धनुषभंग

विश्वामित्रजी की आज्ञा से श्रीरामजी सहज भाव से शिवजी का धनुष उठाते हैं। प्रत्यंचा चढ़ाते ही वह धनुष भंग हो जाता है और सभा आश्चर्य तथा हर्ष से भर उठती है।

बालकाण्ड · प्रकरण ५२ / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

देखी बिपुल बिकल बैदेही। निमिष बिहात कलप सम तेही॥ तृषित बारि बिनु जो तनु त्यागा। मुएँ करइ का सुधा तड़ागा॥ १ ॥

अर्थ:

उन्होंने जानकीजी को बहुत ही विकल देखा। उनका एक-एक क्षण कल्प के समान बीत रहा था। यदि प्यासा आदमी पानी के बिना शरीर छोड़ दे, तो उसके मर जाने पर अमृत का तालाब भी क्या करेगा?

चौपाई

का बरषा सब कृषी सुखानें। समय चुकें पुनि का पछितानें॥ अस जियँ जानि जानकी देखी। प्रभु पुलके लखि प्रीति बिसेषी॥ २ ॥

अर्थ:

सारी खेती के सूख जाने पर वर्षा किस काम की? समय बीत जाने पर फिर पछताने से क्या लाभ? जी में ऐसा समझकर श्रीरामजी ने जानकीजी की ओर देखा और उनका विशेष प्रेम लखकर वे पुलकित हो गये।

चौपाई

गुरहि प्रनामु मनहिं मन कीन्हा। अति लाघवँ उठाइ धनु लीन्हा॥ दमकेउ दामिनि जिमि जब लयऊ। पुनि नभ धनु मंडल सम भयऊ॥ ३ ॥

अर्थ:

मन-ही-मन उन्होंने गुरु को प्रणाम किया और बड़ी फुर्ती से धनुष को उठा लिया। जब उसे [हाथ में] लिया, तब वह धनुष बिजली की तरह चमका और फिर आकाश में मण्डल-जैसा हो गया।

चौपाई

लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें। काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़ें॥ तेहि छन राम मध्य धनु तोरा। भरे भुवन धुनि घोर कठोरा॥ ४ ॥

अर्थ:

लेते, चढ़ाते और जोर से खींचते हुए किसी ने नहीं लखा (अर्थात् ये तीनों काम इतनी फुर्ती से हुए कि धनुष को कब उठाया, कब चढ़ाया और कब खींचा, इसका किसी को पता नहीं लगा); सब ने श्रीरामजी को [धनुष खींचे] खड़े देखा। उसी क्षण श्रीरामजी ने धनुष को बीच से तोड़ डाला। भरे भुवन में घोर, कठोर ध्वनि गूँज उठी।

छन्द

भरे भुवन घोर कठोर रव रबि बाजि तजि मारगु चले। चिक्करहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कूरुम कलमले॥ सुर असुर मुनि कर कान दीन्हें सकल बिकल बिचारहीं। कोदंड खंडेउ राम तुलसी जयति बचन उचारहीं॥

अर्थ:

घोर, कठोर शब्द से [सब] लोक भर गये; सूर्य के घोड़े मार्ग छोड़कर चलने लगे। दिग्गज चीत्कार करने लगे, धरती डोलने लगी, शेष, वाराह और कच्छप कलमला उठे। देवता, असुर और मुनि कानों पर हाथ रखकर सब व्याकुल होकर विचारने लगे। तुलसीदास कहते हैं, जब [सब को निश्चय हो गया कि] श्रीरामजी ने धनुष को तोड़ डाला, तब सब 'जयति' का वचन उच्चारने लगे।

सोरठा

संकर चापु जहाजु सागरु रघुबर बाहुबलु। बूड़ सो सकल समाजु चढ़ा जो प्रथमहिं मोह बस॥ २६१ ॥

अर्थ:

शिवजी का धनुष जहाज है और श्रीरामचन्द्रजी की भुजाओं का बल समुद्र है। [धनुष टूटने से] वह सारा समाज डूब गया, जो मोहवश पहले इस जहाज पर चढ़ा था।

दोहा 262 के अंतर्गत
चौपाई

प्रभु दोउ चापखंड महि डारे। देखि लोग सब भए सुखारे॥ कौसिकरूप पयोनिधि पावन। प्रेम बारि अवगाहु सुहावन॥ १ ॥

अर्थ:

प्रभु ने धनुष के दोनों टुकड़े पृथ्वी पर डाल दिये। यह देखकर सब लोग सुखी हुए। विश्वामित्ररूपी पवित्र समुद्र में, जिसमें प्रेमरूपी सुन्दर अथाह जल भरा है।

चौपाई

रामरूप राकेसु निहारी। बढ़त बीचि पुलकावलि भारी॥ बाजे नभ गहगहे निसाना। देवबधू नाचहिं करि गाना॥ २ ॥

अर्थ:

रामरूपी पूर्णचन्द्र को देखकर पुलकावलीरूपी भारी लहरें बढ़ने लगीं। आकाश में बड़े जोर से नगाड़े बजने लगे और देवबधुएँ गान करके नाचने लगीं।

चौपाई

ब्रह्मादिक सुर सिद्ध मुनीसा। प्रभुहि प्रसंसहिं देहिं असीसा॥ बरिसहिं सुमन रंग बहु माला। गावहिं किंनर गीत रसाला॥ ३ ॥

अर्थ:

ब्रह्मा आदि देवता, सिद्ध और मुनीश्वर प्रभु की प्रशंसा कर रहे हैं और आशीर्वाद दे रहे हैं। वे रंग-बिरंगे फूल और मालाएँ बरसा रहे हैं। किन्नर लोग रसीले गीत गा रहे हैं।

चौपाई

रही भुवन भरि जय जय बानी। धनुषभंग धुनि जात न जानी॥ मुदित कहहिं जहँ तहँ नर नारी। भंजेउ राम संभुधनु भारी॥ ४ ॥

अर्थ:

सारे ब्रह्माण्ड में जय-जयकार की ध्वनि छा गयी, जिसमें धनुष टूटने की ध्वनि जान ही नहीं पड़ती। जहाँ-तहाँ स्त्री-पुरुष प्रसन्न होकर कह रहे हैं कि श्रीरामचन्द्रजी ने शिवजी के भारी धनुष को तोड़ डाला।

दोहा

बंदी मागध सूतगन बिरुद बदहिं मतिधीर। करहिं निछावरि लोग सब हय गय धन मनि चीर॥ २६२ ॥

अर्थ:

धीर बुद्धिवाले भाट, मागध और सूत लोग विरुदावली (कीर्ति) का बखान कर रहे हैं। सब लोग घोड़े, हाथी, धन, मणि और वस्त्र निछावर कर रहे हैं।

दोहा 263 के अंतर्गत
चौपाई

झाँझि मृदंग संख सहनाई। भेरि ढोल दुंदुभी सुहाई॥ बाजहिं बहु बाजने सुहाए। जहँ तहँ जुबतिन्ह मंगल गाए॥ १ ॥

अर्थ:

झाँझ, मृदंग, शंख, शहनाई, भेरी, ढोल और सुहावने दुंदुभि आदि बहुत प्रकार के सुन्दर बाजे बज रहे हैं। जहाँ-तहाँ युवतियाँ मंगल गीत गा रही हैं।

चौपाई

सखिन्ह सहित हरषी अति रानी। सूखत धान परा जनु पानी॥ जनक लहेउ सुखु सोचु बिहाई। पैरत थकें थाह जनु पाई॥ २ ॥

अर्थ:

सखियों सहित रानी अत्यन्त हर्षित हुई। मानो सूखते हुए धान पर पानी पड़ गया हो। जनकजी ने सोच त्यागकर सुख प्राप्त किया। मानो तैरते-तैरते थके हुए पुरुष ने थाह पा ली हो।

चौपाई

श्रीहत भए भूप धनु टूटे। जैसें दिवस दीप छबि छूटे॥ सीय सुखहि बरनिअ केहि भाँती। जनु चातकी पाइ जलु स्वाती॥ ३ ॥

अर्थ:

धनुष टूट जाने पर राजालोग ऐसे श्रीहीन (निस्तेज) हो गये, जैसे दिन में दीपक की शोभा जाती रहती है। सीताजी के सुख को किस भाँति वर्णन किया जाय; जैसे चातकी स्वाती का जल पा गयी हो।

चौपाई

रामहि लखनु बिलोकत कैसें। ससिहि चकोर किसोरकु जैसें॥ सतानंद तब आयसु दीन्हा। सीताँ गमनु राम पहिं कीन्हा॥ ४ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी को लक्ष्मणजी किस प्रकार देख रहे हैं, जैसे चन्द्रमा को चकोर का बच्चा देख रहा हो। तब शतानन्दजी ने आज्ञा दी और सीताजी ने श्रीरामजी के पास गमन किया।

दोहा

संग सखीं सुंदर चतुर गावहिं मंगलचार। गवनी बाल मराल गति सुषमा अंग अपार॥ २६३ ॥

अर्थ:

साथ में सुंदर, चतुर सखियाँ मंगलाचार गा रही हैं; सीताजी बाल-हंस की गति से चलीं। उनके अंगों में अपार शोभा है।