कवि वन्दना

कवि पूर्ववर्ती महाकवियों को प्रणाम करते हैं, जिनकी वाणी ने धर्म, भक्ति और रस को समृद्ध किया। उन्हीं की परम्परा में वे विनम्रतापूर्वक अपनी रचना आरम्भ करते हैं।

बालकाण्ड · प्रकरण ८ / ५९

प्रकरण पाठ

चौपाई

एहि प्रकार बल मनहि देखाई। करिहउँ रघुपति कथा सुहाई॥ ब्यास आदि कबि पुंगव नाना। जिन्ह सादर हरि सुजस बखाना॥ १ ॥

अर्थ:

इस प्रकार मन को बल दिखलाकर मैं श्रीरघुनाथजी की सुहावनी कथा की रचना करूँगा। व्यास आदि जो अनेकों श्रेष्ठ कवि हो गये हैं, जिन्होंने बड़े आदर से श्रीहरि का सुयश वर्णन किया है।

चौपाई

चरन कमल बंदउँ तिन्ह केरे। पुरवहुँ सकल मनोरथ मेरे॥ कलि के कबिन्ह करउँ परनामा। जिन्ह बरने रघुपति गुन ग्रामा॥ २ ॥

अर्थ:

मैं उन सब (श्रेष्ठ कवियों) के चरणकमलों में प्रणाम करता हूँ वे मेरे सब मनोरथों को पूरा करें। कलियुग के भी उन कवियों को मैं प्रणाम करता हूँ, जिन्होंने श्रीरघुनाथजी के गुणसमूहों का वर्णन किया है।

चौपाई

जे प्राकृत कबि परम सयाने। भाषाँ जिन्ह हरि चरित बखाने॥ भए जे अहहिं जे होइहहिं आगें। प्रनवउँ सबहि कपट सब त्यागें॥ ३ ॥

अर्थ:

जो बड़े बुद्धिमान् प्राकृत कवि हैं, जिन्होंने भाषा में हरिचरित्रों का वर्णन किया है, जो ऐसे कवि पहले हो चुके हैं, जो इस समय वर्तमान हैं और जो आगे होंगे, उन सबको मैं सारा कपट त्याग कर प्रणाम करता हूँ।

चौपाई

होहु प्रसन्न देहु बरदानू। साधु समाज भनिति सनमानू॥ जो प्रबंध बुध नहिं आदरहीं। सो श्रम बादि बाल कबि करहीं॥ ४ ॥

अर्थ:

आप सब प्रसन्न होकर यह वरदान दीजिये कि साधु-समाज में मेरी कविताका सम्मान हो; क्योंकि बुद्धिमान् लोग जिस कविताका आदर नहीं करते, मूर्ख कवि ही उसकी रचना का व्यर्थ परिश्रम करते हैं।

चौपाई

कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई॥ राम सुकीरति भनिति भदेसा। असमंजस अस मोहि अँदेसा॥ ५ ॥

अर्थ:

कीर्ति, कविता और सम्पत्ति वही उत्तम है जो गंगा जी की तरह सबका हित करनेवाली हो। श्रीरामचन्द्रजी की कीर्ति तो बड़ी सुन्दर (सबका अनन्त कल्याण करनेवाली ही) है, परन्तु मेरी कविता भद्दी है। यह असमंजस है (अर्थात्‌ इन दोनों का मेल नहीं मिलता), इसी की मुझे चिन्ता है।

चौपाई

तुम्हरी कृपाँ सुलभ सोउ मोरे। सिअनि सुहावनि टाट पटोरे॥ ६ ॥

अर्थ:

परन्तु हे कवियो! आपकी कृपा से यह बात भी मेरे लिये सुलभ हो सकती है। रेशम की सिलाई टाट पर भी सुहावनी लगती है।

दोहा

सरल कबित कीरति बिमल सोइ आदरहिं सुजान। सहज बयर बिसराइ रिपु जो सुनि करहिं बखान॥ १४ (क) ॥

अर्थ:

चतुर पुरुष उसी कविता का आदर करते हैं, जो सरल हो और जिसमें निर्मल चरित्र का वर्णन हो तथा जिसे सुनकर शत्रु भी स्वाभाविक वैर को भूलकर सराहना करने लगें।

दोहा

सो न होइ बिनु बिमल मति मोहि मति बल अति थोर। करहु कृपा हरि जस कहउँ पुनि पुनि करउँ निहोर॥ १४ (ख) ॥

अर्थ:

ऐसी कविता बिना निर्मल बुद्धि के होती नहीं और मेरी बुद्धि का बल बहुत ही थोड़ा है। इसलिये बार-बार निहोरा करता हूँ कि हे कवियो! आप कृपा करें, जिससे मैं हरि यश का वर्णन कर सकूँ।

दोहा

कबि कोबिद रघुबर चरित मानस मंजु मराल। बालबिनय सुनि सुरुचि लखि मो पर होहु कृपाल॥ १४ (ग) ॥

अर्थ:

कवि और पण्डितगण। आप जो रामचरित्ररूपी मानसरोवर के सुन्दर हंस हैं, मुझ बालक की विनती सुनकर और सुन्दर रुचि देखकर मुझपर कृपा करें।