर उनके शरीर पुलकित होते हैं। भरद्वाजजी का आश्रम बहुत ही पवित्र, परम रमणीय और श्रेष्ठ मुनियों के मन को भानेवाला है।

चौपाई

तहाँ होइ मुनि रिषय समाजा। जाहिं जे मज्जन तीरथराजा॥ मज्जहिं प्रात समेत उछाहा। कहहिं परसपर हरि गुन गाहा॥ ४ ॥

अर्थ:

तीर्थराज प्रयाग में जो स्नान करने जाते हैं, उन ऋषि-मुनियों का समाज वहाँ (भरद्वाज के आश्रम में) जुटता है। प्रातःकाल सब उत्साहपूर्वक स्नान करते हैं और फिर परस्पर हरि के गुणों की कथाएँ कहते हैं।

दोहा

ब्रह्म निरूपन धरम बिधि बरनहिं तत्त्व बिभाग। कहहिं भगति भगवंत कै संजुत ग्यान बिराग॥ ४४ ॥

अर्थ:

ब्रह्म का निरूपण, धर्म की विधि और तत्त्वों के विभाग का वर्णन करते हैं तथा ज्ञान-वैराग्य से युक्त भगवान् की भक्ति का कथन करते हैं।

दोहा 45 के अंतर्गत
चौपाई

एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं। पुनि सब निज निज आश्रम जाहीं॥ प्रति संबत अति होइ अनंदा। मकर मज्जि गवनहिं मुनिबृंदा॥ १ ॥

अर्थ:

इसी प्रकार माघ भर स्नान करते हैं और फिर सब अपने-अपने आश्रमों को चले जाते हैं। हर साल वहाँ इसी तरह बड़ा आनन्द होता है। मकर में स्नान करके मुनिगण चले जाते हैं।

चौपाई

एक बार भरि मकर नहाए। सब मुनीस आश्रमन्ह सिधाए॥ जागबलिक मुनि परम बिबेकी। भरद्वाज राखे पद टेकी॥ २ ॥

अर्थ:

एक बार पूरे मकर भर स्नान करके सब मुनीश्वर अपने-अपने आश्रमों को लौट गये। परम ज्ञानी जागबलिक मुनि को चरण पकड़कर भरद्वाजजी ने रख लिया।

चौपाई

सादर चरन सरोज पखारे। अति पुनीत आसन बैठारे॥ करि पूजा मुनि सुजसु बखानी। बोले अति पुनीत मृदु बानी॥ ३ ॥

अर्थ:

आदरपूर्वक उनके चरणकमल धोये और बड़े ही पवित्र आसन पर उन्हें बैठाया। पूजा करके मुनि याज्ञवल्क्यजी के सुयश का वर्णन किया और फिर अत्यन्त पवित्र और कोमल वाणी से बोले--।

चौपाई

नाथ एक संसउ बड़ मोरें। करगत बेदतत्त्व सबु तोरें॥ कहत सो मोहि लागत भय लाजा। जौं न कहउँ बड़ होइ अकाजा॥ ४ ॥

अर्थ:

हे नाथ! मेरे मन में एक बड़ा सन्देह है; वेदों का तत्त्व सब आपकी मुट्ठी में है (अर्थात्‌ आप ही वेद का तत्त्व जाननेवाले होने के कारण मेरा सन्देह निवारण कर सकते हैं) पर उस सन्देह को कहते मुझे भय और लाज आती है [ भय इसलिये कि कहीं आप यह न समझें कि मेरी परीक्षा ले रहा है, लाज इसलिये कि इतनी आयु बीत गयी, अब तक ज्ञान न हुआ] और यदि नहीं कहता तो बड़ी हानि होती है [क्योंकि अज्ञानी बना रहता हूँ]।

दोहा

संत कहहिं असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव। होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किएँ दुराव॥ ४५ ॥

अर्थ:

हे प्रभो! संतलोग ऐसी नीति कहते हैं और श्रुति, पुराण तथा मुनिजन भी यही बतलाते हैं कि गुरु के साथ छिपाव करने से हृदय में निर्मल विवेक नहीं होता।

दोहा 46 के अंतर्गत
चौपाई

अस बिचारि प्रगटउँ निज मोहू। हरहु नाथ करि जन पर छोहू॥ राम नाम कर अमित प्रभावा। संत पुरान उपनिषद गावा॥ १ ॥

अर्थ:

यही सोचकर मैं अपना अज्ञान प्रकट करता हूँ। हे नाथ! सेवक पर कृपा करके इस अज्ञान का नाश कीजिए। राम नाम का असीम प्रभाव संतों, पुराणों और उपनिषदों ने गाया है।

चौपाई

संतत जपत संभु अबिनासी। सिव भगवान ग्यान गुन रासी॥ आकर चारि जीव जग अहहीं। कासीं मरत परम पद लहहीं॥ २ ॥

अर्थ:

कल्याणस्वरूप, ज्ञान और गुणों की राशि, अविनाशी भगवान् शम्भु निरन्तर रामनाम का जप करते रहते हैं। संसार में चार जाति के जीव हैं, काशी में मरने से सभी परमपद को प्राप्त करते हैं।

चौपाई

सोपि राम महिमा मुनिराया। सिव उपदेसु करत करि दाया॥ रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही। कहिअ बुझाइ कृपानिधि मोही॥ ३ ॥

अर्थ:

हे मुनिराज! वह भी राम [नाम] की ही महिमा है, क्योंकि शिवजी महाराज दया करके [काशी में मरनेवाले जीव को] रामनाम का ही उपदेश करते हैं [इसीसे उनको परमपद मिलता है]। हे प्रभो! मैं आपसे पूछता हूँ कि वे राम कौन हैं? हे कृपानिधान! मुझे समझाकर कहिये।

चौपाई

एक राम अवधेस कुमारा। तिन्ह कर चरित बिदित संसारा॥ नारि बिरहँ दुखु लहेउ अपारा। भयउ रोषु रन रावनु मारा॥ ४ ॥

अर्थ:

एक राम तो अवधनरेश दशरथजी के कुमार हैं, उनका चरित्र सारा संसार जानता है। उन्होंने स्त्री के विरह में अपार दुःख उठाया और क्रोध आने पर युद्ध में रावण को मार डाला।

दोहा

प्रभु सोइ राम कि अपर कोउ जाहि जपत त्रिपुरारि। सत्यधाम सर्बग्य तुम्ह कहहु बिबेकु बिचारि॥ ४६ ॥

अर्थ:

हे प्रभो! वही राम हैं या और कोई दूसरे हैं, जिनको शिवजी जपते हैं? आप सत्य के धाम हैं और सब कुछ जानते हैं, ज्ञान विचारकर कहिये।

दोहा 47 के अंतर्गत
चौपाई

जैसें मिटै मोर भ्रम भारी। कहहु सो कथा नाथ बिस्तारी॥ जागबलिक बोले मुसुकाई। तुम्हहि बिदित रघुपति प्रभुताई॥ १ ॥

अर्थ:

हे नाथ! जिस प्रकार से मेरा यह भारी भ्रम मिट जाए, आप वही कथा विस्तारपूर्वक कहिये। इस पर याज्ञवल्क्यजी मुसकराकर बोले, श्रीरघुनाथजी की प्रभुता को तुम जानते हो।

चौपाई

रामभगत तुम्ह मन क्रम बानी। चतुराई तुम्हारि मैं जानी॥ चाहहु सुनै राम गुन गूढ़ा। कीन्हिहु प्रस्न मनहुँ अति मूढ़ा॥ २ ॥

अर्थ:

तुम मन, कर्म और वाणी से श्रीरामजी के भक्त हो। तुम्हारी चतुराई को मैं जान गया। तुम श्रीरामजी के रहस्यमय गुणों को सुनना चाहते हो; इसी से तुमने ऐसा प्रश्न किया है मानो बड़े ही मूढ़ हो।

चौपाई

तात सुनहु सादर मनु लाई। कहउँ राम कै कथा सुहाई॥ महामोहु महिषेसु बिसाला। रामकथा कालिका कराला॥ ३ ॥

अर्थ:

हे तात! तुम आदरपूर्वक मन लगाकर सुनो; मैं श्रीरामजी की सुन्दर कथा कहता हूँ। बड़ा भारी अज्ञान विशाल महिषासुर है और श्रीरामजी की कथा [उसे नष्ट कर देनेवाली] भयंकर कालीजी हैं।

चौपाई

रामकथा ससि किरन समाना। संत चकोर करहिं जेहि पाना॥ ऐसेइ संसय कीन्ह भवानी। महादेव तब कहा बखानी॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी की कथा चन्द्रमा की किरणों के समान है, जिसे संतरूपी चकोर सदा पान करते हैं। ऐसा ही सन्देह पार्वतीजी ने किया था, तब महादेवजी ने विस्तार से उसका उत्तर दिया था।

दोहा

कहउँ सो मति अनुहारि अब उमा संभु संबाद। भयउ समय जेहि हेतु जेहि सुनु मुनि मिटिहि बिषाद॥ ४७ ॥

अर्थ:

अब मैं अपनी बुद्धि के अनुसार वही उमा और शिवजी का संवाद कहता हूँ। वह जिस समय और जिस हेतु से हुआ, उसे हे मुनि! तुम सुनो, तुम्हारा विषाद मिट जायगा।

दोहा 48 के अंतर्गत
चौपाई

एक बार त्रेता जुग माहीं। संभु गए कुंभज रिषि पाहीं॥ संग सती जगजननि भवानी। पूजे रिषि अखिलेस्वर जानी॥ १ ॥

अर्थ:

एक बार त्रेतायुग में शिवजी अगस्त्य ऋषि के पास गये। उनके साथ जगज्जननी भवानी सतीजी भी थीं। ऋषि ने सम्पूर्ण जगत् के ईश्वर जानकर उनका पूजन किया।

चौपाई

रामकथा मुनिबर्ज बखानी। सुनी महेस परम सुखु मानी॥ रिषि पूछी हरिभगति सुहाई। कही संभु अधिकारी पाई॥ २ ॥

अर्थ:

मुनिवर अगस्त्यजी ने रामकथा विस्तार से कही, जिसको महेश्वर ने परम सुख मानकर सुना। फिर ऋषि ने शिवजी से सुन्दर हरिभक्ति पूछी और शिवजी ने उनको अधिकारी पाकर [रहस्यसहित] भक्ति का निरूपण किया।

चौपाई

कहत सुनत रघुपति गुन गाथा। कछु दिन तहाँ रहे गिरिनाथा॥ मुनि सन बिदा मागि त्रिपुरारी। चले भवन सँग दच्छकुमारी॥ ३ ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी के गुणों की कथाएँ कहते-सुनते कुछ दिनों तक शिवजी वहाँ रहे। फिर मुनि से विदा माँगकर शिवजी दक्षकुमारी सतीजी के साथ घर (कैलास) को चले।

चौपाई

तेहि अवसर भंजन महिभारा। हरि रघुबंस लीन्ह अवतारा॥ पिता बचन तजि राजु उदासी। दंडक बन बिचरत अबिनासी॥ ४ ॥

अर्थ:

उन्हीं दिनों पृथ्वी का भार उतारने के लिए श्रीहरि ने रघुवंश में अवतार लिया था। वे अविनाशी भगवान् उस समय पिता के वचन से राज्य का त्याग करके तपस्वी या साधुवेश में दण्डक वन में विचर रहे थे।

दोहा

हृदयँ बिचारत जात हर केहि बिधि दरसनु होइ। गुप्त रूप अवतरेउ प्रभु गएँ जान सबु कोइ॥ ४८ (क) ॥

अर्थ:

शिवजी हृदय में विचारते जा रहे थे कि भगवान् के दर्शन मुझे किस प्रकार हों। प्रभु ने गुप्त रूप से अवतार लिया है, मेरे जाने से सब लोग जान जायँगे।

सोरठा

संकर उर अति छोभु सती न जानहिं मरमु सोइ। तुलसी दरसन लोभु मन डरु लोचन लालची॥ ४८ (ख) ॥

अर्थ:

श्रीशंकरजी के हृदय में इस बात को लेकर बड़ी खलबली उत्पन्न हो गयी, परन्तु सतीजी इस भेद को नहीं जानती थीं। तुलसीदासजी कहते हैं कि शिवजी के मन में [भेद खुलने का] डर था, परन्तु दर्शन के लोभ से उनके नेत्र ललचा रहे थे।

दोहा 49 के अंतर्गत
चौपाई

रावन मरन मनुज कर जाचा। प्रभु बिधि बचनु कीन्ह चह साचा॥ जौं नहिं जाउँ रहइ पछितावा। करत बिचारु न बनत बनावा॥ १ ॥

अर्थ:

रावण ने [ब्रह्माजी से] अपनी मृत्यु मनुष्य के हाथ से माँगी थी। ब्रह्माजी के वचनों को प्रभु सत्य करना चाहते हैं। मैं जो पास नहीं जाता हूँ तो बड़ा पछतावा रह जायगा। इस प्रकार शिवजी विचार करते थे, परन्तु कोई भी युक्ति ठीक नहीं बैठती थी।

चौपाई

एहि बिधि भए सोचबस ईसा। तेही समय जाइ दससीसा॥ लीन्ह नीच मारीचहि संगा। भयउ तुरत सोइ कपट कुरंगा॥ २ ॥

अर्थ:

इस प्रकार महादेवजी चिन्ता के वश हो गये। उसी समय नीच रावण ने जाकर मारीच को साथ लिया और वह (मारीच) तुरंत कपटमृग बन गया।

चौपाई

करि छलु मूढ़ हरी बैदेही। प्रभु प्रभाउ तस बिदित न तेही॥ मृग बधि बंधु सहित हरि आए। आश्रमु देखि नयन जल छाए॥ ३ ॥

अर्थ:

मूर्ख (रावण) ने छल करके सीताजी को हर लिया। उसे श्रीरामचन्द्रजी के वास्तविक प्रभाव का कुछ भी पता न था। मृग को मारकर भाई लक्ष्मण सहित श्रीहरि आश्रम में आये और उसे खाली देखकर (अर्थात् वहाँ सीताजी को न पाकर) उनके नेत्रों में आँसू भर आये।

चौपाई

बिरह बिकल नर इव रघुराई। खोजत बिपिन फिरत दोउ भाई॥ कबहूँ जोग बियोग न जाकें। देखा प्रगट बिरह दुखु ताकें॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी मनुष्यों की भाँति विरह से व्याकुल हैं और दोनों भाई वन में सीता को खोजते हुए फिर रहे हैं। जिनके कभी कोई संयोग-वियोग नहीं है, उनमें प्रत्यक्ष विरह का दुःख देखा गया।

दोहा

अति बिचित्र रघुपति चरित जानहिं परम सुजान। जे मतिमंद बिमोह बस हृदयँ धरहिं कछु आन॥ ४९ ॥

अर्थ:

श्रीरघुनाथजी का चरित्र बड़ा ही विचित्र है, उसको पहुँचे हुए ज्ञानीजन ही जानते हैं। जो मन्दबुद्धि हैं, वे तो विशेषरूप से मोह के वश होकर हृदय में कुछ दूसरी ही बात समझ बैठते हैं।