श्रीलक्ष्मणजी का क्रोध

राजा जनक के वचन सुनकर श्रीलक्ष्मणजी का वीर रस उमड़ पड़ता है। वे रघुवंश की महिमा प्रकट करते हुए सभा में अपना धर्मयुक्त रोष व्यक्त करते हैं।

बालकाण्ड · प्रकरण ५१ / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

जनक बचन सुनि सब नर नारी। देखि जानकिहि भए दुखारी॥ माखे लखनु कुटिल भइँ भौंहें। रदपट फरकत नयन रिसौंहें॥ ४ ॥

अर्थ:

जनक के वचन सुनकर सभी नर-नारी जानकीजी को देखकर दुःखी हुए। लक्ष्मणजी तमतमा उठे, उनकी भौंहें टेढ़ी हो गईं, ओठ फड़कने लगे और नेत्र क्रोध से लाल हो गए।

दोहा

कहि न सकत रघुबीर डर लगे बचन जनु बान। नाइ राम पद कमल सिरु बोले गिरा प्रमान॥ २५२ ॥

अर्थ:

श्रीरघुवीरजी के डर से वे कुछ कह तो नहीं सकते, पर जनक के वचन उन्हें बाण-से लगे। जब न रहा गया, तब श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमलों में सिर नवाकर वे यथार्थ वचन बोले—

दोहा 253 के अंतर्गत
चौपाई

रघुबंसिन्ह महुँ जहँ कोउ होई। तेहिं समाज अस कहइ न कोई॥ कही जनक जसि अनुचित बानी। बिद्यमान रघुकुलमनि जानी॥ १ ॥

अर्थ:

रघुवंशियों में जहाँ कोई भी हो, उस समाज में ऐसे वचन कोई नहीं कहता, जैसे अनुचित वचन रघुकुलमणि श्रीरामजी को उपस्थित जानकर भी जनकजी ने कहे।

चौपाई

सुनहु भानुकुल पंकज भानू। कहउँ सुभाउ न कछु अभिमानू॥ जौं तुम्हारि अनुसासन पावौं। कंदुक इव ब्रह्मांड उठावौं॥ २ ॥

अर्थ:

हे सूर्यकुलरूपी कमल के सूर्य! सुनिए, मैं स्वभाव ही से कहता हूँ, कुछ अभिमान करके नहीं, यदि आपकी आज्ञा पाऊँ, तो मैं ब्रह्माण्ड को गेंद की तरह उठा लूँ।

चौपाई

काचे घट जिमि डारौं फोरी। सकउँ मेरु मूलक जिमि तोरी॥ तव प्रताप महिमा भगवाना। को बापुरो पिनाक पुराना॥ ३ ॥

अर्थ:

और उसे कच्चे घड़े की तरह फोड़ डालूँ। मैं मेरु पर्वत को मूली की तरह तोड़ सकता हूँ, हे भगवान! आपके प्रताप की महिमा से यह बेचारा पुराना पिनाक तो कौन चीज है।

चौपाई

नाथ जानि अस आयसु होऊ। कौतुकु करौं बिलोकिअ सोऊ॥ कमल नाल जिमि चाप चढ़ावौं। जोजन सत प्रमान लै धावौं॥ ४ ॥

अर्थ:

ऐसा जानकर हे नाथ! आज्ञा हो तो कुछ खेल करूँ, उसे भी देखिए। धनुष को कमल की नाल की तरह चढ़ाकर सौ योजन तक दौड़ा ले जाऊँ।

दोहा

तोरौं छत्रक दंड जिमि तव प्रताप बल नाथ। जौं न करौं प्रभु पद सपथ कर न धरौं धनु भाथ॥ २५३ ॥

अर्थ:

हे नाथ! आपके प्रताप के बल से धनुष को कुकुरमुत्ते (बरसाती छत्ते) की तरह तोड़ दूँ। यदि ऐसा न करूँ तो प्रभु के चरणों की शपथ है, फिर मैं धनुष और तरकस को कभी हाथ में भी न लूँगा।

दोहा 254 के अंतर्गत
चौपाई

लखन सकोप बचन जे बोले। डगमगानि महि दिग्गज डोले॥ सकल लोग सब भूप डेराने। सिय हियँ हरषु जनकु सकुचाने॥ १ ॥

अर्थ:

ज्यों ही लक्ष्मणजी ने क्रोध भरे वचन बोले कि पृथ्वी डगमगा उठी और दिशाओं के हाथी काँप उठे। सभी लोग और सब राजा डर गये। सीताजी के हृदय में हर्ष हुआ और जनकजी सकुचा गये।

चौपाई

गुर रघुपति सब मुनि मन माहीं। मुदित भए पुनि पुनि पुलकाहीं॥ सयनहिं रघुपति लखनु नेवारे। प्रेम समेत निकट बैठारे॥ २ ॥

अर्थ:

गुरु विश्वामित्रजी, श्रीरघुनाथजी और सब मुनि मन में प्रसन्न हुए और बार-बार पुलकित होने लगे। श्रीरघुपति ने संकेत से लक्ष्मण को रोका और प्रेम सहित अपने निकट बैठा लिया।

चौपाई

बिस्वामित्र समय सुभ जानी। बोले अति सनेहमय बानी॥ उठहु राम भंजहु भवचापा। मेटहु तात जनक परितापा॥ ३ ॥

अर्थ:

विश्वामित्रजी ने शुभ समय जानकर अत्यन्त स्नेहमयी वाणी बोली—उठो, राम! शिवजी का धनुष तोड़ो और हे तात! जनक का परिताप मिटाओ।

चौपाई

सुनि गुरु बचन चरन सिरु नावा। हरषु बिषादु न कछु उर आवा॥ ठाढ़े भए उठि सहज सुभाएँ। ठवनि जुबा मृगराजु लजाएँ॥ ४ ॥

अर्थ:

गुरु के वचन सुनकर श्रीरामजी ने चरणों में सिर नवाया। उनके हृदय में न हर्ष आया, न विषाद; और वे सहज स्वभाव से उठ खड़े हुए, ऐसी शान से कि जवान सिंह भी लजाए।

दोहा

उदित उदयगिरि मंच पर रघुबर बालपतंग। बिकसे संत सरोज सब हरषे लोचन भृंग॥ २५४ ॥

अर्थ:

उदयगिरि रूपी मंच पर रघुवर रूपी बालसूर्य के उदित होते ही सब संतरूपी कमल खिल उठे और नेत्ररूपी भौरे हर्षित हो गये।

दोहा 255 के अंतर्गत
चौपाई

नृपन्ह केरि आसा निसि नासी। बचन नखत अवली न प्रकासी॥ मानी महिप कुमुद सकुचाने। कपटी भूप उलूक लुकाने॥ १ ॥

अर्थ:

राजाओं की आशारूपी रात्रि नष्ट हो गयी। उनके वचनरूपी तारों के समूह का चमकना बंद हो गया (वे मौन हो गये)। अभिमानी राजारूपी कुमुद संकुचित हो गये और कपटी राजारूपी उल्लू छिप गये।

चौपाई

भए बिसोक कोक मुनि देवा। बरिसहिं सुमन जनावहिं सेवा॥ गुर पद बंदि सहित अनुरागा। राम मुनिन्ह सन आयसु मागा॥ २ ॥

अर्थ:

मुनि और देवतारूपी चकवे शोकरहित हो गये। वे फूल बरसाकर अपनी सेवा प्रकट कर रहे हैं। प्रेमसहित गुरु के चरणों की वन्दना करके श्रीरामचन्द्रजी ने मुनियों से आज्ञा माँगी।

चौपाई

सहजहिं चले सकल जग स्वामी। मत्त मंजु बर कुंजर गामी॥ चलत राम सब पुर नर नारी। पुलक पूरि तन भए सुखारी॥ ३ ॥

अर्थ:

समस्त जगत् के स्वामी श्रीरामजी सुन्दर मतवाले श्रेष्ठ हाथी की-सी चाल से स्वाभाविक ही चले। श्रीरामचन्द्रजी के चलते ही नगर भर के सब स्त्री-पुरुष सुखी हो गये और उनके शरीर रोमांच से भर गये।

चौपाई

बंदि पितर सुर सुकृत सँभारे। जौं कछु पुन्य प्रभाउ हमारे॥ तौ सिवधनु मृनाल की नाईं। तोरहुँ रामु गनेस गोसाईं॥ ४ ॥

अर्थ:

उन्होंने पितरों और देवताओं की वन्दना करके अपने पुण्यों का स्मरण किया। यदि हमारे पुण्यों का कुछ भी प्रभाव हो, तो हे गणेश गोसाईं! रामचन्द्रजी शिवजी के धनुष को कमल की डंडी की भाँति तोड़ डालें।

दोहा

रामहि प्रेम समेत लखि सखिन्ह समीप बोलाइ। सीता मातु सनेह बस बचन कहइ बिलखाइ॥ २५५ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी को [वात्सल्य] प्रेम के साथ देखकर और सखियों को समीप बुलाकर सीताजी की माता स्नेहवश बिलखकर (विलाप करती हुई-सी) ये वचन बोलीं—

दोहा 256 के अंतर्गत
चौपाई

सखि सब कौतुकु देखनिहारे। जेउ कहावत हितू हमारे॥ कोउ न बुझाइ कहइ गुर पाहीं। ए बालक असि हठ भलि नाहीं॥ १ ॥

अर्थ:

हे सखी! ये जो हमारे हितू कहलाते हैं, वे भी सब तमाशा देखनेवाले हैं। कोई भी इन्हें गुरु विश्वामित्रजी को समझाकर नहीं कहता कि ये (रामजी) बालक हैं, इनके लिये ऐसा हठ अच्छा नहीं। [जो धनुष रावण और बाण-जैसे जगद्विजयी वीरों के हिलाये न हिल सका, उसे तोड़ने के लिये मुनि विश्वामित्रजी का रामजी को आज्ञा देना और रामजी का उसे तोड़ने के लिये चल देना रानी को हठ जान पड़ा, इसलिये वे कहने लगीं कि गुरु विश्वामित्रजी को कोई समझाता भी नहीं।]

चौपाई

रावन बान छुआ नहिं चापा। हारे सकल भूप करि दापा॥ सो धनु राजकुअँर कर देहीं। बाल मराल कि मंदर लेहीं॥ २ ॥

अर्थ:

रावण और बाणासुर ने जिस धनुष को छुआ तक नहीं और सब राजा घमंड करके हार गये, वही धनुष इस सुकुमार राजकुमार के हाथ में दे रहे हैं। हंस के बच्चे भी कहीं मन्दराचल पहाड़ उठा सकते हैं?

चौपाई

भूप सयानप सकल सिरानी। सखि बिधि गति कछु जाति न जानी॥ बोली चतुर सखी मृदु बानी। तेजवंत लघु गनिअ न रानी॥ ३ ॥

अर्थ:

राजा का भी सारा सयानापन समाप्त हो गया। हे सखी! विधाता की गति कुछ जानने में नहीं आती। तब एक चतुर सखी कोमल वाणी से बोली—हे रानी! तेजवान् को [देखने में छोटा होने पर भी] छोटा नहीं गिनना चाहिये।

चौपाई

कहँ कुंभज कहँ सिंधु अपारा। सोषेउ सुजसु सकल संसारा॥ रबि मंडल देखत लघु लागा। उदयँ तासु तिभुवन तम भागा॥ ४ ॥

अर्थ:

कहाँ घड़े से उत्पन्न होनेवाले [छोटे-से] मुनि अगस्त्य और कहाँ अपार समुद्र? किन्तु उन्होंने उसे सोख लिया, जिसका सुयश सारे संसार में छाया हुआ है। सूर्य मण्डल देखने में छोटा लगता है, पर उसके उदय होते ही तीनों लोकों का अन्धकार भाग जाता है।

दोहा

मंत्र परम लघु जासु बस बिधि हरि हर सुर सर्ब। महामत्त गजराज कहुँ बस कर अंकुस खर्ब॥ २५६ ॥

अर्थ:

जिसके वश में ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सभी देवता हैं, वह मन्त्र अत्यन्त छोटा होता है। महान् मतवाले गजराज को छोटा-सा अंकुश वश में कर लेता है।

दोहा 257 के अंतर्गत
चौपाई

काम कुसुम धनु सायक लीन्हे। सकल भुवन अपने बस कीन्हे॥ देबि तजिअ संसउ अस जानी। भंजब धनुषु राम सुनु रानी॥ १ ॥

अर्थ:

कामदेव ने फूलों का ही धनुष-बाण लेकर समस्त लोकों को अपने वश में कर रखा है। हे देवी! ऐसा जानकर सन्देह त्याग दीजिये। हे रानी! सुनिये, रामचन्द्रजी धनुष को अवश्य ही तोड़ेंगे।

चौपाई

सखी बचन सुनि भै परतीती। मिटा बिषादु बढ़ी अति प्रीती॥ तब रामहि बिलोकि बैदेही। सभय हृदयँ बिनवति जेहि तेही॥ २ ॥

अर्थ:

सखी के वचन सुनकर रानी को [श्रीरामजी के सामर्थ्य के सम्बन्ध में] विश्वास हो गया। उनकी उदासी मिट गयी और श्रीरामजी के प्रति उनका प्रेम अत्यन्त बढ़ गया। उस समय श्रीरामचन्द्रजी को देखकर सीताजी भयभीत हृदय से जिस-तिस [देवता] से विनती कर रही हैं।

चौपाई

मनहीं मन मनाव अकुलानी। होहु प्रसन्न महेस भवानी॥ करहु सफल आपनि सेवकाई। करि हितु हरहु चाप गरुआई॥ ३ ॥

अर्थ:

वे व्याकुल होकर मन-ही-मन मना रही हैं—हे महेश-भवानी! मुझ पर प्रसन्न होइये, मैंने आपकी जो सेवा की है, उसे सुफल कीजिये और मुझ पर स्नेह करके धनुष के भारीपन को हर लीजिये।

चौपाई

गननायक बरदायक देवा। आजु लगें कीन्हिउँ तुअ सेवा॥ बार बार बिनती सुनि मोरी। करहु चाप गुरुता अति थोरी॥ ४ ॥

अर्थ:

हे गणों के नायक, वर देने वाले देवता गणेशजी! मैंने आज ही के लिये तुम्हारी सेवा की थी। बार-बार मेरी विनती सुनकर धनुष का भारीपन बहुत ही कम कर दीजिये।

दोहा

देखि देखि रघुबीर तन सुर मनाव धरि धीर। भरे बिलोचन प्रेम जल पुलकावली सरीर॥ २५७ ॥

अर्थ:

श्रीरघुबीरजी के शरीर को देख-देखकर देवता धीरज धरकर मनाते हैं। उनके नेत्रों में प्रेमजल भरा है और शरीर में रोमाञ्च हो रहा है।

दोहा 258 के अंतर्गत
चौपाई

नीकें निरखि नयन भरि सोभा। पितु पनु सुमिरि बहुरि मनु छोभा॥ अहह तात दारुनि हठ ठानी। समुझत नहिं कछु लाभु न हानी॥ १ ॥

अर्थ:

अच्छी तरह नेत्र भरकर श्रीरामजी की शोभा देखकर, फिर पिताजी के प्रण का स्मरण करके सीताजी का मन क्षुब्ध हो उठा। [वे मन-ही-मन कहने लगीं—] अहो! पिताजी ने बड़ा ही कठिन हठ ठाना है, वे लाभ-हानि कुछ भी नहीं समझ रहे हैं।

चौपाई

सचिव सभय सिख देइ न कोई। बुध समाज बड़ अनुचित होई॥ कहँ धनु कुलिसहु चाहि कठोरा। कहँ स्यामल मृदुगात किसोरा॥ २ ॥

अर्थ:

मन्त्री डर रहे हैं; इसलिये कोई उन्हें सीख भी नहीं देता, पण्डितों की सभा में यह बड़ा अनुचित हो रहा है। कहाँ तो वज्र से भी बढ़कर कठोर धनुष और कहाँ ये कोमलशरीर किशोर श्यामसुन्दर।

चौपाई

बिधि केहि भाँति धरौं उर धीरा। सिरस सुमन कन बेधिअ हीरा॥ सकल सभा कै मति भै भोरी। अब मोहि संभुचाप गति तोरी॥ ३ ॥

अर्थ:

हे विधाता! मैं हृदय में किस तरह धीरज धरूँ, सिरस के फूल के कण से कहीं हीरा छेदा जाता है। सारी सभा की बुद्धि भोली (बावली) हो गयी है, अतः हे शिवजी के धनुष! अब तो मुझे तुम्हारा ही आसरा है।

चौपाई

निज जड़ता लोगन्ह पर डारी। होहि हरुअ रघुपतिहि निहारी॥ अति परिताप सीय मन माहीं। लव निमेष जुग सय सम जाहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

तुम अपनी जड़ता लोगों पर डालकर, श्रीरघुनाथजी [के सुकुमार शरीर] को देखकर [उतने ही] हलके हो जाओ। इस प्रकार सीताजी के मन में बड़ा ही सन्ताप हो रहा है। निमेष का एक लव (अंश) भी सौ युगों के समान बीत रहा है।

दोहा

प्रभुहि चितइ पुनि चितव महि राजत लोचन लोल। खेलत मनसिज मीन जुग जनु बिधु मंडल डोल॥ २५८ ॥

अर्थ:

प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को देखकर फिर पृथ्वी की ओर देखती हुई सीताजी के चंचल नेत्र इस प्रकार शोभित हो रहे हैं, मानो चन्द्रमण्डलरूपी डोल में कामदेव की दो मछलियाँ खेल रही हों।

दोहा 259 के अंतर्गत
चौपाई

गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी। प्रगट न लाज निसा अवलोकी॥ लोचन जलु रह लोचन कोना। जैसें परम कृपन कर सोना॥ १ ॥

अर्थ:

सीताजी की वाणीरूपी भ्रमरी को उनके मुखरूपी कमल ने रोक रखा है। लाजरूपी रात्रि को देखकर वह प्रकट नहीं हो रही है। नेत्रों का जल नेत्रों के कोने में ही रह जाता है। जैसे बड़े भारी कंजूस का सोना कोने में ही गड़ा रह जाता है।

चौपाई

सकुची ब्याकुलता बड़ि जानी। धरि धीरजु प्रतीति उर आनी॥ तन मन बचन मोर पनु साचा। रघुपति पद सरोज चितु राचा॥ २ ॥

अर्थ:

अपनी बढ़ी हुई व्याकुलता जानकर सीताजी सकुचा गयीं और धीरज धरकर हृदय में विश्वास ले आयीं कि यदि तन, मन और वचन से मेरा प्रण सच्चा है और श्रीरघुनाथजी के चरणकमलों में मेरा चित्त वास्तव में अनुरक्त है,

चौपाई

तौ भगवानु सकल उर बासी। करिहि मोहि रघुबर कै दासी॥ जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू॥ ३ ॥

अर्थ:

तो सबके हृदय में निवास करनेवाले भगवान् मुझे रघुश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी की दासी अवश्य बनायेंगे। जिसका जिसपर सच्चा स्नेह होता है, वह उसे मिलता ही है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है।

चौपाई

प्रभु तन चितइ प्रेम तन ठाना। कृपानिधान राम सबु जाना॥ सियहि बिलोकि तकेउ धनु कैसें। चितव गरुरु लघु ब्यालहि जैसें॥ ४ ॥

अर्थ:

प्रभु की ओर देखकर सीताजी ने शरीर के द्वारा प्रेम ठान लिया (अर्थात् यह निश्चय कर लिया कि यह शरीर इन्हीं का होकर रहेगा या रहेगा ही नहीं)। कृपानिधान श्रीरामजी सब जान गये। उन्होंने सीताजी को देखकर धनुष की ओर कैसे ताका, जैसे गरुड़जी छोटे-से साँप की ओर देखते हैं।

दोहा

लखन लखेउ रघुबंसमनि ताकेउ हर कोदंडु। पुलकि गात बोले बचन चरन चापि ब्रह्मांडु॥ २५९ ॥

अर्थ:

इधर जब लक्ष्मणजी ने देखा कि रघुकुलमणि श्रीरामचन्द्रजी ने शिवजी के धनुष की ओर ताका है, तो वे शरीर से पुलकित हो ब्रह्माण्ड को चरणों से दबाकर निम्नलिखित वचन बोले—

दोहा 260 के अंतर्गत
चौपाई

दिसिकुंजरहु कमठ अहि कोला। धरहु धरनि धरि धीर न डोला॥ रामु चहहिं संकर धनु तोरा। होहु सजग सुनि आयसु मोरा॥ १ ॥

अर्थ:

हे दिग्गजो! हे कच्छप! हे शेष! हे वाराह! धीरज धरकर पृथ्वी को थामे रहो, जिससे यह हिल न पाए। श्रीरामचन्द्रजी शिवजी के धनुष को तोड़ना चाहते हैं। मेरी आज्ञा सुनकर सब सावधान हो जाओ।

चौपाई

चाप समीप रामु जब आए। नर नारिन्ह सुर सुकृत मनाए॥ सब कर संसउ अरु अग्यानू। मंद महीपन्ह कर अभिमानू॥ २ ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी जब धनुष के समीप आए, तब सब स्त्री-पुरुषों ने देवताओं और पुण्यों को मनाया। सब का सन्देह और अज्ञान, मंद महीपों का अभिमान।

चौपाई

भृगुपति केरि गरब गरुआई। सुर मुनिबरन्ह केरि कदराई॥ सिय कर सोचु जनक पछितावा। रानिन्ह कर दारुन दुख दावा॥ ३ ॥

अर्थ:

परशुरामजी के गर्व की गुरुता, देवता और श्रेष्ठ मुनियों की कातरता (भय), सीताजी का सोच, जनक का पश्चात्ताप और रानियों के दारुण दुःख का दावानल।

चौपाई

संभुचाप बड़ बोहितु पाई। चढ़े जाइ सब संगु बनाई॥ राम बाहुबल सिंधु अपारू। चहत पारु नहिं कोउ कड़हारू॥ ४ ॥

अर्थ:

ये सब शिवजी के धनुषरूपी बड़े जहाज को पाकर, समाज बनाकर उस पर जा चढ़े। ये श्रीरामचन्द्रजी की भुजाओं के बलरूपी अपार समुद्र के पार जाना चाहते हैं, परंतु कोई कड़हारू नहीं है।

दोहा

राम बिलोके लोग सब चित्र लिखे से देखि। चितई सीय कृपायतन जानी बिकल बिसेषि॥ २६० ॥

अर्थ:

श्रीरामजी ने सब लोगों की ओर देखा और उन्हें चित्र में लिखे हुए-से देखकर फिर कृपाधाम श्रीरामजी ने सीताजी की ओर देखा और उन्हें विशेष व्याकुल जाना।