धनुषभंग
विश्वामित्रजी की आज्ञा से श्रीरामजी सहज भाव से शिवजी का धनुष उठाते हैं। प्रत्यंचा चढ़ाते ही वह धनुष भंग हो जाता है और सभा आश्चर्य तथा हर्ष से भर उठती है।
बालकाण्ड · प्रकरण ५२ / ५९
प्रकरण पाठ
लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें। काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़ें॥ तेहि छन राम मध्य धनु तोरा। भरे भुवन धुनि घोर कठोरा॥ ४ ॥
अर्थ:
लेते, चढ़ाते और जोर से खींचते हुए किसी ने नहीं लखा (अर्थात् ये तीनों काम इतनी फुर्ती से हुए कि धनुष को कब उठाया, कब चढ़ाया और कब खींचा, इसका किसी को पता नहीं लगा); सब ने श्रीरामजी को [धनुष खींचे] खड़े देखा। उसी क्षण श्रीरामजी ने धनुष को बीच से तोड़ डाला। भरे भुवन में घोर, कठोर ध्वनि गूँज उठी।
भरे भुवन घोर कठोर रव रबि बाजि तजि मारगु चले। चिक्करहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कूरुम कलमले॥ सुर असुर मुनि कर कान दीन्हें सकल बिकल बिचारहीं। कोदंड खंडेउ राम तुलसी जयति बचन उचारहीं॥
अर्थ:
घोर, कठोर शब्द से [सब] लोक भर गये; सूर्य के घोड़े मार्ग छोड़कर चलने लगे। दिग्गज चीत्कार करने लगे, धरती डोलने लगी, शेष, वाराह और कच्छप कलमला उठे। देवता, असुर और मुनि कानों पर हाथ रखकर सब व्याकुल होकर विचारने लगे। तुलसीदास कहते हैं, जब [सब को निश्चय हो गया कि] श्रीरामजी ने धनुष को तोड़ डाला, तब सब 'जयति' का वचन उच्चारने लगे।
रही भुवन भरि जय जय बानी। धनुषभंग धुनि जात न जानी॥ मुदित कहहिं जहँ तहँ नर नारी। भंजेउ राम संभुधनु भारी॥ ४ ॥
अर्थ:
सारे ब्रह्माण्ड में जय-जयकार की ध्वनि छा गयी, जिसमें धनुष टूटने की ध्वनि जान ही नहीं पड़ती। जहाँ-तहाँ स्त्री-पुरुष प्रसन्न होकर कह रहे हैं कि श्रीरामचन्द्रजी ने शिवजी के भारी धनुष को तोड़ डाला।