श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध
राजा जनक के वचन सुनकर श्रीलक्ष्मणजी का वीर रस उमड़ पड़ता है। वे रघुवंश की महिमा प्रकट करते हुए सभा में अपना धर्मयुक्त रोष व्यक्त करते हैं।
बालकाण्ड · प्रकरण ५१ / ५९
प्रकरण पाठ
बंदि पितर सुर सुकृत सँभारे। जौं कछु पुन्य प्रभाउ हमारे॥ तौ सिवधनु मृनाल की नाईं। तोरहुँ रामु गनेस गोसाईं॥ ४ ॥
अर्थ:
उन्होंने पितरों और देवताओं की वन्दना करके अपने पुण्यों का स्मरण किया। यदि हमारे पुण्यों का कुछ भी प्रभाव हो, तो हे गणेश गोसाईं! रामचन्द्रजी शिवजी के धनुष को कमल की डंडी की भाँति तोड़ डालें।
सखि सब कौतुकु देखनिहारे। जेउ कहावत हितू हमारे॥ कोउ न बुझाइ कहइ गुर पाहीं। ए बालक असि हठ भलि नाहीं॥ १ ॥
अर्थ:
हे सखी! ये जो हमारे हितू कहलाते हैं, वे भी सब तमाशा देखनेवाले हैं। कोई भी इन्हें गुरु विश्वामित्रजी को समझाकर नहीं कहता कि ये (रामजी) बालक हैं, इनके लिये ऐसा हठ अच्छा नहीं। [जो धनुष रावण और बाण-जैसे जगद्विजयी वीरों के हिलाये न हिल सका, उसे तोड़ने के लिये मुनि विश्वामित्रजी का रामजी को आज्ञा देना और रामजी का उसे तोड़ने के लिये चल देना रानी को हठ जान पड़ा, इसलिये वे कहने लगीं कि गुरु विश्वामित्रजी को कोई समझाता भी नहीं।]
भूप सयानप सकल सिरानी। सखि बिधि गति कछु जाति न जानी॥ बोली चतुर सखी मृदु बानी। तेजवंत लघु गनिअ न रानी॥ ३ ॥
अर्थ:
राजा का भी सारा सयानापन समाप्त हो गया। हे सखी! विधाता की गति कुछ जानने में नहीं आती। तब एक चतुर सखी कोमल वाणी से बोली—हे रानी! तेजवान् को [देखने में छोटा होने पर भी] छोटा नहीं गिनना चाहिये।
कहँ कुंभज कहँ सिंधु अपारा। सोषेउ सुजसु सकल संसारा॥ रबि मंडल देखत लघु लागा। उदयँ तासु तिभुवन तम भागा॥ ४ ॥
अर्थ:
कहाँ घड़े से उत्पन्न होनेवाले [छोटे-से] मुनि अगस्त्य और कहाँ अपार समुद्र? किन्तु उन्होंने उसे सोख लिया, जिसका सुयश सारे संसार में छाया हुआ है। सूर्य मण्डल देखने में छोटा लगता है, पर उसके उदय होते ही तीनों लोकों का अन्धकार भाग जाता है।
सखी बचन सुनि भै परतीती। मिटा बिषादु बढ़ी अति प्रीती॥ तब रामहि बिलोकि बैदेही। सभय हृदयँ बिनवति जेहि तेही॥ २ ॥
अर्थ:
सखी के वचन सुनकर रानी को [श्रीरामजी के सामर्थ्य के सम्बन्ध में] विश्वास हो गया। उनकी उदासी मिट गयी और श्रीरामजी के प्रति उनका प्रेम अत्यन्त बढ़ गया। उस समय श्रीरामचन्द्रजी को देखकर सीताजी भयभीत हृदय से जिस-तिस [देवता] से विनती कर रही हैं।
नीकें निरखि नयन भरि सोभा। पितु पनु सुमिरि बहुरि मनु छोभा॥ अहह तात दारुनि हठ ठानी। समुझत नहिं कछु लाभु न हानी॥ १ ॥
अर्थ:
अच्छी तरह नेत्र भरकर श्रीरामजी की शोभा देखकर, फिर पिताजी के प्रण का स्मरण करके सीताजी का मन क्षुब्ध हो उठा। [वे मन-ही-मन कहने लगीं—] अहो! पिताजी ने बड़ा ही कठिन हठ ठाना है, वे लाभ-हानि कुछ भी नहीं समझ रहे हैं।
बिधि केहि भाँति धरौं उर धीरा। सिरस सुमन कन बेधिअ हीरा॥ सकल सभा कै मति भै भोरी। अब मोहि संभुचाप गति तोरी॥ ३ ॥
अर्थ:
हे विधाता! मैं हृदय में किस तरह धीरज धरूँ, सिरस के फूल के कण से कहीं हीरा छेदा जाता है। सारी सभा की बुद्धि भोली (बावली) हो गयी है, अतः हे शिवजी के धनुष! अब तो मुझे तुम्हारा ही आसरा है।
निज जड़ता लोगन्ह पर डारी। होहि हरुअ रघुपतिहि निहारी॥ अति परिताप सीय मन माहीं। लव निमेष जुग सय सम जाहीं॥ ४ ॥
अर्थ:
तुम अपनी जड़ता लोगों पर डालकर, श्रीरघुनाथजी [के सुकुमार शरीर] को देखकर [उतने ही] हलके हो जाओ। इस प्रकार सीताजी के मन में बड़ा ही सन्ताप हो रहा है। निमेष का एक लव (अंश) भी सौ युगों के समान बीत रहा है।
गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी। प्रगट न लाज निसा अवलोकी॥ लोचन जलु रह लोचन कोना। जैसें परम कृपन कर सोना॥ १ ॥
अर्थ:
सीताजी की वाणीरूपी भ्रमरी को उनके मुखरूपी कमल ने रोक रखा है। लाजरूपी रात्रि को देखकर वह प्रकट नहीं हो रही है। नेत्रों का जल नेत्रों के कोने में ही रह जाता है। जैसे बड़े भारी कंजूस का सोना कोने में ही गड़ा रह जाता है।
सकुची ब्याकुलता बड़ि जानी। धरि धीरजु प्रतीति उर आनी॥ तन मन बचन मोर पनु साचा। रघुपति पद सरोज चितु राचा॥ २ ॥
अर्थ:
अपनी बढ़ी हुई व्याकुलता जानकर सीताजी सकुचा गयीं और धीरज धरकर हृदय में विश्वास ले आयीं कि यदि तन, मन और वचन से मेरा प्रण सच्चा है और श्रीरघुनाथजी के चरणकमलों में मेरा चित्त वास्तव में अनुरक्त है,
प्रभु तन चितइ प्रेम तन ठाना। कृपानिधान राम सबु जाना॥ सियहि बिलोकि तकेउ धनु कैसें। चितव गरुरु लघु ब्यालहि जैसें॥ ४ ॥
अर्थ:
प्रभु की ओर देखकर सीताजी ने शरीर के द्वारा प्रेम ठान लिया (अर्थात् यह निश्चय कर लिया कि यह शरीर इन्हीं का होकर रहेगा या रहेगा ही नहीं)। कृपानिधान श्रीरामजी सब जान गये। उन्होंने सीताजी को देखकर धनुष की ओर कैसे ताका, जैसे गरुड़जी छोटे-से साँप की ओर देखते हैं।